For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गनेश जी "बागी")

All Blog Posts (8,862)

इस दीपावली एक ऐसा दीप जलायें - डॉo विजय शंकर

आओ इस दीपावली

एक ऐसा दीप जलायें

भटके हुए रहनुमाओं को

सही रास्ता दिखायें।

आओ इस दीपावली एक ……

वो जो अन्धकार को

अन्धकार से मिटाने

का दम भरते हैं,

दूसरों के लिए उठाया

हर कदम अन्धकार की

ओर ही रखते हैं ,उन्हें

दीप-ज्योति कुछ यूँ दिखायें ,

कभी दूसरों के लिये भी

रौशनी में चलना सिखायें।

आओ इस दीपावली एक ……



उनकी दीवाली शुभ हो ,

हमारी दीवाली शुभ हो ,

इस बार सबकी दीवाली

शुभ- और - शुभ बनायें।

आओ इस दीपावली… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 22, 2014 at 6:54pm — 1 Comment

आओ मिल कर दिए जलाएं

आओ मिल कर दिए जलाएं,

आओ मिल कर दिए जलाएं।

भारत को तमलीन जगत में,

ज्योतिर्मय पुनः बनायें।।

 

आओ मिल कर करें सभी प्रण,

भारत के हित हों अर्पण।

अपने जीवन के कुछ क्षण,

भारत को स्वच्छ बनायें।।

 

आओ मिल कर दिए जलाएं,

आओ मिल कर दिए जलाएं।।

 

आओ मिल कर लड़ें एक रण,

अपने भीतर का रावण।

कभी स्वांस नहीं ले पाये,

हम भ्रष्टाचार मिटायें।।

 

आओ मिल कर दिए जलाएं,

आओ मिल कर दिए…

Continue

Added by Aditya Kumar on October 22, 2014 at 1:48pm — No Comments

एक ग़ज़ल आपके हवाले

उल्टा सीधा बोल रही है दुनिया मेरे बारे में,

अखबारों ने छापा क्या कुछ, पढना मेरे बारे में.  

.

इस दुनिया में मिल न सकेंगे अगली बार मिलेंगे हम,

अर्श को जो भी अर्ज़ी भेजो, लिखना मेरे बारे में.

.

उनकी ज़ात से वाक़िफ़ हूँ, वो बाज़ नहीं आने वाले,

सर पर लेकर घूम रहे हैं फ़ित्ना मेरे बारे में.     

.

अपने दिल में एक दीया तुम मेरे नाम जला रखना, 

आँधी जाने सोच रही है क्या क्या मेरे बारे में.

.

मज्लिस से बाहर कर बैठे, उनकी जान में जाँ…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on October 22, 2014 at 1:00pm — 3 Comments

आशा का मै दीप जलाऊँ

पुष्य नक्षत्र की शुभ बेला में, श्री लक्ष्मी का अवतार हुआ

महक फैलाती आई कमला, तो गुरु नक्षत्र भी धन्य हुआ|

 

दाता भी है रिद्धि सिद्दी के, सुख सम्रद्धि जो लेकर आये  

माँ शारदे भी संग बैठी, ज्ञान पिपासू प्यास बुझायें |

  

बरकत करती धन वैभव की, जो धन धान्य से घर भरदें

दीपो का त्यौहार मनाते, आँगन माँड़ रँगोली सज दे |

 

घर लक्ष्मी प्रसन्न जब रहती, तब लक्ष्मी का वरदान मिले

बिन गणपति और ज्ञानेश्वरी, फिर उल्लू ही साक्षात् मिले…

Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 22, 2014 at 12:00pm — No Comments

दिये (लघुकथा)

ये दिये क्या भाव हैं अम्मा ?" गाडी में बैठी सभ्रांत महिला ने दीपक बेचने वाली बुढ़िया से पूछा I  
"50 रुपये के 100 हैं बिटिया I" बुढ़िया ने उत्तर दिया I
"हे भगवान् ! इतने महेंगे ? अम्मा तुम तो लूट रही हो I"
"एक बात का जवाब दो बेटी, ये महंगाई क्या सिर्फ अमीरों के लिए ही है, हम गरीबों के लिए नहीं ?"

मौलिक एवं अप्रकाशित

आलोक मित्तल

मथुरा

Added by Alok Mittal on October 22, 2014 at 12:00pm — 3 Comments

शिकायत हम करें किससे बता दो जिन्‍दगी मुझको

किया जो प्‍यार का वादा न जाने क्‍यों भुलाती है

अँधेरी रात में हमको नहीं राहें दिखाती है



छलक जाती न जाने क्‍यों कभी भी आँख ये मेरी

न जाती याद उसकी है मुझे हर पल रूलाती है



उसे दिल में बसाने की लिये चाहत मरेंगे क्‍या

बने अंजान वो यारो हमें पागल बताती है



मिले जब वो कभी हमसे बताये हाल दिल का क्‍या

न रहता होश अपना  जब हमें नगमे सुनाती है l



शिकायत हम करें किससे बता दो जिन्‍दगी मुझको

बसी जो दिल में मेरे क्‍यों वही हमको सताती है



अखंड…

Continue

Added by Akhand Gahmari on October 21, 2014 at 8:53pm — No Comments

उत्तर जहां से अब ..

हाय राम क्या करे जी कोई ...जवाब चाहिए

उत्तर जहां से अब तो कुछ लाजवाब चाहिए

लौकी आलू भिण्डी टमाटर लड़ते  हैं  बाजार में

इस दिवाली  हमको  ही इक खिताब चाहिए

पटाखों फुलझड़ी को देख बच्चे मचल रहे हैं

टूटी आस लिए वो पूछें कितने बेताब चाहिए

मजबूरियों में निःशब्द बाप आंसू बहा रहे हैं

फीकी जेब तेज हाट में माथों पर आब चाहिए

लड्डू बर्फ़ी रसगुल्ला हमसे यूँ  अब दूर हुए

मिश्री घोलें रिश्तों में मिठास बेहिसाब…

Continue

Added by anand murthy on October 21, 2014 at 5:00pm — No Comments

दिल्ली चीखती है

किसी की सरफ़रोशी चीखती है

वतन की आज मिट्टी चीखती है



हक़ीक़त से तो मैं नज़रें चुरा लूँ

मगर ख़्वाबों में दिल्ली चीखती है



हुकूमत कब तलक ग़ाफिल रहेगी

कोई गुमनाम बस्ती चीखती है



भुला पाती नहीं लख्ते-जिगर को

कि रातों में भी अम्मी चीखती है



बहारों ने चमन लूटा है ऐसे

मेरे आंगन में तितली चीखती है



गरीबी आज भी भूखी ही सोई

मेरी थाली में रोटी चीखती है



महज़ अल्फ़ाज़ मत समझो इन्हें तुम

हरेक पन्ने पे स्याही चीखती… Continue

Added by Samir Parimal on October 21, 2014 at 4:35pm — 5 Comments

लघुकथा - उपकार

वह रात भर छटपटाता रहता, रटी रटाई बातोँ के सिवाय वह कुछ और बोल भी तो नही सकता था । लेकिन पिंजरें के अन्दर ही सही उसे कभी भी भूखा नही रहना पडा था । उसने सोचा, मेरा मालिक भीखू जैसे भो हो, पर मेरा पसंदीदा आहार जुटाता है, और हर तरह से अब तक मेरी हिफाजत करता  है । बन्धन मे पडना मेरा प्रारब्ध है और बिकना मेरी क्रूर नियति है । फिर भी मै अब तक जिंदा हूँ, कितना प्यार करता है भीखू  मुझे ! वो गरीब है पर फिर भी उसका व्यवहार उत्तम रहा है । भीखू ने सदा मुझे दोस्त समझा है, इसी कारण मेरे दिल मे भी उसके लिए…

Continue

Added by Bipul Sijapati on October 21, 2014 at 11:00am — 3 Comments

छँट गये अँधेरे

दीप जले हैं जब-जब

छँट गये अँधेरे।

अवसर की चौखट पर

खुशियाँ सदा मनाएँ

बुझी हुई आशाओं के

नवदीप जलाएँ

हाथ धरे बैठे

ढहते हैं स्वर्ण घरौंदे

सौरभ के पदचिह्नों पर

जीवन महकाएँ

क़दम बढ़े हैं जब-जब

छँट गये अँधेरे।

कलघोषों के बीच

आहुति देते जाएँ

यज्ञ रहे प्रज्‍ज्‍वलित

सिद्ध हों सभी ॠचाएँ

पथभ्रष्टों की प्रगति के

प्रतिमान छलावे

कर्मक्षेत्र में जगती रहतीं

सभी…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on October 21, 2014 at 10:47am — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं (गीत) // -- सौरभ

१२१२ ११२२ १२१२ २२

अनेक भाव हृदय में उकेर जाते हैं ।

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं ॥



किसी उदास की पीड़ा सजल हृदय में ले

निशा निराश हुई, चुप वृथा पड़ी-सी थी

तथा निग़ाह कहीं दूर व्योम में उलझी…

Continue

Added by Saurabh Pandey on October 21, 2014 at 5:30am — 13 Comments

खिलौना (लघुकथा)

'माँ क्या दूल्हा बाजार में बिकता है? जिसे दहेज देकर खरीदने के लिए तू पेसे जोड़ रही है ।'
' मगर बेटा में तो तेरे लिए ...'
'माँ मुझे पति चाहिए कोई दहेज लेकर बिका हुआ खिलौना नही ।'


मोलिक व अप्रकाशित
किशन 21-10-14

Added by किशन कुमार "आजाद" on October 20, 2014 at 10:50pm — 2 Comments

बोलती बंदिशे

“तू लड़की होकर भी हमेशा गली में लड़कों के साथ खेलती रहती है, ये बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता |“

पड़ोसी अंकल ने रितिका को समझाते हुए कहा |

“हाँ अंकल जी !  मगर ये तो अच्छा लगता होगा न कि लड़के हमें देखकर छींटाकशी करें,  और हमें चुप रहने और घर में रहने की नसीहत दी जाए ?”

अंकल जी चुपचाप बेटे को लेकर घर में चले गए |

.

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित )

 

Added by somesh kumar on October 20, 2014 at 10:30pm — No Comments

गजल : बाजी मोहब्बत की हारे हुए

ख्वाब   हरगिज   न  पूरे  हमारे  हुये  I

हम तो बाजी मुहब्बत की हारे हुये II

 

दोस्त    हमको   भुलावा   ही    देते रहे

वक्त जब आ  पड़ा तो  किनारे हुये I

 

माफ़ जबसे    हमारी   खता   हर   हुई

हमने समझा कि गर्दिश में तार  हुये I

 

उनका नजरे चुराने  का  ढब देखिये

कैसे-कैसे   गजब   के   इशारे   हुये I

  

इश्क नजरो में जब से नुमायाँ हुआ

कितने दिलकश जहाँ के नज़ारे हुये I

 

हुस्न अपनी   खनक    में…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 20, 2014 at 6:00pm — 2 Comments

लघुकथा : कीमत

वो लगातार स्टैंड पे टंगी बोतल से गिरती दवा की एक एक बूँद को गौर से देख रहा था ! नर्स ने काफी देर उसे ऐसा करते देखा तो उसके पास आकर पूछ बैठी !


"इन बूंदों को गिन रहे हैं क्या आप ? लगता है पर बूँद प्राइस निकालेंगे !"

"नहीं ,माँ के शरीर में जा रही है इसलिये दुआ मिला रहा हूँ !"

( मौलिक एवं अप्रकाशित )

Added by Neeles Sharma on October 20, 2014 at 6:00pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
लक्ष्मी (लघु कथा ‘राज’)

“माँ वो कोठी वाली मैडम हर दीवाली पर लक्ष्मी जी के पैर बनाती हैं तू क्यूँ नहीं बनाती? इसी लिए हमारे घर लक्ष्मी नहीं आती क्या?”रिक्कू ने बड़े भोलेपन से पूछा|

”बेटा, हमारे घर भी एक बार लक्ष्मी आई थी पर तेरे बापू ने दारु के लिए उसे बेच दिया अब वो कभी नहीं आएगी”|

.

(मौलिक एवं अप्रकाशित ) 

Added by rajesh kumari on October 20, 2014 at 3:30pm — 12 Comments

एक तरही ग़ज़ल....

हमेशा दौड़ में पिछड़ा रहा हूँ

मगर चिन्तन में मैं कछुआ रहा हूँ

खिलौना मैं नहीं जो खेल लोगे

हूँ इंसा मैं  भी ये  समझा रहा हूँ

सितम ढाओं, गुमां कर लो जी भर के

ये मत कहना कि मैं पछता रहा हूँ

मैं मुफ़लिस ही सही कोई नहीं गम

हमेशा दिल से ही सच्चा रहा हूँ

तेरी तस्वीर पलकों में सजा के

तेरी  यादों से दिल बहला रहा हूँ 

मौलिक व् अप्रकाशित 

Added by MAHIMA SHREE on October 20, 2014 at 10:00am — 4 Comments

कहानी

जाने किस तानेबाने मे उलझी, मैं अपनी खिड़की पे खड़ी थी।

इतने में मैंने देखा - एक सदाबहार का पौधा जो कि खिड़की की चौखट और दीवार की संद से निकल कर लहलहा रहा था ।

उसके हरे चिकने पत्ते प्याजी रंग के फूल मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे, लेकिन दीवार में बरसात का पानी मरेगा , ये सोच कर मैंने उखाड़ने के लिये हाथ बढ़ाया ही था, कि नीचे गली से आवाज आई-

"पौधे ले लो पौधे"

मैंने देखा-तो ठेले पर देसी गुलाब, इंगलिश गुलाब ,बोगन बेलिया ,एरोकेरिया पाम की विभिन्न किस्में रखी थी।

ये इंगलिश…

Continue

Added by Dr.sandhya tiwari on October 19, 2014 at 10:30pm — 8 Comments

कविता

 कविता 

कविता हृदय की सहचरी है 

भावों से भरी हुई रस भरी है।

जिंदा दिलों की रवानगी है 

कविता कवि की वानगी है । 

कविता अपने दिल से उदार है

कवि के भावों की चित्रकार है ।

समेटती कई रहस्यों को अपने में

 संवेदनावों पर करती प्रहार है । 

उगती है कलम के साथ कागज पर 

पहुँच इसकी हृदय के उस पार है । 

कविता माला है भावों और शब्दों की 

शुष्क मन को भी करती तार-तार है…

Continue

Added by kalpna mishra bajpai on October 19, 2014 at 10:00pm — 4 Comments

उत्सव [दोहावली]

उत्सव लाये हैं ख़ुशी,खूब सजे बाजार

साथ मिठाई के सजे,भिन्न भिन्न उपहार |



रंग रूप लेकर नए ,चमक उठे सब गेह

उत्सव हैं सब गर्व के ,बाँटे खुशियाँ नेह |



उत्सव धनतेरस हुआ,त्रयोदशी के वार

नूतन बर्तन हैं सजे ,और स्वर्ण बाजार |



छोटी दीवाली जले,यम दीपक हर द्वार

मुक्त हुईं कन्या सभी,नरकासुर को मार |



उत्सव दीपों का सभी,मनाते संग प्यार

सबको बाँटे रोशनी ,दीवाली त्यौहार |



अन्नकूट उत्सव रचा, दीवाली पश्चात

भोग…

Continue

Added by Sarita Bhatia on October 19, 2014 at 8:00pm — 7 Comments

Monthly Archives

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-"OBO" मुफ्त विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

जितेन्द्र 'गीत' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post एक ग़ज़ल आपके हवाले
"बहुत सुंदर"
4 hours ago
जितेन्द्र 'गीत' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post इस दीपावली एक ऐसा दीप जलायें - डॉo विजय शंकर
"सुंदर आशाभरी पंक्तियाँ, बधाई स्वीकारें आदरणीय डा.विजय जी. दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामानाएं…"
4 hours ago
जितेन्द्र 'गीत' commented on Alok Mittal's blog post दिये (लघुकथा)
"बहुत अच्छी लघुकथा, आदरणीय आलोक जी. फ़ालतू के खर्च और जबरन के दिखावों में पैसा खपाना तो कोई महगाई…"
5 hours ago
Dr. Vijai Shanker posted a blog post

इस दीपावली एक ऐसा दीप जलायें - डॉo विजय शंकर

आओ इस दीपावलीएक ऐसा दीप जलायेंभटके हुए रहनुमाओं कोसही रास्ता दिखायें।आओ इस दीपावली एक ……वो जो…See More
5 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on Samir Parimal's blog post दिल्ली चीखती है
"सुन्दर ग़ज़ल लिखी है समीर जी , भुला पाती नहीं लख्ते-जिगर कोकि रातों में भी अम्मी चीखती है-----हृदय…"
6 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on Alok Mittal's blog post दिये (लघुकथा)
"सही कहा ,क्या मंहगाई सिर्फ अमीरों के लिए ही है ,सच में ये देखकर सुनकर शर्म आती है उन लोगों पर जो…"
6 hours ago
somesh kumar commented on Alok Mittal's blog post दिये (लघुकथा)
"shi mrm hai ,acchi khani"
6 hours ago
somesh kumar commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post एक ग़ज़ल आपके हवाले
"good "
6 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on rajesh kumari's blog post लक्ष्मी (लघु कथा ‘राज’)
"आ० लक्ष्मण जी,लघुकथा पर आपक अनुमोदन मेरे लिखे को सार्थक कर रहा है ,धन की लक्ष्मी की पूजा करते हैं…"
6 hours ago
Samir Parimal commented on Samir Parimal's blog post दिल्ली चीखती है
"शुक्रिया आदित्य जी"
8 hours ago
Aditya Kumar commented on Saurabh Pandey's blog post दियालिया उजास दे (नवगीत) // --सौरभ
"पढ़ कर बहुत अच्छा लगा और मै तो क्या कहूँ।  सुबह दीपोत्सव कवि शिरोमणि अग्रज श्री सौरभ जी !"
8 hours ago

© 2014   Created by Admin.

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service