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परोथन – लघुकथा -

परोथन – लघुकथा -

 "अरे छुटकी, देख तो कौन है दरवाजे पर"?

"कोई भिखारिन जैसी लड़की है अम्मा"।

"बिटिया, एक कटोरा गेंहू दे दे उसे”|

“अम्मा, वह तो बोल रही है कि उसे केवल आटा ही चाहिये”।

"अरे तो क्या हुआ छुटकी, एक कटोरा आटा ही दे दे बेचारी को"।

"पर अम्मा, आटा तो एक बार के लिये ही था तो सारा गूँथ लिया"।

"एक कटोरा भी नहीं बचा क्या"?

"ऐसे तो है, एक कटोरा, पर वह परोथन के लिये है"।

"अरे तो वही देदे मेरी बच्ची। हम लोग एक दिन बिना परोथन की, हाथ…

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Added by TEJ VEER SINGH on September 26, 2017 at 12:28pm — 24 Comments

प्राण-स्वप्न

ख़्यालों में गिरफ़्तार

गम्भीर   उदास

अपना सिर टेक कर

इ-त-नी पास

तुम इतनी पास

तो कभी नहीं बैठती थी

फिर आज...?

मिलने पर 

न स्वागत

न शिकायत

न कोई बात

अपने में ही सोचती-सी ठहरी

धड़कन की खलबली में भी

तुम इतनी आत्मीय ...

मेरे बालों की अव्यवस्था को ठेलती

कभी शाम के मौन में  शाम की

निस्तब्धता को पढ़ती

शांत पलकें, अब अलंकार-सी

जागती-सी सोचती, कुछ…

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Added by vijay nikore on September 26, 2017 at 12:24pm — 12 Comments

ग़ज़ल नूर की-मुझ को कोई ख़रीद ले सस्ता किए बग़ैर

२२१/ २१२१/ १२२१/ २१२ (अरकान सही क्रम में हैं या नहीं ये मुझे नहीं पता)



मुझ को कोई ख़रीद ले सस्ता किए बग़ैर

रुसवाई यानी हो भी तो रुसवा किए बग़ैर. 

.

रुख्सत किया है ज़ह’न से यादें लपेट कर, 

तन्हा किया है आप ने तन्हा किए बग़ैर.

.

झुकिए अना को छोड़ के गर इल्म चाहिए,

मिलता नहीं सवाब भी सजदा किए बग़ैर.

.

जिस दर पे पूरी होतीं मुरादें तमाम-तर  

हम वाँ से लौट आये तमन्ना किए बग़ैर.

.

मुझ को न हो गुरूर मेरे नूर का कभी  

रौशन…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on September 26, 2017 at 11:30am — 27 Comments

ग़ज़ल - वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने

बह्र : 2122-1122-1122-112/22

फिर मुहब्बत से लिया नाम तुम्हारा उसने

वार मुझ पर है किया कितना करारा उसने

मेरी कश्ती को समन्दर में उतारा उसने

और फिर कर दिया तूफ़ाँ को इशारा उसने

डूबते वक़्त दी आवाज़ बहुत मैंने मगर

बैठ कर दूर से देखा था नज़ारा उसने

आप कहते थे इसे बख़्श दो, देखो ख़ुद ही

मुझ में ख़ंजर ये उतारा है दुबारा उसने

ग़ैर भी कोई गुज़ारे न किसी ग़ैर के साथ 

वक़्त…

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Added by Mahendra Kumar on September 26, 2017 at 10:00am — 30 Comments

ये कैसे हो गया

ये क्यूँ और कैसे हो गया

हद में रहकर भी बेहद हो गया 

  

था कभी जो नज़रों और ख्वाबों में,

ना जाने अब क्यूँ ओझल हो गया

चाहूँ मैं उसको जितना ज्यादा 

वो दूर क्यूँ मुझसे उतना हो गया

ये क्यूँ और कैसे हो गया

हद में रहकर भी बेहद हो गया

सोचा भूल जाऊँ अब उसे मैं 

पर वो क्यूँ मेरी रूह में बस गया

लौट-लौट कर आती हैं यादें तेरी

क्यूँ हर लम्हा मेरा तेरे नाम हो गया

पाना क्यूँ…

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Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on September 25, 2017 at 10:06pm — 7 Comments

वो दिन---

"तुम रातभर बैचेन थी। हो सके तो आज आराम करो। मैंने चाय बनाकर थर्मस में डाल दी हैं। मैं नाश्ता, खाना आफ़िस में ही ली लूँगा, तुम बस अपना बनवा लेना। आफ़िस से छुट्टी ले लो।"

पास तकिए पर रखे कागज को पढा और चूमकर सीने पर रख लिया। आफ़िस में इस एक दिन के अवकाश की लड़ाई लड़ी और जीती भी थी।

चाय का कप लेकर बालकनी में आई तो सहज ही प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनती उन लड़कियों पर नजर गयी। उफ्फ, ये लोग क्या करती होंगी इन दिनों? कप हाथ में लिए-लिए ही झट नीचे आयी। उन्हें आवाज लगाकर अपने…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on September 25, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल (३)

२२ २२ २२ २२ २२ २२  

दिल की बातें वो भी समझें ये  सोचा था 

होंगी मिलकर सारी बातें ये  सोचा था ?

चले जायेंगे अपने रस्ते वो भी इक दिन 

रह जाएंगी तन्हा रातें ये   सोचा था ?

जीवन जैसा होगा उसको जी लेना है 

दर्दो अलम की ले सौगातें ये सोचा था ?

एक बहाना मुझको जीने का मिल जाता 

रह जातीं बस उनकी यादें ये सोचा था ?

डूब गयीं हूँ प्यार में जिनके मैं " रौनक"…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 25, 2017 at 9:30pm — 18 Comments

आपका हक़ - डॉo विजय शंकर

क्या कहा ,
आपका हक़ आपको
दिया नहीं गया ?
क्योंकि हक़ आपका आपसे
हाथ जोड़ के माँगा नहीं गया।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on September 25, 2017 at 8:04pm — 16 Comments

गीत -जिसको मैं दिन रात पढ़ूँ वो पुस्तक है मेरी|

दिल में कसक है तेरी यादों का हक है तेरी,

जिसको मैं दिन रात पढ़ूँ वो पुस्तक है मेरी|

दिल में ............

तू ही मेरा सांध्य-गीत है, और भोर वंदन है,

जिसमें मैं निज को निज देखूं नैन तेरे दर्पण है|

तेरी खातिर खुले हमेशा सब दिल के दरवाजे,

चाहे जिससे तू आ जाए तेरा अभिनंदन है||

दिल तो तेरा है पर उसकी धक-धक है तेरी,

दिल में ......

.

गंगा-सा मन पावन तेरा, यमुना सा निर्मल हो,

सरस्वती-सी बुद्धि तुम्हारी, चंडी-सा सम्बल…

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Added by ARUNESH KUMAR 'Arun' on September 25, 2017 at 7:00pm — 4 Comments

तेरे इंतज़ार में ...

तेरे इंतज़ार में ...

गज़ब करता रहा

तेर हर वादे पे

यकीं करता रहा

हर लम्हा

तेरी मोहब्बत में

कई कई सदियाँ

जीता रहा

और हर बार

सौ सौ बार

मरता रहा

पर अफ़सोस

तू

मुझे न जी सकी

मैं

तुझे न जी सका

पी लिया

सब कुछ मगर

इक अश्क न पी सका

मेरी ख़ामोशी को तूने

मेरी नींद का

बहाना समझा

तू

ग़फ़लत में रही

और

मैं

अजल का हो गया

तिश्नागर आँखों के …

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Added by Sushil Sarna on September 25, 2017 at 2:00pm — 19 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आईने में सिंगार कौन करे (फिलबदीह ग़ज़ल 'राज')

2122     1212  22

.

दिल को फिर बेकरार कौन करे

आपका ऐतबार कौन करे

 

कत्ल का दिन अगर मुकर्रर है

 ज़िन्दगानी से प्यार कौन करे

 …

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Added by rajesh kumari on September 25, 2017 at 12:30pm — 39 Comments

ग़ज़ल-गलतियाँ किससे नही होतीं-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212



गलतियाँ किससे नही होतीं भला संसार में

है मगर शुभ आचरण निज भूल के स्वीकार में



शून्य में सामान्यतः तो कुछ नही का बोध पर

है यहाँ क्या शेष छूटा शून्य के विस्तार में



आधुनिकता के दुशासन ने किया ऐसे हरण

द्रौपदी निर्वस्त्र है खुद कलियुगी अवतार में



सूर्य को स्वीकार गर होता न जलना साथियों

तो भला क्या वो कभी करता प्रभा संसार में



व्यर्थ ही व्याख्यान आदर्शों पे देने से भला

अनुसरण कुछ कीजिये इनका निजी… Continue

Added by रामबली गुप्ता on September 25, 2017 at 5:00am — 49 Comments

छोटी बहर की ग़ज़ल

बहर - 2112
काफ़िया - आम; रदीफ़ - चले

जाम चले
काम चले।

मौत लिये
आम चले।

खुद का कफ़न
थाम चले।

सांसें आठों
याम चले।

सुब्ह हो या
शाम चले।

लोग अवध
धाम चले।

मन में बसा
राम चले।

पैसा हो तो
नाम चले।

जग में 'नमन'
दाम चले


मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on September 24, 2017 at 3:30pm — 8 Comments

गजल(कह रहे,...)

2122 2122 212

कह रहे,घर को सजाया जा रहा

लग रहा सच को दबाया जा रहा।1



खून का धब्बा पड़ा गहरा बहुत

अब पसीने से मिटाया जा रहा।2



हो गयी पहली रपट रद्दी वहाँ

जाँच दल फिर से लगाया जा रहा।3



आदमी अब आदमी से तंग है

'नाम' ले-लेकर डराया जा रहा।4



मुजरिमों की हो गयी बल्ले यहाँ

बेगुनाहों को फँसाया जा रहा।5



मर्सिया माकूल होता ,क्या कहूँ?

गीत परिणय का सुनाया जा रहा।6



घिर गयी काली घटा, कहते सभी-

अब सबेरा को… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 24, 2017 at 11:00am — 10 Comments

बाज़ार में जूतमपैजार (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"अब्बू, चलिए जूतों की दुकान पर!"
"नहीं बेटा, ई़़द़ के लिए तुम ही कोई सस्ती सी चप्पलें ख़रीद लाओ मेरे लिए!"
"आप भी चलिये न, दिल बहल जायेगा!" सुहैल ने अपने अब्बू को पलंग से लगभग उठाते हुए कहा।
"ख़ाक दिल बहलेगा। वहां तो ऐसा लगता है कि ग्राहक, दुकान के नौकर और मालिक और जूते-चप्पलों की कम्पनियां सब एक-दूसरे को जूते मार रहे हों!"
"हां, सो तो है! जूतमपैजार और हमें ग़रीबी का अहसास!" सुहैल ने अब्बू को पलंग पर लिटाते हुए कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 24, 2017 at 10:44am — 9 Comments

आएं न आएं वो लेकिन - सलीम रज़ा रीवा

22 22 22 22 22 22 22 2

.........................................

आएं न आएं वो  लेकिन हम आस लगाए .बैठे हैं 

दिन ढलते ही शमए मुहब्बत घर में जलाए बैठे हैं 

..

आख़िर दिल की बात ज़ुबाँ तकआये तो कैसेआये 

अपनी  ख़ामोशी  में  वो  सब  राज़  छुपाये बैठे हैं 

..

हैरत है जो प्यार मुहब्बत से ना वाकिफ़ हैं यारो 

वह  इल्ज़ाम दग़ाबाज़ी का मुझ पे लगाए  बैठे हैं

..

कौन है अपना कौन…

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Added by SALIM RAZA REWA on September 24, 2017 at 10:00am — 25 Comments

ग़ज़ल -तरही -2(उनके सोए हुए जज़्बात जगा भी न सकूँ )

(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फइलुन /फेलुन)

आ गया हूँ वहाँ जिस जा से मैं जा भी न सकूँ |

मा सिवा उनके कहीं दिल को लगा भी न सकूँ |

इस तरह बैठे हैं वो फेर के आँखें मुझ से

उनके सोए हुए जज़्बात जगा भी न सकूँ |

मेरी महफ़िल में किसी ग़ैर को लाने वाले

दिल से मजबूर हूँ मैं तुझको जला भी न सकूँ |

फितरते तर्के महब्बत है तेरी यार मगर 

तेरी इस राय को मैं अपना बना भी न सकूँ |

इतना मजबूर भी मुझको न खुदा कर देना…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 24, 2017 at 9:00am — 16 Comments

ग़ज़ल -- लिखूं सच को सच ये हुनर शेष है ( दिनेश कुमार )

122___122___122___12



लिखूँ सच को सच, ये हुनर शेष है

अभी रोशनाई में डर शेष है



क़दम उठ रहे हैं इकट्ठे मगर

दिलों के मिलन का सफ़र शेष है



बुझाओ न तुम शम्अ उम्मीद की

फ़क़त रात का इक पहर शेष है



भले उनकी दस्तार है तार तार

वो ख़ुश हैं कि काँधे पे सर शेष है



चमन में लगी आग, लगती रहे

मुझे क्या, अभी मेरा घर शेष है



दशहरा मनाने का क्या फ़ाइदा

बुराई का ख़ूँ में असर शेष है



जो हातिम सा इमदाद सबकी… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 24, 2017 at 6:57am — 22 Comments

तरही ग़ज़ल

122 122 122 12

उन्हें देखकर ये बदलने लगा
नहीं टिक सका दिल फिसलने लगा

नदी से मिलन की घड़ी आ गयी
*समन्दर खुशी से मचलने लगा*

जमाने से मिलती रही ठोकरें
उन्हीं की बदौलत सँभलने लगा

लगा संग दिल ही था जो अब तलक
वो किलकारियों से पिघलने लगा

पड़ोसी लगाता रहा आग जो
वही आज खुद देखो जलने लगा

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 24, 2017 at 6:46am — 8 Comments

सूत्र और सूत्रधार (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"छोटा सा काम हो या बड़ा, छोटा लक्ष्य हो या बड़ा; कुछ हासिल करने के लिए सबसे पहले सूत्र चाहिए, जुगाड़ चाहिए, बस!"

"हां, सूत्र से सूत्र मिलते हैं, कड़ी से कड़ी जुड़ती है, तभी मंज़िल का रास्ता तय होता है!"

इन दोनों की बातें सुनकर तीसरे व्यक्ति ने कहा- "लेकिन मेरे तो यही सूत्र हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, इसकी टोपी उसके सर और उंगली पकड़कर कर पौंछा पकड़ना!"

यह सुनकर चौथा व्यक्ति अपना सीना तान कर खड़ा हुआ और बोला- "इनमें मेरी सफलता के सूत्र भी जोड़ दो। छोटा हो या बड़ा;… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 23, 2017 at 11:50pm — 15 Comments

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