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अच्छे दिन – अरुण कुमार निगम

पापा पापा बतलाओ ना , अच्छे दिन कैसे होते हैं

क्या होते हैं चाँद सरीखे, या तारों जैसे होते हैं.

 

बेटा ! दिन तो दिन होते हैं ,गिनती के पल-छिन होते हैं

अच्छे बीतें तो सुखमय हैं, वरना ये दुर्दिन होते हैं.

 

पापा पापा बतलाओ ना , अच्छे दिन कैसे होते हैं

क्या होते हैं दूध-मलाई , या माखन जैसे होते हैं.

 

बरसों से मैं सुनते आया, स्वप्न सजीले बुनते आया

लेकिन देखे नहीं आज तक, अच्छे दिन कैसे होते हैं

 

पापा पापा बतलाओ…

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Added by arun kumar nigam on November 23, 2014 at 11:00pm — No Comments

काला पत्थर

डोभाल जी का मकान बन रहा था, बड़े ही धार्मिक व्यक्ति थे और प्रकृति प्रेमी भी,एक माली भी रख लिया था ,उसका कार्य एक सुन्दर बगीचे का निर्माण करना था ,वह भी धुन का पक्का था , उसने तरह-तरह के फूल ,घास ,पेड़ लगा दिए और कभी –कभी वह  सजावट के लिए रंग बिरंगे पत्थर भी उठा कर ले आता और बड़े अच्छे शिल्पी की तरह उन्हें पौधों के इर्द-गिर्द सजाता ,उस बगीचे में अब तरह तरह के  फूल खिलने लगे थे ,वही नीचे एक बड़ा काला सा पत्थर भी था जिस पर माली अपना खुरपा रगड़ता और पौधों के नीचे से खरपतवार…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 23, 2014 at 10:00pm — No Comments

राजकुमार (लघुकथा)

"पापा, पढ़ने के बाद मुझे जाॅब तो मिल जाएगी ना?"
"किस मूर्ख ने कहा है तुमको नौकरी करनी है! तुमको तो राज करना है राज, मेरे राजकुमार बेटे।"- नेता जी ने अपने 12 साल के लड़के को सीने से लगा लिया।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Vinod Khanagwal on November 23, 2014 at 4:12pm — No Comments

शहर की रात

बंद खिडकियों से

झांकता

प्रकाश

चारो ओर स्याह-स्याह

मुट्ठी भर

उजास

 

टूटी हुयी

गर्दन लिए

बल्ब रहे झाँक

ट्यूब लाईट

अपना महत्त्व

रहे आंक

 

सर्र से

गुजर जाते

चौपहिया वाहन

सन्नाटा

विस्तार में

करता अवगाहन

 

तारकोली

सड़क सूनी

रिक्त चौराहे

सर्पीली…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 23, 2014 at 12:00pm — 1 Comment

ग़ज़ल

मुहब्बत में कोई रिश्ता नहीं देखा
परिंदा क़ैद में उड़ता नहीं देखा।

वफ़ा को क़ैद कहना है ख़िरदमंदी
ख़िरदमंदों को कुछ जँचता नहीं देखा।

सुनो फ़ितरत तो कुदरत ही बनाती है
शरीफों को कभी गिरता नहीं देखा।

ये आशिक़ सब के सब जैसे ज़नाना हैं
इन्हें हर बात पे रोता नहीं देखा?

बनाए रास्तों पर क्या चलें शेखर
फ़लक पे मैंने तो रस्ता नहीं देखा!

मौलिक व अप्रकाशित

Added by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 23, 2014 at 6:16am — 2 Comments

यार बैरी बना आशिकी के लिये |

शोर होता रहा रोशनी के लिये |

लोग लड़ते रहे चाशनी के लिये |

बेबसी का नज़ारा न देखा कोई ,

मार होती रही चाँदनी  के लिये |

लूट मचती रही चीख होता रहा , 

अश्क गिरते रहे ज़िंदगी के लिये |

हाथ बाँधे खड़े देखते रह गये ,   

घर जला आग में दोस्ती के लिये |

नाव डूबी वहीँ आब ना था जहाँ ,

यार बैरी बना…

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Added by Shyam Narain Verma on November 22, 2014 at 5:00pm — 1 Comment


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : दौर (गणेश जी बागी)

         वर्ष का पहला दिन, दीवार पर टंगा नया कैलेण्डर और जनवरी का पृष्ठ अपने भाग्य पर इतरा रहा था, बाकी महीनों के पृष्ठ दबे जो पड़े थे, सभी को प्रणाम करते देख वह अहंकार और आत्ममुग्धता से भर गया उसे क्या पता कि लोग उसे नहीं बल्कि उस पृष्ठ पर लगी माँ लक्ष्मी की तस्वीर को प्रणाम करते हैं ।

                    दिन-महीने बीतते गये, संघर्ष सफल हुआ और सबसे नीचे दबा दिसंबर माह का पृष्ठ आज सबसे ऊपर था । उसके ऊपर लगी माँ सरस्वती की तस्वीर बहुत ही सुन्दर लग रही थी…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 22, 2014 at 1:00pm — 13 Comments

ऐसी कोई वजह बनों

झगड़ा ना हो सुलह बनों।
ऐसी कोई वजह बनों।।

चर्चा हो सारे जग में।
ऐसी भी इक जगह बनों।।

तारीफ भी करना खूब।
पहले उसकी तरह बनों।

बेगुनाह को सजा न हो।
ऐसी कोई ज़िरह बनों।।

वाह वाह होगी तेरी।
पहले ऐसी गिरह बनों।।

-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on November 22, 2014 at 11:00am — 4 Comments

बलात्कार (लघुकथा)

"सर, एक काॅलेज की लड़की से बलात्कार हुआ है उसे हॉस्पिटल में लाया गया है।"-फोन पर किसी ने पत्रकार को सूचना दी।
"चलो यार, एक लड़की से बलात्कार करना है........"
"किसी टाइम तो अपनी जुबान को लगाम लगा लिया करो।"
"हाहाहाहाहा............"- ठहाकों से प्रेस रूम गूंज उठा और सभी पत्रकार उठकर हस्पताल की तरफ चल दिए।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Vinod Khanagwal on November 22, 2014 at 10:08am — 3 Comments

मुआवजा (लघु कथा)

"रमलू की घरवाली कौन हैं ? "

"साब मैं हूँ । "

"हम तेरे पति की मौत पर सरकार की तरफ से मुआवजा देने आये हैं, पढना जानती हैं ? "

"जी नही साब, अनपढ़ हूँ । "

"और कौन -कौन है घर में ? "

"साब मैं, 4 छोरिया 1 बेटो है। रमलू तो मर गयो । ये सारो बोझ मारे ऊपर छोड़ गयो । घर की हालत तो थे देख ही रया हो, खाने के लाले है। साब इतनी सर्दी में भी पहनने को कुछ नही ..." सिसकने लगती है ।

"चल ठीक है, रो मत ये......"

" इक मिनट " बात पूरी भी नही हुई थी की सहायक के कान मेँ वो…

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Added by किशन कुमार "आजाद" on November 22, 2014 at 8:30am — 7 Comments

ग़ज़ल

मौत की भीख मांगती है क्या
ज़िन्दगी ये भी ज़िंदगी है क्या

मौत को भीख ज़िन्दगी दे दी
आज तक क्या किसी ने दी है क्या।

अपने साये का बोझ उट्ठा कर
रौशनी आज तक चली है क्या।

हर इक आवाज़ बहरी होती है
आप ने बात ये सुनी है क्या।

'शम्स' ने जो कहा सुना है अभी
बात वो 'मीर' ने कही है क्या?

मौलिक व अप्रकाशित

Added by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 22, 2014 at 7:15am — 3 Comments

बालपन की मस्तियाँ ....(.नवगीत) सीमा हरि शर्मा

* बालपन की मस्तियाँ *



इंद्रधनुषी रंग उतरे

हैं फलक पर से जमीं

बालपन की मस्तियों में

रंग सारे चुन रहे।



मन लुभाती हैं सदा ही

तोतली सी बोलियाँ

बात बेमतलब भले पर

शब्द मिसरी गोलियाँ

फूल झरते ओंठ से सब

तोल मोलों से परे

बस करें अपने दिलों की

ना किसी की सुन रहे।...बालपन की मस्तियों में



सर्द शामें पैर नंगे

फर्श पर जब दौड़ते

घुमती पीछे तभी माँ

चप्पलों को हाथ ले

चूमती है गाल ढककर

माँ कभी आँचल… Continue

Added by seemahari sharma on November 22, 2014 at 12:30am — 10 Comments

पुण्य (लघुकथा)

"चाची, तुम्हारी बहू को जापे में खिलाने के लिए घी का इंतजाम नहीं हो पाया है अगर थोड़ी सी मदद कर देती तो...."
"देखो बेटा, इस महीने थोड़ा हाथ तंग है।"- चाची ने बात पूरी होने से पहले ही बहाना बना दिया।
शाम को एक थाली को ढके चाची कहीं जा रही थी। उसने पूछा-"चाची, कहाँ जा रही हो?"
"बेटा, वो अपनी गली की कुतिया ने बच्चों को जन्म दिया है। जापे वाली के लिए देसी घी का हलवा बहुत फायदेमंद होता है इसलिए उसके लिए ले जा रही हूँ। बड़ा पुण्य मिलेगा।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Vinod Khanagwal on November 21, 2014 at 2:37pm — 5 Comments

मेरे ख्वाबों कि कोई बात अगर हो जाये

२१२     २११    २२१    १२२   २२ 

 

चांदनी रात में बरसात अगर हो जाये

मेरे ख्वाबों कि कोई बात अगर हो जाये

 

यार मेरे तू ज़माने से सदा ही बचना

इक  हसीं  गुल से मुलाकात अगर हो जाये

 

काश! सहरा हो नजर जब भी बने दिल दुल्हा

यूं भी अरमानो कि बारात अगर हो जाये

 

आये हर सिम्त से बस यार महक जूही की  

काश धरती पे ये हालात अगर हो जाये

 

तन ये साँसों से तपे हौले से शब् भर मेरा

काश ऐसी भी कभी रात अगर हो…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on November 21, 2014 at 12:02pm — 5 Comments

नया मुर्गा (लघुकथा)

"क्या बात, आज क्लास अटेंड नहीं कर रही हो?"
"नहीं यार, एक नया मुर्गा फसा है आज तो बस रेस्टोरेंट और थियेटर।"

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Vinod Khanagwal on November 20, 2014 at 6:20pm — 9 Comments

मेरे पास, थोडे से बीज हैं

मेरे पास,

थोडे से बीज हैं

जिन्हे मै छींट आता हूं,

कई कई जगहों पे



जैसे,



इन पत्थरों पे,

जहां जानता हूं

कोई बीज न अंकुआयेगा

फिर भी छींट देता हूं कुछ बीज

इस उम्मीद से, शायद

इन पत्थरों की दरारों से

नमी और मिटटी लेकर

कभी तो कोई बीज अंकुआएगा

और बनजायेगा बटबृक्ष

इन पत्थरों के बीच



कुछ बीज छींट आया हूं

उस धरती पे,

जहां काई किसान हल नही चलाता

और अंकुआए पौधों को

बिजूका गाड़ कर

परिंदो से…

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Added by MUKESH SRIVASTAVA on November 20, 2014 at 3:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

22  22  22  22  2

टूटने लगे हैं घर शब्दों से

अब तो लगता है डर  शब्दों से



दैर हरम इक हो जाते लेकिन

पड़े दिलों पे पत्थर  शब्दों से



हैं मेरे हमराह ज़रा देखो

ग़ालिब ओ मीर ,ज़फ़र  शब्दों से



बनती बात बिगड़ने लगती है

ऐसे उठे बवण्डर  शब्दों से



फूल अमन के खिलते कैसे अब

दिल आज हुए बन्जर  शब्दों से



मेरी हस्ती गुमनाम -रहे पर 

छाऊँ सबके मन पर  शब्दों से



गुमनाम पिथौरागढ़ी



मौलिक व…

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Added by gumnaam pithoragarhi on November 19, 2014 at 8:00pm — 7 Comments

क्षणिकाएँ - 3 - डा० विजय शंकर

भला आदमी है वो ,
भला करता है ,
सौदागरों की तरह ।

रहमदिल है वह
दुआ करता है
भिखारियों की तरफ ।

आशीर्वाद देता है वह
चढ़ावा चढ़ जाने के बाद
पुजारी है वह ।

सब कर देगा वह
सब पा लेने के बाद
वादा है उसका ,
नेता है वह ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on November 19, 2014 at 5:46pm — 16 Comments

चिंता (लघुकथा)

"सुनो माँ, रवि का फोन आया था। कल मुझे लेने आ रहा है और इस बार कुछ ढंग के कपड़े ला देना। वहाँ मेरी बहुत इंसेल्ट होती है।"
'पिछली बार जिससे पैसे उधार लिए थे वो कई बार वापस माँगने आ चुकी थी। अब किससे उधार माँगेगी?'- सोचकर माँ चिंता में डूब गई।

मौलिक और अप्रकाशित

Added by Vinod Khanagwal on November 19, 2014 at 4:10pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है ( गिरिराज भंडारी )

मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है

**************************************

1222    1222    1222     122 

न आये होश अब यारों नशा छाया हुआ है  

सँभल ऐ बज़्म दिल अब वज़्द में आया हुआ है

 

ज़रा राहत की कुछ सांसें तो लेलूँ मैं ,कि सदियों

बबूलों को मनाया हूँ तो अब साया हुआ है 

 

हथौड़ा एक तुम भी मार दो लोहा गरम पर

यहाँ मज़हब को ले के खून गरमाया हुआ है…

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Added by गिरिराज भंडारी on November 19, 2014 at 10:10am — 18 Comments

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"आ. गुमनाम भाई , बहुत खूब ! बहुत बधाइयाँ ।"
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गिरिराज भंडारी commented on Dr. Vijai Shanker's blog post क्षणिकाएँ - 3 - डा० विजय शंकर
"आदरणीय विजय भाई , चार व्यवहारिक सच्चाइयों को बयान करती आपको चारों क्षणिकाओं के लिये बधाई ।"
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गिरिराज भंडारी commented on CHANDRA SHEKHAR PANDEY's blog post ग़ज़ल
"आ. चंद्र शे खर भाई , बढ़िया ग़ज़ल के लिये बधाई !"
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गिरिराज भंडारी commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल -- मुहब्बत का तराना तो बहुत गाया हुआ है ( गिरिराज भंडारी )
"आदरणीय मुकेश भाई , सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका दिली  आभार ।"
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