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Sushil Sarna
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स्मृति ...

स्मृति ...ज़िंदगीजबढलान पर होती हैउसके अंतस मेंबुझे अलाव होते हैंएक शाश्वत डर की आहट होती हैकुछ अनसुलझे सवाल होते हैंकुछ अधूरे जवाब होते हैंज़िंदगीधीरे -धीरेबिना पड़ाव के पथ परअग्रसर होती हैआँखों में ओस होती हैप्रभात और साँझ एक हो जाते हैंआहट यथार्थ हो जाती हैऔर एक श्वासअंतिम हो जाती हैज़िंदगीस्मृति हो जाती हैसुशील सरनामौलिक एवं अप्रकाशितSee More
23 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post हरजाई ....
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन पर आपकी आत्मीय प्रशंसा का दिल से शुक्रिया।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post निष्कलंक कृति ...
"आदरणीया बबिता गुप्ता जी सृजन पर आपकी मुक्त कंठ द्वारा की गयी प्रशंसा का दिल से आभार।"
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Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post नहीं जानती ...(350 वीं कृति )
"आदणीय लक्ष्मण धामी जी प्रस्तुति पर आपकी मुक्तकंठ प्रशंसा का दिल से आभार।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post नहीं जानती ...(350 वीं कृति )
"आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन पर आपकी मधुर प्रतिक्रिया का दिल से शुक्रिया। संशोधन एवं सुझाव के लिए शुक्रिया। संशोधित किया।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post यौवन रुत ...
"आदरणीय डॉ आशुतोष जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post यौवन रुत ...
"आदरणीय विजय निकोर जी, सादर प्रणाम। ... सृजन आपकी स्नेहाशीष का दिल से आभारी है।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post यौवन रुत ...
"आदरणीय अजय कुमार शर्मा जी सृजन आपकी आत्मीय प्रशंसा का आभारी है।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post यौवन रुत ...
"आदरणीय मोहित मिश्रा जी सृजन को मान देने का दिल से शुक्रिया।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post यौवन रुत ...
"आदणीय लक्ष्मण धामी जी प्रस्तुति पर आपकी मुक्तकंठ प्रशंसा का दिल से आभार।"
Thursday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post यौवन रुत ...
"आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... सृजन पर आपकी मधुर प्रतिक्रिया का दिल से शुक्रिया।"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

ज़रा से रूठ जाने पर ...

ज़रा से रूठ जाने पर ...अजबमिज़ाज हैनादाँ दिल कातोड़ देता हैहर रस्मउनकेज़रा से रूठ जाने परजो लम्हेमेरी हयातबन कर आये थेतारीकियों मेंरूठ गएहयात-ए-शरर केज़रा से रूठ जाने परक्या ख़बरबाद मेरे फ़ना होने केक्या गुजरी होगीख्वाब-ए-माहताब परयक़ीननमैंने ही नहींउनके लम्हों ने भीपायी होगी सज़ाज़ार ज़ार रोने कीतन्हाईयों मेंख़ुद के हीज़रा से रूठ जाने परसुशील सरनामौलिक एवं अप्रकाशसितSee More
Thursday
babitagupta commented on Sushil Sarna's blog post निष्कलंक कृति ...
"आदरणीय सर जी, बहुत ही सटीक शब्दों में भावों को पिरोया है, बधाई स्वीकार कीजिए प्रस्तुत रचना के लिए ।"
Wednesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post हरजाई ....
"आ. भाई सुशील जी, अच्छी कविता हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Wednesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post नहीं जानती ...(350 वीं कृति )
"आ. भाई सुशील जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Wednesday
Sushil Sarna replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब ... आपकी दिली मुबारकबाद का दिल शुक्रिया।"
May 16

Profile Information

Gender
Male
City State
Jaipur-Rajasthan
Native Place
New Delhi
Profession
Retired from Central Govt.Service as Superintending Officer
About me
I am a simple,sentimental and transparent person.Poetry is my hobby and passion

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स्मृति ...

स्मृति ...

ज़िंदगी
जब
ढलान पर होती है
उसके अंतस में
बुझे अलाव होते हैं
एक शाश्वत डर की आहट होती है
कुछ अनसुलझे सवाल होते हैं
कुछ अधूरे जवाब होते हैं

ज़िंदगी
धीरे -धीरे
बिना पड़ाव के पथ पर
अग्रसर होती है
आँखों में ओस होती है
प्रभात और साँझ एक हो जाते हैं
आहट यथार्थ हो जाती है
और एक श्वास
अंतिम हो जाती है
ज़िंदगी
स्मृति हो जाती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on May 21, 2018 at 5:45pm

ज़रा से रूठ जाने पर ...

ज़रा से रूठ जाने पर ...





अजब

मिज़ाज है

नादाँ दिल का

तोड़ देता है

हर रस्म

उनके

ज़रा से रूठ जाने पर



जो लम्हे

मेरी हयात

बन कर आये थे

तारीकियों में

रूठ गए

हयात-ए-शरर के

ज़रा से रूठ जाने पर



क्या ख़बर

बाद मेरे फ़ना होने के

क्या गुजरी होगी

ख्वाब-ए-माहताब पर

यक़ीनन

मैंने ही नहीं

उनके लम्हों ने भी

पायी होगी सज़ा

ज़ार ज़ार रोने की

तन्हाईयों में

ख़ुद के ही

ज़रा से रूठ… Continue

Posted on May 17, 2018 at 1:01pm

हरजाई ....

हरजाई ....

ये

वो गालियां हैं

जहां

अंधेरों में

सह्र होती है

उजाले उदास होते हैं

पलकों में

खारे मोती

होते हैं

बे-लिबास जिस्म,

लिपे -पुते चेहरे,

शायद

बाजार में

बिकने की

ये पहली जरूरत है

इक रोटी के लिए

सलवटों से खिलवाड़

रौंदे गए जिस्म की

बिलखती दास्ताँ हैं

भोर

एक कह्र ले कर आती है

पेट की लड़ाई

शुरू हो जाती है

दिन ढलने के साथ -साथ…

Continue

Posted on May 16, 2018 at 11:30am — 2 Comments

नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती ...(350 वीं कृति )

नहीं जानती

तुम किस धागे से

रिस्ते हुए ज़ख्मों पर

ख़्वाबों का

पैबंद लगाओगे

नहीं जानती

तुम किस चाशनी में डुबोकर

ज़ख़्मी लम्हों को

मेरी आँखों की हथेली पर

सजाओगे

नहीं जानती

तार तार हुए

ख़्वाबों के लिबास

कैसे बेशर्मी को

नज़रअंदाज़ कर पाएंगे

मगर

जानती हूँ

तुम फिर से

मेरे

संग-रेज़ों में तकसीम ख़्वाबों को

अपने शीरीं…

Continue

Posted on May 14, 2018 at 5:30pm — 4 Comments

Comment Wall (34 comments)

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At 11:15pm on September 17, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुशील सरना जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी "कविता : कितना अच्छा होता" को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र यथा शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 1:35am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका मेल बॉक्स ब्लॉक होने के कारण मेल सेंड नहीं हो रहा है. 

At 1:29am on May 6, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय सुशील सरना सर, विलम्ब से प्रत्युत्तर हेतु क्षमा. आपको मेल कर दिया है. सादर 

At 10:17pm on April 7, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ० सरना भाई जी, सादर  प्रणाम!

आपका हार्दिक स्वागत है.  मित्रता से भाग्योदय होता है ,  मैं धन्य हुआ. सादर

At 9:46am on April 1, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय सुशील जी ..महीने का सक्रिय सदस्य चुने जाने पर मेरी तरफ से हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 6:02am on March 20, 2016, केवल प्रसाद 'सत्यम' said…

आ०  सुशील सरना भाई जी, सादर प्रणाम!  आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" चुने जाने पर बहुत-बहुत बधाई. सादर

At 4:22pm on March 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

सुशील सरना जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 9:00pm on February 17, 2016, Tasdiq Ahmed Khan said…

मोहतरम जनाब सुशील सरना  साहिब ,  यह  आप सब की हौसला अफ़ज़ाई का नतीजा है  , जिसके लिए   आप का बहुत बहुत शुक्रिया ,महरबानी

At 8:47pm on January 11, 2016, सतविन्द्र कुमार राणा said…
धन्यवाद आदरणीय sushil Sarna जी।आपको भी सपरिवार सादर हार्दिक शुभकामनाएं!
At 2:33pm on January 5, 2016, अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव said…

तन स्वस्थ रहे मन में उमंग...सुशील भाईजी आपको भी सपरिवार नव वर्ष की ढेरों  शुभकामनायें

 
 
 

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"जनाब मोहम्मद आरिफ साहब, सराहना हेतु दिल से आभार ।"
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"सराहना एवं उत्साहवर्धन हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय हर्ष महाजन साहब ।"
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