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Dr. Vijai Shanker
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Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी , सबसे बड़ी बात , “ खुश रहो “ वाला आशीर्वाद नहीं सुनाई देता , हॉय और बॉय में वह भी खो गया। बाहत ही सुन्दर और प्रभावशाली क्षणिकाएं प्रस्तुत्त हुयी , हार्दिक बधाई , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय सुश्री प्रतिभा पांडे जी , आपकी उपस्थिति के लिए आभार , कविता अपने अर्थों में आप तक पहुंची , उसका सौभाग्य, आपका आशीर्वाद मिला। बधाई के लिए धन्यवाद , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय सतविंदर कुमार जी , आपकी सुबह विवेचना के लिए ह्रदय से आभार , बधाई के लिए धन्यवाद , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी , बहुत सुन्दर अभियक्ति से आप द्वारा कविता को मान मिला , आभार। आपकी समस्त शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी , आपकी उपस्थिति के लिए आभार , कविता अपने मंतव्य सहित आप तक पहुंची , सौभाग्य, आपका आशीष मिला,  धन्य हुयी। आपकी बधाई के लिए धन्यवाद , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी , आपकी उपस्थिति एवं बधाई के लिये आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय सुश्री कल्पना भट्ट जी , आपकी सार्थक प्रस्तुति के लिए बधाई , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"आदरणीय सुश्री कल्पना भट्ट जी , आपकी उपस्थिति एवं बधाई के लिये आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"सुन्दर ग़ज़ल , बधाई , आदरणीय लक्षमण धामी ' मुसाफिर ' जी , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"सुन्दर एवं गंभीर चौपाइयां, बधाई , आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी , सादर।"
Saturday
Dr. Vijai Shanker replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-87
"कितना टिकाऊ सुख ? हम जो चाहते हैं उसी के पाने को सुख मानते हैं। चाहतें खुद चाहतें नहीं रहतीं पूरी हो जाने के बाद। तो सुख क्या है चाहतों के साथ ? चाहतें जो खुद टिकाऊ नहीं होती , जो सुख देती हैं वह भी कितना टिकाऊ होता है ? मौलिक एवं अप्रकाशित"
Jan 12
Dr. Vijai Shanker commented on डॉ संगीता गांधी's blog post लघुकथा -गठबंधन की गाँठें
"बहुत सही , सार्थक। यह अलग बात है कि कौटिल्य का यह अभिप्राय नहीं रहा होगा । बधाई, सुश्री आदरणीय संगीता जी , सादर।"
Jan 11
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post बंधन की डोरियां - डॉo विजय शंकर
"हृदय स्पर्शी रचना के लिए हार्दिक बधाई । आ. भाई विजय जी ।"
Jan 8
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post बंधन की डोरियां - डॉo विजय शंकर
"आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , आप बड़े सहज भाव से कविता की तह तक पहुँच जाते हैं , विषय कोई भी हो। आपकी शानदार उपस्थिति के लिए आभार और बधाई के लिए धन्यवाद। सादर।"
Jan 8
Samar kabeer commented on Dr. Vijai Shanker's blog post बंधन की डोरियां - डॉo विजय शंकर
"आली जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब,इस्तिआरों की ज़बान में बात कहने का सलीक़ा बहुत कम लोगों को नसीब होता है, और उन कम लोगों में आपका भी शुमार है,बहुत उम्दा कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 6
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post बंधन की डोरियां - डॉo विजय शंकर
"आदरणीय मोहित मिश्र ( मुक्त ) जी , हार्दिक आभार एवं बहुत बहुत धन्यवाद , सादर।"
Jan 6

Profile Information

Gender
Male
City State
UP
Native Place
Allahabad
Profession
Retired
About me
Educationist

.जिंदगी तुझे ही पढ़ लेते हैं ---डा० विजय शंकर

चलो किताबों को बंद कर देते हैंजिंदगी तुझे ही सीधे-सीधे पढ़ लेते हैं .किताबों में सबकुझ तेरे बारे में ही तो हैलो , तुझसे ही सीधे-सीधे बात कर लेते हैं.किताबें तो बहुत सी हैं , मिल भी जायेंगींउन को पढ़ लूँ तो क्या तू मिल जायेगी .मौत को कितने और कौन-कौन पढ़ते हैंपर उसका वादा है , सबको मिलती है .भरोसा नहीं , तू किसको मिले , कितनी मिलेतेरे लिये , तेरे चाहने वाले दिन रात लगे रहते हैं .अरे सब कुछ तो तेरे लिए ही है जिंदगी मेंतू है तो सब है , तू नहीं तो क्या है जिंदगी में .इसलिए चलो किताबों को बंद कर देते हैं .तू है , तुझसे सीधे-सीधे बात कर लेते हैं ...डा० विजय शंकर---------------( मौलिक और अप्रकाशित )

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Comment Wall (18 comments)

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At 5:38pm on January 1, 2017, Mohammed Arif said…
आदरणीय डॉ.विजय शंकर मेहताजी सकारात्मक सोच को उद्घरित करती रचना के लिए बधाई । नव वर्ष मंगलमय हो !
At 4:58pm on November 5, 2015, Abid ali mansoori said…

देर से ही सही.. हर्दिक आभार आपका आदरणीय विजय शंकर जी!

At 10:23pm on November 4, 2015, Abid ali mansoori said…

Haardik abhaar aapka!

At 3:46pm on July 1, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर,

आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

At 7:50pm on June 3, 2015, Tanuja Upreti said…
आभार आदरणीय
At 7:28pm on May 4, 2015, Seema Singh said…
आभार सर मार्गदर्शन के लिए
At 8:35am on April 17, 2015, Mohan Sethi 'इंतज़ार' said…

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी आप का हार्दिक आभार ....मंगलकामनाएँ...सादर  

At 6:57am on January 18, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, निवेदन स्वीकार करने के लिए आभार...

विद्यार्थी की मुक्त कंठ प्रशंसा आपका बड़प्पन और आपके हृदय की विशालता का प्रमाण है.

आपका  स्नेह और आशीर्वाद  सदैव मिलता रहे, इसके लिए सदैव प्रयास करता रहूँगा. नमन 

At 10:51pm on January 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, आभार, धन्यवाद.... आप लोगो के स्नेह और आशीर्वाद से ही मंच पर सक्रिय हो पाता हूँ. आपका आभार हार्दिक धन्यवाद 

At 4:40pm on October 23, 2014, Sushil Sarna said…

आपको  सपरिवार ज्योति पर्व की हार्दिक एवं मंगलमय शुभकामनाएं...

Dr. Vijai Shanker's Blog

बंधन की डोरियां - डॉo विजय शंकर

कुछ डोरियां

कच्चे धागों की होती हैं ,

कुछ दृश्य होती हैं ,

कुछ अदृश्य होती हैं ,

कुछ , कुछ - कुछ

कसती , चुभती भी हैं ,

पर बांधे रहती हैं।

कुछ रेशम की डोरियां ,

कुछ साटन के फीते ,

रंगीले-चमकीले ,फिसलते ,

आकर्षित तो बहुत करते हैं ,

उदघाट्न के मौके जो देते हैं ,

पर काटे जाते हैं।

इस रेशम की डोरी

की लुभावनी दौड़ में ,

ज़रा सी चूक ,

बंधन की डोरियां

छूट गईं या टूट गईं ,

रेशम की डोरियां …

Continue

Posted on January 4, 2018 at 9:30am — 11 Comments

क्षणिकाएं - डॉ. विजय शंकर


  • 1.
    सच का कहीं दूर तक
    नहीं कोई पता है।
    हाँ ये सच है
    कि बहुत कुछ
    झूठ पर टिका है।
    2.
    रेत मुठ्ठी से जब
    फिसल जाती है ,
    जिंदगी कुछ कुछ
    समझ में आती है।
    3.
    रोज रोज के तजुर्बे
    यूँ बीच बीच में
    बांटा न करो ,
    ये जिंदगी गर
    एक सबक है तो
    उसे पूरा तो हो लेने दो

  • मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on December 24, 2017 at 7:52pm — 12 Comments

पढ़े-लिखे हैं आप तो - डॉo विजय शंकर

पढ़े-लिखे हैं आप तो आपको

पढ़े-लिखे दिखना चाहिए।

मोटर कार हो सब ,फिर भी अक्ल से ,

आपको , बिलकुल पैदल दिखना चाहिए।

कपड़े अजीब, चाल अजीब , हाव-भाव अजीब ,

बातचीत में अजीब होना और दिखना चाहिये।

रचनात्मक होना तो बहुत कठिन होता है ,

विध्वंस और क्रान्ति की बात करनी आनी चाहिए।

सबसे बड़ी बात आपको

घर फूंक तमाशा देखना आना चाहिए।

अपनी बुनियाद को निरंतर हिलाना और

मौक़ा लगते ही उखाड़ देना चाहिए।

आपको वो तो लपक लेंगे ही

जो उकसा रहे हैं… Continue

Posted on November 13, 2017 at 10:57am — 15 Comments

लोकतंत्र - डॉo विजय शंकर

( 1 )
लोकतंत्र ?
जो लोक ले
उसी का तंत्र।

( 2 )
लोक तंत्र ,
इहलोक तक
परलोक का
विचार नहीं।

( 3 )
लोकतंत्र ,
लोक का तंत्र
या लोक से
ऊपर तंत्र।

( 4 )
शेर अकेला हो तो उसकी
दहाड़ के सामने भी आवाज़
उठा देते हैं लोग।
झुण्ड में भेड़-बकरिया हों तो
उनकीं हाँ में हाँ मिलाते हैं वही लोग।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on November 7, 2017 at 8:30am — 12 Comments

 
 
 

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