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अजय गुप्ता 'अजेय
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  • Karnal
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अजय गुप्ता 'अजेय's Groups

अजय गुप्ता 'अजेय's Discussions

आयोजन कैलंडर संबंधित
7 Replies

आदरणीय प्रबंधन समूह,मेरा एक सुझाव है जिसे आपके विचारार्थ रखना चाहता हूँ । ओबीओ में पूर्व कि भाँति आयोजन कैलंडर के प्रकाशन कि आवश्यकता महसूस हो रही है। पहले कि तरह यदि वेबसाईट पर ही हर महीने कि 4-5…Continue

Started this discussion. Last reply by surender insan Oct 9, 2023.

कैलेंडर

नौ तारीख तक कैलेंडर न आने से असुविधा होती है। यदि पहले से निर्धारित हो और 1-2 तारीख तक कैलेंडर आ जाए तो आसानी हो जाये।उम्मीद है आयोजक इस और ध्यान देंगेContinue

Started Apr 9, 2018

 

अजय गुप्ता 'अजेय's Page

Latest Activity

अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अब, जबकि यह लगभग स्पष्ट हो ही चुका है कि OBO की आगे चलने की संभावना नगण्य है और प्रबंधन इसे ऑफलाइन करने का मन बना ही चुका है तो मैं एक विनती करना चाहता हूँ जिससे इस मंच का कुछ एहसास और कुछ कार्य आगे भी चलता रहे।  सदस्यों का एक वाहटसपप ग्रुप…"
May 18
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रबंधन समिति से आग्रह है कि इस पोस्ट का लिंक उस ब्लॉक में डाल दें जिसमें कैलंडर डाला जाता है। हो सकता है अनेक सदस्य और साइट के उपयोगकर्ता केवल कैलंडर देखने में अपेक्षा में आकर यूँ ही लौटे जा रहें हों।  जानकारी होने पर वो अपनी रचनाएं भी ले…"
May 11
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय सौरभ भाई, आप ने सभी बातें सविस्तार कही और अनेकों संशयों को समाप्त किया। इसके पश्चात और कुछ कहने को रह नहीं जाता है। यूँ भी आपका मार्गदर्शन सदा एक बड़े भाई की भांति उपस्थित रहा है। अपने काव्यरचना के क्षेत्र में आपका प्रभाव मैं कभी नहीं भुला…"
May 7
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"इस सारी चर्चा के बीच मैं एक बात और कहना चाहता हूँ। जैसा कि हम सबने देख लिया कि सदस्य इस मंच के लिए आगे आने को तैयार हैं। न केवल आर्थिक रूप से अपितु संचालन गतिविधियों में भी वो समय देकर इसे जीवित रखना चाहते हैं। और यह भी मैं मानता हूँ कि प्रबंधकों का…"
May 7
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जी आदरणीय "
May 7
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जैसा कि ज्ञात हुआ है कि संचालन का व्यय प्रतिवर्ष 90 हज़ार रुपये आ रहा है। इस रकम को इतने लंबे समय तक व्यक्तिगत रूप से वहन करने के लिए भी संचालक/समिति साधूवाद के पात्र हैं।  अब हम सदस्यों को देखना है कि इसे किस प्रकार पूरित करना है जिससे आर्थिक…"
May 6
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"आदरणीय गणेश जी, जितना कष्ट आपको यह सूचना देते हुए हो रहा है, उतना ही कष्ट हम सब को यह सुनने में हो रहा है। इस मंच को हम सब ने अपना अमूल्य समय दिया है और यहाँ से सभी ने कुछ न कुछ अमूल्य प्राप्त भी किया है।  यह ठीक है कि पिछले कुछ समय से मंच पर…"
May 2
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आभार भाईसाब "
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"तरही मिसरे पर ग़ज़ल पर अच्छा प्रयास है आदरणीय। विस्तृत समीक्षा के लिए आदरणीय तिलकराज जी उपयोगी सुझाव देंगें। सादर "
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह-वाह, क्या छंद, क्या भाव, क्या अलंकरण। बहुत बहुत बधाई प्रतिभा जी। कोयल को न्यौता भिजवाया// क्या ही कहने  दूजे सब फल खूब जलेंगे।// सुन्दर  बहुत सुंदर काव्यात्मक अभिव्यक्ति। सादर"
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"आभार आदरणीय उस्मानी जी "
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अनेक आभार प्रतिभा जी ।"
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीय "
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा पर अच्छा प्रयास हुआ है अखिलेश भाई। पढ़ने में रोचक तो है। विशेष टिप्पणी तो इस विधा के जानकार ही कर पाएंगें। सो उनका इंतज़ार करते है।  बहरहाल, पनाह बधाई।  सादर "
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"छंदों पर अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय भाई अखिलेश जी।  मात्रा की तुकांतता ... ना हो ---- रक्षा हो । छंद आदि में मान्य नहीं है।// जी ऐसा नहीं है कि के तुकांतता मान्य नहीं है। हाँ यह अवश्य है कि इस प्रकार के प्रयोग को…"
Mar 31
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय भाई अखिलेश जी, आपको भी नववर्ष 2083 की अनेक शुभकामनाएं।  उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहता हूँ कि आपके छंद ज्ञान पर मुझे ज़रा भी संशय नहीं है। लेकिन हम सब से कभी कभी भूलवश कभी मात्राएं, कभी बह्र, कभी वर्णक्रम, कभी लय अनजाने में भंग…"
Mar 31

Profile Information

Gender
Male
City State
Karnal (Haryana)
Native Place
Karnal
Profession
Business
About me
ग़ज़ल, कविता, लघुकथा लेखन में रूचि, 6 स्वतंत्र काव्य संग्रह प्रकाशित, 3 ऑनलाइन पुस्तकें प्रकाशित. एक काव्य संग्रह हरियाणा साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित. parivartaaajkal.com पर 'अजय की कलम' के शीर्षक से नियमित कॉलम

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अजय गुप्ता 'अजेय's Blog

ग़ज़ल (कुर्ता मगर है आज भी झीना किसान का)

देखे जो एक दिन का भी जीना किसान का

समझे तू कितना सख़्त है सीना किसान का



मिट्टी नहीं अनाज उगलती है तब तलक

जब तक मिले न उस में पसीना किसान का



बारिश की आस और कभी है उसी का डर

यूँ बीतता हर एक महीना किसान का



कब से उगा रहा है कपास अपने खेत में

कुर्ता मगर है आज भी झीना किसान का



समतल ज़मीन पर ये लकीरें अजब-ग़ज़ब

देखे ही बन रहा है करीना किसान का



है हिम्मती है…

Continue

Posted on May 28, 2025 at 6:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल (अलग-अलग अब छत्ते हैं)

लोग हुए उन्मत्ते हैं

बिना आग ही तत्ते हैं

गड्डी में सब सत्ते हैं

बड़े अनोखे पत्ते हैं

उतना तो सामान नहीं है

जितने महँगे गत्ते हैं

जितनी तनख़्वाह मिलती है

उस से ज्यादा भत्ते…

Continue

Posted on May 23, 2025 at 12:15pm — 8 Comments

ग़ज़ल (हर रोज़ नया चेहरा अपने, चेहरे पे बशर चिपकाता है)

हर रोज़ नया चेहरा अपने, चेहरे पे बशर चिपकाता है

पहचान छुपा के जीता है, पहचान में फिर भी आता है

दिल टूट गया है- मेरा था, आना न कोई समझाने को,

नुक़सान में अपने ख़ुश हूँ मैं, क्या और किसी का जाता है

संतोष सहज ही मिल जाए, तो कद्र नहीं होती इसकी,

संतोष की क़ीमत वो जाने, जो चैन गँवा कर पाता है

आज़ाद परिंदे पिंजरे में, जी पाएँ न पाएँ क्या मालूम,

जो धार से पीते है उनको,…

Continue

Posted on May 15, 2025 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)

कौशिशें इतनी सी हैं बस शायरी की 

आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की

हद जुनूँ की तोड़ कर की है इबादत

ख़ूँँ जलाकर अपना तेरी आरती की

गोलियों की ही धमक है हर दिशा में

और तू कहता है ग़ज़लें आशिक़ी की!

भूले-बिसरे लफ़्ज़ कुछ आये हवा में

कोई बातें कर रहा है सादगी की

इतनी लंबी हो गयी है ये अमावस

चाँद भी अब शक्ल भूला चांदनी की

बूँद मय की तुम पिलाओ वक़्ते-रुखसत

आखि़री ख्वा़हिश यही है ज़िन्दगी…

Continue

Posted on October 7, 2020 at 5:00pm — 6 Comments

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At 12:18pm on November 23, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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आप अपनी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ यहाँ पोस्ट (क्लिक करें) कर सकते है.

और अधिक जानकारी के लिए कृपया नियम अवश्य देखें.

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतुयहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

 

ओबीओ पर प्रतिमाह आयोजित होने वाले लाइव महोत्सवछंदोत्सवतरही मुशायरा व  लघुकथा गोष्ठी में आप सहभागिता निभाएंगे तो हमें ख़ुशी होगी. इस सन्देश को पढने के लिए आपका धन्यवाद.

 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post देश की बदक़िस्मती थी चार व्यापारी मिले (ग़ज़ल)
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