चला गया वो
कह कर फिर मिलूँगा ,
चला गया वो
लगता है सदीओं से खड़ी हूँ वहीँ
जहाँ से गया है वो
मैंने कहा जिन्दगी प्यार है
तुमने सुधारा -नहीं प्यार जिन्दगी है
फिर जिन्दगी क्या है -पूछा मैंने
उत्तर में-तुम देखने लगे
देर रात तक यूँ ही कुछ कुछ…
ContinueAdded by NEERJA ARORA on February 23, 2012 at 9:23pm — 1 Comment
यह कविता उन व्यक्तियों ,महिलाओं के सन्दर्भ में है जो कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भागीदार हैं इसके खिलाफ लड़ाई में मेरा यह छोटा सा प्रयास है !मेरी यह कविता QAWWA(मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स )
Added by rajesh kumari on February 23, 2012 at 8:36pm — 2 Comments
अनछुआ चैतन्य
क्या याद हैं
तुम्हे
वो लम्हे
जब
हम तुम मिले थे
पहली बार
और आख़िरी बार भी...
वो लम्हे
आज तक
संहाल कर रखे हैं
मेरे दिल नें....
तब सिर्फ़
एक दूसरे को
ही नही सुना था हमने
बल्कि
सुना था हमनें
उस शाश्वत खामोशी को
जिसने
हमें अद्वेत कर दिया था....
तब सिर्फ़
सानिध्य को
ही नहीं जिया था…
ContinueAdded by Dr. Prachi Singh on February 23, 2012 at 8:19pm — 2 Comments
बहुत दुखते हैं
पुराने घाव ,
जब आती हैं
मरहम लगाने
नई उँगलियाँ !
उन्हें नही पता -
कितनी है
जख्म की गहराई ,
क्या होगी
स्पर्श की सीमा !
उनमे नही होती
पुराने हाथों जैसी छुअन !
रिसने दो
मेरे घावों को ,
क्योकि बहुत दुखतें हैं
पुराने घाव
जब आती है
मरहम लगाने
नई उँगलियाँ !
अब और दर्द सहा न जाएगा…
ContinueAdded by Arun Srivastava on February 23, 2012 at 10:30am — 8 Comments
सरकार ने सख्ती दिखाई.फिर से हेलमेट की दुकानें सज गई.गोविन्द ने भी कुछ पैसे जमाये और एक हेलमेट की दुकान सड़क के किनारे खोलकर बैठ गया. धंधा चल निकला.लोगों के सरों की हिफाज़त के सरकारी फरमान के चलते गोविन्द और उस जैसे कई बेरोजगारों को काम मिल गया. तभी एक दिन दोपहर के वक़्त एक अनियंत्रित ट्रक गोविन्द की दुकान पर चढ़ गया. तमाम हेलमेट सड़क पर इधर-उधर बिखर गए. पुलिस वाले उन्ही हेलमेटों के बीच गोविन्द के धड से अलग हुये सिर की तलाश कर रहे थे..
....... अविनाश बागडे.
Added by AVINASH S BAGDE on February 23, 2012 at 10:00am — 2 Comments
फर्ज के अलाव में कब तक जलो
Added by rajesh kumari on February 23, 2012 at 9:05am — 6 Comments
*स्वप्न*…
ContinueAdded by SHAILENDRA KUMAR SINGH 'MRIDU' on February 22, 2012 at 11:30pm — 2 Comments
जब भी करने लगती हूँ मैं खुद से दिल की बात
दिल दिखलाता है सारे सच , भूल के सब जज़्बात …
मैने पुछा अन्तः मन से…
ContinueAdded by Dr. Prachi Singh on February 22, 2012 at 5:04pm — 5 Comments
Added by asha pandey ojha on February 22, 2012 at 1:06pm — 4 Comments
अश्रु गण साथी रहे
मेरे ह्रदय की पीर बनकर !
रात चुभ जाती हमेशा तीर बनकर !
मैं भटकता नीर बनकर !
तुम सुनहरे स्वप्न सी हो
मैं नयन हूँ !
बिन तुम्हारे मैं अधूरा
और मेरे बिन तुम्हारा अर्थ कैसा !
जीत की उम्मीद से प्रारंभ होकर
निज अहम के हार तक का ,
प्रथम चितवन से शुरू हो प्यार तक का ,
प्यार से उद्धार तक का
मार्ग हो तुम !
मै पथिक हूँ !
निहित हैं तुझमे सदा से
कर्म मेरे
भाग्य…
ContinueAdded by Arun Srivastava on February 22, 2012 at 1:00pm — 4 Comments
आज ख़त लिखने बैठी हूँ तुम्हे ...कुछ सूझ नहीं रहा कहाँ से लिखना शुरू करूँ ..आज से पहले तुम्हे कभी कोई पत्र लिखा नहीं मैंने , लिखने की जरुरत नहीं समझी ...क्यूँ ? पता नहीं ...शायद तुम पढ़ नहीं सकती थी ...या फिर शायद इसलिएकि मां को पत्र लिखने की जरुरत क्या है ...मां तो यूँ भी सब जानती है ...बिना कहे , बिना सुने ...
मगर आज जब लिखने बैठी हूँ तो अपने बचपन से तुम्हे जोड़ कर देखना चाहती हूँ ...अपनी सफ़ेद झक फ्रिल वाली फ्रॉक याद है मुझे , कभी- कभी खाना खिलाते हुए दादी का चेहरा भी याद…
ContinueAdded by NEERJA ARORA on February 22, 2012 at 12:37pm — 3 Comments
प्यार के नाम पे इज्ज़त के सौदे देखे हैं ..
कुर्सी पर दागी नेता बैठे देखे हैं …
बच्चों के मासूम दिलों कोमल जिस्मों पर …
खून से लथपथ घाव बहुत गहरे देखे हैं ..
देखा है दौलत की खातिर प्यार का चर्चा …
और कचहरी मैं वकील नंगे देखे हैं ..
जज्बातों को रौंद कहीं जिस्मों की खातिर ..
प्यार की चादर मे लिपटे धोखे देखे हैं ..
कहीं कहीं देखी हैं दौलत की दीवारें …
जिनके अन्दर टूट गयी कितनी …
Added by Dr. Prachi Singh on February 22, 2012 at 9:55am — 7 Comments
जलते-तपते पथरीले रास्ते पर
सुंदर फूलों वाला मन को भाने वाला
मुझे आश्चर्य हुआ
इस कठोर वातावरण में भी आखिर ये खिला कैसे
इतना सुन्दर रंग-रूप इसे मिला कैसे ?
मैं रुकी और सोंचने लगी- क्यूँ न ले चलूँ इसे अपने सुन्दर उपवन में
खाद-पानी पा कर यह और निखर…
ContinueAdded by Seema agrawal on February 21, 2012 at 12:30pm — 17 Comments
बेक़ुसूर
ज़िंदगी में
कुछ मुकाम
ऐसे आते हैं,
जहाँ
हम तो
आगे बढ़ जाते हैं
पर
हमारे ही अंतः मन का
एक अभिन्न अंश
कहीं पीछे छूट जाता है...
जिंदगी हमें बढ़ाती है
आगे और आगे
नयी उँचाईयों की ओर
और
हर बार
हम हो जाते हैं
अधूरे और अधूरे
अपनी संपूर्णता से दूर
बेक़ुसूर...........
Added by Dr. Prachi Singh on February 20, 2012 at 6:00pm — 9 Comments
सूखे पेड़ों से मैंने डटकर के जीना सीखा है,
हरे-भरे पेड़ों से मैंने झुककर जीना सीखा है,
मस्त घूमते मेघों ने सिखलाया मुझको देशाटन,
और बरसते मेघों से सब कुछ दे देना सीखा है।
हर दम बहती लहरों से सीखा है सतत् कर्म करना,
रुके हुए पानी से मैंने थम कर जीना सीखा है,
जलती हुई आग से सीखा है जलकर गर्मी देना,
जल की बूंदों से औरों की आग बुझाना सीखा है।
सागर से सीखा है सागर जितना बड़ा हृदय रखना,
धरती से सब की पीड़ा का भार उठाना…
ContinueAdded by Prof. Saran Ghai on February 18, 2012 at 10:06pm — 3 Comments
शुरू में सब ठीक था
जब धरती पर
प्रारम्भिक स्तनधारियों का विकास हुआ
नर मादा में कुछ ज्यादा अन्तर नहीं था
मादा भी नर की तरह शक्तिशाली थी
वह भी भोजन की तलाश करती थी
शत्रुओं से युद्ध करती थी
अपनी मर्जी से जिसके साथ जी चाहा
सहवास करती थी
बस एक ही अन्तर था दोनों में
वह गर्भ धारण करती थी
पर उन दिनों गर्भावस्था में
इतना समय नहीं लगता था
कुछ दिनों की ही बात होती थी।
फिर क्रमिक विकास में बन्दरों का उद्भव हुआ
तब जब हम…
Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 18, 2012 at 8:04pm — 1 Comment
१. मनमीत रे
Added by दुष्यंत सेवक on February 18, 2012 at 5:30pm — 4 Comments
आरोग्य दोहावली
१
दही मथें माखन मिले, केसर संग मिलाय.
होठों पर लेपित करें, रंग गुलाबी आय..
२
बहती…
ContinueAdded by Ambarish Srivastava on February 18, 2012 at 2:30pm — 14 Comments
मेरे मन ,
बसंत के गाँव चल तो सही
सब कुछ है वहीं
उमंग उल्लास का गाँव है, रे
प्रीत की डोर थामे ,चल तो सही | सब कुछ…
Added by mohinichordia on February 18, 2012 at 11:16am — 3 Comments
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