For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-187

ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरे के 187 वें अंक में आपका हार्दिक स्वागत है |

इस बार का मिसरा आज के दौर के मशहूर शायर जनाब इरफ़ान सिद्दीक़ी साहब की ग़ज़ल से लिया गया है।

तरही मिसरा है:

“अस्ल जंजीर तो सामान-ए-सफ़र है साईं”

बह्र 2122, 1122, 1122, 112/22

अर्थात् फ़ायलातुन्, फ़ियलातुन् फ़ियलातुन्, फ़यलुन् है।

रदीफ़ है “है साईं” और क़ाफ़िया है ‘अर’ का स्वर

क़ाफ़िया के कुछ उदाहरण हैं, अगर, अधर, अमर, असर, इधर, उतर, खबर, डगर, नगर, नजर, पहर, मगर, लहर आदि उदाहरण के रूप में, मूल ग़ज़ल यथावत दी जा रही है।

मूल ग़ज़ल यह है:

देख ले ख़ाक है कासे में कि ज़र है साईं

दस्त-ए-दादार बड़ा शो'बदा-गर है साईं

तू मुझे उस के ख़म-ओ-पेच बताता क्या है

कू-ए-क़ातिल तो मिरी राहगुज़र है साईं

शहर-ओ-सहरा तो हैं इंसानों के रक्खे हुए नाम

घर वहीं है दिल-ए-दीवाना जिधर है साईं

पाँव की फ़िक्र न कर बार-ए-कम-ओ-बेश उतार

अस्ल जंजीर तो सामान-ए-सफ़र है साईं

शा'इरी कौन करामत है मगर क्या कीजे

दर्द है दिल में सो लफ़्ज़ों में असर है साईं

'इश्क़ में कहते हैं फ़रहाद ने काटा था पहाड़

हम ने दिन काट दिए ये भी हुनर है साईं


मुशायरे की अवधि केवल दो दिन होगी । मुशायरे की शुरुआत दिनांक 28 जनवरी दिन बुधवार के प्रारंभ के साथ हो जाएगी और दिनांक 29 जनवरी दिन गुरुवार के समाप्त होते ही मुशायरे का समापन कर दिया जायेगा.

नियम एवं शर्तें:-

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" में प्रति सदस्य अधिकतम एक ग़ज़ल ही प्रस्तुत की जा सकेगी |

एक ग़ज़ल में कम से कम 5 और ज्यादा से ज्यादा 11 अशआर ही होने चाहिए |

तरही मिसरा मतले को छोड़कर पूरी ग़ज़ल में कहीं न कहीं अवश्य इस्तेमाल करें | बिना तरही मिसरे वाली ग़ज़ल को स्थान नहीं दिया जायेगा |

शायरों से निवेदन है कि अपनी ग़ज़ल अच्छी तरह से देवनागरी के फ़ण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें | इमेज या ग़ज़ल का स्कैन रूप स्वीकार्य नहीं है |

ग़ज़ल पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे ग़ज़ल पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं | ग़ज़ल के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें |

वे साथी जो ग़ज़ल विधा के जानकार नहीं, अपनी रचना वरिष्ठ साथी की इस्लाह लेकर ही प्रस्तुत करें

नियम विरूद्ध, अस्तरीय ग़ज़लें और बेबहर मिसरों वाले शेर बिना किसी सूचना से हटाये जा सकते हैं जिस पर कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी |

ग़ज़ल केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, किसी सदस्य की ग़ज़ल किसी अन्य सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी ।

विशेष अनुरोध:-

सदस्यों से विशेष अनुरोध है कि ग़ज़लों में बार बार संशोधन की गुजारिश न करें | ग़ज़ल को पोस्ट करते समय अच्छी तरह से पढ़कर टंकण की त्रुटियां अवश्य दूर कर लें | मुशायरे के दौरान होने वाली चर्चा में आये सुझावों को एक जगह नोट करते रहें और संकलन आ जाने पर किसी भी समय संशोधन का अनुरोध प्रस्तुत करें | 

मुशायरे के सम्बन्ध मे किसी तरह की जानकारी हेतु नीचे दिये लिंक पर पूछताछ की जा सकती है....

"OBO लाइव तरही मुशायरे" के सम्बन्ध मे पूछताछ

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो 28 जनवरी दिन बुधवार लगते ही खोल दिया जायेगा, यदि आप अभी तक ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार से नहीं जुड़ सके है तो www.openbooksonline.comपर जाकर प्रथम बार sign upकर लें.

"ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" के पिछ्ले अंकों को पढ़ने हेतु यहाँ क्लिक...

मंच संचालक

तिलक राज कपूर

(वरिष्ठ सदस्य)

ओपन बुक्स ऑनलाइन डॉट कॉम

Views: 715

Replies are closed for this discussion.

Replies to This Discussion

स्वागतम

सादर अभिवादन।

कोख से मौत तलक रात अमर है साईं
अपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।
*
धूप ही धूप मिली जब से सफर है साईं
पग नहीं अपने पड़े छाँव जिधर है साईं।२।
*
वासना ही तो चढ़ी सबकी नजर है साईं
रूह का प्यार  जमाने  में किधर है साईं।३।
*
सादगी करती किसी पर न असर है साईं
नित दिखावे  में  रमा  गाँव-नगर है साईं।४।
*
देश की बोल किसे आज फ़िकर है साईं
मुफ्त के माल से करना जो बसर है साईं।५।
*
कुछ तो इस नींव में हमने भी रखी थीं ईंटे
क्या कहें आज व्यवस्था जो लचर है साईं।६।
*
भाट-चारण सा हुआ आज है चौथा खम्भा
सत्य दिखता न  जिसे  झूठ खबर है साईं।७।
*
दिल भी दहले तो भला पीर से कैसे बोलो
देख पत्थर सा हुआ सबका जिगर है साईं।८।
*
काफिया सुख का जिसे और रदीफें दौलत
जिन्दगी  उसको  तो  आसान बहर है साईं।९।
*
चल के गंगा में सभी पाप ये धो लें हम भी
दो घड़ी  शेष  बची  अपनी  उमर  है साईं।१०।
*
गिरह-
रूह जब तन से गयी बात ये समझे हम भी
"अस्ल जंजीर तो  सामान-ए-सफ़र है साईं'।११।
***
एक हँसगुल्ला-
ढूँढ अब और नहीं जिसकी सिफर है साईं
फैल कमरे  सी  हुई  सबकी कमर है साईं।।
******
मौलिक/अप्रकाशित

आरंभ से गिरह तक सभी शेर बहुत अच्छे हुए। उर्दू के दृष्टिकोण से 9वें शेर में 'बहर' तथा 10 वें शेर में 'उमर' के प्रयोग पर आपत्ति हो सकती है जबकि सामान्य बोलचाल में ये शब्द ऐसे ही प्रयोग में आते हैं। 

आ. भाई तिलक राज जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।

9, 10 शेर के विषय में आपके कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। प्रयास करता हूँ कि कोई विकल्प बन सके। सादर..

 कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं 

 अब तो दीदावर न कोई न वो दर है साईं 

 महज़ होकर रहे अहबाब हैं माँ - बाप सभी

 है नहीं गौर तो उनकी वो असर है साईं 

 कहर बरपा रखा दुनिया में अकेली ताक़त 

 वो है अमरीका कि उसका वो असर है साईं

 बिगड़ी निय्यत अभी तो ट्रम्प की वो ग्रीन लैंड पे 

 हो विरासत कहीं और ज़र वो नज़र है साईं 

 मानता स्वयं को सारे जहाँ का  बादशाह है 

 हो जहाँ सारा ही साम्राज्य लो घर है साईं 

 छोड़ आलस्य खड़े हो जाओ सभी अब, 'चेतन'

शुरु हो परवाज़ भी गर अहल- ए- नज़र है साईं 

गिरह: 

 बाद मरने के ही जाना सभी ने है, यारो! 

 अस्ल जंजीर तो सामान -ए- सफ़र है साईं 

 

 मौलिक व अप्रकाशित 

 

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। अच्छी गिरह के साथ गजल का अच्छा प्रयास हुआ है। हार्दिक बधाई।

आ. भाई लक्ष्मण सिंह धानी ' मुसाफिर' साहब हौसला अफज़ाई के लिए  आपका बहुत-बहुत शुक्रिया !

कोई  सुनता नहीं मेरी वो असर है साईं 
 अब तो दीदावर न कोई न वो दर है साईं 

दीदावर का प्रयोग बह्र में नहीं है।

 महज़ होकर रहे अहबाब हैं माँ - बाप सभी
है नहीं गौर तो उनकी वो असर है साईं।
महज का वज़्न 12 होता है। शेर को बह्र की दृष्टि से एक बार फिर देखें।

 कहर बरपा रखा दुनिया में अकेली ताक़त 
वो है अमरीका कि उसका वो असर है साईं
कहर का वज़्न 12 होता है। शेर को बह्र की दृष्टि से एक बार फिर देखें।

बिगड़ी निय्यत अभी तो ट्रम्प की वो ग्रीन लैंड पे 
हो विरासत कहीं और ज़र वो नज़र है साईं ।
सही शब्द नीयत है। शेर को बह्र की दृष्टि से एक बार फिर देखें।

बह्र की दृष्टि से सभी शेर एक बार फिर देखें।

 आदरणीय तिलक राज कपूर साहब,  आप मेरी प्रस्तुति तक आये, आपका आभारी हूँ।

 // दीदावर का प्रयोग बह्र में नहीं है //

'हौसला अब न वो कोई न वो दर है साईं ' , सही होगा, कृपया मार्ग  दर्शन कीजिएगा !

 

// महज़ का वज़न 12 होता है //

" बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में 

  "ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है "

 (बा कलम असगर उल हक़ मजाज़ )

 // क़हर का वज़न 12 होता है //

 " क़हर टूटे जो मुद्दआ लिखूँ 

" फ़िक्र मजमून में गर्क़ था पहरों " 

( बा कलम दाग़ देहलवी )

 

// सही शब्द नीयत है //

 "हर जुम्बिशे निगाह में सद- कफ़ बेख़ुद

 " मरती फिरंगी हुस्न की निय्यत कहाँ कहाँ"

( बा कलम फिराक गोरखपुरी )

आशा  ही नहीं पूर्ण विश्वास है, उपरोक्त प्रमाणों को दृष्टिगत रखकर आप पुन: मेरी प्रस्तुति का अवलोकन अवश्य करेंगे ! सादर ....

सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"   
राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है साईं 
 
जो झुका रहता हो बस बोझ वो सर है साईं 
रीढ़ जिस में नहीं वो क्या ही कमर है साईं 
 
ज़र्रे-ज़र्रे पे हुक़ूमत बस उसी की चलती  
वो दिखाई नहीं देता है, मगर है साईं 
 
दर्ज होते हैं तेरे कर्म तुझे है मालूम  
बाज तू फिर भी नहीं आता, गदर है साईं  
 
देख पाँवों को ही नारी के वहीं है जन्नत
कहने वाले की भी सीने पे नज़र है साईं  
 
आज के दौर की कड़वी सी हक़ीक़त है ये
भूल अपनों की, परायों की ख़बर है साईं
 
और कुछ रोक नहीं दर पे तेरे आने तक  
**अस्ल ज़ंजीर तो सामान-ए-सफ़र है साईं  
#मौलिक एवं अप्रकाशित 

 सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं" 
राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है साईं 
प्रथम पंक्ति को बह्र की दृष्टि से देखें।
एक विकल्प ‘सुनते आये हैं कि मुश्किल ये डगर है साईं’


बाकी शेर गिरह सहित अच्छे हुए।

 

RSS

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  सही कहना है हम भारतीय और विशेषकर जो अभावों में पलकर बड़े हुए हैं, हर…"
24 minutes ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया प्रतिभाजी हार्दिक धन्यवाद आभार आपका"
31 minutes ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अशोक भाईजी  हार्दिक धन्यवाद आभार आपका।"
32 minutes ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर, प्रदत्त चित्र पर मेरी प्रस्तुति की सराहना के लिए आपका हार्दिक…"
51 minutes ago
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"    आदरणीया प्रतिभा पाण्डे जी सादर, प्रस्तुत दोहों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार ।…"
52 minutes ago
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"किल्लत सारे देश में, नहीं गैस की यार नालियाँ बजबजा रही, हर घर औ हर द्वार गैस नहीं तो क्या हुआ, लोग…"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी विस्तृत टिप्पणी और सुझाव के लिए हार्दिक…"
2 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. प्रतिभा बहन, सादर अभिवादन। चित्रानुरूप सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
2 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"*पका न पाती  रोटियाँ, भले  युद्ध की आगजला रही है नित्य पर, वह निर्धन का…"
3 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चित्रानुरूपसुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
3 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"गमलों में अब पेड़ हैं, पौधों के हैं हाट। लाखों घर बनते गए, वन उपवन सब काट॥//वाह.बहुत सुन्दर। …"
3 hours ago
pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"लड़ने  संकट  से  हमें, रहना   है   तैयार। गला काटने गैस फिर, बने…"
3 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service