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गीत -जिसको मैं दिन रात पढ़ूँ वो पुस्तक है मेरी|

दिल में कसक है तेरी यादों का हक है तेरी,

जिसको मैं दिन रात पढ़ूँ वो पुस्तक है मेरी|

दिल में ............

तू ही मेरा सांध्य-गीत है, और भोर वंदन है,

जिसमें मैं निज को निज देखूं नैन तेरे दर्पण है|

तेरी खातिर खुले हमेशा सब दिल के दरवाजे,

चाहे जिससे तू आ जाए तेरा अभिनंदन है||

दिल तो तेरा है पर उसकी धक-धक है तेरी,

दिल में ......

.

गंगा-सा मन पावन तेरा, यमुना सा निर्मल हो,

सरस्वती-सी बुद्धि तुम्हारी, चंडी-सा सम्बल हो।

जीवन मेँ बन कर के त्रिवेणी, तुम बहती रहती हो,

दिखे तुम्हारे सजल नयन जब जन-जन-मन विह्वल हो॥

 मै तो तेरी प्रेम-वस्तु,  तू ग्राहक है मेरी ,

दिल में .....

.*******************************************

मौलिक एवम् अप्रकाशित 

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 27, 2017 at 11:24am

आदरणीय अरुण भाई , भाव पूर्न अच्छी गीत रचना की है .. हार्दिक बधाइयाँ । आ. रामबली भाई जी से मै भी सहमत हूँ .. गीत को और कुछ समय की ज़रूरत है .. शिल्प मे कसने के लिए ।

Comment by Mohammed Arif on September 27, 2017 at 7:59am
आदरणीय अरुणेश जी आदाब, गीत का अच्छा प्रयास । हार्दिक बधाई स्वीकार करें । गुणीजनों की बातों का संज्ञान लें ।
Comment by रामबली गुप्ता on September 26, 2017 at 10:04pm
भाई अरुणेश जी गीत पर प्रयास अच्छा है। कथ्य और भाव भी अच्छे है। किंतु बताना चाहूंगा गीत में प्रवाह और गेयता की भारी कमी है। इसलिए शिल्प के दृष्टिकोण से रचना कमजोर है।
Comment by Samar kabeer on September 26, 2017 at 3:20pm
जनाब अरुण जी आदाब,गीत का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।
गीत के बारे में इस मंच पर आलेख मौजूद हैं,उनका अध्यन करें ।

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