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क्लीवत्व नदी बहती

सुनो बली है भारत भू अन्याय नहीं किंचित सहती

सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती

सच मानो हर मन में हमको क्रान्ति जगाना आता है

पाक बंग या चीन सरीखों को समझाना आता है

सत्य धर्म की रक्षा में हैं प्राण दान भी दे देते

तुष्ट करे रणचंडी को वो चक्र चलाना आता है

वक्र दृष्टि हो जाये हम पर जो वो दृष्टि नहीं रहती

सत्ता के गलियारों में तब क्यों क्लीवत्व नदी बहती

राष्ट्रवाद बलवान बड़ा है तभी सुनो यह देश टिका

पर…

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Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 20, 2013 at 6:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल - मंडी से आढ़त तक सबकी पर्ची कटी हुई !

ग़ज़ल - 

कुछ होनी कुछ अनहोनी का मेला  ही तो है ,

ये जीवन क्या माटी का एक ढेला ही तो है ।

साँसों की झीनी चादर पर रिश्तों के गोटे ,

भीड़ में भी होकर  हर शख्स अकेला ही तो है ।

इस घर से उस घर तक जाने में रोना हँसना ,

सब कुछ गुड्डे गुड़ियों का एक खेला ही तो है ।

सुख दुःख का संगम तट ये तन और सारा जीवन ,

आशाओं  उम्मीदों का एक रेला ही तो है ।

सूली ऊपर सेज पिया की छूने को तत्पर…

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Added by Abhinav Arun on May 20, 2013 at 3:58pm — 6 Comments

!!! नव गीत !!!

!!! नव गीत !!!



जन्नत सा खुशनुमा ये, लखनऊ है हमारा।



ये चमन है हमारा,

हम सुमन हैं सितारा

ये गोमती सुधारा,

मंगल करे हमारा

हम सादगी से जीते, इतिहास है हमारा।1 जन्नत सा...



नव रूप हो रहे हैं,

नवजात जन्म लेते

लम्बी चुप सी गलियां,

छत पर पतंग उड़ाते

पार हो रही नभ में ये, विकास है हमारा।2 जन्नत सा...



उलझन कभी न होती,

बसती रही कलोनी

बागों के दायरे भी,

सौन्दर्य को बढ़ाते

है नवाबी गवाही, चश्म सांस है…

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Added by Kewal Prasad on May 19, 2013 at 1:01pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल "बह रही गंगा अजल से पापियों के वास्ते"

हो गये सब सर कलम कुछ रोटियों के वास्ते 

जैसे उगते हों शज़र बस आरियों के वास्ते 



दौरे वहशत पूछिए मत, बढ़ रही कैसी हवस 

है परेशां बाप अपनी बच्चियों के वास्ते 



कुछ निवाले छीन लेते हैं गरीबों से भले 

रोज़ दाना लाएं साहब मछलियों के वास्ते 

देश के रक्षक उगाते बेच कर ईमान अब 

नोट की फसलें सियासी इल्लियों के वास्ते 



दौर है रफ़्तार का, फुर्सत नहीं खुद के लिए 

व्यस्त हैं सब कागज़ी कुछ चिन्दियों के…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 19, 2013 at 11:18am — 9 Comments

सागर में सागर की खोज [गीत ]

समन्दर में बसी मछली, समन्दर ढूढ़ती है क्यों ।

जो उसके हर तरफ फैला, उसे ना देखती है क्यों ।

वो सागर से पूछती है, बता तेरा पता है क्या ।

बताये कैसे ये सागर, बताने को भला है क्या ।

जहाँ पर वो वही सागर ,नही ये सोचती है क्यों ।

समन्दर में बसी मछली............................|

ना जाने कौन सा सागर, लिए बैठी ख़यालों में ।

वो लहरों में भटकती है, फसा करती है जालों में ।

वो पल पल जी रही जिसमे, उसी को भूलती है क्यों…

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Added by Neeraj Mishra on May 18, 2013 at 11:30pm — 2 Comments

चाँद बादल में छुपा [नज़्म]

चाँद बादल में छुपा,  परछाइयाँ भी खो गयीं ।

साथ मेरा छोड़ कर , तनहाइयाँ भी सो गयीं ।

चुप्पियों की बाढ़ आयी , सारे मेले बह गये ।

महफ़िलों की गोद में भी , हम अकेले रह गये ।

खामोश मेरे हाल पर , खामोशियाँ भी हो गयीं ।

साथ मेरा छोड़ कर ,…

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Added by Neeraj Mishra on May 18, 2013 at 11:00pm — 5 Comments

कंजूस

ठीक ही तो कहा उसने 

क्या दरिद्रों की तरह 

लम्हों के पीले पत्ते 

बटोरती हो और 

और कबाड़ी वाले की तरह 

टेर लगाए फिरती हो 

एहसासों के मोती चुगो 

और राज हंसिनी कहलाओ 

और…

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Added by Gul Sarika Thakur on May 18, 2013 at 9:30pm — 6 Comments

इक दीवाना मुसव्विर

"कुछ दिनों बाद

पूछेगी जब ये दुनिया मुझसे

हुआ क्या तेरी कलम को

क्यों रूठी है तुझसे वो

जबाब क्या दूँगा जानता नहीं…

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Added by Kedia Chhirag on May 18, 2013 at 7:30pm — 2 Comments

करें इश्क और रखें फिर भी दिल पे काबू ,क्या कहें

"करें इश्क और रखें फिर भी दिल पे काबू ,क्या कहें

बतलाएँ क्या कैसा रूप है तेरा कैसी है तू ,क्या कहें

डूबे कजियारी आँखों में तेरे तो जी ली ज़िन्दगी सारी

अज़ब है ये आशिकी भी…

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Added by Kedia Chhirag on May 18, 2013 at 7:30pm — No Comments

फेरीवाला

ये लो चाँद-सितारे ले लो

जगमगाती यादों के तारे ले लो

ज़िन्दगी कों हँसकर जीने कों…

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Added by POOJA AGARWAL on May 18, 2013 at 10:32am — 8 Comments

खनिकर्मी

कोयला खदान की

आँतों सी उलझी सुरंगों में

पसरा रहता अँधेरे का साम्राज्य



अधपचे भोजन से खनिकर्मी

इन सर्पीली आँतों में

भटकते रहते दिन-रात

चिपचिपे पसीने के साथ...



तम्बाकू और चूने को

हथेली पर मलते

एक-दूजे को खैनी खिलाते

सुरंगों में पिच-पिच थूकते

खानिकर्मी जिस भाषा में बात करते हैं

संभ्रांत समाज उस भाषा को

असंसदीय कहता, अश्लील कहता...



खदान का काम खत्म कर

सतह पर आते वक्त

पूछते अगली शिफ्ट के कामगारों से

ऊपर का…

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Added by anwar suhail on May 17, 2013 at 9:30pm — 4 Comments

आज हमे दोनों वक़्त खाना मिल जायेगा

बंज़र होती धरती

किसान बे-हाल है

सोच रहा है इस बार भी पानी मिलेगा

मेरी फसल को या नही

या गुजरे कई सालो जैसा ही

ये साल है .........

सोच रहा है ......

क्या कम होगा .......?????…

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Added by Sonam Saini on May 17, 2013 at 4:30pm — 6 Comments

अतुलनीय माँ।

अतुलनीय माँ।

 नौ महीनो में बनती है  एक औरत सम्पूर्ण 'माँ' ,

माता  बनता है उसका शरीर, ह्रदय और आत्मा।

परम पूजनीय ,अतुलनीय,दिव्य है माँ का रिश्ता , 

दूजे है उसके आगे, मंदिर ,मस्जिद ,देवी- देवता .

जैविक प्रक्रियाएँ हैं, दोनों  माँ  बनना और मात्रत्व ,

एक माँ ही तो है- जिसका धर्म है, पूर्ण नि:स्वार्थ .

 

धरती माँ जेसा धैर्य ,सहिष्णुता-…

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Added by Raj Kumar Jindal on May 17, 2013 at 3:21pm — 5 Comments

हास्य कविता

पत्नी बोली अजी सुनते हो

मुनुवा बहुत मिट्टी ख़ाता है

मैने कहा- ये असली राष्ट्र- निर्माता है

क्यूँ घबराती हो डियर

आगे चलकर बनेगा एंजीनियर

आज मिट्टी खा रहा है

कल गिट्टी खाएगा

परसों न जाने कितने पुल सड़क, बाँध और बड़ी- बड़ी परियोजनाओं

को चट कर जाएगा

राष्ट्र की मुख्य धारा मे शामिल हो जाएगा

सच्‍चे अर्थों मे यही विकास पुरुष कहलाएगा

तुम्हारा सुंदरी करण कराएगा

और मेरी नय्या पार लगाएगा

सच कहता हूँ मैं लड़का बहुत काम आएगा…





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Added by aditya chaturvedi on May 17, 2013 at 12:00pm — 12 Comments

जब दर्द गुजरता हो दिल से [नज़्म]

जब दर्द गुजरता हो दिल से , वो पल नज़दीक भी होने दो |

जब छोड़ के जाएँ लोग मुझे , अब वो तकलीफ भी होने दो |

तूफ़ान मै सारे सह जाऊं , बहने दो अगर मै बह जाऊं |

अब ये परवाह नही मुझको , मै मिटूँ या बाकी रह जाऊं |

न रोको मेरे इन अश्कों को बीती यादों को धोने दो…

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Added by Neeraj Mishra on May 17, 2013 at 11:00am — 7 Comments

आओ फिर बटवारा कर लो......

अब जो तुम ना लोटोगे तो

आओ फिर बटवारा कर लो

तुम अपने दिल से जो चाहो

वो सभी सोगातें रख लो....

 

हाँ मैं दोषी नहीं फिर भी चलो

मेरी गवाही तुम ले लो

गिनाते थे जो ऐब मुझ को

वो तुम अब लिख के दे दो.....

 

भर के रखे तुम्हारे लिए

अरमानो के पैमाने जो

जाते हुए उनका अंतिम

संस्कार खुद से कर दो

अब भी कोई बता दो

शर्त रखते हो तो

इस वक़्त उसे भी

आखिरी सलामी दे दो....

 

सूखे फूलो…

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Added by Priyanka singh on May 17, 2013 at 2:00am — 20 Comments

अनुभूति तुम्हारे प्यार की

 कह सकती हूँ अकेले ,

पर बाँट सकती हूँ,तुम्हारे संग |

मुस्करा सकती हूँ अकेले ,

पर हंस सकती हूँ तुम्हारे संग |

आनंद ले सकती हूँ अकेले ,…

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Added by Sarita Bhatia on May 17, 2013 at 12:00am — 12 Comments

सॉनेट/ आस सी भरती

14 पंक्तियां

पहली, तीसरी व दूसरी, चौथी  तुकान्त का क्रम

तेरहवी व चौदहवीं पंक्ति तुकान्त

साढ़े तीन का पद

 

जब जब सूरज की किरनें पूरब में चमकी

जगत में छाया गहन तिमिर तब तब छंटता

लेकिन अंधियारा…

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Added by बृजेश नीरज on May 16, 2013 at 11:30pm — 8 Comments

अदभुत समर्पण

तूफ़ान जोरों पर था , बादलों की घुमड़ घुम भी शुरू हो चुकी थी , पतझड़ के मौसम में सारी पत्तियां झड़ चुकी थीं , उनका तिनकों से बना घोंसला मुझे साफ़ नज़र आ रहा था , वो हवा में डोलती डालों पर सहमे सहमे बैठे कभी अपने घोंसलों को देखते तो कभी इस तूफानी मंज़र में अपनी नज़र इधर उधर दौड़ाते , एकाएक मै उन परिंदों की भाव वेदना में डूब सा गया , कितने बेसहारा, कितने असुरक्षित , कितना निर्दोष भाव ,कोई शिकायत नही , ये कैसा समर्पण , लगा कि कहर भी परमात्मा ढा रहा हो और उसे झेल भी परमात्मा ही रहा हो , दो…

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Added by Neeraj Mishra on May 16, 2013 at 9:34pm — 7 Comments

माँ

माँ होती है आदि गुरु

जीवन की दी प्राथमिक शिक्षा

बोलना सिखाया जिसने हमेँ

चलना सिखाया जिसने हमें

वो है माँ



होता है स्वर्ग का अहसास

माँ के ही आँचल में

मिलता है सुकून मन को

की जो माँ की निस्वार्थ सेवा

अपार कष्ट सहा जिसने

वेदना सही जिसने असीम

जन्म दिया फिर भी हमको

वो है माँ



परवाह नहीं की जिसने

अपनी भूख और प्यास की

अन्न पहुँचाया हमारे पेट

खुद पानी पीकर सो रही

हमको ना उसने भूखा सुलाया

वो है… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on May 16, 2013 at 6:31pm — 4 Comments

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