For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (10,514)

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता © परी ऍम. 'श्लोक'

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २



उस हरजाई का कोई पैग़ाम नहीं आता

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता



करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे

जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता



होगी कुछ सच्चाई तो कि धुआँ सा उठता है

यूँ ही तो सर पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता



तुमसे उल्फ़त ने ही ये हाल किया है अपना

दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता



दूर खड़ा साहिल पर बेहिस तकता है मुझको

हो मुश्किल चाहे कुछ भी वो काम नहीं आता



ए इश्क़ तेरी… Continue

Added by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 4:19pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : शातिर (गणेश जी बागी)

                      र्षिता क्लास की सबसे खुबसूरत लड़की थी, अधम, रंजित और उसकी मित्र मंडली, सभी उससे दोस्ती के लिए लालायित रहते थे किन्तु वह तो बस अपने काम से काम रखती थी. एक दिन हर्षिता को अकेला देख रंजित उससे बोला,

“हर्षिता मैं तुम्हे अपनी बहन बनाना चाहता हूँ क्या तुम मुझे अपना भाई होने का अधिकार दोगी ?”

माँ बाप की इकलौती बेटी हर्षिता रंजित को भाई के रूप में पाकर बहुत ख़ुश हो गयी. अब उसका उठना बैठना रंजित के साथ-साथ उसके दोस्तों के साथ भी होने…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 4, 2015 at 4:04pm — 3 Comments

अनाथ ( लघुकथा )

पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे ।

अंतिम संस्कार करके वापस चलते समय मौजूद सभी लोगों को रिवाज़ के अनुसार भरपेट नाश्ता कराकर वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे…

Continue

Added by vinaya kumar singh on July 4, 2015 at 2:03pm — 2 Comments

आस का सुर्योदय (लघुकथा ) कान्ता राॅय

आस का सुर्योदय ( लघुकथा )





सर पर लकड़ी का गठ्ठर , पसीने से तर- बतर वो घर की ओर चली आ रही थी । माई का डर मन ही मन सता रहा था उसे । कल रात ही माई ने बोल दिया था कि ,



"चुल्हा चौका और घर का काम करके अगर समय मिले तो ही पढना छोरी ! "

माई भी क्या करें .. खेत पर बापू के संग काम पर जाना जो होता है !



आज सुबह सीतो अखबार लेकर आ गई थी ।



" देख तु जिले में प्रथम स्थान पर आई है ! " -- सीतो ने जैसे ही कहा , सुनते ही उसके खुशी से पैर , बदन सब काँप उठे थे… Continue

Added by kanta roy on July 4, 2015 at 1:08pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - फिल बदीह -- सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी ( गिरिराज भंडारी )

122     122     122      122

पियादे से राजा की फिर मात होगी

सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी

 

दिशायें जहाँ पर समझ की अलग हैं

वहाँ अब ठिकाने की क्या बात होगी 

 

अभी मंज़िलों की न सोच ऐ मेरे दिल

अभी तो सफर की शुरुवात होगी

 

समझ कर ज़रा आप तस्लीम करिये

वो देते नहीं हक़ , ये ख़ैरात होगी

 

वही सुब्ह निकली , वही धूप पसरी

नया कुछ नहीं तो , वही रात होगी

 

यहाँ साजिशों में लगे सारे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on July 4, 2015 at 7:32am — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
किन्तु इनका क्या करें ? (नवगीत) // -सौरभ

खिड़कियों में घन बरसते

द्वार पर पुरवा हवा..

पाँच-तारी चाशनी में पग रहे

सपने रवा !

किन्तु इनका क्या करें ?



क्या पता आये न बिजली

देखना माचिस कहाँ है

फैलता पानी सड़क…

Continue

Added by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 2:00am — 9 Comments

स्टोरी ( लघुकथा )

" सर , मैं हस्पताल पहुँच गया हूँ , कवर करता हूँ एक्सीडेंट की स्टोरी "|

" अच्छा तो आपने देखा उनको , सामने देखकर कैसा लगा ? रिपोर्टर की आवाज़ ने उसके दर्द में इज़ाफ़ा कर दिया |

" अरे इतने बड़े स्टार से मुलाक़ात तो हो गयी , लोग तो तरसते हैं दूर से भी एक झलक पाने के लिए , कुछ बताईये ", और भी कुछ कह रहा था वो लेकिन दर्द और क्रोध के उबाल में उसने रिपोर्टर का माइक छीन कर फेंक दिया |

" स्टार , स्टार लगा रखा है , मेरी टूटी हड्डियाँ तुम्हे नहीं दिखती , दफा हो यहाँ से "|

मौलिक एवम…

Continue

Added by vinaya kumar singh on July 3, 2015 at 8:42pm — No Comments

लेपटॉप ( लघुकथा )

" अम्मा , दद्दा , छुटके ! ई देखो , नए फिसनवा की पेटी । ऊ सहर की सड़क पे मिळत रही । "

" तनिक खोल तो मुनिया , कउनो गहना- जेबर भए तो दरोग़ा के बुलवाई के पड़ी ।"

" खोलत हैं अम्मा , ई का ? भीतर तो दर्पन चिपकत रही , वो भी ठुस्स भेसईंन रंगत ।"

" का कहत है ? फैंक अबहीं । जुरूर ई सुसरा सहर वाले कौनों जादू-टोना करके पटकत गईल ।"

" पर दद्दा , ई के भीतरे जो ढेर डिबियाँ जमत रहि , ऊ का , का ? "

" जिज्जी , तनक उहे बी तो .....का पता , कौनो गोली- बिस्किट ही धरें हों । "

" सैतान !…

Continue

Added by shashi bansal on July 3, 2015 at 8:00pm — No Comments

अजनबी लाशें..

अजनबी लाशें..

पाठशाला में  पढाती  

आँंखें खोल कर,

सृ-िष्ट की सबसे सुन्दर कृति

नारी का हृदयंगम पाठ

अक्षर-अक्षर निर्वस्त्र, लिजलिजा भाव

भाषा नि:शब्द!

पर, संवेदना के पहाड़े याद नहीं होते।…

Continue

Added by Kewal Prasad on July 3, 2015 at 7:30pm — 1 Comment

पश्चाताप के आंसू

दीनानाथ चौधरी उर्फ डी एन चौधरी रेलवे से रिटायर्ड जूनियर इंजीनियर मरणासन्न अवस्था में सरकारी हॉस्पीटल में पड़ा था. बीच बीच में हिचकियों से उसका पूरा तन बदन उछल उठता. डॉक्टर सलाइन पे सलाइन लटकाए जा रहा था. अचानक उसे दिल का दौरा पड़ा था ऐसा सब कोई मानते थे पर, सच कुछ और था. दिल का दौरा उसे अचानक नहीं बल्कि आज का न्यूज पेपर देखने के बाद पड़ा था. आज का न्यूज पेपर उसके लिए कड़वे सच का बवंडर लेकर आया था, जिसकी उसने ना कभी कल्पना की थी और ना ही कल्पना करना उसके वश की बात थी. एक ही साथ दो दो कड़वे…

Continue

Added by Govind Pandit on July 3, 2015 at 5:30pm — No Comments

चेप्टर -1 - दोहे

चेप्टर -1 - दोहे

निंदा को आतुर रहें, करें नहीं गुणगान
मैल हिया में देख के ,रूठ गए भगवान

मालिक कैसा हो गया ,  तेरा ये इंसान
बन्दे तेरे लूटता , बन  कर वो भगवान


तेरा  अजब  संसार  है,हर  कोई  बेहाल
हर मानव को यूँ लगे, जग जैसे जंजाल


संस्कार  सब  खो गए ,  बढ़ने  लगी  दरार
जनम जनम के प्यार का, टूट गया आधार

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 3, 2015 at 4:01pm — 15 Comments

नीरवताएँ

नीरवताएँ

दुखपूर्ण भावों से भीतर छिन्न-भिन्न

साँस-साँस में लिए कोई दर्दीली उलझन

मेरे प्राण-रत्न, प्रेरणा के स्रोत

तुम कुछ कहो न कहो पर जानती हूँ मैं

किसी रहस्यमय हादसे से दिल में तुम्हारे

है अखंडित वेदना भीषण

चोट गहरी है

दुख का पहाड़ है

दुख में तुम्हारे .. तुम्हारे लिए

दुख मुझको भी है

रंज है मुझको कि संवेदन-प्रेरित हो कर भी

मैं कुछ कर नहीं पाती

खुले रिसते घाव को…

Continue

Added by vijay nikore on July 3, 2015 at 5:30am — No Comments

अपने अपने दर्द ( लघुकथा )

" आजकल इंडस्ट्री लगाना और उसे चलाना आसान नहीं रहा " कहते हुए उनके चेहरे का दर्द टपक गया |

" क्यों , क्या हो गया ऐसा ", आश्चर्य से पूछा उसने |

" अरे ये मनरेगा जो आ गया , अब जिसको अपने गाँव , घर में ही काम मिल जा रहा है , वो क्यों आएगा दूर काम करने "|

" और रही सही कसर ये शॉपिंग माल वाले पूरी कर दे रहे हैं | बढ़िया ए सी में काम मिल जा रहा है उनको "|

उसे अपना गाँव याद आ गया जहाँ ग्राम प्रधान और अधिकारी मिल कर मनरेगा का आधा से ज्यादा पैसा फ़र्ज़ी नाम से हड़प जाते हैं |

मज़दूर को…

Continue

Added by vinaya kumar singh on July 2, 2015 at 10:42pm — 10 Comments

परपोते की चाह (लघुकथा)

बुढ़िया दादी बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अपनी अंतिम साँसें गिन रही है. डॉ. साहब आते हैं, देखते हैं दवा देते हैं, कभी कोई इंजेक्शन भी चढ़ा देते हैं. डॉक्टर से धीरे धीरे बुदबुदाती है. – “बेटा, बंटी  से कहो न, जल्द से जल्द ‘परपोते’ का मुंह दिखा दे तो चैन से मर सकूंगी. मेरी सांस परपोते की चाह में अंटकी है."

बच्चे की जल्दी नहीं, (विचार वाला) बंटी अपनी कामकाजी पत्नी की तरफ देख मुस्कुरा पड़ा. …

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 2, 2015 at 8:48pm — 3 Comments

चुप्पी

कभी किसी की चुप्पी

कितना उदास कर जाती है।

साँसे  भी भारी होती जाती है।

मन हो जाता है उस झील- सा

जो कब से बारिश के इंतजार मे  थम सी गई हो 

और उसकी लहरें भी उंघ रही हो किसी किनारे बैठ के

शाम भी तो धीरे से गुजरी है अभी कुछ फुसफूसाती हुई

उसे भी किसी की चुप्पी का खयाल था शायद।

 

मौलिक व अप्रकाशित

Added by MAHIMA SHREE on July 2, 2015 at 8:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल :मीआ़दे उल्फ़त देखिये

2212 2212 2212





मीआ़दे उल्फ़त देखिये पूरी हुई

इतनी सी तब तो बात अब उतनी हुई.



क्या इश्क़ में दुनिया से तू भी तंग है

क्या तंज़ तुझ पे भी मेरी जैसी हुई.



दौरे गुज़श्ता दोनो पे गुज़रा यूँ कुछ

टूटा हुआ मैं,तू भी है टूटी हुई.



पाया है जो मेयार तेरे इश्क़ ने

लो! ज़िन्दगी क्या! रूह भी तेरी हुई.



ऐ चाँद! मुझको खींच ले ख़ुद की तरफ़

देखूं कि छत पे होगी वो आई हुई.



उनसा खिला गमले में इक गुल, अरे!

ख़ुशबूू भी… Continue

Added by shree suneel on July 2, 2015 at 6:42pm — 12 Comments

नवगीत : नाच रहा पंखा

देखो कैसे

एक धुरी पर

नाच रहा पंखा

 

दिनोरात

चलता रहता है

नींद चैन त्यागे

फिर भी अब तक

नहीं बढ़ सका

एक इंच आगे

 

फेंक रहा है

फर फर फर फर

छत की गर्म हवा

 

इस भीषण

गर्मी में करता

है केवल बातें

दिन तो छोड़ो

मुश्किल से अब

कटती हैं रातें

 

घर से बाहर

लू चलती है

जाएँ भला कहाँ

 

लगा घूमने का

बचपन से ही

इसको…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 6:26pm — 1 Comment

गुमनाम होता बचपन (लघुकथा)

प्रकाशक को उपन्यास की पाण्डुलिपि थमाकर लौटी, तो आज उसका मन फूल सा हल्का हो गया। पूरे छः माह की मेहनत साकार हुई थी।पुस्तक विमोचन, सम्मान,रॉयल्टी प्रसिद्धि ये सब बारी -2 से उसकी आँखों में कौंध गए। घर पहुंची तो देखा पाँच वर्षीय बेटा बड़ी बहन की गोद में सो रहा था।उसकी आँखों में सूखे अश्रु चिन्ह,तप्त शरीर,तोड़े मरोड़े गए खिलौने,अधूरा होमवर्क,डायरी में टीचर की शिकायत ।



उफ़...ये क्या कर बैठी मैं ? अपनी महत्वाकांक्षा में अपने बच्चे के बचपन को ही गुमनामी के अंधेरों में धकेल दिया।…



Continue

Added by jyotsna Kapil on July 2, 2015 at 6:00pm — 4 Comments

गुमनाम लखौड़ी पत्थर

कभी सुंदर रही इमारत , आज गुमनामी की धूल में दबी उस लखौड़ी की चीखें , प्रातः बुजर्गो व बच्चों के चहल कदमी का स्थल व दिन में चोंच से चोंच लड़ाते प्रेमियों के एकांत क्षणों के बीच दब कर रह गई।

नवाब को क्या पता था कि उसके द्वारा नीव में रखी लखौड़ी उसके वंशजो के लिए कांटे का ताज साबित होगी ।

 " मौलिक व अप्रकाशित "

Added by Pankaj Joshi on July 2, 2015 at 6:00pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अभी जीने की हसरत मुझमें बाकी है

1222/ 1222/ 1222
मेरे दिल में अजब सी बेकरारी है
अभी जीने की हसरत मुझमें बाकी है

मैं मेरी हसरतों के साथ तन्हा हूँ
किसे परवाह मेरी चाहतों की है

वो बरसेगा कि मुझ पर टूट जायेगा
अभी बादल मेरे सर पर उठा ही है

अचानक शह्र क्यों जलने लगा कहिये
शरारों को किसी ने तो हवा दी है

हक़ीकत ही कही थी मैंने तो ऐ दोस्त
ये देखो जान पर मेरी बन आई है

मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2015 at 4:26pm — 8 Comments

Monthly Archives

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Manoj kumar Ahsaas commented on Pari M Shlok's blog post मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता © परी ऍम. 'श्लोक'
"वाह वाह बहुत खूब सादर"
1 minute ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on kanta roy 's blog post कविता
"इस अच्छी कोशिश केलिए बधाइयाँ, आदरणीया.. सादर "
2 minutes ago
krishna mishra 'jaan'gorakhpuri commented on jyotsna Kapil's blog post गुमनाम होता बचपन (लघुकथा)
"बहुत ही बेहतरीन लघुकथा! आपकी लघुकथा ने ऐसे अनछुए पहलू  को छुआ है जो मेरे ख्याल से हर…"
8 minutes ago
krishna mishra 'jaan'gorakhpuri commented on jyotsna Kapil's blog post गुमनाम होता बचपन (लघुकथा)
"बहुत ही बेहतरीन लघुकथा! आपकी लघुकथा ने ऐसे अनछुए पहलू  को छुआ है जो मेरे ख्याल से हर…"
9 minutes ago
krishna mishra 'jaan'gorakhpuri commented on Pari M Shlok's blog post तू वहाँ मशरूफ़ मैं यहाँ तन्हा
"जी हाँ आ० अब ठीक है! //यहाँ सीखना ही उद्देश्य है// आपकी बात का स्वागत है!साथ ही आभार आपने मर्म…"
24 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on somesh kumar's blog post दो दिल दो रास्ते(कहानी,सोमेश कुमार )
"आपने मुग्ध कर दिया भाई सोमेश कुमारजी. जिस तरह से मनोभावों को शब्दबद्ध किया गया है वह चकित तो करता…"
41 minutes ago
shree suneel commented on Sushil Sarna's blog post चेप्टर -1 - दोहे
"तेरा अजब संसार है,हर कोई बेहाल हर मानव को यूँ लगे, जग जैसे जंजाल.. आदरणीय सुशील सरना सर जी, अच्छे…"
55 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on सुनील प्रसाद(शाहाबादी)'s blog post कला गीतिका-दौर गम का ये पिघलने दो जरा
"आदरणीय सुनील प्रसादजी, आपकी इस प्रस्तुति पर सार्थक चर्चा हो चुकी है. आप चाहें तो तदनुरूप एडिट कर…"
58 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on विवेक मिश्र's blog post ग़ज़ल (विवेक मिश्र)
"मज़ा आगया भाई विवेक. मन खुश हो गया. ग़ज़ल तो पूरी ही उम्दा है. लेकिन इस शेर ने कहीं दूरतक छुआ है. बस…"
1 hour ago
shree suneel commented on shree suneel's blog post ग़ज़ल :मीआ़दे उल्फ़त देखिये
"बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय नरेंद्र सिंह जी."
1 hour ago
shree suneel commented on shree suneel's blog post ग़ज़ल :मीआ़दे उल्फ़त देखिये
"शुक्रिया.. शुक्रिया आदरणीया परी जी."
1 hour ago
shree suneel commented on शिज्जु "शकूर"'s blog post अभी जीने की हसरत मुझमें बाकी है
"जी हाँ.... आदरणीय शिज्जु सर जी, ये अलिफ़ वस्ल का मामला था. क्षमा चाहूंगा. पुनः बधाइयाँ आपको इस…"
1 hour ago

© 2015   Created by Admin.

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service