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KALPANA BHATT ('रौनक़')
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KALPANA BHATT ('रौनक़') added a discussion to the group English Literature
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Two little birdies (poem)

I wish to fly But our wings are cut The sky calls me But we are in cages shutWe were Freeborne no worries with us Eating grains or fruits Or insects so foundDependent are we For our masters bring us food As per his wish or will. And we the Poor onesStop! Said the other one You see yourself in cage But we are safe From prey birds and wildsThe prison of ours Is our home from then The master looks at us With love and careThinking and talking Swinging to and fro The two little birdies…See More
Wednesday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Rahila's blog post सुनो..!
"बढ़िया रचना आदरणीया राहिला जी| हार्दिक बधाई |"
Monday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on Rahila's blog post सुनो..!
"बढ़िया रचना आदरणीया राहिला जी| हार्दिक बधाई |"
Monday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post अनकहा रिश्ता (लघुकथा)
"आदरणीय शहजाद जी आपको रचना पसंद आई शुक्रगुज़ार हूँ|"
Monday
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post अनकहा रिश्ता (लघुकथा)
"नमस्ते आदरणीय समर भाई, आपको रचना अधूरी लगी, कथानक कमजोर लगा , मुझे और मेहनत करनी होगी इसके माने | प्रयास करुँगी| सादर"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post अनकहा रिश्ता (लघुकथा)
"आदाब। डायरी शैली में बहुत बढ़िया रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना भट्ट 'रौनक' साहिबा।"
Monday
Samar kabeer commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post अनकहा रिश्ता (लघुकथा)
"बहना कल्पना भट्ट "रौनक़' जी आदाब,लघुकथा का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । लेकिन रचना अभी अधूरी अधूरी सी लग रही है,डायरी की बड़ी बहन कौन थी?कथानक भी कमज़ोर है,इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है,कुछ टंकण त्रुटियां भी देखें ।"
Sunday
KALPANA BHATT ('रौनक़') posted a blog post

अनकहा रिश्ता (लघुकथा)

9 फ़रवरी 2019प्रिय डायरीआज साईट पर कनक अम्मा की हालत देखकर मन भारी हो गया। तुम तो जानती ही हो, कनक अम्मा बाऊजी के समय से अपनी कम्पनी से जुड़ी है। बाऊजी को यह अन्ना दादा कहती थी। बाऊजी को तो तुमने भी देखा है, नहीँ तुम न थी उस वक़्त मेरे साथ तुम्हारी बड़ी बहन थी, मैं उससे अपनी बातें साझा किया करता था, जैसे मैं आज तुमसे करता हूँ। यह क्या मैं भटक गया... हाँ तो मैं कहाँ था। हाँ, कनक अम्मा की बात बता रहा था न मैं। आज वह रोज़ की तरह सीमेंट की तगाड़ी लेकर सीढ़ियों पर चढ़ रही थी कि वह फिसल पड़ी। कितनी ही बार…See More
Feb 16
KALPANA BHATT ('रौनक़') added a discussion to the group English Literature
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Arms and ammunition (Poem)

 Guns and swordsSymbol of braveryUsed by soldiersFor country's victoryGuns and swordsSymbol of crueltyUsed by terroristsTo show their slaveryMen are both Soldier and terroristThoughts do comeClassic or in fusionKilling peopleTask of arms and ammunitionSome die for countrySome die for no reasonWhat do they gainkilling mass in vainBlood shed all aroundLike cannibals, not a manInhuman is the behaviourThey belong to no religionHow though ever they shoutThey believe in their religionFor no religion…See More
Feb 16
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-100
"सादर धन्यवाद आदरणीय अखिलेश जी| मेरा ये छोटा सा प्रयास आपको पसंद आया सार्थक हुआ ये प्रयास| "
Feb 11
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-100
"आदरणीय शहजाद उस्मानी जी आपको यह प्रयास पसंद आया सार्थक हुआ लिखना | सादर धन्यवाद \ "
Feb 11
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-100
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी  नेट की प्रॉब्लम तो यहाँ भी हो रही है, मेरी रचना मुझसे भी लुपन छुपैया खेल रही है| एक प्रयास किया, आपको पसंद आया सार्थक हुआ मेरा लिखना |  आपकी रचना पढ़ी मैंने कटु सत्य से मिलना ही चाहिए कई बार लगता है,…"
Feb 11
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-100
"सादर धन्यवाद आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले सर! आपको रचना पसंद आई मेरा प्रयास सफल हुआ| सादर|"
Feb 11
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-100
"आदरणीय समर भाई,नमस्ते !  आपको रचना पसंद आई सार्थक हुआ मेरा लिखना | सादर धन्यवाद आपको| "
Feb 11
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-100
"आज के आयोजन के लिए मेरी तीसरी और अंतिम प्रस्तुति  कहती है प्रकृति भी कहती है प्रकृति भी अपने दिल की बातें रवि और सोम के द्वारा समझ सको तो समझो अँधेरे के बाद होता उजाला और उजाले के बाद फिर अँधेरा होता है धरा और आसमान के द्वारा क्षितिज की लकीर…"
Feb 11
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-100
"वाह! बहुत उम्दा बात कही है आपने और कटु सत्य भी | हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति के लिए आदरणीय अखिलेश सर | "
Feb 11

Profile Information

Gender
Female
City State
BHOPAL
Native Place
MUMBAI
Profession
house wife
About me
was a teacher for about 20 Years. Recently resigned. I am M.A in English,B.Ed ,LLB.. . interested in literature

KALPANA BHATT ('रौनक़')'s Blog

अनकहा रिश्ता (लघुकथा)

9 फ़रवरी 2019

प्रिय डायरी

आज साईट पर कनक अम्मा की हालत देखकर मन भारी हो गया। तुम तो जानती ही हो, कनक अम्मा बाऊजी के समय से अपनी कम्पनी से जुड़ी है। बाऊजी को यह अन्ना दादा कहती थी। बाऊजी को तो तुमने भी देखा है, नहीँ तुम न थी उस वक़्त मेरे साथ तुम्हारी बड़ी बहन थी, मैं उससे अपनी बातें साझा किया करता था, जैसे मैं आज तुमसे करता हूँ। यह क्या मैं भटक गया... हाँ तो मैं कहाँ था। हाँ, कनक अम्मा की बात बता रहा था न मैं। आज वह रोज़ की तरह सीमेंट की तगाड़ी लेकर सीढ़ियों पर चढ़ रही थी कि वह फिसल…

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Posted on February 16, 2019 at 9:48am — 4 Comments

स्वावलम्बी (लघुकथा)

“अरे यार! हद्द है ये तो, अब क्या इसके हाथ का खाना पड़ेगा?”



लोकल ट्रेन में बैठे एक व्यक्ति ने कहा। एक किन्नर इडली-सांभर के डिब्बों का थैला लिए डिब्बे में घूम रहा था| उसकी आवाज़ और उसके हाव-भाव से लोग उसकी ओर आकर्षित तो हो रहे थे | पर उससे सामान कोई नहीं खरीद रहा था| एक मनचले ने कहा, “ क्यों बे हिजड़े अब हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि ...|”



किन्नर ने उसके प्रतिउत्तर में कहा, “ क्यों रे? क्या तू किसी और तरह का अन्न खाता है?|



मनचले ने घृणा से उसकी ओर देखा|



किन्नर… Continue

Posted on December 22, 2018 at 10:23am — 10 Comments

लहरें ( कविता)

आज लहरों ने की बातें मुझसे 

बोलीं 

तुम सोचती हो तुम हो बहादुर 

समय से तुम लडती हो 

मूर्ख हो तुम 

जो यह सोचकर दम भरती हो| 

और वह इठला कर चली गयी 

दूर 

वहीं जहाँ से वह आयीं थी 

किनारे तक 

और वहाँ पड़े चट्टानों से 

टकरा-टकरा कर रही थी 

बातें उनसे, 

कह रहे थे चट्टान उनसे 

रुक जाओ 

करीब आप मेरे ऊपर से 

न यूँ बह जाओ 

रुको कुछ घड़ी 

की हम तपते हैं 

और…

Continue

Posted on October 26, 2018 at 12:00am — 9 Comments

दो धारी तलवार(लघुकथा)

"अरे सुखिया! सुन तो मन्ने एक बात सूझी हैं, तू कहे तो बताऊँ।"

"का बात सूझी है दद्दा! बताय ही द्यो। मैं तो परेसान हो गया हूँ, एक तो उ बैंक का मनजेर बाबू आज सुबह ही कह रहे थे कि जो करजवा हम लिये रही उ का ब्याज भरने को पड़ी...।"

"ह्म्म्म हम सुन लिए थे उ वा की बात, तभी तो हम आये हैं, तू एक काम कर, तू कल सरपंच से कछु उधार मांग ले, वो इंकार न करेगा, और उ पैसा से अपन का ब्याज की किश्त चुकाई दिए।"

"होउ , इ हे बात तो हमरी ख़ोपड़िया में आयी ही नही। हम कल ही सरपंच जी से बात करेंगे। पर…

Continue

Posted on September 12, 2018 at 10:30am — 7 Comments

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At 10:51pm on August 8, 2017, श्याम किशोर सिंह 'करीब' said…

संदेशात्मक लघुकथा। सहज चित्रण के लिए बधाई।

KALPANA BHATT

At 1:55pm on May 17, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीया कल्पना जी महीने की सक्रिय सदस्य चुने जाने पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

At 1:26pm on May 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीया 

श्रीमती कल्पना भट्ट जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 11:34am on May 15, 2016, Rahila said…
बहुत शुक्रिया आदरणीया दी! आपने मुझे दोस्ती के काबिल समझा ।
At 2:10pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

आपकी मित्रता मेरे लिए अमूल्य है , धन्यवाद आदरणीया कल्पना जी 

 
 
 

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