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दो गज़लें

1.

फैलुन फैलुन फैलुन फैलुन फाइलुन

२२ २२ २२ २२ २१२ 

बहरे मुतदारिक कि मुजाहिफ सूरत 

************************************************************************************************************************

जब से वो मेरी दीवानी हो गई 

पूरी अपनी राम कहानी हो गई 

काटों ने फूलों से कर लीं यारियां 

गुलचीं को थोड़ी आसानी हो गई 

थोड़ा थोड़ा देकर इस दिल को सुकूं

याद पुरानी आँख का पानी हो गई 

सारे बादल…

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Added by Rana Pratap Singh on July 6, 2015 at 7:28pm — 4 Comments

नीरवताएँ

नीरवताएँ

दुखपूर्ण भावों से भीतर छिन्न-भिन्न

साँस-साँस में लिए कोई दर्दीली उलझन

मेरे प्राण-रत्न, प्रेरणा के स्रोत

तुम कुछ कहो न कहो पर जानती हूँ मैं

किसी रहस्यमय हादसे से दिल में तुम्हारे

है अखंडित वेदना भीषण

चोट गहरी है

दुख का पहाड़ है

दुख में तुम्हारे .. तुम्हारे लिए

दुख मुझको भी है

रंज है मुझको कि संवेदन-प्रेरित भी

मैं कुछ कर नहीं पाती

खुले रिसते घाव को तुम्हारे 

सी नहीं…

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Added by vijay nikore on July 6, 2015 at 3:42pm — 4 Comments

ज़माना (ग़ज़ल)

1222 /  1222  /1222 / 1222

--------------------------------------------------

जमाना बाज कब आता है हमको आजमाने से

न हो जाना कहीं जख्मी कभी इसके निशाने से  

       

हमेशा जंग वो जीता किये हों सर कलम जिसने 

कभी जीता नही कोई भी अपना सर कटाने से 

 

करे जो बात दुनिया की उसी की लोग सुनते हैं

किसी को वास्ता कैसा भला तेरे फसाने से 

 

कभी धेला तलक बांटा नहीं जिसने कमाई का

लगा है बांटने सिक्के वो सरकारी खजाने…

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Added by Sachin Dev on July 6, 2015 at 3:00pm — 4 Comments

निशान !

निशान !

लगभग ५३ वर्ष हुए जब  "धर्मयुग" साप्ताहिक पत्रिका के पन्ने पलटते हुए किसी अदृश्य शक्ति नें अचानक मुझको रोक लिया, और मुझे लगा कि मेरी अंगुलियों में किसी एक पन्ने को पलटने की क्षमता न थी।

आँखें उस एक पन्ने पर देर तक टिकी रहीं, और मात्र ८ पंक्तियों की एक छोटी-सी कविता को छोड़ न सकीं। वह कविता थी  "निशान"  जो ५३ वर्ष से आज तक मेरे स्मृति-पटल पर छाई रही है, और जिसे मैं अभी भी अपने परम मित्रों से आए-गए साझा करता हूँ .....

                 …

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Added by vijay nikore on July 6, 2015 at 10:00am — 4 Comments

निर्माताओं से मुलाक़ात (लघु कथा)

वो मुझे साथ लेकर गया, उसे चुपचाप इंसान ढूंढना था|

सबसे पहले उसने मिलाया एक नामी शिक्षक से, जो बात करने में तेज़ था, लेकिन खुद नकल कर के उत्तीर्ण होता था|

फिर उसने मिलाया एक बड़े चिकित्सक से, जो अपनी चिकित्सा की पद्धति को सबसे अच्छा कहता और बाकी को बुरा|

फिर मिलाया तीन भिखारीयों से, जो अपने धर्म…

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Added by Chandresh Kumar Chhatlani on July 5, 2015 at 10:28pm — 4 Comments

महंगी मुस्कान (लघुकथा )

महंगी मुस्कान ( लघुकथा )









" मुस्कान का व्यापारी हूँ । मुस्कान ही बेचता हूँ । कई प्रकार की मुस्कान है मेरे पास । "



" ये क्या बात हुई भला ..!!! मुस्कान का भी कोई व्यापार होता है ! "



" होता है बाबू , आजकल मुस्कान भी बिकती है । .... मुस्कान बडी ही महंगी चीज़ होती है । "



" अच्छा !! दिखाओ तो भला ... कितने प्रकार की मुस्कान है तुम्हारे पास ..??? "



" पहले जेब से पैसा निकालो , तुम्हारा जेब ही तय करेगा कि तुम पर कौन सा मुस्कान सुट… Continue

Added by kanta roy on July 5, 2015 at 9:35pm — 5 Comments

अधूरी इच्छा (लघुकथा)

बाबूजी जी के श्राद्ध कर्म में वे सारी वस्तुएं ब्राह्मण को दान में दी गयी जो बाबूजी को पसंद थे. शय्या-दान में भी पलंग चादर बिछावन आदि दिए गए. ऐसी मान्यता है कि स्वर्ग में बाबूजी इन वस्तुओं का उपभोग करेंगे. लोगों ने महेश की प्रशंशा के पुल बांधे।

"बहुत लायक बेटा है महेश. अपने पिता की सारी अधूरी इच्छाएं पूरी कर दी."
"पर दादाजी को इन सभी चीजों से जीते जी क्यों तरसाया गया?"- महेश का बेटा पप्पू बोल उठा.

.

(मौलिक व अप्रकाशित )

Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 5, 2015 at 8:30pm — 8 Comments

सिगरेट की राख सी जिंदगी

कम्पनी में गबन के आरोप में वह आज पांच साल की कैद काट कर वह जेल से छूटा तो सीधे दिव्या के घर पहुँचा । दिव्या नहीं मिली । वह काम पर गई थी । उसने उसके मोबाइल पर उसी जगह मिलने का समय दिया जहाँ वह अक्सर मिला करते थे ।

"मुझे भूल जाओ तुम । अब मेरी जिंदगी में तुम्हारे लिये कोई जगह नहीं है ।" सिगरेट सुलगाते ही उसकी आवाज सुनाई दी ।

"पर यह सब तो मैंने तुम्हारी ख़ुशी के लिये किया था ? " सुनते ही उसका दिल रो पडा जैसे ।

"मेरी ख़ुशी या अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये ....! मेरी ख़ुशी तो…

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Added by Pankaj Joshi on July 5, 2015 at 5:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल :मीआ़दे उल्फ़त देखिये

2212 2212 2212





मीआ़दे उल्फ़त देखिये पूरी हुई

इतनी सी तब तो बात अब उतनी हुई.



क्या इश्क़ में दुनिया से तू भी तंग है

क्या तंज़ तुझ पे भी मेरे जैसी हुई.



दौरे गुज़श्ता ने असर कुछ यूँ किया

टूटा हुआ मैं,तू भी है टूटी हुई.



पाया है जो मेयार तेरे इश्क़ ने

लो! ज़िन्दगी क्या! रूह भी तेरी हुई.



ऐ चाँद! मुझको खींच ले ख़ुद की तरफ़

देखूं कि छत पे होगी वो आई हुई.



उनसा खिला गमले में इक तो गुल, अरे!

ख़ुशबूू भी… Continue

Added by shree suneel on July 5, 2015 at 5:00pm — 21 Comments

नदी के बीच वाला पाया (लघुकथा)

एक नदी पर एक पुल था , जिसमे सात पाये थे। एक बार सबसे बीच वाले पाए ने सबसे किनारे वाले पाए से कहा “जानते हो यह पुल मेरी वजह से ही है। नदी की जलधारा का सबसे ज्यादा प्रवाह मैं ही झेलता हूँ। मैं हमेशा पानी में डूबा रहता हूँ, तुमलोगों का क्या किनारे खड़े रहते हो, बरसात में कभी कभी नदी की जलधारा तुम तक पहुँचती है वरना सालो भर ऐसे ही खड़े रहते हो, तुम्हारी उपयोगिता ही क्या है। मेरे कारण ही लाखों लोग इस पुल का प्रयोग कर नदी के आर पार जा पाते हैं । “

किनारे वाले पाये ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ…

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Added by Neeraj Kumar 'Neer' on July 5, 2015 at 3:00pm — 2 Comments

फ़ैसला

मैं चुप था

मगर शामिल नहीं था

तुम्हारे फासलों के

फ़ैसले में



मेरी चुप्पी का

हर एक अर्थ लगाया था

तुमने अपनी समझ से



मेरे चुप रहने का अर्थ

तुमने उस दिन भी

गलत समझा था

जब कि शिरू हो रही थी

जिन्द्गी की यात्रा



और मेरी चुप्पी का अर्थ

आज भी गलत ही है

जबकि समाप्ति की ओर है

जिन्द्गी की यात्रा



क्योंकि तुमने

मेरी चुप्पी का हमेशा

वो अर्थ लगाया

जो अनुकूल था

तुम्हारे लिये



उमेश… Continue

Added by umesh katara on July 5, 2015 at 12:26pm — 3 Comments


AMOM
मजहब जिसने इंसानों को आपस में जोड़ा है

मजहब जिसने इंसानों को आपस में जोड़ा है 

आज उसी मजहब ने क्यूँ दिल इंसा का तोडा है 

कितनी सुंदर धरती है ये कितने सुंदर मंजर 

पर राहों में उल्फत की क्यूँ नफरत का रोड़ा है 

जिन की ख्वाइश धन दौलत दुनिया भर की हथिया लें 

गर समझें तो आज समझ लें ये जीवन थोडा है 

राम नाम जिस पाहन पर वो सागर में उतराए 

डूब गया वो राम नाम के बिन जिसको छोड़ा है 

तब तक चैन कहाँ पाया है इस इंसा ने जग में 

जब…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 5, 2015 at 10:34am — 10 Comments

गीतिका- *रंग में जिंदगी को*

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम

मापनी-212__212__212__212,

समांत-(आते)___पदांत-(चलो)

पूर्णत: हिंदी व्याकरण पर आधारित रचना,

******************************

रंग में जिंदगी को डुबाते चलो।

शब्द मेरे लबों पर सजाते चलो।

------

जख्म रिसते रहें हो तुम्हारे अगर,

दर्द का गीत ही गुनगुनाते चलो।

-------

हो सरस फुल या कुम्हलाई कली,

जो मिले दिल उन्हीं से लगाते चलो।

-------

काँपते पैर हैं ढूँढते मंजिले,

राह में वो गिरें तो उठाते… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on July 4, 2015 at 8:21pm — 7 Comments

सत्ता का विकेन्द्रीकरण (लघुकथा) // -शुभ्रांशु

“तुम लोग बहू से ही ठीक रहती हो. बात-बात पे वो डांटा करती है न, तभी तुम लोगों का दिमाग ठंढा रहता है ! आ रही है न, गर्मी छुट्टी के बाद.. कल-परसों में.... ,” - तमतमाती हुई सुभद्रा महरी पर बरसती जा रही थी.

“माँजी, साफ तो मैं कर ही रही थी.. ” - महरी ने बात सम्भालना चाहा. 

“चुप रहो ! महीने भर का लेना-देना सब बेकार कर दिया. जरा सा कुछ कहा नहीं कि टालना शुरु.. ”



अखबार पर से आँखे उठा कर रमेश ने पत्नी की ओर देखा. इधर तीन-चार दिनों से…

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Added by Shubhranshu Pandey on July 4, 2015 at 8:00pm — 5 Comments

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता © परी ऍम. 'श्लोक'

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २



उस हरजाई का कोई पैग़ाम नहीं आता

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता



करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे

जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता



होगी कुछ सच्चाई तो कि धुआँ सा उठता है

यूँ ही तो सर पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता



तुमसे उल्फ़त ने ही ये हाल किया है अपना

दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता



दूर खड़ा साहिल पर बेहिस तकता है मुझको

हो मुश्किल चाहे कुछ भी वो काम नहीं आता



ए इश्क़ तेरी… Continue

Added by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 4:19pm — 23 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : शातिर (गणेश जी बागी)

                      र्षिता क्लास की सबसे खुबसूरत लड़की थी, अधम, रंजित और उसकी मित्र मंडली, सभी उससे दोस्ती के लिए लालायित रहते थे किन्तु वह तो बस अपने काम से काम रखती थी. एक दिन हर्षिता को अकेला देख रंजित उससे बोला,

“हर्षिता मैं तुम्हे अपनी बहन बनाना चाहता हूँ क्या तुम मुझे अपना भाई होने का अधिकार दोगी ?”

माँ बाप की इकलौती बेटी हर्षिता रंजित को भाई के रूप में पाकर बहुत ख़ुश हो गयी. अब उसका उठना बैठना रंजित के साथ-साथ उसके दोस्तों के साथ भी होने…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 4, 2015 at 4:04pm — 25 Comments

अनाथ ( लघुकथा )

पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे ।

अंतिम संस्कार करके वापस चलते समय मौजूद सभी लोगों को रिवाज़ के अनुसार भरपेट नाश्ता कराकर वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे…

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Added by vinaya kumar singh on July 4, 2015 at 2:03pm — 18 Comments

आस का सुर्योदय (लघुकथा ) कान्ता राॅय

आस का सुर्योदय ( लघुकथा )





सर पर लकड़ी का गठ्ठर , पसीने से तर- बतर वो घर की ओर चली आ रही थी । माई का डर मन ही मन सता रहा था उसे । कल रात ही माई ने बोल दिया था कि ,



"चुल्हा चौका और घर का काम करके अगर समय मिले तो ही पढना छोरी ! "

माई भी क्या करें .. खेत पर बापू के संग काम पर जाना जो होता है !



आज सुबह सीतो अखबार लेकर आ गई थी ।



" देख तु जिले में प्रथम स्थान पर आई है ! " -- सीतो ने जैसे ही कहा , सुनते ही उसके खुशी से पैर , बदन सब काँप उठे थे… Continue

Added by kanta roy on July 4, 2015 at 1:08pm — 6 Comments


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गज़ल - फिल बदीह -- सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी ( गिरिराज भंडारी )

122     122     122      122

पियादे से राजा की फिर मात होगी

सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी

 

दिशायें जहाँ पर समझ की अलग हैं

वहाँ अब ठिकाने की क्या बात होगी 

 

अभी मंज़िलों की न सोच ऐ मेरे दिल

अभी तो सफर की शुरुवात होगी

 

समझ कर ज़रा आप तस्लीम करिये

वो देते नहीं हक़ , ये ख़ैरात होगी

 

वही सुब्ह निकली , वही धूप पसरी

नया कुछ नहीं तो , वही रात होगी

 

यहाँ साजिशों में लगे सारे…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 4, 2015 at 7:32am — 17 Comments


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किन्तु इनका क्या करें ? (नवगीत) // -सौरभ

खिड़कियों में घन बरसते

द्वार पर पुरवा हवा..

पाँच-तारी चाशनी में पग रहे

सपने रवा !

किन्तु इनका क्या करें ?



क्या पता आये न बिजली

देखना माचिस कहाँ है

फैलता पानी सड़क…

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Added by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 2:00am — 29 Comments

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