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"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-178 के आयोजन के क्रम में विषय से परे कुछ ऐसे बिन्दुओं को लेकर हुई चर्चा की सूचना मिली है, और इसी क्रम में उक्त चर्चा को आयोजन के पटल पर पढ़ा और देखा भी गया है, जिनका…Continue
Started this discussion. Last reply by Saurabh Pandey May 5, 2025.
पहले सींचा नेह से, बाद सौंप दी पीर ।निकली मेरी प्रेम में, दगाबाज तकदीर ।।अरुन अनन्त …Continue
Started this discussion. Last reply by Sushil Sarna Oct 21, 2020.
भाग - २=====’दूसरा सप्तक’ की भूमिका लिखते समय अज्ञेय ने कहा है, कि, ’प्रयोग का कोई वाद नहीं है । हम वादी नहीं रहे, न ही हैं, न प्रयोग अपने आप में इष्ट या साध्य है ।’ वे आगे कहते हैं - ’जो लोग प्रयोग…Continue
Started this discussion. Last reply by Saurabh Pandey Sep 6, 2016.
मानवीय विकासगाथा में काव्य का प्रादुर्भाव मानव के लगातार सांस्कारिक होते जाने और संप्रेषणीयता के क्रम में गहन से गहनतर तथा लगातार सुगठित होते जाने का परिणाम है । मानवीय संवेदनाओं को सार्थक अभिव्यक्ति…Continue
Started this discussion. Last reply by Kalipad Prasad Mandal Sep 26, 2016.
जिस-जिस की सामर्थ्य रही है
धौंस उसी की
एक सदा से
एक कहावत रही चलन में
भैंस उसीकी जिसकी लाठी
मनमर्जी थोपी जाती है
नहीं चली तो तोड़ें काठी
अहंकार मद भरे विचारों
उड़ें हवा में
वे गर्दा से ..
हठ में अड़ना, जबरन भिड़ना
और झूठ रच मन की करना
निर्बल अबलों या नन्हों में
नाहक वीर बने घुस लड़ना
मद में ऐंठे गरमी झोंकें
लफ्फाजी भी
यदा-कदा से
खरबूजे का मीठा बाना
चक्कू से…
Posted on January 13, 2026 at 11:28pm
सूर्य के दस्तक लगाना
देखना सोया हुआ है
व्यक्त होने की जगह
क्यों शब्द लुंठित
जिस समय जग
अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो
कुंद होती दिख रही हो वेग की गति
और कर्कश वक्त
केंचुल छोड़ता हो
साधना जब
शौर्य का विस्तार चाहे
उग्र का पर्याय तब
खोया हुआ है
धूप के दर्शन नहीं हैं,
धुंध है बस
व्योम के उत्साह पर
कुहरा जड़ा है
जम रहा है आँख का पानी निरंतर
काल यह संक्रांति का
औंधा पड़ा है
अब प्रतीक्षा…
ContinuePosted on January 1, 2026 at 12:33am — 8 Comments
२१२२ २१२२ २१२२
जब जिये हम दर्द.. थपकी-तान देते
कौन क्या कहता नहीं अब कान देते
आपके निर्देश हैं चर्या हमारी
इस जिये को काश कुछ पहचान देते
जो न होते राह में पत्थर बताओ
क्या कभी तुम दूब को सम्मान देते ?
बन गया जो बीच अपने हम निभा दें
क्यों खपाएँ सिर इसे उन्वान देते
दिल मिले थे, लाभ की संभावना भी,
अन्यथा हम क्यों परस्पर मान देते ?
जो थे किंकर्तव्यमूढों-से निरुत्तर
आज देखा तो मिले वे…
Posted on November 2, 2025 at 7:30am — 5 Comments
२१२२ १२१२ २२/११२
तमतमा कर बकी हुई गाली
कापुरुष है, जता रही गाली
भूल कर माँ-बहन व रिश्तों को
कोई देता है बेतुकी गाली
कुछ नहीं कर सका बुरा मेरा
खीझ उसने उछाल दी गाली
ढंग-व्यवहार के बदलने से
हो गयी विष बुझी वही गाली
कब मुलायम लगी कठिन कब ये
सोचना कब दुलारती गाली
कौन कहिए यहाँ जमाने में
अदबदा कर न दी कभी गाली
नाज से तुम सहेज कर रखना
संस्कारों पली-बढ़ी…
Posted on August 29, 2025 at 5:30pm — 12 Comments
आदरणीय बन्धु सादर अभिवादन । जन्मदिन की असीम हार्दिक शुभकामनाएँ ।
जन्म दिन की हार्दिक बधाई आदरणीय सौरभ पांडे जी।
आदरणीय सौरभ पांडे जी को जन्म दिवस की हार्दिक बधाई एवम असीमित शुभ कामनायें।
नूतन वर्ष 2016 आपको सपरिवार मंगलमय हो। मैं प्रभु से आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता हूँ।
सुशील सरना
आदरणीय सौरभ जी, आप जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई हो
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