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सूबे सिंह सुजान's Blog (67)

ग़ज़ल : एक तन्हा ग़ज़ल रहा हूँ मैं

एक तन्हा ग़ज़ल रहा हूँ मैं

उसकी यादों में चल रहा हूँ मैं (1)

तेरी यादों में ज़िन्दगी जी कर,

ज़िन्दगी को मसल रहा हूँ मैं (2)

कैसी हो ज़िन्दगी बताओ तुम?

तेरे ग़म में उबल रहा हूँ मैं (3) 

प्यार में इक महीन सा काग़ज़,

भीग आँसू से गल रहा हूँ मैं (4) 

तुम मुझे देख मुस्कुराते हो,

सारी दुनिया को खल रहा हूँ मैं (5) 

वो मेरी राह में खड़ी होगी ,

इसलिए तेज चल रहा हूँ…

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Added by सूबे सिंह सुजान on May 3, 2020 at 8:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

आरती ख़ुद उतारते हैं हम

फिर भी वैसे के वैसे रहते हैं

ख़ुद को कितना सँवारते हैं हम

दूसरों का मजाक करते हैं

ख़ुद की शेखी बघारते हैं हम

सिर्फ़ अपनी किसी जरूरत में

दूसरों को पुकारते हैं हम

डाल कर दूसरों में अपनी कमी

दूसरों को विचारते हैं हम

जीतने से ज़ियादा आये मज़ा

जब महब्बत में हारते हैं हम

इस खुशी…

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Added by सूबे सिंह सुजान on March 22, 2020 at 2:02pm — 6 Comments

ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

ग़ज़ल   

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

 

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना

हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ 

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं

बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ 

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए

भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ. 

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले

शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ   

अब न इंसानियत की हवा लग रही

इस तरफ आजकल बंद…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on January 25, 2019 at 6:27am — 4 Comments

ग़ज़ल - गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

              ग़ज़ल 

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना

हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं

बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ

पशु पक्षी जितने थे, उतने वाहन हुए

भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले

शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ

अब न इंसानियत की हवा लग…

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Added by सूबे सिंह सुजान on January 24, 2019 at 9:32pm — 7 Comments

नज़्म - नया साल

नज़्म      नया साल

इन दिनों पिछले साल आया था

पेड़ की टहनी पर नया पत्ता

वक्त की मार से हुआ बूढ़ा

आज आखिर वह शाख से टूटा ।

जन्मदिन हर महीने आता था

और वो और खिलखिलाता था

वो मुझे देख मुस्कुराता था

मैं उसे देख मुस्कुराता था ।

जिन दिनों वो जवान होता था

पेड़ पौधों की शान होता था

उस तरफ सबका ध्यान होता था

और वो आंगन की शान होता था ।

उसके चेहरे में ताब होता था

मुस्कुराना गुलाब होता…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on December 31, 2018 at 2:30pm — 5 Comments

कविता - कौओं के पितृ स्थान

कौए अब अपने पितृ स्थान के लिए

स्कूल के बच्चों के हिस्से में आई

अनुदान राशि को हड़प ले गये ।

और अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए

राजनीति को यूँ अपनाया

कि विधायक, सरपंच मजबूर हैं

सरकारी सहायता को पितृों तक भेजने के लिए ।

अन्य पक्षियों को छोड़कर

केवल कौओं की वोटो की गिनती

के मायने जियादा हैं ।



शेर भी लाचार हैं

वे अब शिकार नहीं करते

वे शिकार हो जाते हैं ।

शेरों को हमेशा

कौओं ने सरकश में नचवाया…

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Added by सूबे सिंह सुजान on November 26, 2018 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल - इधर उधर की बातें

हमने भी की इधर-उधर की बातें...
तुमने समझी इधर-उधर की बातें...

खो गये अर्थ वायदों के जब,
याद आयी इधर-उधर की बातें...

जब सरेआम चोरी पकडी गई,
फिर भी की इधर-उधर की बातें...

रोज वो ताश खेलने बैठें,
धूप करती इधर-उधर की बातें..

मुझ पे विश्वास कर महब्बत में,
छोड पगली इधर-उधर की बातें..

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on December 22, 2017 at 8:57pm — 6 Comments

ग़ज़ल - क्या आपके दिल में है ?बता क्यों नहीं देते?

ग़ज़ल

क्या आपके दिल में है,बता क्यों नहीं देते ?

नजरों से मेरी पर्दा उठा क्यों नहीं देते ?



ये किसलिये अहसान के नीचे है दबाया?

मुझको मेरी कमियों की सज़ा क्यों नहीं देते ?



कुछ गलतियाँ करवाती हैं मज़बूरियाँ सबसे

तुम तो बड़े हो गलती भुला क्यों नहीं देते?



हालाँकि सराबोर महब्बत से हूँ लेकिन

मौसम ये बहारों के मज़ा क्यों नहीं देते?



ये कौन ज़ुदा शख्स मेरे पीछे पड़ा है

सब पूछते हैं मुझसे,बता क्यों नहीं देते ?



जो शख्स… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on September 19, 2016 at 11:04pm — 12 Comments

तरह ग़ज़ल -याद रख अगर कच्चा रास्ता नहीं होता

तरह ग़ज़ल

याद रख,अगर कच्चा रास्ता नहीं होता

आज तू सड़क पर यूँ दौड़ता नहीं होता ।

आदमी करेगा बेशर्म हरक़तें अक्सर,

ना समझ नहीं है,के जानता नहीं होता!!

तेज गति समय पहले मौत को बुलाती है

आप धीरे चलते तो हादसा नहीं होता

प्यार के मरासिम ऐसे निभाये जाते हैं

फूल को देखना तो है तोड़ना नहीं होता

क्यों ख़फा है दुनिया से,फैसला बदल अपना

इस जहाँ में हर कोई बेवफ़ा नहीं होता वो तो खूबसूरत है,हर नज़र उसी पर है

ग़म न कीजिए,वो गर आपका नहीं होता।

वो… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on July 13, 2016 at 1:09am — 12 Comments

ग़ज़ल -चाहता हूँ उसे कमल कहना ।

चाहता हूँ उसे कमल कहना
चाँदनी और गंगा जल कहना
उसकी तारीफ़ जो रहा करता
भूल ही जाउंगा ग़ज़ल कहना
मायने अब समझ नहीं आते
अब विफल को नहीं विफल कहना
दिल दुखाने में जो सफल हो जाए
आजकल उनको ही सफल कहना
मुस्कुराहट मुझे सिखाती है
आँसुओं पर कोई ग़ज़ल कहना ।


मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by सूबे सिंह सुजान on April 2, 2016 at 12:08am — 4 Comments

ग़ज़ल - सबके चेहरों को देखते आये

आज बस में खड़े खड़े आये
सबके चेहरों को देखते आये ।

पिछली यादें तलाश करते हुए
हम तेरे शहर में चले आये ।

और कुछ काम भी नहीं मुझको,
आज मिलने ही आपसे आये ।

जैसे कुछ खो गया था मेरा यहाँ
हर गली मोड़ देखते आये ।

मेरी औक़ात क्या महब्बत में
इस जहाँ में बड़े बड़े आये ।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on March 28, 2016 at 11:00pm — 5 Comments

गीत -मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

122122122122

मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

कि बदलाव पल पल यहाँ हो रहा है



नये लोग आये नई बात की है

नये ही विचारों की बरसात की है

बहुत कुछ बदलना,बहुत कुछ है करना

अभी आए हैं बस शुरूआत की है

हम आगे बढ़ेंगे,कदम ना रूकेंगे

सितारों से आगे जहाँ हो रहा है .......



सभी साथ लेकर हम आगे बढ़ेंगे

कि दुर्गम कठिन राह को तोड़ लेंगे

न अब तक हुआ जो वो करके रहेंगे

अगर आप विश्वास हम पर करेंगे

तभी तो हरिक मुश्किलों से लड़ेंगे

नकारात्मक… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on August 13, 2015 at 10:08am — 5 Comments

गीत -मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

122122122122

मेरा देश भारत जवाँ हो रहा है

कि बदलाव पल पल यहाँ हो रहा है



नये लोग आये नई बात की है

नये ही विचारों की बरसात की है

बहुत कुछ बदलना,बहुत कुछ है करना

अभी आए हैं बस शुरूआत की है

हम आगे बढ़ेंगे,कदम ना रूकेंगे

सितारों से आगे जहाँ हो रहा है .......



सभी साथ लेकर हम आगे बढ़ेंगे

कि दुर्गम कठिन राह को तोड़ लेंगे

न अब तक हुआ जो वो करके रहेंगे

अगर आप विश्वास हम पर करेंगे

तभी तो हरिक मुश्किलों से लड़ेंगे

नकारात्मक… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on August 12, 2015 at 11:34pm — 8 Comments

गजल -आदमी अपनी ही मर्जी का खुदा रखता है ।

कुछ भी हो,अपने मसीहा को बड़ा रखता है

आदमी अपनी ही मर्जी का खुदा रखता है

वो सरेआम हकीकत से मुकर जायेगा

गिरगिटों जैसी बदलने की अदा रखता है

तुम गरीबी को तो इनसान का गहना समझो

जो फटेहाल है वो लब पे दुआ रखता है ।

जुल्म पर जुल्म जो करता है यहाँ दुनिया में

उसके हिस्से में भी भगवान सजा रखता है ।

मार के कुंडली,खजाने पे अकेला बैठा

हक गरीबों का यहाँ सेठ दबा रखता है

एक दिन मैं तुझे आईना दिखा दूंगा "सुजान "

मेरे बारे में जो तू ख्याल बुरा रखता है… Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on July 20, 2015 at 8:20pm — 13 Comments

गजल-मेरा मन मेरे सामने आइना है

मेरा मन मेरे सामने आइना है
मेरा आज खुद से हुआ सामना है
तुम्हारे मिलन में मुझे फैलना है
मगर किसलिये आज मन अनमना है
तुम्हारी खुशी में हमारी खुशी है
खुशी से खुशी को हमें बाँटना है
महब्बत पनपती नहीं जकडनों में
ये रस्मों का जंगल हमें तोड़ना है
तुम्हारी महब्बत भी मंजिल थी लेकिन
अभी जिंदगी है अभी दौड़ना है

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on June 27, 2015 at 2:12pm — 6 Comments

गर्मियों में सर्दियाँ

देखने में आ रही है गर्मियों में सर्दियाँ 

मौसमों की दोस्ती हैं गर्मियों में सर्दियाँ 

आम पर खामोश बैठी,झुरमटों से देखती 

कोयलें कुछ सोचती हैं गर्मियों में सर्दियाँ 

आओ चिंता सब  करें अपने किसानों के लिये 

क्यों फसल को लूटती हैं गर्मियों में सर्दिया  

बादलों के साथ ओले ले, हवायें आ गई 

देखो कितनी साहसी है गर्मियों में सर्दिया।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on April 17, 2015 at 9:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल- बदलने को बदल जाना,मगर तहजीब जिंदा रख।

बदलने को बदल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

हवा के साथ ढल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

यहाँ रंगीन होती रोशनी है कौंधने वाली

खुशी के साथ जल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

हमारे आम पर यह कूकती कोयल बताती है

नये मौसम मचल जाना, मगर तहजीब जिंदा रख

हमारे नौजवानों की नई पीढी, नये रिश्ते

नशे में खुद को छल जाना मगर तहजीब जिंदा रख

महब्बत के लिये तो लाख पापड बेलने होंगे

महब्बत में उछल जाना मगर तहजीब जिंदा रख

बदलना भी जमाने का बडा हैरान करता है

बहुत आगे निकल जाना…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on April 15, 2015 at 10:30pm — 10 Comments

गजल ,वो मुझे एकटक देखती रह गई

हाथ पर उसके ठोडी टिकी रह गई
वो मुझे एकटक देखती रह गई

वो हवा हो गई एक पल में कंही
मुस्कुराहट यहाँ गूँजती रह गई

मंजिलों की तरफ दौड़ते -दौड़ते,
जिंदगी कट गई बेबसी रह गई

आपकी याद जिंदा जलाई मगर,
आँधियाँ फिर चलीं,अधजली रह गई

सच का सूरज उजाला बहुत भर गया,
रात आईं मगर रोशनी रह गई

सूबे सिंह सुजान
मौलिक व प्रकाशित

Added by सूबे सिंह सुजान on March 17, 2015 at 11:38pm — 13 Comments

मुक्तक- बेटियाँ

      बेटियाँ    

बेटियों की ज़मीन को सींचो

उग रही पौध को नहीं खींचो

ये हमारे समाज की जड हैं,

इन जडों के शरीर मत भींचो।

मौलिक व अप्रकाशित  

Added by सूबे सिंह सुजान on January 15, 2015 at 11:12pm — 4 Comments

ग़ज़ल- छुट्टियों के दिन

मस्कुराते हैं छुट्टियों के दिन

कम ही आते हैं छुट्टियों के दिन

कंपकंपाते हैं छुट्टियों के दिन  

थरथराते हैं छुट्टियों के दिन 

देखो सचमुच में थक गये हैं हम,

ये बताते हैं छुट्टियों के दिन



सैंकडों काम छोड कर बाकी

भाग जाते हैं छुट्टियों के दिन



सपनों के बोझ में दबे बच्चे

खेल पाते हैं छुट्टियों के दिन



चार दिन घर में रह नहीं पाये,

अब थकाते हैं छुट्टियों के दिन

आदतें और थकान,आलस…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on January 4, 2015 at 11:00pm — 16 Comments

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