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बदन पे वही लिबास भाई।

22 22 22 22
बदन पे वही लिबास भाई।
दिखता फिर से उदास भाई।।

कड़वाहट की बातें छोड़ो।
कुछ तो रखिये मिठास भाई।।

वादों की बौछार न करिये।
सच में हो इक प्रयास भाई।।

मरा भूख से फिर भी देखो।
लगते क्या क्या कयास भाई।।

चाँद तारे किस काम के जब।
दीपक से घर उजास भाई।।
********************
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on January 31, 2015 at 10:00am — 10 Comments

राधॆश्यामी छन्द :

राधॆश्यामी छन्द :

=====================



भारत की यह पावन धरती,प्रगटॆ कितनॆं भगवान यहाँ !!

समय समय पर महापुरुष भी,दॆनॆ आयॆ सद्ज्ञान यहाँ !!



वॆद,ऋचायॆं लिखकर जिसनॆ,जीवन शैली सिखला दी है !!

एक शून्य मॆं सारी दुनियाँ,जॊड़,घटा कर दिखला दी है !!



इतिहास यहाँ का भरा पड़ा, वलिदानों की गाथाऒं सॆ !!

गूँज रहा है शौर्य आज भी, वीरॊं की अमर चिताऒं सॆ !!



शौर्य-शिरॊमणि यॆ भारत है,सत्य,अहिंसा की है डॊरी !!

एक दृष्टि सॆ पूर्ण पुरुष है,एक…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 31, 2015 at 12:30am — 5 Comments

सत्य तो परमात्मा है

किंचित मात्र सत्य नहीं जहाँ 

वहाँ बहरूपिया बन कर ,

 ढ़ोल पीट - पीट  कर ,

बना रहे अपना अपना सत्य। 

जहाँ सारी शक्तियाँ हो जाती हैं आसक्त । 

ये ज्ञात तो होता कौन से ,

अपराध का परिणाम है । 

कहीं तो दिखाई देता ,

जो भूल का प्रमाण है । 

जो ज्ञात नहीं वह कैसा अपराध ?

कैसा न्याय फिर सत्य का । 

जो मुझे मेरा रूप न दिखा सके ।

जो मुझमे न समा सके । 

'सत्य तो परमात्मा है '

हर शरीर की आत्मा है। 

तो…

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Added by pratibha tripathi on January 30, 2015 at 9:00pm — 4 Comments

माँ तू सुनती क्यों नहीं

माँ तू सुनती क्यों नहीं

तूँ बुनती क्यों नहीं

इक नई सी जिंदगी

वो घुटनों पे चलना

वो आँखों को मलना

वो मिटटी को खाना

बिना सुर के गाना

वो चिल्ला के कहना

मुझे रोटी देना

आज फिर चूल्हे पे पानी

तूँ पकाती क्यों नहीं

माँ तूँ सुनती क्यूँ नहीं

वो तेरी हथेली

में कितनी पहेली

वो मेरा कसकना

वो तेरा सिसकना

वो ममता की छाया

मुझे याद आया

वो मुस्कान तेरी

वो पेशानी मेरी

आज फिर से बोशा

सजाती क्यूँ नहीं

माँ…

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Added by vijay on January 30, 2015 at 7:30pm — 9 Comments

जिन्दा रखना - लघुकथा

सुकन्या भारतीय वायुसेना में नौकरी के पहले दिन तैयार होते ही भागी भागी आयी और अपनी माँ मधु को एक सैल्यूट करते हुए कहा, "माँ देखो, तुम्हारा सपना, तुम्हारे सामने| अब और क्या चाहिये तुम्हे?"

मधु की आखों में चमक के साथ साथ आंसू भी आ गये| उसने कहा, "एक वादा और चाहिये, बेटे| यदि तेरे भी बेटी हुई और तेरा पति और सास उसकी हत्या करने की कोशिश करे, तो तू मेरे जैसे अपनी बेटी को लेकर भाग मत आना| तेरी बेटी की रक्षा करने का कोई न कोई तरीका तुझे तेरे अफसर सिखा ही देंगे|"

(मौलिक…

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Added by Chandresh Kumar Chhatlani on January 30, 2015 at 7:00pm — 8 Comments

ताटंक छंद -

1.

कीमत बड़ी चुकाकर पाया, यह गणतंत्र हमारा है |

आज चलो सब मिलकर गायें, भारत हमको प्यारा है|

सस्य स्यामला धरती अपनी,नभ तक शुभ्र हिमाला है|

चरण पखारें नदियाँ निर्मल, सागर लहरों वाला है |

2.

प्रहरी हैं हम आर्या वर्ती , हममें दमखम भारी है |

छद्म युद्ध अब बंद करो खुद, अबकी तेरी बारी है|

डटकर हम तो लड़े लड़ाई पीठ नहीं दिखलाते हैं |

भारत माँ की रक्षा खातिर सिर उपहार चढाते हैं ||

3.

हिन्दू, मस्लिम, सिख, इसाई हमसब भाई भाई हैं|

इक दूजे की…

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Added by Chhaya Shukla on January 30, 2015 at 1:00pm — 8 Comments

मकान जब घर बनता है

दीवारें चहकने सी लगे  

मकान जब घर बनता है 

तेरे आने से घर मेरा 

जन्नत बनता है 



खुशियाँ , सावन की 

घटाएँ बनने लगी   

किलकारी से तेरी  

मेरी दुनिया सजने लगी  



खिड़कियाँ घर की 

उम्मीद का सूरज लाए

सुगन्धित मस्त पवन 

गीत बहारों के गुनगुनाएँ



आँगन में फागुन 

रंग नए बिखरा गया 

बसंती खेत की तरह   

मेरे घर को वो लहरा गया

सरसों की फसल सम  

मनभावन सा घर 

पूज्य है मुझको मेरा छोटा सा घर…

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Added by डिम्पल गौर 'अनन्या' on January 30, 2015 at 10:08am — 6 Comments

घी (लघुकथा )

"यार,काव्य-गोष्ठी तो बहुत कर लीं पर काव्य-सम्मेलनों से बुलावा नहीं आता |"

"अरे मिट्टी के माध, अच्छी कविता लिखना–पढ़ना ही काफ़ी नहीं|"

"तो !"

"तोता बनना सीखो |"

"कैसे?"

"सज्जन के घर राम-राम |और चोर के घर-माल-माल |और फिर पाँचों अंगुलियाँ घी में | "

.

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by somesh kumar on January 30, 2015 at 10:00am — 6 Comments

ग़ज़ल .........;;;गुमनाम पिथौरागढ़ी

2122 2122 212

जब हमें दिल का लगाना आ गया

राह में देखो ज़माना आ गया



ख़त तुम्हारा देखकर बोले सभी

खुशबू का झोंका सुहाना आ गया



इक पता लेके पता पूंछे चलो

बात करने का बहाना आ गया



नाम तेरा जपते जपते यूँ लगे

अब तुझे ही गुनगुनाना आ गया



ज़िन्दगी रफ़्तार में चलती रही

मौत बोली अब ठिकाना आ गया



बेरुखी ने ही दिखाया गई हमें

फूल पत्थर पर चढ़ाना आ गया



शख्स इक गुमनाम देखा बोले सब

शहर में…

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Added by gumnaam pithoragarhi on January 30, 2015 at 8:00am — 8 Comments

हरनर्तन छन्द,,

हरनर्तन छन्द,(वीभत्स रस)

==================

शिल्प=,१२,,,७,,,७,,,यति

==================



याद है वह दृश्य जब, इन्सान कुछ, नंगॆ हुयॆ !!

जल उठा धूँ-धूँ नगर, जब मज़हबी, दंगॆ हुयॆ !!

रक्त की प्यासी बला,बस रक्त ही पीने लगी !!

कैद होकर ज़िन्दगी,खुद ख़ौफ़ में,जीने लगी !!



थे कई नवजात शिशु, माँ बेटियाँ,…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 30, 2015 at 12:30am — 5 Comments

वजूद

"आप का नाम क्या है ?" बगल में आई नयी पड़ोसन ने पूछा |
वो सोच में पड़ गयी , क्या बताये | शादी के बाद जब से इस घर में आई है तब से तो किसी ने उसके नाम से नहीं पुकारा | शुरू में बहू , फिर मुन्ने की माँ और अब मिसेस शर्मा , यही सुनती आई है वो | शायद तीस साल बहुत होते हैं किसी को खुद का वजूद भूलने के लिए | वो अपना वजूद ढूँढ रही थी , पड़ोसन चली गयी थी |

.

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by vinaya kumar singh on January 29, 2015 at 9:30pm — 12 Comments

घाव की मौजूदगी में - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122   2122    2122   2122

******************************

मन  किसी  अंधे  कुए  में  नित  वफ़ा  को  ढूँढता है

जबकि तन  लेकर हवस को रात दिन बस भागता है

*****

तार  कर  इज्जत   सितारे   घूमते  बेखौफ  होकर

कह रहे सब खुल के वचलना चाँद की भोली खता है

*****

जिंदगी  भर  यूँ  अदावत  खूब  की   तूने  सभी  से

मौत  के  पल  मिन्नतें  कर  राह  में क्यों रोकता है

****

जाँच  को  फिर  से  बिठाओ आँसुओं कोई कमीशन

घाव   की   मौजूदगी    में    दर्द  …

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Added by laxman dhami on January 29, 2015 at 11:14am — 12 Comments

सरकार - इनकी उनकी--- डॉo विजय शंकर

लोगों की , लोगों से , लोगों के लिए
सरकार होती है ,
हमने इनकी , उनकी ,
हर इनकी , हर उनकी ,
सरकार बना दी , लोगों से छीन कर ।
हालात ये हैं कि अब हर एक
ठगा सा लगता है,
दूसरे की हो सरकार तो
डरा डरा सा लगता है ॥
खुद अपनी हो सरकार तो
ज्यादा ही अड़ा अड़ा सा लगता है ॥
अपनी स्वतंत्रता , अपना राज , अपनी सरकार ,
सब कुछ अपना अपना है , दूजे सब बेकार ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित
डॉo विजय शंकर

Added by Dr. Vijai Shanker on January 29, 2015 at 10:29am — 22 Comments

ग़ज़ल-- मेरे हँसने हँसाने पे शक़ है उसे

212  212  212  212

मेरे हँसने हँसाने पे शक़ है उसे

बेव़जह मुस्कुराने पे शक़ है उसे

.................

अलव़िदा कह गया जाता-जाता मग़र

आज़तक भूलपाने पे शक़ है उसे

....................

हर किसी से करूँ ज़िक्र मैं यार का

पर व़फायें निभाने पे शक़ है उसे

...................

कब से तनहाई दुल्हन बनी है मेरी 

पर तुझे भूल जाने पे शक़ है उसे

.................

आँसुओं से समन्दर भी मैंने भरा

मेरे आँसू बहाने पे शक़ है उसे





उमेश…

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Added by umesh katara on January 29, 2015 at 9:19am — 23 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
क्या आप सच में वैसे ही हैं ? --- अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

मेरे सबसे प्रिय रचनाकार  

कभी प्रत्यक्ष मिला नहीं आपसे

सपना है मेरा ,

आपसे मिलना , बातें करना

घंटों ,

किसी झील के किनारे

सूनसान में

 

आपकी हर रचनायें

गढती जाती है

मेरे अन्दर आपको

बनती जाती है

आपकी छवि ,

कभी धुंधली , कभी चमक दार , साफ साफ

क़ैद है मेरे दिलो दिमाग़ में

आपकी रचनाओं की सारी खूबियों के साथ

आपकी एक बहुत प्यारी छवि

 

क्या आप सच में वैसे ही हैं

जैसी आपकी…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 29, 2015 at 8:16am — 24 Comments

ताटंक छन्द

एक लघु प्रयास (ताटंक छन्द) *****************************



राष्ट्र-वन्दना के स्वर फिर से,वीणाओं में गूँजेंगे ।।

शीश चढ़ाकर अगणित बॆटॆ,भारत माँ को पूजेंगे ।।

षड़यंत्रों नें बाँध रखा है, आज हिन्द को घेरे में ।।

मानवता का दीप जलायें, आऒ सभी अँधेरे में ।।



अपने अपने धर्म दॆवता, लगते सबकॊ प्यारे हैं ।।

जितने प्यारे प्राण…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 29, 2015 at 3:33am — 5 Comments

ग़ज़ल -- कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती

कहानियों में हक़ीक़त नहीं हुआ करती

बिना फरेब सियासत नहीं हुआ करती



ज़बान दे के पलटना तुम्हें मुबारक हो

मैं ख़ुश हूँ, मुझसे तिज़ारत नहीं हुआ करती



मैं कैसे झूठ को सच और सच को झूठ कहूँ

कि एक दिन में ये आदत नहीं हुआ करती



जो चंद पैसों में ईमान बेच देते हैं

उन्हें किसी से रिफ़ाक़त नहीं हुआ करती



कभी अनाड़ी था वो आज नामी शायर है

कभी फ़ुज़ूल मशक़्क़त नहीं हुआ करती



'दिनेश' तू भी ज़माने का ढंग अपना ले

शरीफ़ लोगों की इज़्ज़त नहीं हुआ… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 28, 2015 at 7:30pm — 11 Comments

मानव का मान करो ….

मानव का मान करो ….

सिर से नख तक

मैं कांप गया

ऐसा लगा जैसे

अश्रु जल से

मेरे दृग ही गीले नहीं हैं

बल्कि शरीर का रोआं रोआं

मेरे अंतर के कांपते अहसासों,

मेरी अनुभूतियों के दर पे

अपनी फरियाद से

दस्तक दे रहे थे

दस्तक एक अनहोनी की

एक नृशंस कृत्य की

एक रिश्ते की हत्या की

दस्तक उन चीखों की

जिन्हें अंधेरों ने

अपनी गहराई में

ममत्व देकर छुपा लिया

मैं असमर्थ था

अखबार का हर अक्षर

मेरी आँखों की नमी से

कांप रहा…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 28, 2015 at 3:03pm — 14 Comments

चारसू उठता धुंआ ही अब नजारों में

२१२२  २१२२   २१२२२

 

रहनुमा वो कह गया है क्या इशारों में

चारसू उठता धुंआ ही अब नजारों में

 

धुंध कुछ छाई है ऐसी अब फलक पे यूं

रोशनी मद्दिम सी लगती चाँद तारों में

 

साजिशों की आ रही है हर तरफ से बू

छुप के बैठी हैं खिजाएँ अब बहारों में

 

खेलते जो लोग थे तूफाँ में लहरों से

वक़्त ने उनको धकेला है किनारों में

 

है नहीं महफूज दुल्हन डोलियों में अब

क्या पता अहबाब ही हों इन…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on January 28, 2015 at 2:11pm — 13 Comments

एक व्यथा

रातों के बेच कर ,दिन की रोशनी मैं इज्जत से जिन मज़बूरी हैं मेरी

आत्मा को बेच कर ,चहरे पर ये रौशनी झूठी है मेरी

जिनके आगे रातें लूटी हैं लुटाया है मैंने ,

उन्हें दिन में इज्जत देने वालों की पहली कतार में पाया हैं मैने

रातों ......

वैसे कहने को तो सभ कुछ पाया है मैने ,

पर हकीकत ये है ,सब कुछ लुटाया  हैं मैंने

मेरे आंशुओं की नीलामी लगाई हैं उन्होंने

मेरे मजबूरियों की पूरी कीमत पाई है उन्होंने

रातों....

मुझे चीर…

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Added by Shyam Mathpal on January 28, 2015 at 12:00pm — 10 Comments

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