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Dr. Vijai Shanker
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Dr. Vijai Shanker commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post जाते हो बाजार पिया (नवगीत)
"आदरणीय धर्मेंद्र कुमार जी , बधाई , इस सुन्दर प्रस्तुति पर। सादर।"
Friday
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post पुरोधा कौन — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , रचनाओं पर आपकी उपस्थिति का इन्तजार रहता है , आपकी विवेचना से तसल्ली हो जाती है कि जो लिखा है वह ठीक है , मान्य है , आपका बहुत बहुत आभार और आपकी सद्भावनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर।"
Oct 4
Samar kabeer commented on Dr. Vijai Shanker's blog post पुरोधा कौन — डॉo विजय शंकर
"आली जनाब डॉ. विजय शंकर जी आदाब,आपने अपनी रचना में जो गहरे और सटीक तंज़ किये हैं,वो क़ाबिल-ए-दाद हैं,इस शानदार रचना पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।"
Oct 4
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post पुरोधा कौन — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय लक्ष्मण सिंह धामी जी , आभार के पहले बधाई आपको जो आपने इस रचना को मान दिया। अब रचना पर उपस्थिति एवं मान देने के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
Oct 3
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post पुरोधा कौन — डॉo विजय शंकर
"आ. भाई विजय शंकर जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Oct 2
Dr. Vijai Shanker replied to Dr. Vijai Shanker's discussion स्वच्छता का भाव in the group सामाजिक सरोकार
"आदरणीय एडमिन , सही जानकारी के लिए धन्यवाद , सादर।"
Sep 30
Dr. Vijai Shanker added a discussion to the group सामाजिक सरोकार
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स्वच्छता का भाव

एक पूर्व ऐतिहासिक विवेचन——————————स्वच्छता है क्या और इसका भाव आया कैसे , यह मनुष्य के जीवन में इतनी आवश्यक क्यों है , यह जानने की जिज्ञासा किसी को भी हो सकती है। आइये इसके विचार से जुड़े पहलुओं पर एक नज़र डालते हैं। ऐसा माना जाता है कि पाषाण युग के आदिम मानव के सम्मुख जीवन में अचानक आने वाली दो स्थितियों ने उसे काफी प्रभावित और चिंतित किया। एक है मृत्यु और दूसरी है रुग्णावस्था अर्थात किसी भी मनुष्य का अचानक बीमार हो जाना। प्रथम , मृत्यु ने उसके विचारों को इतना उद्वेलित किया कि वह ज्ञात संसार…See More
Sep 30
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post क्या सोचते हैं हम — डॉo विजय शंकर
"आभार एवं धन्यवाद , आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी , सादर।"
Sep 28
Dr. Vijai Shanker added a discussion to the group सामाजिक सरोकार
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स्वच्छता का भाव

एक पूर्व ऐतिहासिक विवेचन——————————स्वच्छता है क्या और इसका भाव आया कैसे , यह मनुष्य के जीवन में इतनी आवश्यक क्यों है , यह जानने की जिज्ञासा किसी को भी हो सकती है। आइये इसके विचार से जुड़े पहलुओं पर एक नज़र डालते हैं। ऐसा माना जाता है कि पाषाण युग के आदिम मानव के सम्मुख जीवन में अचानक आने वाली दो स्थितियों ने उसे काफी प्रभावित और चिंतित किया। एक है मृत्यु और दूसरी है रुग्णावस्था अर्थात किसी भी मनुष्य का अचानक बीमार हो जाना। प्रथम , मृत्यु ने उसके विचारों को इतना उद्वेलित किया कि वह ज्ञात संसार…See More
Sep 28
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post क्या सोचते हैं हम — डॉo विजय शंकर
"बहुत ही बढ़िया कविता हुई आदरणीय"
Sep 28
Dr. Vijai Shanker posted a blog post

पुरोधा कौन — डॉo विजय शंकर

मूर्खता विद्व्ता के सर पर ताण्डव कर रही है , सर के अंदर छुपी विद्व्ता संतुलन बनाये हुए है , क्योंकि मूर्खता में कोई वजन नहीं है , विद्व्ता शालीन है , संयत है , संतुलित है आराम से मूर्खता को ढोये जा रही है , क्योंकि यही युग धर्म है आज , शायद , कि वह मूर्खता को शिरोधार्य करे , उसे नाचने के लिए ठोस मंच दे , आधार दे। युगदृष्टा जाने विद्व्ता ने शायद ही कभी मूर्खता का पृश्रय लिया हो , उसे आधार बनाया हो। भाषा वैज्ञानिक स्वयं भ्रमित हैं कि चतुर कौन है , पूज्य कौन है ,विद्व्ता या मूर्खता ?…See More
Sep 27
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post क्या सोचते हैं हम — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय लक्षमण धामी जी , रचना पर आपकी उपस्थिति एवं बधाई के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
Sep 27
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post क्या सोचते हैं हम — डॉo विजय शंकर
"आ. भाई विजय जी, सुंदर प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Sep 26
Dr. Vijai Shanker commented on Usha's blog post फिर से जी लूँ ... अतुकांत कविता
"इस लम्बी रात का सुंदर सवेरा हुआ,बादल छँट गए, इंद्रधनुष ने रंग बिखेर दिए। बहुत ही सुन्दर , उत्साव बर्धक पंक्ति , मन के संशय फिर भी बने रहते हैं जोकि स्वाभाविक है , दूसरी पंक्ति , कुल मिला कर बहुत ही गंभीर एवं आकर्षक रचना , हार्दिक बधाई , आदरणीय…"
Sep 25
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post क्या सोचते हैं हम — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , आपकी प्रतिक्रिया सदैव उत्साह वर्धक होती है , मुझे सदैव यही लगता है कि हर बात में key word एक या दो ही होते हैं , उसी में सम्पूर्ण दर्शन निहित होता है , वैसा ही प्रयास करता हूँ , मनीषी और विद्वान लोग पकड़ लेते हैं ,…"
Sep 25
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post क्या सोचते हैं हम — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय समर कबीर साहब , नमस्कार , आपकी प्रतिक्रया सदैव उत्साह वर्धक होती है , मुझे सदैव यही लगता है कि हर बात में key word एक या दो ही होते हैं , उसी में सम्पूर्ण दर्शन निहित होता है , वैसा ही प्रयास करता हूँ , मनीषी और विद्वान लोग पकड़ लेते हैं ,…"
Sep 25

Profile Information

Gender
Male
City State
UP
Native Place
Allahabad
Profession
Retired
About me
Educationist

.जिंदगी तुझे ही पढ़ लेते हैं ---डा० विजय शंकर

चलो किताबों को बंद कर देते हैंजिंदगी तुझे ही सीधे-सीधे पढ़ लेते हैं .किताबों में सबकुझ तेरे बारे में ही तो हैलो , तुझसे ही सीधे-सीधे बात कर लेते हैं.किताबें तो बहुत सी हैं , मिल भी जायेंगींउन को पढ़ लूँ तो क्या तू मिल जायेगी .मौत को कितने और कौन-कौन पढ़ते हैंपर उसका वादा है , सबको मिलती है .भरोसा नहीं , तू किसको मिले , कितनी मिलेतेरे लिये , तेरे चाहने वाले दिन रात लगे रहते हैं .अरे सब कुछ तो तेरे लिए ही है जिंदगी मेंतू है तो सब है , तू नहीं तो क्या है जिंदगी में .इसलिए चलो किताबों को बंद कर देते हैं .तू है , तुझसे सीधे-सीधे बात कर लेते हैं ...डा० विजय शंकर---------------( मौलिक और अप्रकाशित )

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At 7:54pm on August 31, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी प्रणाम! बहुत बहुत शुक्रिया आपको मेरी प्रथम लघुकथा अच्छी लगी आपने अपना अमूल्य समय निकाला और जो हौसला बढ़ाया उसका ह्रदय से आभार आपका स्नेहभाव सदा यूँ ही बना रहे!
At 5:38pm on January 1, 2017, Mohammed Arif said…
आदरणीय डॉ.विजय शंकर मेहताजी सकारात्मक सोच को उद्घरित करती रचना के लिए बधाई । नव वर्ष मंगलमय हो !
At 4:58pm on November 5, 2015, Abid ali mansoori said…

देर से ही सही.. हर्दिक आभार आपका आदरणीय विजय शंकर जी!

At 10:23pm on November 4, 2015, Abid ali mansoori said…

Haardik abhaar aapka!

At 3:46pm on July 1, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर,

आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

At 7:50pm on June 3, 2015, Tanuja Upreti said…
आभार आदरणीय
At 7:28pm on May 4, 2015, Seema Singh said…
आभार सर मार्गदर्शन के लिए
At 8:35am on April 17, 2015, Mohan Sethi 'इंतज़ार' said…

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी आप का हार्दिक आभार ....मंगलकामनाएँ...सादर  

At 6:57am on January 18, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, निवेदन स्वीकार करने के लिए आभार...

विद्यार्थी की मुक्त कंठ प्रशंसा आपका बड़प्पन और आपके हृदय की विशालता का प्रमाण है.

आपका  स्नेह और आशीर्वाद  सदैव मिलता रहे, इसके लिए सदैव प्रयास करता रहूँगा. नमन 

At 10:51pm on January 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, आभार, धन्यवाद.... आप लोगो के स्नेह और आशीर्वाद से ही मंच पर सक्रिय हो पाता हूँ. आपका आभार हार्दिक धन्यवाद 

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पुरोधा कौन — डॉo विजय शंकर

मूर्खता विद्व्ता के सर पर ताण्डव कर रही है ,

सर के अंदर छुपी विद्व्ता संतुलन बनाये हुए है ,

क्योंकि मूर्खता में कोई वजन नहीं है ,

विद्व्ता शालीन है , संयत है , संतुलित है

आराम से मूर्खता को ढोये जा रही है ,

क्योंकि यही युग धर्म है आज , शायद ,

कि वह मूर्खता को शिरोधार्य करे ,

उसे नाचने के लिए ठोस मंच दे , आधार दे।

युगदृष्टा जाने विद्व्ता ने शायद ही कभी

मूर्खता का पृश्रय लिया हो , उसे आधार बनाया हो।

भाषा वैज्ञानिक स्वयं भ्रमित…

Continue

Posted on September 27, 2019 at 6:30pm — 4 Comments

क्या सोचते हैं हम — डॉo विजय शंकर

सोचता हूँ ,

अब तो यह भी सोचना पड़ेगा

कि कैसे सोचते हैं हम ?

कितनी सीमाओं में सोचते हैं हम ?

या किस सीमा तक सोचते हैं हम ?

कुछ सोचते भी हैं हम ?

अगर नहीं तो क्यों नहीं सोचते हैं हम ?

सच तो यह है कि ' बिना विचारे जो करे ' .....

भी नहीं सोचते हैं हम।

खुद में गज़ब का विश्वास रखते है हम ?

बस सोचने में क्रियाशील रहते हैं हम ,

जितनी तेजी से आगे जाते हैं

उतनी हे तेजी से लौट आते हैं।

नतीज़तन वहीं के वहीं रह जाते हैं हम।…

Continue

Posted on September 23, 2019 at 10:01am — 6 Comments

क्षणिकाएं —डॉo विजय शंकर

एक नेता ने दूसरे को धोया ,
बदले में उसने उसे धो दिया।
छवि दोनों की साफ़ हो गई।।.......1.

मातृ-भाषा हिंदी दिवस ,
एक उत्सव हम ऐसा मनाते हैं ,
जिसमें हम हिंदी बोलने वालों से
उनकीं माँ का परिचय कराते हैं।। .......2 .

अपनों से हट के कभी
दूर के लोगों से भी मिला करो ,
वो कुछ देगा नहीं ... ,
हाँ ,धोखा भी नहीं देगा।l ....... 3 .

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 17, 2019 at 10:30am — 8 Comments

जिंदगी के लिए — डॉo विजय शंकर

कभी लगता है ,

वक़्त हमारे साथ नहीं है ,

फिर भी हम वक़्त का साथ नहीं छोड़ते।

कभी लगता है ,

हवा हमारे खिलाफ है ,

फिर भी हम हवा का साथ नहीं छोड़ते l

कभी लगता है ,

जिंदगी बोझ बन गयी है ,

फिर भी हम जिंदगी को नहीं छोड़ते l

कभी लगता है

सांस सांस भारी हो रही है ,

फिर भी हम सांस लेना नहीं छोड़ते l

ये सब जान हैं

और जान के दुश्मन भी l

जिंदगी की लड़ाई हम

जिंदगी में रह कर लड़ते हैं ,

जिंदगी के बाहर जाकर कौन…

Continue

Posted on June 16, 2019 at 10:04pm

 
 
 

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