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पुस्तक समीक्षा

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इस ग्रुप में पुस्तकों की समीक्षा लिखी जा सकती है |

Location: Vishva
Members: 99
Latest Activity: Apr 1

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पुस्तक समीक्षा : लक्ष्मण की कुण्डलियाँ 3 Replies

समीक्षक : अशोक कुमार रक्ताले.       आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला जी कविताई तो लम्बे समय से कर रहे हैं किन्तु उन्होंने छंद रचनाएं करना पिछले कुछ वर्षों से ही प्रारंभ किया है और कुछ ही वर्षों में उन्होंने अपनी रचनाओं को इतना परिष्कृत कर लिया है की…Continue

Started by Ashok Kumar Raktale. Last reply by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Mar 17.

‘पृथ्वी के छोर पर’- अभियान और अनुभूति का एक रोमांचक दस्तावेज - डॉ0 गोपाल नारायन श्रीवास्तव

हिन्दी साहित्य की गद्याधारित विधाओं में नाटक, उपन्यास, कहानी और निबंध के बाद जीवनी आत्म-कथा, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, रहस्य-रोमांच के इतिवृत्त और रेखाचित्र का विशेष स्थान है और इन इतर विधाओं को एक ही पुस्तक में ढाल देने  जैसे  जादुई करिश्मे का नाम…Continue

Started by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव Mar 16.

"कुंडलिया छंद के नये शिखर" संकलन की समीक्षा 2 Replies

 श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी द्वारा सम्पादित “कुंडलिया छंद के नये शिखर” में 14 कुण्डलियाकारों के कुंडलिया छंद है | इन छन्दों के बारे में प्रोफ. सोम ठाकुर ने इस पुस्तक पर अपने राय में ये उद्गार प्रकट किये है “कुंडलिया छंद के के इस संकलन में…Continue

Started by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला. Last reply by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Dec 19, 2016.

समीक्षा : “अब किसे भारत कहें” एक कुण्डलिया छंद संग्रह.

  “अब किसे भारत कहें” नाम देखकर तो लगा न था की यह कोई कुण्डलिया संग्रह होगा. किन्तु यह डॉ. रमाकांत सोनी जी का जुलाई-१६ में प्रकाशित कुण्डलिया संग्रह है.           डॉ. रमाकांत सोनी जी की अब तक छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. सर्व प्रथम प्रकाशित…Continue

Tags: कहें, भारत, किसे, अब

Started by Ashok Kumar Raktale Nov 24, 2016.

छन्द काव्य संकलन ”करते शब्द प्रहार“ पुस्तक के विमोचन पर उदगार - 4 Replies

दिनांक 12 अक्तूबर, 2016 को छन्द काव्य संग्रह “करते शब्द प्रहार” पर अपने संबोधन में मुख्य अतिथि कलानाथ जी शास्त्री में कहाँ कि दोहों में जितनी मारक क्षमता होती है उतनी गंभीरता से दोहे नहीं लिखे जा रहे | उन्होंने स्पष्ट किया कि “सतसैया के दोहरा जो…Continue

Started by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला. Last reply by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला Oct 27, 2016.

सार्थक प्रस्तुतीकरण हेतु सोच को भी संश्लेषित होना होता है // -सौरभ

युवा कवि अरविन्द की कई कविताओं से गुजरने का संयोग बना है। ऐसे किसी संयोग का बनना मेरे जैसों के लिए सौभाग्य है। आजके कवियों की अंतर्दशा और व्यवहार-दशा दोनों को निकट से बूझने की एक माक़ूल गुंजाइश बनती है। साथ ही, ग़ुज़रते दौर पर एक दृष्टि भी बनी रहती है।…Continue

Started by Saurabh Pandey Sep 14, 2016.

छन्दों के प्रति उत्कट आग्रह के साथ सतत क्रियाशील रहना कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है 3 Replies

सार्थक रचनाकर्म शाब्दिक अभिव्यक्ति मात्र नहीं होता, बल्कि यह एक सुगढ़ काव्य-अनुशासित भाव-संप्रेषण है । रचनाकर्म भावुक किन्तु आग्रही अभिव्यक्तियों के बावज़ूद काव्य-अनुशासन से जितनी दूर जाता है, उतना ही दुरूह और क्षणभंगुर होता जाता है । पद्य-रचनाओं को…Continue

Started by Saurabh Pandey. Last reply by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" Sep 3, 2016.

ज़हीर कुरेशी की ग़ज़लें विविध आयामी सोच तथा भाषायी व्यवहार के कारण ही नयी ऊँचाइयाँ तय कर पाती हैं // --सौरभ

कई विधाएँ, विशेषकर पद्य विधाएँ हैं, जो भाषा विशेष की गोद में जन्म अवश्य लेती हैं, और तदनुरूप पल्लवित भी होती हैं । परन्तु, कालांतर में अपनी अर्थवत्ता और संप्रेष्य गुणों के कारण अपने विशिष्ट भूभाग और भाषा विशेष की सीमाओं को फलांगती हुई अन्यान्य…Continue

Started by Saurabh Pandey Jul 19, 2016.

"काँवर" श्रवण कुमार की: कान्ता रॉय

कांवर श्रवण कुमार कीलेखक :  देवेन्द्र दीपकडी-15,शालीमार गार्डनकोलार रोड ,भोपाल -42.प्रकाशक : सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशनएन -77,कनाट सर्कस ,नई दिल्ली -110001ISBN : 978-81-7309-854-3 (PB)प्रथम संस्करण :2015मूल्य : 80/- मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के…Continue

Started by kanta roy Jul 8, 2016.

स्तुत्य, सम्यक, सरस,सुगन्धित पुष्प वल्लरी है ‘काल है संक्रांति का’ (आचार्य संजीव सलिल जी की पुस्तक समीक्षा )

हमारे वेद शास्त्रों में कहा गया है “छन्दः पादौ वेदस्य” अर्थात छंद वेद के पाँव हैं |यदि गद्य की कसौटी व्याकरण है तो कविताओं की  कसौटी छंद है|कवि  के मन के भाव यदि छंदों का कलेवर पा जाएँ तो पाठक के लिए हृदय ग्राही और स्तुत्य हो जाते हैं | आज ऐसी ही…Continue

Started by rajesh kumari Jul 3, 2016.

 
 
 

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