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Aazi Tamaam
  • Male
  • Bareilly, UP
  • India
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Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय dandpani nahak ji दिल से शुक्रिया हौसला अफ़ज़ाई के लिये आभार स्वीकार करें"
yesterday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"माफ़ कीजियेगा गुरु जी नियम ध्यान में नहीं था आगे से ऐसा नहीं होगा"
yesterday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"सादर प्रणाम आदरणीय जान जी ग़ज़ल तक आने और हौसला बड़ाने के लिये आभार कुबूल कीजिये"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"सादर प्रणाम डॉ सिंह जी दिल से धन्यवाद ग़ज़ल तक आने व हौसला अफ़ज़ाई करने के लिये आभार कुबूल कीजिये"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
" आदरणीय राजेश कुमारी जी सादर प्रणाम  ग़ज़ल तक आने और मार्गदर्शन करने के लिये दिल से शुक्रिया मेरे ध्यान में आखिरी शेर की बेहतरी के लिये कुछ आ नहीं पा रहा है यदि आपके ध्यान में कुछ आता हो तो जरूर साझा करें आपकी इस्लाह सर आँखों पर धन्यवाद"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय चेतन जी खूबसूरत ग़ज़ल और मुशायरा प्रारंभ के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"2122 1122 1122 22 अपने ही दिल को सज़ा हमसे सुनाई न गई बे-वफ़ा से तो वफ़ा हमसे निभाई न गई दर्द-ए-दिल सहते रहे सहते रहे सहते रहे चोट कुछ ऐसे लगी दिल पे दिखाई न गई बज़्म-ए-जानाँ में अगर आज़ है फिर चश्म-ए-तर आज़ फिर दिल की रज़ा हमसे छुपाई न…"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"शानदार ग़ज़ल के लिये आदरणीय अमीर जी मुबारकबाद कुबूल करें"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आरणीय रचना जी अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें"
Friday
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"आदरणीय जनाब मुनिश तन्हा जी अच्छी ग़ज़ल के लिये बधाई स्वीकार करें"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय जनाब सालिक जी खूबसूरत ग़ज़ल के लिये धन्यवाद स्वीकार करें"
Friday
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"आदरणीय जनाब धामी जी बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है बधाई स्वीकार करें"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"अच्छी ग़ज़ल के लिये आदरणीय जनाब जान जी मुबारकबाद कुबूल करें"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय राजेश कुमारी जी एक खूबसूरत ग़ज़ल के लिये दिल से मुबारकबाद कुबूल करें"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय रिचा जी खूबसूरत ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें"
Friday
Aazi Tamaam replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-128
"आदरणीय जनाब रवि जी दिल से मुबारकबाद अच्छी ग़ज़ल के लिये"
Friday

Profile Information

Gender
Male
City State
Uttar Pradesh
Native Place
CHANDAUSI
Profession
Poet, Lawer, Engineer
About me
Poetic Nature

Aazi Tamaam's Blog

ग़ज़ल : "मदारी"

बह्र - मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम

अरकान - 122 122 122 122

किसी को मुकम्मल जहाँ देने वाले

किसी को नया आसमां देने वाले

                    **

कि बहती हवा…

Continue

Posted on February 17, 2021 at 4:30am — 5 Comments

ग़ज़ल~ "न मर ही पाये कोई"

बह्र ~ "बह्र-ए- वाफिर मुरब्बा सालिम"  

12112 12112 12112 12112

न चैन पाये है की न सुकूँ .....................ही पाये कोई

ऐसे ले के दर्द ए दिल है जिये.................ही जाये कोई

के चोट जो खाये अपनो से ही ...............अगर

तो ले के भी दिल को अपने कहाँ.............ही जाये कोई

अज़ीब है हाल इश्क में भी.....................सनम है न दवा दिल…

Continue

Posted on February 16, 2021 at 10:00am — 4 Comments

ग़ज़ल ~ " है स्याही सुर्ख़ फिर अपनी क़लम है ख़ूँ-चकाँ अपना "

122 2122 2122 2122 2

उखाड़ेंगीं भी क्या मिलकर हज़ारों आँधियाँ अपना

पहाड़ों से भी ऊँचा सख़्सियत का है मकां अपना

मिटाकर क्या मिटायेगा कोई नाम-ओ-निशाँ अपना

मुक़ाम ऐसा बनाएंगे ज़मीं पर मेरी जाँ अपना

चला है गर चला है डूबकर मस्ती में कुछ ऐसे

नहीं रोके रुका है फिर किसी से कारवाँ अपना

पहुँचने में जहाँ तक घिस गये हैं पैर लोगों के

वहाँ हम छोड़ आये हैं बनाकर आशियाँ…

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Posted on February 15, 2021 at 3:30pm — 13 Comments

एक और दास्ताँ हुई

21 21 21 21 2

एक और दास्तां सुनो

एक और खूँ चकां हुई

एक और दर्द बड़ गया

एक और राज़दाँ हुई

एक और दाग लग गया

एक और जाँ निहाँ हुई

एक और रूह जम गई

एक और ख़त्म जाँ हुई

एक और आग लग गई

एक और लौ तवाँ हुई

एक और फूल आ गया

एक और सब्ज माँ हुई

एक और हादसा हुआ

एक और बे अमाँ हुई

एक और बचपना गया

एक और रूह जवाँ हुई

एक और…

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Posted on February 14, 2021 at 8:27pm — 4 Comments

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At 1:08pm on January 16, 2021, लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' said…

आ. भाई आज़ी तमाम जी, सादर अभिवादन । मेरी गजलें आपको अच्छी लगीं यह हर्ष का विषय है । आपके इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद।

मंच पर अपनी रचनाओं का आनन्द लेने का अवसर प्रदान करें और अन्य रचनाकारों का भी अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन करते रहिए ।

At 8:15pm on January 12, 2021, Samar kabeer said…

जनाब आज़ी साहिब,तरही मुशाइर: में शामिल सभी ग़ज़लों पर लाइव ही तफ़सील से गुफ़्तगू होती है, शिर्कत फ़रमाएँ, और कोई उलझन हो तो मुझसे 09753845522 पर बात कर सकते हैं ।

 
 
 

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