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प्रवाह, बुद्धिमत्ता और भ्रम का खेल सिद्धांत (लेख)

मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल है जिसकी व्याख्या खेल सिद्धांत के आधार पर की जा सकती है। खेल सिद्धांत हमें सिखाता है कि जब दो या अधिक खिलाड़ी किसी स्थिति में निर्णय लेते हैं, तो हमेशा सत्य या सही को नहीं चुनते, बल्कि वह विकल्प चुनते हैं जिससे उन्हें सबसे अधिक लाभ दिखाई देता है। यही सिद्धांत भाषा और बुद्धिमत्ता के आकलन पर भी लागू होता है।

मनुष्य जब किसी वक्ता, लेखक या आजकल किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली प्रणाली से सामना करता है, तो वह भी अनजाने में एक खेल खेल रहा होता है। इस खेल में एक खिलाड़ी है बोलने वाला और दूसरा खिलाड़ी है सुनने वाला। बोलने वाले के पास कई रणनीतियाँ होती हैं जैसे वह ठहरकर, सावधानी से, सीमित शब्दों में उत्तर दे सकता है या फिर धाराप्रवाह, आत्मविश्वास से और बिना रुके बोल सकता है। सुनने वाले के पास भी विकल्प होते हैं जैसे वह गहराई से सोचे, प्रश्न करे या धाराप्रवाह उत्तर को ही बुद्धिमत्ता मान ले।

इस खेल में एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। धाराप्रवाह बोलना एक ऐसी रणनीति है जो तुरंत लाभ देती है। खेल सिद्धांत की भाषा में कहें तो यह एक प्रमुख रणनीति बन जाती है क्योंकि सुनने वाला खिलाड़ी प्रवाह को ही बुद्धिमत्ता का संकेत मान लेता है। बोलने वाले के लिए यह अधिक सुरक्षित और लाभकारी रणनीति होती है कि वह बिना रुके बोले, भले ही उसकी बात पूरी तरह सही न हो। 

यहीं से भ्रम की शुरुआत होती है। प्रवाह एक ऐसा नैश संतुलन बना लेता है जिसमें दोनों खिलाड़ी सहज महसूस करते हैं। बोलने वाला संतुष्ट होता है क्योंकि उसे स्वीकार्यता मिलती है, और सुनने वाला संतुष्ट होता है क्योंकि उसे एक साफ़, आत्मविश्वासी उत्तर मिल गया। यह दोनों के लिए सुविधाजनक होता है। इस संतुलन में सत्य या गहराई की जाँच आवश्यक नहीं रह जाती। खेल संतुलित हो जाता है, लेकिन यह संतुलन सत्य पर नहीं, सुविधा पर आधारित होता है।

पुरानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ इस खेल में हार जाती थीं। वे बोल नहीं सकती थीं। उनके पास प्रवाह की रणनीति नहीं थी। भले ही वे निर्णय लेने में सही हों पर सामाजिक खेल में आकर्षक खिलाड़ी नहीं बन पाईं। खेल सिद्धांत के अनुसार, उनकी रणनीति कम लाभकारी थी, क्योंकि सुनने वाला खिलाड़ी उनसे भावनात्मक या बौद्धिक संतोष नहीं पाता था। चैटजीपीटी जैसे भाषाई औजार इस खेल के अनुसार काम करते हैं। यहाँ प्रवाह एक जीतने वाली रणनीति है इसलिए वे रुकते नहीं, संदेह होने पर भी आत्मविश्वास से लिखते हैं और हर स्थिति में कोई न कोई उत्तर प्रस्तुत करते हैं। इस तरह वे खेल के संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं, भले ही तर्क कमज़ोर हो।

इसके उलट, वास्तविक बुद्धिमत्ता की रणनीति अलग होती है। वह अक्सर रुकने को चुनती है। वह स्वीकार करती है कि सभी प्रश्नों का तुरंत उत्तर नहीं दिया जा सकता। लेकिन खेल सिद्धांत के दृष्टिकोण से देखें तो यह एक जोखिम भरी रणनीति है। क्योंकि इस रणनीति में तुरंत लाभ नहीं मिलता। सुनने वाला खिलाड़ी इसे कमजोरी या अज्ञान समझ लेता है। इसलिए यह रणनीति अक्सर हारने वाली प्रतीत होती है, भले ही दीर्घकाल में यही सबसे सही हो क्योंकि अंत में सत्य ही बचता है। 

कविता और ग़ज़ल को भी इसी खेल के रूप में देखा जा सकता है। कविता जल्दी उत्तर नहीं देती। वह अर्थ को भीतर पकने देती है। ग़ज़ल में तो यह खेल और कठिन हो जाता है, क्योंकि वहाँ रूप पहले से तय होता है और अर्थ को सही क्षण पर उसमें उतारना होता है। यहाँ संतुलन महत्वपूर्ण होता है। यही कारण है कि अच्छी ग़ज़ल लोकप्रिय प्रवाह से नहीं, बल्कि गहरे संतुलन से जन्म लेती है। मंचीय कविता के लोकप्रिय होने का कारण भी यही खेल सिद्धांत है। 

ग़ालिब को कोई इसीलिए नहीं छू सका क्योंकि उन्हें जाने-अनजाने एक ऐसे खेल में उतरना पड़ा जिसमें अधिकांश लोग उतरने का जोखिम ही नहीं लेते। खेल सिद्धांत की भाषा में कहें तो शायरी का मैदान दर’असल एक खेल का मैदान है। यहाँ एक ओर समाज, परंपरा और रसिक की अपेक्षाएँ हैं तो दूसरी ओर कवि का अपना अंतर्जगत। ज़्यादातर शायर तुरंत लाभ देने वाली रणनीति चुनते हैं। वे धाराप्रवाह वही कहते हैं जो पाठक सुनना चाहता है, ताकि स्वीकृति का लाभ तुरंत मिल जाए। ग़ालिब को परिस्थियों ने इसके उलट खेलने पर मजबूर किया। उनके जीवन की परिस्थितियाँ, राजनैतिक पतन, आर्थिक असुरक्षा, निजी त्रासदी इत्यादि ने उनसे यह सुविधा छीन ली कि वे नैश  संतुलन में टिके रहें। उन्हें एक जोखिमभरी रणनीति अपनानी पड़ी, जिसमें अर्थों का टकराव, तसल्ली की जगह असहज कर देने वाले सवाल और समाधान के स्थान पर नए  प्रश्न आते हैं। यह रणनीति तत्काल लोकप्रियता नहीं देती पर दीर्घकाल में यही बचती है। ग़ालिब ने रूप को बचाए रखते हुए अर्थ को इतना गहरा और अस्थिर बना दिया कि पाठक को भी जोखिम लेना पड़ा। यही कारण है कि उनके बाद आने वालों के लिए वही चाल दोहराना संभव नहीं हुआ; उनके पास या तो वह जीवन स्थितियाँ नहीं थीं, या वह जोखिम उठाने की क्षमता नहीं थी। ग़ालिब की अनन्यता किसी जादू में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि उन्होंने शायरी के खेल में मजबूरन वह दांव खेला जिसे खेलना हर किसी के बस का नहीं होता।

अंत में यह कहा जा सकता है कि भाषा, बुद्धिमत्ता और प्रवाह का संबंध एक सामाजिक खेल की तरह है। इस खेल में प्रवाह अक्सर जीतता है, क्योंकि वह तुरंत संतोष देता है। यह जीत सत्य की नहीं होती। खेल सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि क्यों समाज बार-बार आत्मविश्वासी लेकिन गलत आवाज़ों की ओर आकर्षित होता है, और क्यों चुप, सावधान और गहराई से सोचने वाली बुद्धिमत्ता पीछे रह जाती है।

शायद आने वाले समय में मनुष्य को यह सीखना होगा कि इस खेल के नियम बदलने ज़रूरी हैं। जब तक हम प्रवाह को ही जीत की शर्त मानते रहेंगे, तब तक भ्रम नैश संतुलन बनाता रहेगा। लेकिन जिस दिन हम रुकने, संदेह करने और चुप्पी को भी मूल्य देना सीखेंगे, उसी दिन यह खेल सच्ची बुद्धिमत्ता के पक्ष में झुकेगा।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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