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Mohammed Arif's Blog (81)

बारिश की क्षणिकाएँ



(1) बूँदें नहीं

चाँदी के सिक्के गिरते हैं

बादलों की झोली से

और धरती लूट लेती है ।

*******

(2) वर्षा कुबेर

दोनों हाथों से लुटाता है

वर्षा -धन

नदियाँ, सरोवर और तालाब

लूटकर संग्रहित कर लेते हैं ।

*******

(3) बारिश की आत्मकथा

साल भर लिखते रहते हैं

पेड़-पौधे और हरियाली ।

*******

(4) बारिश की बूँदें

नई धुनें

तैयार करने लगती है

राग-मल्हार के लिए ।

*******

(5) बारिश का

अहसास कब होता है ?

जब…

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Added by Mohammed Arif on July 17, 2018 at 8:36am — 27 Comments

बारिश के हाइकु



(1) ख़त्म तपन

हरा हुआ चमन

मचले मन ।

******

(2) भीगी है रात

बादलों की बारात

हो मुलाक़ात ।

******

(3) खेत-मैदान

हरियाली मचले

जीवन चले ।

******

(4) कहीं बरसे

मन मौजी बादल

धरा को बल ।

******

(5) नदियों में है

लहरों का यौवन

जल का धन ।

******

(6) घर-आँगन

जल की मनमानी

जीने की ठानी ।

******

(7)ककड़ी-भुट्टे

मन को ललचाते

सबको भाते ।

*******

(8) बूँदें…

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Added by Mohammed Arif on July 4, 2018 at 8:54am — 21 Comments

ग़ज़ल बह्र फेलुन×5+फा



शैतानों की देखो दावत करता है

पापी है पर जन्नत जन्नत करता है ।

*******

कोई तुझे न देखे अच्छी नज़रों से

क्यों तू ऐसी वैसी हरकत करता है ।

*******

क्या होता है हाथों की रेखाओं में

मिहनत कर क्यों क़िस्मत क़िस्मत करता है ।

*******

काली काली बदली जब भी छाये तो

दहक़ाँ फिर बारिश की हसरत करता है ।

********

भेद नहीं है कोई उसकी नज़रों में

फिर क्यों तू औरों से नफ़रत करता है ।

*******

अता किया सबकुछ क़ुदरत ने उसको पर

वो तो…

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Added by Mohammed Arif on July 1, 2018 at 4:22pm — 14 Comments

कविता---बेबस क़लम और हम

क़लम लाचार है

विरोध की तेज़ धार है

घोषणाएँ जारी हैं

ग़रीब का भूखा पेट भी आभारी है

झोंपड़ियों के ऐब सारे ढँक गए

ग़रीब के घर बेबसी की बीमारी है

संसद में भूख का आँकड़ा गरमा रहा है

रहनुमा विकास का तराना गुनगुना रहा है

धर्म के ठेकेदारों की दबंगई है

ईमान की बोली सस्ती लगी है

दहशत में सबकुछ फलफूल रहा है

मदारी ख़ुद झूठ के बाँस पर चल रहा है

बहुत तरक़्की हो चुकी है

चैन की बाँसुरी भी सुर खो चुकी है

सरकार का चरित्र साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है…

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Added by Mohammed Arif on June 26, 2018 at 8:30am — 17 Comments

कविता--कश्मीर अभी ज़िंदा है भाग-2

कश्मीर अभी ज़िंदा है आँसू गैस में

डल झील की बर्फ में फैले ख़ून में

जवान बेटे की मौत पर दहाड़े मारती माँ में

ईद की खुशियों में शामिल होते मातम में

जवान बेटों के अगवा होने में

आतंकियों के दुष्कर्म में

कश्मीर अभी ज़िंदा है सीज़फायर उल्लंघन में

बर्फ की वादियों में ख़ून के कोहरे में

डरी सहमी , सिसकती रंगीन कालीनों में

गलियों , चौराहों से रोज़ गुज़रते जनाज़ों में

बंद खिड़की , दरवाज़ों से झाँकते मासूमों में

देश विरोधी तकरीरों में

कश्मीर अभी ज़िंदा है जलती…

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Added by Mohammed Arif on June 21, 2018 at 12:58am — 18 Comments

कविता--कश्मीर अभी ज़िंदा है भाग-1



कश्मीर अभी ज़िंदा है

झेलम के ख़ून में

केसर के रक्त में नहाया

बेवाओं की चीख पुकार में

दहााड़ेंं मारती माँओं में

पत्थरबाज़ी में

कश्मीर अभी ज़िंदा है भटके नौजवानों में

कश्मीर अभी ज़िंदा है शहीदों के जनाज़ोंं में 

डरे सहमे शिकारों में

ख़ूूून से सनी पतवारों में

दया के लिए भीख माँगते हाथों में

धमकी भरे पत्रों में

हैण्ड ग्रेनेड में

मोर्टार और एके फोर्टी सेवन में

असंख्य हथियारों के ज़खीरों में

बरामद पाकिस्तानी हथियारों में…

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Added by Mohammed Arif on June 17, 2018 at 8:30am — 16 Comments

कविता --हाँ, हमें अभी और देखना है

हाँ , हमें अभी और देखना है

टूटते शहर का मंज़र

रिश्तों में उलझी संवेदनहीनता का दंश

अपनों के बीच परायेपन का अहसास

घुट घुटकर रोज़ मरना

पीढ़ियों के अंतर की गहरी खाई में गिरना

निर्मम व्यवस्था का शिकार होना

हाँ, हमें अभी और देखना है

लालच का उफनता समुद्र

अकेलेपन के चुभते काँटें

बीमार बाप के लरजते हाथ

झुर्रियों की ख़ामोशियाँ

बेचैन माँ की प्रतीक्षा

कर्कश तरंगों का शोर

विघटन की शैतानी लकीरें

भरोसे में लालच के दैत्य

ठहरा…

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Added by Mohammed Arif on June 8, 2018 at 10:00am — 15 Comments

लघुकथा--शगुन

विवाह में शामिल होने आए दोस्त , रिश्तेदार क़रीबी और परिवार के सदस्य सभी यह जानने के बड़े उत्सुक थे कि आख़िर राहुल मंच से ऐसी क्या घोषणा करेगा जिससे उसकी शादी हमेशा-हमेशा के लिए यादगार बन जाएगी । प्रीतिभोज से निवृत्त होकर सभी मेहमान मंच के सामने एकत्रित हो गए । राहुल अपनी जीवन संगिनी वर्षा का हाथ थामे मंच पर उपस्थित हुआ । हाथ जोड़कर दोनों ने सबका अभिवादन किया और कहा-" साथियों , आप सभी का आभारी हूँ कि आपने अपनी गरिमामयी उपस्थित देकर मेरा मान बढ़ाया । ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा । आज के इस विवाह आयोजन को…

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Added by Mohammed Arif on May 1, 2018 at 10:30am — 10 Comments

लघुकथा--बोध

प्रसंग था 'दशा और 'बोध ' किसे कहते हैं ? जिज्ञासु और दार्शनिक के बीच इस विषय को लेकर काफी वाद-विवाद चला । जिज्ञासु दार्शनिक के तर्कों से संतुष्ट नहीं हो रहा था । अंत में दार्शनिक ने जो सांकेतिक जवाब दिया उसे सुनकर जिज्ञासु अभिभूत हो गया । दार्शनिक ने उंगली से चींटियों के जाते हुए झुण्ड की ओर इशारा कर दिया ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on April 23, 2018 at 9:00am — 16 Comments

कविता -- अनकही ख़ामोशियाँ



अनकही ख़ामोशियाँ

बहुत कुछ कहती है

उनका शोर बहुत दूर तक सुनाई देता है

उन ख़ामोशियों की ज़मीन पे

बीज अंकुरित होते हैं

बहुत कुछ कहने के

मगर अनकही ख़ामोशियाँ

ख़ामोश बनकर रह जाती है

जैसे हड़ताल की अधूरी रह जाती है माँगें

जो कभी पूरी नहीं होती है

और माँगें हड़ताल को चलाती है

अतीत की स्मृतियों को भी

दबाती है अनकही ख़ामोशियाँ

धीरे-धीरे अनकही ख़ामोशियाँ

कब भीतर की तपिश बन जाती है

पता ही नहीं चलता है

यह तपिश

लावा बनकर फूट पड़ती है…

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Added by Mohammed Arif on April 8, 2018 at 9:06am — 12 Comments

लघुकथा--हठ


एक दिन तंग आकर ज़िंदगी मौत से बोली-" आख़िर तू मुझे कब तक डसती रहेगी ?"
मौत खिलखिलाकर बोली-" जब तक तू जीने की हठ करती रहेगी ।"

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on April 1, 2018 at 9:00am — 8 Comments

लघुकथा--अपील



" आप समस्त शहरवासियों से हाथ जोड़कर विनम्र अपील करता हूँ कि इस बार होने जा रहे 'स्वच्छता सर्वेक्षण ' में बढ़ चढ़कर भाग लें , अपना सकारात्मक फीडबेक देकर शहर को स्वच्छता की सूची में नंबर-वन बनाएँ ।यह शहर आपका है , इसे अपने घर की भाँति साफ-सुथरा और सुंदर बनाएँ। यह सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है । शहर का नाम पूरे देश में रोशन करें । अपने आसपास गंदगी को फटकने न दें , घरों से निकलने वाला गीला और सूखा कचरा अलग-अलग डस्टबिन में डालें । मुझे उम्मीद है इस बार हमारा शहर स्वच्छता में पूरे देश में नंबर-वन…

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Added by Mohammed Arif on March 25, 2018 at 9:13am — 10 Comments

लघुकथा--कठपुतली

एक राजनेता से पूछा -" आप तीखी बयानबाज़ी या शोला बयानी क्यों करते हैं ? इससे दूसरे वर्गों की भावनाएँ आहत है । देश का माहौल ख़राब होता है । अपनी ज़बान पर थोड़ा ताला क्यों नहीं लगाते ?"
राजनेता -" ज़बान पर ताला या नियंत्रण नहीं लगा सकता । मेरे हाथों में नहीं है ।"
मैंने पलटवार करते हुए पूछा -" फिर किसके हाथों में है ?"
" पार्टी आला कमान के ।" कुतिलता से मुस्कुराते हुए चल दिए ।

मौलिक एवं अप्रकाशित। ।

Added by Mohammed Arif on March 21, 2018 at 10:30am — 14 Comments

लघुकथा-संजीदा

एक समय था जब आनंदी लाल जी घंटों अख़बार पढ़ा करते थे । उम्र बढ़ने के साथ-साथ नेत्र ज्योति ने साथ छोड़ दिया । उन्हें अब अक्षर दिखाई नहीं देते । पोता चिण्टू सुबह की ताज़ा ख़बरें और अनमोल विचार रोज़ पढ़कर सुनाता है । वह दादा जी का सच्चा समाचार वाचक है । आज सुबह के सारे समाचार सुन लेने के बाद दादा जी बोले-" बेटा चिण्टू कोई अच्छा-सा अनमोल वचन सुनाओ ।" कुछ देर अख़बार के पन्ने पलटने के बाद चिण्टू बोला -" दादा जी ,व्हिक्टर ह्यूगो का बहुत बढ़िया विचार आया है वो सुनाता हूँ । सुनो ,"बुद्धिमान व्यक्ति बूढ़ा नहीं…

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Added by Mohammed Arif on March 17, 2018 at 8:30am — 20 Comments

लघुकथा- हिंसा



अलमारी में रखे शब्दकोष के पन्ने अचानक फड़फड़ाने लगे । हो सकता है ये उनके अंदर की बेचैनी या घबराहट हो । " सहिष्णुता " शब्द ने "संस्कार " से अपनी व्यथा बताते हुए कहा -" मेरे अर्थ को लोग भूल से गए हैं । मैं उपेक्षित जीवन जी रहा हूँ । मेरे मर्म को कोई जानना नहीं चाहता । बुरा तो तब और लगता है जब मेरे आगे "अ" जोड़कर " असहिष्णुता " बनाकर देश में बवाल मचाया जा रहा है ।"

" सच कहती हो " सहिष्णुता" बहना । मेरी भी हालत अनाथों की तरह हो गई है । कोई मुझे अपनाने को तैयार ही नहीं है ।" "संस्कार…

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Added by Mohammed Arif on March 11, 2018 at 9:00am — 27 Comments

लघुकथा--माँ

बड़े बेटे ने माँ के फटे पुराने कपड़े इकट्ठे किए । दूसरा बेटा चश्मा और छड़ी ढूँढकर लाया । तीसरे ने दवाई की शीशी और पुड़ियाँ अलमारी से निकाली । छोटी बहू कड़वा ताना देती हुई बोली-" जाने कब मरेगी । लगता है कोई अमर बूटी खाकर आई है ।" चारों मिलकर माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आए । अब चारों ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला -चिल्लाकर सभी को बता रहे हैं कि माँ अपनी राजी-मर्जी से हमेशा के लिए अपनी बेटी के घर चली गईं ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on March 6, 2018 at 8:00am — 16 Comments

कविता- वो आँखें


समय का काला
क्रूर धुआँ
आख़िरकार
तैर गया आँखों में
बन के मोतियाबिंद
बड़ा चुभता है आठों पहर
उन दिनों आँखें
बड़ी व्यस्त रहती थी
किसी के दिल को लुभाती थी
किसी के मन को भाती थी
सारा संसार समाया था इनमें
लेकिन धीरे-धीरे
इनका यौवन फीका पड़ गया
पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा
अब ये आँखें
पथराई-सी
डबडबाई-सी
लाचार-सी रहती है
बस यही पहचान रह गई है इनकी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on March 1, 2018 at 5:00pm — 17 Comments

कविता-- लाजमी है अब मरना

हमें अब मरना होगा

अपने आदर्शों के साथ

गला घोंटना होगा

अपने ही सिद्धांतों का

सूली पर चढ़ाना होगा मान्यताओं को

इन सबका औचित्य समाप्त - सा हो गया है

सच की अँतड़ियाँ निकल आई है

काल के दर्पण पर कुछ भद्दे चेहरें

मुँह चिढ़ा रहे है खोखले मानव को

दिन सारे दहशत में झुलसते रहते हैं

दोपहर को लू लग गई है

कँपकँपी-सी लगी रहती है शाम को

रातें आतंकी के विस्फोट -सी लगती है

हमें अब मरना होगा अपने आंदोलनों के साथ

भूख हड़ताल और आमरण अनशन…

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Added by Mohammed Arif on February 25, 2018 at 8:00am — 5 Comments

कविता--फागुन

फागुन
अलसाई हुई भोर को
फागुनी दस्तक की
गंध ने महका दिया
मेरे अंदर भी
बीज अंकुरित होने लगे
तुम्हारे अहसासों के
शायद तुम भी
गुनगुना रही होगी
होली का गीत
प्रेम की मादल पर
कुछ पुरानी यादें भी
थाप दे रही होंगी
हृदय के आँगन में
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on February 20, 2018 at 12:30am — 10 Comments

कविता --पारदर्शिता



कितनी पारदर्शिता है

इस सदी में

किसानों की बर्बाद फसल का

तगड़ा मुआवज़ा देने की

सरकार खुलेआम घोषणा कर रही है

मगर मुआवज़ा

आत्महत्या में बदल रहा है

मीडिया सुबह की पहली किरण के साथ

दिखला रहा है

भूख-ग़रीबी , बेरोज़गारी , आँसू , सिसकी

मगर सरकार कहती है

हमने करोड़ों का बजट में

प्रावधान बढ़ा दिया है

आँकड़ों में

मृत्यु दर लगातार घट रही है

सरकारी अस्पतालों में

मौत सस्ती बिक रही है

हीरा और हवाला कारोबारी

करोड़ों की चपत लगा रहे…

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Added by Mohammed Arif on February 18, 2018 at 7:56am — 4 Comments

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