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सूबे सिंह सुजान
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  • India
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सूबे सिंह सुजान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"यूँ भी विज्ञान तरक्की का सफ़र बनता है वॉयरस एक करोना भी ख़बर बनता है (1) बंद रहना है घरों में,ये दवाई समझो जितनी कड़वी दवा,उतना ही असर बनता है (2) घर में रहते हैं तो ख़तरा है झगड़ने का भी ,घर से निकलोगे,तो बीमारी का डर बनता है (3) जोड़कर ईंट और…"
Friday
सूबे सिंह सुजान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"वाह मोहतरम मतला तो कमाल हुआ है ।पूरी ग़ज़ल अच्छी हुई है बहुत बहुत बधाई "
Friday
सूबे सिंह सुजान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"वाह जी बहुत खूबसूरत "
Friday
सूबे सिंह सुजान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
"वाह बढ़िया निभाया है "
Friday
सूबे सिंह सुजान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-117
" बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है । बहुत बहुत बधाई "
Friday
सूबे सिंह सुजान commented on सूबे सिंह सुजान's blog post ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम
"Samar kabeer,ji  आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया का बहुत बहुत आभार । आपने कंई शेर ठीक किये हैं आपकी विशाल हृदयता का मैं बहुत आभारी हूँ ।"
Tuesday
Samar kabeer commented on सूबे सिंह सुजान's blog post ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम
"जनाब सूबे सिंह सुजान जी आदाब,बहुत समय बाद पटल पर आपकी रचना देख कर अच्छा लगा । ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन कुछ मिसरे सुधार चाहते हैं,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'ख़ुद को कितना सँवारते हैं हम' इस मिसरे में 'कितना' की जगह…"
Tuesday
सूबे सिंह सुजान commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)
"कलम चलती रहे "
Mar 23
सूबे सिंह सुजान commented on babitagupta's blog post जीवन का कर्फ्यू
"बहुत खूब, मौज विषय है । बधाई हो "
Mar 23
सूबे सिंह सुजान commented on सूबे सिंह सुजान's blog post ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम
"रवि भसीन शाहिद जी, बहुत बहुत शुक्रिया जनाब । आपकी सहृदयता को नमन है  "
Mar 23
रवि भसीन 'शाहिद' commented on सूबे सिंह सुजान's blog post ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम
"*बहुत ख़ूब"
Mar 23
रवि भसीन 'शाहिद' commented on सूबे सिंह सुजान's blog post ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम
"आदरणीय सूबे सिंह सुजान साहिब, भय ख़ूब। इस रचना पर आपको हार्दिक बधाई। इस ग़ज़ल में स्वयं का जो विश्लेषण करने का प्रयत्न है, वो बहुत अच्छा लगा। वाक़ई हम अपने अंदर झाँकने का प्रयास बहुत कम करते हैं, और आपकी ग़ज़ल ऐसा करने की प्रेरणा देती है।"
Mar 23
सूबे सिंह सुजान commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post कोरोना के विरुद्ध पाँच दोहे (गणेश बाग़ी)
"बहुत प्रेरणा पद हैं "
Mar 22
सूबे सिंह सुजान commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)
"बहुत खूबसूरत ग़ज़ल हुई है ।कुछ शेर बहुत पसंद आये हैं "
Mar 22
सूबे सिंह सुजान commented on Poonam Matia's blog post मुक्तक -कोरोना
"पूनम माटिया जी करोना पर अच्छी रचना हुई है बहुत बहुत बधाई हो "
Mar 22
सूबे सिंह सुजान shared their blog post on Facebook
Mar 22

Profile Information

Gender
Male
City State
कुरूक्षेत्र,हरियाणा
Native Place
करनाल
Profession
09017609226
About me
एक अध्यापक के साथ कवि हूँ।मुख्यतया ग़ज़ल लेखन करता हूँ।एक प्रथम हिंदी ग़ज़ल संग्रह 2007( सीने में आग) में प्रकाशित हुआ तथा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं ।

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सूबे सिंह सुजान's Blog

ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

आरती ख़ुद उतारते हैं हम

फिर भी वैसे के वैसे रहते हैं

ख़ुद को कितना सँवारते हैं हम

दूसरों का मजाक करते हैं

ख़ुद की शेखी बघारते हैं हम

सिर्फ़ अपनी किसी जरूरत में

दूसरों को पुकारते हैं हम

डाल कर दूसरों में अपनी कमी

दूसरों को विचारते हैं हम

जीतने से ज़ियादा आये मज़ा

जब महब्बत में हारते हैं हम

इस खुशी…

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Posted on March 22, 2020 at 2:02pm — 6 Comments

ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

ग़ज़ल   

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

 

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना

हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ 

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं

बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ 

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए

भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ. 

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले

शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ   

अब न इंसानियत की हवा लग रही

इस तरफ आजकल बंद…

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Posted on January 25, 2019 at 6:27am — 4 Comments

ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

              ग़ज़ल 

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना

हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं

बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए

भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले

शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ

अब न इंसानियत की हवा लग…

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Posted on January 24, 2019 at 9:32pm — 7 Comments

नज़्म - नया साल

नज़्म      नया साल

इन दिनों पिछले साल आया था

पेड़ की टहनी पर नया पत्ता

वक्त की मार से हुआ बूढ़ा

आज आखिर वह शाख से टूटा ।

जन्मदिन हर महीने आता था

और वो और खिलखिलाता था

वो मुझे देख मुस्कुराता था

मैं उसे देख मुस्कुराता था ।

जिन दिनों वो जवान होता था

पेड़ पौधों की शान होता था

उस तरफ सबका ध्यान होता था

और वो आंगन की शान होता था ।

उसके चेहरे में ताब होता था

मुस्कुराना गुलाब होता…

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Posted on December 31, 2018 at 2:30pm — 5 Comments

Comment Wall (6 comments)

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At 10:10am on August 17, 2016, सूबे सिंह सुजान said…
Ji
At 8:07pm on February 10, 2014, Sarita Bhatia said…

आदरणीय भाई सूबे सिंह जी हार्दिक आभार 

मेरे प्रोफाइल पर सबसे पहला कमेंट भी आपने ही दिया था आशीर्वाद स्नेह बनाये रखें 

At 8:44am on March 6, 2013, Abhinav Arun said…

आदरणीय श्री सुजान जी आपकी सशक्त रचना "कच्चा रास्ता " को माह की श्रेष्ठ रचना का  पुरस्कार प्रदान किये जाने पर हार्दिक बधाई और साहित्य सेवा हेतु हार्दिक शुभकामनायें भी !!

At 11:41pm on March 5, 2013,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय श्री सुबे सिंह सुजान जी,
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आप की रचना "कच्चा रास्ता" को महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना पुरस्कार के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |

आपको पुरस्कार राशि रु 1100 /- और प्रसस्ति पत्र शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस नामित कृपया आप अपना नाम (चेक / ड्राफ्ट निर्गत हेतु), तथा पत्राचार का पता व् फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी

At 11:09am on August 29, 2012, Naval Kishor Soni said…

आपका आभार ।

At 6:36pm on August 26, 2012, Admin said…

तरही ग़ज़ल पोस्ट करने हेतु सर्वप्रथम मुख्य पृष्ठ पर फोरम से "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक २६ को क्लिक कर ले, अथवा सीधे मुशायरा पोस्टर को भी क्लिक कर सकते है, उसके बाद खुलने वाले पृष्ठ पर मुशायरे के सम्बन्ध में नियम आदि की जानकारी के नीचे बने बड़े बाक्स में अपनी ग़ज़ल पेस्ट कर Add Reply को क्लिक कर ले | 

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