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ग़ज़ल (आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की)

कौशिशें इतनी सी हैं बस शायरी की 

आदमी सी फ़ितरतें हों आदमी की

हद जुनूँ की तोड़ कर की है इबादत

ख़ूँँ जलाकर अपना तेरी आरती की

गोलियों की ही धमक है हर दिशा में
और तू कहता है ग़ज़लें आशिक़ी की!

भूले-बिसरे लफ़्ज़ कुछ आये हवा में
कोई बातें कर रहा है सादगी की

इतनी लंबी हो गयी है ये अमावस
चाँद भी अब शक्ल भूला चांदनी की

बूँद मय की तुम पिलाओ वक़्ते-रुखसत
आखि़री ख्वा़हिश यही है ज़िन्दगी की

#मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on October 15, 2020 at 11:59pm

शुक्रिया जनाब अमीरुद्दीन अमीर जी।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 14, 2020 at 8:52pm

जनाब अजेय जी आदाब, शानदार ग़ज़ल हुई है शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

Comment by अजय गुप्ता 'अजेय on October 14, 2020 at 12:54pm

बहुत बहुत आभार नीलेश जी, समर साहब, रचना जी। आप सब के प्रोत्साहन के शब्द बहुत हिम्मत बढ़ाते हैं।

अरकान: 2122 2122 2122

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 14, 2020 at 11:51am

आ. अजेय जी,

अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
बधाई 

Comment by Rachna Bhatia on October 14, 2020 at 11:44am

आदरणीय अजेय जी बेहतरीन ग़ज़ल, वाह, वाह,वाह। अरकान लिख देते तो समझना और आसान हो जाता।सादर।

Comment by Samar kabeer on October 14, 2020 at 11:41am

जनाब अजेय जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने, बधाई स्वीकार करें ।

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