For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गनेश जी "बागी")

All Blog Posts (9,178)

नववर्ष दोहे

विभु से मांगो मित्र तुम, अब ऐसा वरदान

नये  वर्ष में शांत हो, मानव का शैतान

 

हो न धरा अब लाल फिर, महके मनस प्रसून

किसी अबोध अजान का, नाहक बहे न खून

 

सबके जीवन में खुशी, छा जाए भरपूर

अच्छे  दिन ज्यादा नहीं, भारत से अब दूर

 

कवि गाओ वह गीत अब, जिससे सदा विकास

तन में हो उत्साह प्रिय, मन में हो उल्लास

 

आपस में सद्भाव हो, सभी बने मन-मीत

ओज भरे स्वर में कवे, महकाओ कुछ गीत 

 

ऐसा जिससे नग…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 22, 2014 at 3:00pm — 3 Comments

नवगीत : ये है नया नजरिया.

फटी भींट में चौखट ठोकी,

खोली नयी किवरिया.

चश्मा जूना फ्रेम नया है,

ये है नया नजरिया.

 

गंगा में स्नान सबेरे,

दान पूण्य कर देंगे.

रात क्लब में डिस्को धुन पर,

अधनंगे थिरकेंगे.

देशी पी अंग्रेजी बोलीं,

मैडम बनीं गुजरिया.

 

अपने नीड़ों से गायब हैं,

फड़की सोन चिरैया.

ताल विदेशी में नाचेंगी,

रजनी और रुकैया.

घूंघट गया ओढनी गायब,

उड़ती जाए चुनरिया.

 

चूल्हा चक्की कौन करे…

Continue

Added by harivallabh sharma on December 22, 2014 at 1:55pm — 2 Comments

हुकूमत

हुकूमत हाथ में आते, नशा तो छा ही जाता है,

अगर भाषा नहीं बदली, तो कैसे याद रक्खोगे.

किये थे वादे हमने जो, मुझे भी याद है वो सब,

मनाया जश्न जो कुछ दिन, उसे तो याद रक्खोगे.

मुझे दिल्ली नहीं दिखती, समूचा देश दिखता है,   

बिके हैं लोग…

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on December 22, 2014 at 1:30pm — 5 Comments


मुख्य प्रबंधक
हास्य घनाक्षरी : ईलाज (गणेश जी बागी)

छंद : घनाक्षरी 

झट छायी चिंता-रेखा,

नीला-नीला पाँव देखा,

पहुँचे करीम चच्चा, शफ़ाख़ाना आस में.

देखते हकीम बोला,

पाँव में ज़हर फैला,

दोनों पाँव काट डाले, ज़िन्दग़ी की आस में.

बात हुई ज़ल्द साफ़,

कट गये पर पाँव,

डरता हकीम आया, चच्चाजी के पास में.

सुनो जी करीम भाई,

बात ये समझ आई,

लुंगी रंग छोड़ रही, बोला एक साँस में.…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 22, 2014 at 12:00pm — 7 Comments

कुछ नक्शा बदला है \ माहिया, क़िस्त-तीन (मिथिलेश वामनकर)

मेरा मन दरपन है।

देखी छब तेरी,

आँखों में सावन है।

 

वो पागल लडकी है।

ऐसी बिछडन में.

वो कितना हँसती है।

 

क्यूँ उलटा चलते हो।

वक़्त सरीखे तुम,

हाथों से फिसलते हो।

 

जब शाम पिघलती है।

ऐसे आलम में,

क्यूं रात मचलती है।

 

सूरज को मत देखों ।

उसका क्या होगा,

चाहे पत्थर फेंकों ।

 

सूरज ने पाला है।

हँसता रातों में,

ये चाँद निराला…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on December 22, 2014 at 9:03am — 5 Comments

परिवर्तन

बदल रहा समाज बदल रहा कल आज

बीच चौराहे आ जाती अक्सर घर को लाज

सामान्य से हो रहे विवाहेत्तर सम्बन्ध

धुंधले से पड़ गये, दिल के सब अनुबंध

हर किसी को चाहिए जरुरत से ज्यादा "मोर"

भौतिकता जागी है सारे बंधन तोड़

जितना मिले उतना जगे, ज्यादा पाने की आस

कम हो गयी सहनशीलता बढ़ गयी है प्यास

हर किसी को चाहिए अस्तित्व की खोज

कमजोर हो रहे है रिश्ते, दरक रहे है रोज

आया नया ज़माना है कुछ खोकर कुछ पाना…

Continue

Added by sarita panthi on December 21, 2014 at 8:02pm — 6 Comments

इश्क की हद से, गुज़र कर देखा...

 इश्क की हद से, गुज़र कर देखा,

जीते जी हमने तो, मर कर देखा।

राह में तेरा वो, बिछड़ जाना,

ख़ुशी से अपनी, बिछड़ कर देखा।

छोड़ के तुझको हम, रूखसत तो हुए,

बढ़ते क़दमों ने कई बार, पलटकर देखा।

काश तू फिर कभी मिल जाए, किन्ही राहों में,

बस यही सोच कर, हर राह पर चल कर देखा।

खाब में ही कभी, इक रोज़ कभी तू आये,

खुली आँखों से ही, नींदों में उतर कर…

Continue

Added by Usha Pandey on December 21, 2014 at 8:00pm — 7 Comments

ये शज़र आज भी......

अपने  वज़ूद  की  ख़बर   इस तरह  हम  देते हैं

मुट्ठी  में  रेत उठाकर  हम  हवा  में उड़ा देते हैं



क्या हुआ जो  इस  उम्र में  हम बे-समर हो गए

ये शज़र आज भी  गुज़री  बहारों  की हवा देते हैं



अब हंसी भी  लबों पे  पैबंद  सी  नज़र  आती हैं

जाने लोग आँखों में कैसे नमी को  छुपा  लेते हैं



रुख से चिलमन उठते ही नज़रें भी बहकने लगी

हम भी बेजुबानों की तरह पैमाने को उठा लेते हैं



जागते  रहे  तमाम  शब्  हम  उसके इंतज़ार में

बार बार  चरागों…

Continue

Added by Sushil Sarna on December 21, 2014 at 7:00pm — 7 Comments

"लुटा हाट में नोट वोटें बटोरे",-

चुनावी समा बाँधना हो जभी वो,

गली में लुटाते रुपैया तभी वो|

लुटा हाट में नोट वोटें बटोरे,

यही वो घड़ी जो भुनाते चटोरे ||

 

बनायें-बिगाड़ें, सभी पे तुले वो,

इसारा मिले बर्तनें भी धुलें वो|

दिखे जो हुआ आपसे वोट लेना,

विजेता हुए तो, अधेला न देना ||

 

कभी ज्ञान की  ज्योंति जाया न होगी,

बली पुष्ट होते निरा मूढ़-रोगी |

मिटाये अँधेरा डगोँ को बढ़ाए,

यही ज्योंति प्रेरा शिखा पे…

Continue

Added by SHARAD SINGH "VINOD" on December 21, 2014 at 6:00pm — 3 Comments

अन्धकार भी आज उदास है

भरी हुई मधुशालायें सारी

पीकर  सारे मस्त पड़ें हैं ,

मदिरालय पर लोगों का जमघट

अब मंदिर पर बंध जड़ें  हैं ,

मिटे दुःख दर्द गरीबी सारी

आया नव वर्ष उल्लास है ,

सुन्दर गति,सुन्दर मति सारी

अन्धकार…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on December 21, 2014 at 5:32pm — 6 Comments

अनबूझा मौसम

अनबूझा मौसम

आसमानी बिजली

मूसलाधार बारिश

फिर सूरज की चमकती किरणें

डाल पर फूल का नव रूप धर आना

मौसम के बाद एक और मौसम ...

यह सब सिलसिला है न ?

पर किसी एक के चले जाने के बाद

यहाँ कहीं नए मौसम नहीं आए

एक मौसम लटक रहा है

उदासी का

डाल पर रुकी, लटक रही टूटी टहनी-सा

भय और शंका और आतंक का मौसम

भिगोए रहता है पलकों को

आधी रात

क्या नाम दूँ

टूटे विश्वास का…

Continue

Added by vijay nikore on December 21, 2014 at 4:30pm — 13 Comments

स्वागत नववर्ष : दोहे

चौदह अब इतिहास है, पंद्रह से है आस.
समय सलौना कब रुका, क्षण भर अपने पास.
 
पल बीता तो कल हुआ, कल बीता तो मास.
पल पल गुजरे साल के, हर पल कल की आस,
 
खुशियाँ कितनी दे गया, गुजर गया जो साल.…
Continue

Added by harivallabh sharma on December 21, 2014 at 2:17pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गीत - आने वाला नया, नया कब रह पाता है ( गिरिराज भंडारी )

नया कहूँ तो, वैसे तो हर पल होता है

नया जागता तब है जब पिछला सोता है 

पर सोचो तो नया , नये में क्या होता है

हर पल पिछला, आगे को सब दे जाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

वही गरीबी , भूख , वही है फ़टी रिदायें 

वही चीखती मायें , जलती रोज़ चितायें

वही पुराने घाव , वही है टीस पुरानी

वही ज़हर, बारुद, धमाका रह जाता है

 

आने वाला नया, नया कब रह पाता है

 

वही अक़्ल के अंधे , जिनके मन जंगी…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on December 21, 2014 at 11:48am — 13 Comments


AMOM
ग़ज़ल-उमेश कटारा

मैं कभी था दिलज़लों में
आज़ हूँ मैं पागलों में

क्या सुँकू तूने कमाया
क्या मिला है फ़ासलों में

मज़हबी आतंक से अब
आदमी है दहशतों में

सब ग़िले शिक़वे भुलादो
क्या रख़ा है रतज़गों में 

ख़ो दिये हैं घर हजारों
जिन्द़गी ने हादसों में

मौलिक व अप्रकाशित
उमेश कटारा


Added by umesh katara on December 21, 2014 at 10:07am — 7 Comments

रिश्ते हैं , बन जाते हैं -- डा० विजय शंकर

लोग मिलते हैं ,

जीवन में आते हैं ,

रिश्ते हैं , बन जाते हैं |

कभी छाँव में दो पल साथ बिताते हैं ,

कभी तपती दोपहरी भी सह जाते हैं ,

कभी चट्टान से बन जाते हैं ,

कभी बरगद की तरह हो जाते हैं,

कभी फूलों की तरह आते हैं ,

सब महका , महका जाते हैं ,

रिश्ते हैं , बन जाते हैं |



रिश्ते बनते हैं ,

बनते जाते हैं ,

कभी छूट भी जाते हैं ,

कभी कहीं बिखर जाते हैं ,

कभी बिखरने की वजह से छूट जाते हैं।

कभी कांच से भी नाज़ुक रह जाते हैं… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on December 21, 2014 at 9:40am — 13 Comments

सूरजमुखी के पास जा / ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

   2212   -    2212

हो  वार  अब  के  दूसरा

बेजार दिल दामन बचा

मेरे  मुकाबिल  तू  खड़ा

कितना मगर तू लापता …

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on December 21, 2014 at 2:00am — 11 Comments

माँ

माँ गर्भ में पालती है ,

जीवन का स्वप्न । 

जिसे माँ सहलाती है ,

अपने ममत्व से । 

माँ जो सुनाती है ,

शिशु को भविष्य में आने वाले । 

हर कष्ठ की विवेचना । 

फिर…

Continue

Added by pratibha tripathi on December 20, 2014 at 11:30pm — 3 Comments

गजल-ये नहीं शायरी के पन्नें है!

2122 1222 22

ये मेरी जिन्दगी के पन्ने हैं!
ये नहीं शायरी के पन्ने हैं!!

ये नशेमन है मेरी आहों के!
ये तेरी बेरुखी के पन्ने हैं!!

मुफलिसी बेबसी की ये चींखे!
ये मेरी सर जमीं के पन्ने हैं!!

ये तो बच्चों की लाशे है या रब!
ये तेरी खामुशी के पन्ने हैं!!

ना समझ हो अभी ना समझोगे!
मेरे कागज सभी के पन्ने हैं!!

देखनी हो जिसे दुनिया 'राहुल'!
मुझको पढ़ ले इसी के पन्ने हैं!!

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Rahul Dangi on December 20, 2014 at 7:30pm — 19 Comments

सज़ा दो मुझे

चोट दिल पे लगी है दवा दो मुझे
याद आये न उसकी दुआ दो मुझे

प्‍यार जिससे किया छुप गया वो कहीं
ऐ हवा तुम ही उसका पता दो मुझे

मर न जायें कहीं प्‍यार के दर्द से
दर्द कैसे सहें तुम सिखा दो मुझे

हर खुशी आपको तो दिया हूँ मगर
दिल दुखाया कभी तो सज़ा दो मुझे

अब जुदाई न मुझसे सही जाती है
मौत की नींद आकर सुला दो मुझे

मौलिक एवं अप्रकाशित अखंड गहमरी

Added by Akhand Gahmari on December 20, 2014 at 2:08pm — 13 Comments

मत लिखना आने की बात

मत लिखना आने की बात

मत लिखना आने की बात

 आने से पहले

 जो ना आए, नियत वक्त पे

 झल्लाएगा मन

 उठेंगे सौ-सौ प्रश्न

 तुम्हारे बारे में

 लपटें उठ जाएंगी

 राख ढके अंगारे में

 अच्छा है बिन बतलाए आओ

 बिना कोई उम्मीद जगाए

 आ जाओ जो ऐसे एक दिन

 दिल होली, दिवाली, ईद मनाए |

  सोमेश कुमार(08/08/2014) (मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by somesh kumar on December 20, 2014 at 11:54am — 16 Comments

Monthly Archives

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Rahul Dangi's blog post गजल-ये नहीं शायरी के पन्नें है!
"आदरणीय गिरिराजभाईजी, काफ़िया पर चर्चा कर आपने विश्लेषण को पूर्णता दी है. ग़ज़ल लेखन में यह विन्दु वाकई…"
12 seconds ago
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on harivallabh sharma's blog post नवगीत : ये है नया नजरिया.
"वाकई चस्मा जून फ्रेम नया है i एक अलग ही रंग की कविता i सुन्दर i मोहक i"
6 minutes ago
SHARAD SINGH "VINOD" commented on SHARAD SINGH "VINOD"'s blog post "लुटा हाट में नोट वोटें बटोरे",-
"आदरणीय हरि प्रसाद दुबे जी बधाई व उत्साह वर्धन के लिये धन्यवाद"
8 minutes ago
gumnaam pithoragarhi commented on मिथिलेश वामनकर's blog post कुछ नक्शा बदला है \ माहिया, क़िस्त-तीन (मिथिलेश वामनकर)
"वाह बहुत सुन्दर माहिया सीखने को मिले ..अति सुन्दर..बधाई आदरणीय."
9 minutes ago
JAWAHAR LAL SINGH commented on JAWAHAR LAL SINGH's blog post हुकूमत
"आदरणीय श्री हरिवल्लभ शर्मा साहब, सादर अभिवादन! यह मेरा पहला प्रयास है ...गजल लिखने के पूरे विधान से…"
10 minutes ago
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on JAWAHAR LAL SINGH's blog post हुकूमत
"जवाहरलाल  जी बहुत ही लाजवाब i एक एक शेर मानो मोती जड  दिए गए हैं i ऐसी रचना में…"
11 minutes ago
gumnaam pithoragarhi commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post हास्य घनाक्षरी : ईलाज (गणेश जी बागी)
"वाह मज़ा आ गया बहुत खूब"
13 minutes ago
डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव commented on Sushil Sarna's blog post ये शज़र आज भी......
"आदरनीय  सरना जी हिन्दी कीछंद विधा के अतिरिक्त भी कोई   गीतिका है इसका ज्ञान…"
15 minutes ago
Shyam Narain Verma commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post हास्य घनाक्षरी : ईलाज (गणेश जी बागी)
"बहुत सुंदर और अनुपम रचना अभिव्यक्ति  के लिए  हार…"
16 minutes ago
Shyam Narain Verma commented on JAWAHAR LAL SINGH's blog post हुकूमत
" बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको  "
18 minutes ago
Shyam Narain Verma commented on harivallabh sharma's blog post नवगीत : ये है नया नजरिया.
" बहुत सुन्दर मनमुग्ध करता गीत ...बहुत बहुत बधाई आपको "
20 minutes ago
gumnaam pithoragarhi commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post नववर्ष दोहे
"स्वागत है नव्-वर्ष का, जिसमे नव उत्कर्ष विकसित सबका हिय-कमल जगमग भारतवर्ष वाह खूब है सर जी वाह बधाई"
20 minutes ago

© 2014   Created by Admin.

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service