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Dayaram Methani
  • Male
  • Bhilwara - rajsthan
  • India
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Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय समर कबीर जी, प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद एवं सुझाव के लिए आभार।"
Sep 1
Samar kabeer commented on Dayaram Methani's blog post ग़ज़ल
"जनाब दयाराम मेठानी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । 'संकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहींवक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर है' इस शैर के सानी मिसरे में 'सभी' शब्द के कारण रदीफ़ है कि बजाय "हैं" हो गई…"
Sep 1
Dayaram Methani posted a blog post

ग़ज़ल

 2122 2122 2122 212नाव है मझधार में नाविक नशे में चूर है सांझ है होने लगी मंजिल नज़र से दूर हैसंकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहीं वक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर हैजिन्दगी की कशमकश में जीना’ जिसको आ गया यों समझ लो हौसलों से वो बहुत भरपूर हैदोष है अपना समय के साथ चल पाये नहीं बंद मुट्ठी से फिसलना वक्त का दस्तूर हैहाल ‘‘मेठानी’’ बतायंे क्या किसी को अब यहां आदमी सुनता नहीं अब हो गया मगरूर है( मौलिक एवं अप्रकाशित ) - दयाराम मेठानीSee More
Aug 27
Dayaram Methani commented on Balram Dhakar's blog post ग़ज़ल- बलराम धाकड़ (मुहब्बत के सफ़र में सैकड़ों आज़ार आने हैं)
"आदणीय बलराम धाकड़ जी, सुंदर गज़ल के ​लिए बधाई स्वीकार करें। "
Jul 28
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"आदरणीय समर कबीर जी, अजय तिवारी जी की टिप्पणी के समय मुझे शतुर गुरबा के बाबत कुछ याद नहीं आया। इसलिए  उनसे जानकारी बाबत निवेदन किया फिर मुझे याद आया कि इस बाबत कभी चर्चा की थी तो मैने उसे ढूंढा आैर जो आपने बताया वो मुझे नोट किया हुआ मिल गया। उसे…"
Jul 7
Samar kabeer commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"जनाब दयाराम जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । जनाब अजय तिवारी जी से सहमत हूँ,आपको याद हो तो कुछ दिन पहले "शुतरगुरबा" के बारे में आपको विस्तार से बता चुका हूँ ।"
Jul 7
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"आ. भाई दयाराम जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jul 6
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,  प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार।"
Jul 6
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"आदरणीय अजय तिवारी जी, रचना पर विस्तृत समीक्षा एवं सुझाव के लिए बहुत बहुत आभार। आपने शतुर गुर्बा दोष बताया है। मुझे इसके बारे में संभवत: पूरी जानकारी नहींं है। अत: आपसे निवेदन है कि इस रचना में जहा जहां आपने यह दोष बताया हे वो कैसे उत्पन्न हुआ…"
Jul 6
Ajay Tiwari commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"आदरणीय दयाराम जी, अच्छे शेर हुए हैं. हार्दिक बधाई. लेकिन कुछ शेरों को अभी और वक्त देने की ज़रुरत है. मसलन ये शेर :    आंख से आंसू बहाना छोड़िये > शुतुर गुर्बा है. 'छोड़िये' की जगह 'छोड़ कर' रखा जा सकता है. …"
Jul 6
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"आ. भाई दयाराम जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jul 6
Dayaram Methani commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी।"
Jul 5

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on Dayaram Methani's blog post गज़ल सीख लो
"अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय .. बधाई !"
Jul 5
Dayaram Methani posted a blog post

गज़ल सीख लो

2122 2122 212दर्द को दिल में दबाना सीख लो ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लोआंख से आंसू बहाना छोड़िये हर मुसीबत को भगाना सीख लोज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से खेल में खुद को जिताना सीख लोफूल को दुनिया मसल कर फैंकती खुद को कांटों सा दिखाना सीख लोछोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लोथी जवानी जोश भी था स्वप्न भी दिन पुराने अब भुलाना सीख लोकौन ‘‘मेठानी’’ किसी को पूछता तुम जमाने को झुकाना सीख लो( मौलिक एवं अप्रकाशित ) - दयाराम मेठानीSee More
Jul 5
Dayaram Methani commented on Samar kabeer's blog post एक मुश्किल बह्र,"बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्बा सालिम" में एक ग़ज़ल
"आदरणीय समर कबीर जी, बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।"
Jul 4
Dayaram Methani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-104
"आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप जी, प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार।"
Jun 15

Profile Information

Gender
Male
City State
BHILWARA
Native Place
BHILWARA
Profession
journlist and writer
About me
I like to read and write kavita, gazal, short stories and artical.

Dayaram Methani's Blog

ग़ज़ल

 2122 2122 2122 212

नाव है मझधार में नाविक नशे में चूर है

सांझ है होने लगी मंजिल नज़र से दूर है

संकटों से आदमी क्या देव भी बचते नहीं

वक्त के आगे सभी होते यहां मजबूर है

जिन्दगी की कशमकश में जीना’ जिसको आ गया

यों समझ लो हौसलों से वो बहुत भरपूर है

दोष है अपना समय के साथ चल पाये नहीं

बंद मुट्ठी से फिसलना वक्त का दस्तूर है

हाल ‘‘मेठानी’’ बतायंे क्या किसी को अब यहां

आदमी सुनता नहीं अब हो गया मगरूर…

Continue

Posted on August 27, 2019 at 10:00pm — 2 Comments

गज़ल सीख लो

2122 2122 212

दर्द को दिल में दबाना सीख लो

ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लो

आंख से आंसू बहाना छोड़िये

हर मुसीबत को भगाना सीख लो

ज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से

खेल में खुद को जिताना सीख लो

फूल को दुनिया मसल कर फैंकती

खुद को कांटों सा दिखाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी

कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

थी जवानी जोश भी था स्वप्न भी

दिन पुराने अब भुलाना सीख लो

कौन…

Continue

Posted on July 4, 2019 at 9:30pm — 8 Comments

झूठ का व्यापार - ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

झूठ का व्यापार बढ़ता जा रहा है आजकल,

और हर इक पर नशा ये छा रहा है आजकल

है लड़ाई का नजारा हर तरफ देखें जिधर,

आदमी ही आदमी को खा रहा है आजकल

इस प्रगति के नाम पर ही मिट रहे संस्कार सब

झूठ को हर आदमी अपना रहा है आजकल

बाँटकर भगवान को नेता खुशी से झूमकर

काबा’ तेरा काशी’ मेरी गा रहा है आजकल

जाग ‘मेठानी’ बचायें आग से अपना चमन

नित नया जालिम जलाने आ रहा है…

Continue

Posted on April 8, 2019 at 2:01pm — 7 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल

मापनी: 2122 2122 2122 212

आंख से आंसू कभी यों ही बहाया ना करो

दर्द दिल का भी जमाने को बताया ना करो

हर किसी को मुफ्त में कोई खुशी मिलती नहीं

मेहनत से आप अपना जी चुराया ना करो

जिन्दगी ले जब परीक्षा हौसलों से काम लो

आपदा के सामने खुद को झुकाया ना करो

हैं सफलता और नाकामी समय का खेल ही 

लक्ष्य से अपनी नजर को तो हटाया ना करो

जीत लेंगे जिन्दगी की जंग ’मेठानी‘ सुनो

तुम निराशा को कभी मन में बसाया ना…

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Posted on March 15, 2019 at 1:14pm — 5 Comments

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At 10:09pm on May 24, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय दयाराम मेथानि जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया जनाब
 
 
 

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