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एक दिन तंग आकर ज़िंदगी मौत से बोली-" आख़िर तू मुझे कब तक डसती रहेगी ?"
मौत खिलखिलाकर बोली-" जब तक तू जीने की हठ करती रहेगी ।"

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mohammed Arif on April 4, 2018 at 1:22pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय विजय निकोर जी ।

Comment by vijay nikore on April 4, 2018 at 9:36am

भाई आरिफ़ जी, लघुकथा इतने कम शब्दों में इतना कुछ कह सकती है, सच, यह सोचा न था। दाद देता हूँ आपकी सोच को। बधाई

Comment by Mohammed Arif on April 2, 2018 at 9:16pm

आपकी इस्लाह सर आँखों पर । सुधार कर लिया है आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब । आपकी प्रतिक्रिया ने इस लघुकथा पर सफलता की मोहर लगा दी । लेखन सार्थक हो गया । दिली आभार ।

Comment by Mohammed Arif on April 2, 2018 at 9:13pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय अजय तिवारी जी ।

Comment by Samar kabeer on April 1, 2018 at 10:09pm

जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,बहुत ख़ूब वाह, शानदार,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'डँसती'--"डसती"

Comment by Ajay Tiwari on April 1, 2018 at 4:53pm

आदरणीय आरिफ साहब, दूसरी पंक्ति में 'का' की जगह 'की' टंकित हो गया है. बहुत अच्छी लघुकथा हुई. हार्दिक बधाई.  

Comment by Mohammed Arif on April 1, 2018 at 2:05pm

लघुकथा के मर्म को समझ उस पर त्वरित निरपेक्ष टिप्पणी देने का बहुत-बहुत आभार आदरणीय शेख शहज़ाद उस्मानी जी ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 1, 2018 at 10:25am

बेहतरीन यथार्थपूर्ण कटाक्षपूर्ण सृजन के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब।

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