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Mohammed Arif
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Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-85
"बलवाइयों ने छीन लिया चैन देश का कायम है आज देखिये वहशत कहाँ कहाँ । कमाल है! कमाल है!!बहुत ही साहस दिखाया है आपने इस शे'र में । बहुत ही सामयिक शे'र कहा आपने । साहब तो धूमकेतु की तरह दुनिया का चक्कर लगा रहे हैं और उन्हीं के कारिंदें देश में…"
1 hour ago
Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-85
"लेंगे हजार बार नसीहत कहाँ कहाँ । बाकी अभी है और फ़जीहत कहाँ कहाँ ।। अच्छा है । ज़ियादा नसुहत भी फ़जीहत का कारण बनती है । बढ़िया !! चलना बहुत सँभल के ये हिन्दोस्तान है, देगा कोई किसी को नसीहत कहाँ-कहाँ । भई वाह! बहुत अच्छी बात कही आपने । हमारे देश में…"
1 hour ago
Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-85
"पैरिस में ढून्ढ़ते हो कि लन्दन में मेरे दोस्त । बिखरी पड़ी है इल्म की दौलत कहां-कहां ।। सच है इल्म की दौलत तो हर जगह बिखरी पड़ी है । मगर इज का इल्म उपयोगी कहाँ है जनाब । बहुत बढ़िया शे'र । मंदिर में मस्जिद में कलीसा में देख लो, करते हैं लोग रब की…"
2 hours ago
Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-85
"इंसानियत का फ़र्ज़ निभाने के वास्ते रब ने करी है तुमको नसीहत कहाँ कहाँ । वल्लाह कमाल का शे'र है । लेकिन इंसान इंसानियत कि फ़र्ज़ तो भूल गया है जनाब । वह तो दूसरे फित्नों में लगा है । करते नहीं है घर के बुज़ुर्गों का एहतिराम, कर आए हैं जनाब ज़ियारत…"
2 hours ago
Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-85
"वामन सी रखती पाँव सियासत कहाँ कहाँ बोती है नाम धर्म के नफरत कहाँ कहाँ। कमाल का शे'र है । बहुत सामयिक शे'र । आजकल साहब के कार्याकाल में नफ़रत की खेती लहलहा रही है । उनके कारिंदे अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं । नेता के साथ लोग भी बाँटें हैं रंजिशें…"
3 hours ago
Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-85
"दोस्ती का हो या मुहब्बत का मसअला करने लगे हैं लोग तिजारत कहाँ कहाँ | वाह!वाह !! बहुत ख़ूब । आजकल हर इक को तिजारत की निगाह से ही तो देख रहा है जनाब । मेरा यक़ी न आए तो ख़ुद दिल से पूछ लो, तुमने चलाये ख़ंजरे नफ़रत कहाँ-कहाँ । कमाल का शे'र है जनाब…"
4 hours ago
Mohammed Arif replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-85
"फ़रमान बादशाह का जारी तो हो गया अब देखना है होगी बग़ावत कहाँ कहाँ । वाह!वाह!! कमाल का प्रासंगिक शे'र है । आजकल देश का बादशाह बग़ावत ही तो देख रहा है । आओ तलाश करते हैं मिलजुल के दोस्तों, बैठी हुई है छुप के ये नफ़रत कहाँ-कहाँ । बहुत ख़ूब !नफ़रत को…"
11 hours ago
Mohammed Arif commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post लाठी के सहारे (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी आदाब, अंतर्मन के सहारे आपने वैश्विकरण के दौर में बढ़ती विवशता को इशारों-इशारों में इंगित कर दिया । बढ़िया लघुकथा । दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें ।"
13 hours ago
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post लघुकथा-कुत्ता संस्कृति
"बहुत-बहुत आभार आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी । लेखन सार्थक हो गया ।"
13 hours ago
Sheikh Shahzad Usmani commented on Mohammed Arif's blog post लघुकथा-कुत्ता संस्कृति
"करारे कटाक्ष करती बढ़िया प्रस्तुति के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहब।"
14 hours ago
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post लघुकथा-कुत्ता संस्कृति
"आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब लघुकथा पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया देने और हौसला अफज़ाई का बहुत-डहुत आभार ।"
18 hours ago
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post लघुकथा-कुत्ता संस्कृति
"आदरणीय आशुतोष जी लघुकथा पर अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया देकर मान बढ़ाने का बहुत-बहुत आभार ।"
18 hours ago
Dr Ashutosh Mishra commented on Mohammed Arif's blog post लघुकथा-कुत्ता संस्कृति
"आदरणीय आरिफ जी ..आजकल के चलन को इस रचना के माध्यम से बखूबी चित्रित किया है आपने इस शानदार रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर "
19 hours ago
Samar kabeer commented on Mohammed Arif's blog post लघुकथा-कुत्ता संस्कृति
"जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,अच्छी लगी आपकी लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
20 hours ago
Mohammed Arif commented on Mohammed Arif's blog post ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)
"आली जनिब मोहतरम समर कबीर साहब ग़ज़ल पर अपनी प्रतिक्रिया देकर मान बढ़ाने और सुख़न नवाज़ी का बहुत-बहुत आभार ।"
yesterday
Mohammed Arif posted a blog post

लघुकथा-कुत्ता संस्कृति

मॉर्निंग वॉक के दो मित्र कुत्ते आपस में बतिया रहे थे । उन्हें अपने कुत्तेपन पर बड़ा अभिमान हो रहा था । इंसान के गिरते निकम्मेपन पर ठहाके भी बीच-बीच में लगाते जा रहे थे । पहला कुत्ता बोला-"हमें अपने कुत्तेपन पर नाज़ है ।" तब दूसरा कुत्ता उछलकर बोला -"व्हाय नॉट । वी आर सो फेथफुल ।"पहला-"हममें से कुत्तापन के संस्कार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे है । हम तेज़ी से सभ्य हो रहे हैं ।"दूसरा-"एब्सोल्यूटली ! अगली सदी हमारी ही होगी ।"पहला-"बेशक! हमारा आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । हमने इंसान के हर क्षेत्र पर…See More
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लघुकथा-कुत्ता संस्कृति

मॉर्निंग वॉक के दो मित्र कुत्ते आपस में बतिया रहे थे । उन्हें अपने कुत्तेपन पर बड़ा अभिमान हो रहा था । इंसान के गिरते निकम्मेपन पर ठहाके भी बीच-बीच में लगाते जा रहे थे । पहला कुत्ता बोला-"हमें अपने कुत्तेपन पर नाज़ है ।" तब दूसरा कुत्ता उछलकर बोला -"व्हाय नॉट । वी आर सो फेथफुल ।"

पहला-"हममें से कुत्तापन के संस्कार धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे है । हम तेज़ी से सभ्य हो रहे हैं ।"

दूसरा-"एब्सोल्यूटली ! अगली सदी हमारी ही होगी ।"

पहला-"बेशक! हमारा आधिपत्य बढ़ता ही जा रहा है । हमने इंसान के… Continue

Posted on July 26, 2017 at 7:44pm — 6 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/2)

बाक़ी थोड़ा बचपन है,
ये उसका भोलापन है ।
रूठे-रूठे चहरें हैं,
अब घर-घर सूनापन है ।
जतलाता है हरदम वो,
ये उसका ओछापन है ।
हाँ, उसकी रचनाओं में,
रहता कुछ तो चिंतन है ।
उनसे रिश्ता है लेकिन ,
रहती थोड़ी अनबन है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Posted on July 24, 2017 at 2:45pm — 16 Comments

ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

ये रंजिश का दौर नया है ,

हाँ, साज़िश का दौर नया है ।

कितने बेबस चहरे देखो ,

फिर यूरिश का दौर नया है ।

हम क्या खायें, क्या पहनें अब ,

बस, काविश का दौर नया है ।

भाई-भाई का दुश्मन है ,

ये सोज़िश का दौर नया है ।

शक हर इक पर है अब यारो ,

हाँ, पुरसिश का दौर नया है ।

धन-दौलत के दीवाने सब ,

पैमाइश का दौर नया है ।

सूखी-सूखी नदियाँ हैं सब ,

अब बारिश का दौर नया है… Continue

Posted on July 20, 2017 at 12:07am — 14 Comments

सावन की ग़ज़ल (बह्र-22/22/22/22)

मन में आग लगाये सावन ,
यौवन को भड़काये सावन ।
दो दिल मचल रहे हैं देखो ,
ऐसा राग सुनाये सावन ।
छैल-छबीला , रंगीला-सा ,
बाग़ों में इतराये सावन ।
छन-छन छन-छन करता छत पर
बेहद शोर मचाये सावन ।
खेतों में हरियाली लाये ,
संग घटा के छाये सावन ।
मस्ती में जब झूमे नाचे
ऐसा रंग जमाये सावन ।
गीत मिलन के गाता है ये
झूलों में इठलाये सावन ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Posted on July 16, 2017 at 2:09pm — 20 Comments

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At 10:54am on January 2, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय आरिफ जी ..आपके मित्रों की श्रेणी में खुद को पाकर मैं सुखद अनुभव कर रहा हूँ ..सादर 

At 4:59pm on August 30, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

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 ग़ज़ल की बातें 

 

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