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Samar kabeer
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क़दम उठाने से पहले विचार करना था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन(आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करें और शैर का लुत्फ़ लें)अगर वफ़ा का चलन इख़्तियार करना थाक़दम उठाने से पहले विचार करना थाये एक बार नहीं बार बार करना थाबग़ैर नाव के दरिया को पार करना थाहुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैंग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना थाउठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत मेंशऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना थावो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आताउसी के तीर से उसका शिकार करना था__________हुसूल-ए-इल्म :- ज्ञान प्राप्त करनाशऊर :- अक़्लतेग़ :- तलवार--समर…See More
13 hours ago
Samar kabeer commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल-नूर की- ऐसा लगता है फ़क़त ख़ार सँभाले हुए हैं,
"जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
yesterday
Sushil Sarna commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आताउसी के तीर से उसका शिकार करना थावाह आदरणीय समर कबीर साहिब हर शेर सीधे दिल में उत्तर गया। इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई कबूल फरमाएं।"
Monday
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"जनाब शिज्जु शकूर साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।"
Monday
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"जनाब सुशील सरना जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।"
Monday
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।"
Monday
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"जनाब रोहिताश्व मिश्रा जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।"
Monday
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।"
Monday
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।"
Monday
Samar kabeer commented on Samar kabeer's blog post क़दम उठाने से पहले विचार करना था
"जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ।"
Monday
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post बेशर्मी से ... (क्षणिका )...
"जी,ठीक है ।"
Monday
Samar kabeer commented on Dr Ashutosh Mishra's blog post खुद आंसू पीते हैं
"जनाब डॉ.आशुतोष मिश्रा जी आदाब,आप अपनी कविता में जो कहना चाहते हैं वो स्पष्ट नहीं हो रहा है,हमारे देश में,गाय, भैंस,बकरी,क़साइयों के हाथों में आने के बाद भी ख़त्म नहीं हो गई हैं,बड़ी तादाद में मौजूद हैं,और दूध की भी यहाँ कोई कमी नहीं है,सभी अमीर ग़रीब सब…"
Monday
Samar kabeer commented on Sushil Sarna's blog post बेशर्मी से ... (क्षणिका )...
"जनाब सुशील सरना साहिब आदाब, 'पवन की थपकी से इक दिया बुझते बुझते बेशर्मी से जल उठा' इस क्षणिका में 'बेशर्मी'शब्द की तार्किकता समझ नहीं आ रही है,दिया तो पवन के होते हुए हिम्मत से ही जलता है,इसमें बेशर्मी की क्या बात है ?"
Monday
Samar kabeer commented on Rohit dobriyal"मल्हार"'s blog post "तन्हा" सपना (मल्हार)
"जनाब मल्हार साहिब आदाब,अच्छी लगी आपकी कविता,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Monday
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...जहर से भरी वादियों में हवा है
"हेडिंग में 'हालातों'शब्द ग़लत है,हालत का बहुवचन 'हालात'है ।"
Monday
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...जहर से भरी वादियों में हवा है
"जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज'साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल है, बधाई स्वीकार करें ।"
Monday

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क़दम उठाने से पहले विचार करना था

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



(आख़री शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ करें और शैर का लुत्फ़ लें)



अगर वफ़ा का चलन इख़्तियार करना था

क़दम उठाने से पहले विचार करना था



ये एक बार नहीं बार बार करना था

बग़ैर नाव के दरिया को पार करना था



हुसूल-ए-इल्म की ख़ातिर भटकते फिरते हैं

ग़ज़ल का फ़न जो हमें बा वक़ार करना था



उठाके बोझ ज़माने का तेरी चाहत में

शऊर-ओ-फ़िक्र की सरहद को पार करना था



वो मेरी तेग़ से मरता तो क्या मज़ा आता

उसी… Continue

Posted on April 20, 2017 at 12:04am — 15 Comments

तरही ग़ज़ल नंबर-3

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

(मक़्ते में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ को नज़र अंदाज़ कर दें)



रफ़्ता रफ़्ता सारी अफ़वाहें कहानी हो गईं

तल्ख़ियाँ इतनी बढ़ीं रेशा दवानी हो गईं



हिज्र की रातों में इतनी बार उनके ख़त पढ़े

याद मुझको सारी तहरीरें ज़बानी हो गईं



हाल वो देखा ग़ज़ल का आज यारो,शर्म से

'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की भी रूहें पानी पानी हो गईं



क़ह्र को बाँधें क़हर वो और टोको तो कहें

शे'र कहने की ये तरकीबें पुरानी हो गईं



जानते हो ख़ूब यारो ओबीओ के मंच… Continue

Posted on April 9, 2017 at 12:13am — 38 Comments

तरही ग़ज़ल नंबर-2

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन



आज तारीफ़ें मिरी उनकी ज़बानी हो गईं

हासिदों की देख शकलें ज़ाफ़रानी हो गईं



उनके रुख़सारों की गर्मी अलअमाँ सद अलअमाँ

सब चटानें बर्फ़ की यकलख़्त पानी हो गईं



आज हैं मासूम सीता की तरह ये रावणों

क्या करोगे लड़कियाँ गर ये भवानी हो गईं



देखते थे कल हिक़ारत से हमें वो देख लें

किस क़दर नस्लें हमारी आज ज्ञानी हो गईं



मैं तो हूँ ख़ामोश लेकिन लोग कहते हैं "समर"

तेरी ग़ज़लें एह्ल-ए-दिल की तर्जुमानी हो… Continue

Posted on April 6, 2017 at 12:29am — 31 Comments

ओबीओ की सातवीं सालगिरह का तोहफ़ा

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

(एक शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ नज़र अंदाज़ कर दें)





जो कहूँ जो लिखूँ ओबीओ के लिये

यूँ समर्पित रहूँ ओबीओ के लिये



माँगता हूँ यही आजकल मैं दुआ

जब तलक भी जियूँ ओबीओ के लिये…



Continue

Posted on April 1, 2017 at 2:30pm — 44 Comments

Comment Wall (12 comments)

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At 10:54am on October 9, 2016, सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' said…
आदरणीय समर कबीर साहिब प्रणाम आपको।

गजल विधा सिखने का इच्छुक हूँ और मैंने दूसरी गजल आज इस पटल पर रखी है।

आपके आने से मेरा घर जग जगमगाया।

आपक नजर कर मुझे कुछ सुझाव देंगे तो आगे से मुझे कुछ सीखने में मदद मिलेगी। सादर
At 11:29am on September 26, 2016, Kalipad Prasad Mandal said…

आदरणीय समीर कबीर साहिब आदाब , आपको थोड़ा कष्ट दे रहा हूँ क्योंकि ग़ज़ल में जितनी जानकारी आपको है शायद मेरी जानकारी में और कोई नहीं है | मैं कुछ शे'र ग़ालिब के पढ़ रहा था और उनके बहर जांच कर रहा था अपनी जानकारी केलिए | दो शेर में अटक गया हूँ ,नीचे लिखा है :-

बेनिया/जी हद से गुज/री , बन्दा पर/वर कब तलक 

२१२/ २२१ २/           1222        / २२१२ 

हम कहें/गे हाले  दिल, और आ/प फरमाएं/गे क्या 

२१२/     २२१    २ /   २१२ /    १  222   /२२(१२)

गर किया /नासेह ने/ हमको कै/द ,अच्छा यूं स/ही 

२१२/      २२१२/      212     /२२ २१/२ 

ये जुनू/ने -इश्क के /अंदाज़ छुट /जायेंगे क्या 

212/   २२१२/        221२/       2212

कृपया आप इस्नके सही बहर बताने का कष्ट करें |

सादर 

At 11:08pm on September 24, 2016, Samar kabeer said…
सरिता जी आप किस विषय में
पूछ रही हैं ?
At 9:14pm on September 24, 2016, sarita panthi said…
आदरणीय सर क्या मैंने अब सही जगह पोस्ट की है ?
At 3:16pm on September 19, 2016, Dipu mandrawal said…
आदरणीय समीर कबीर जी आपने मेरी कविताओं को पढ़ा और पसंद किया इसके लिए मेरा प्रणाम स्वीकार करें । Dipu Mandrawal
At 12:07pm on July 26, 2016, Dr Ashutosh Mishra said…

आदरणीय समर सर मेरे मित्रता के निवेदन को स्वीकार करके आपने मुझे अपना आशीर्वाद दिया है मेरे तकरीबन हर रचना को आपका मार्गदर्शन मिलता  रहा है इससे अगले रचना में एक नयी सोच मिलती है आपका स्नेह और आशीवाद यूं ही सतत मिलता रहे इस कामना के और सदर प्रणाम के साथ सादर 

At 9:46pm on February 1, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय Samar kabeer जी,

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें...

At 11:06am on October 24, 2015, Tasdiq Ahmed Khan said…

janab samar kabeer sahab aadab,    hosla afzayi ke liye shukriya ,  1. ar ka matlab hai agar...aur 2.chhar ka matlab hai  ..khayal.

At 6:40pm on March 18, 2015, pratibha tripathi said…

आदरणीय समर कबीर जी आपको माह कि सर्वश्रेष्ठ रचना के हेतु चुने जाने के लिए बधाई प्रेषित करती हूँ । ये सच है कि ग़ज़ल को लिखना और उसमे खिताब पाना बहुत ही प्रशंशनीय है ,आपको एक बार फिरसे बधाई हो सादर । 

At 7:09pm on March 16, 2015, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

आ०समर कबीर जी

सर्वश्रेष्ठ लेखन  कोई हंसी खेल नहीं  .आपको यह पुरस्कार प्राप्य हुआ . आपको मेरी भूरि-भूरि  बधायी .

 
 
 

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