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Sheikh Shahzad Usmani
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  • SHIVPURI M.P.
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Sheikh Shahzad Usmani commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post फर्स्ट-साईट-लव (लघुकथा )
"आदाब। वाक़ई होता तो ऐसा भी है  अधिकतर बुद्धिजीवी पुरूषों के साथ। आजकल की लड़िकयां तो यूं जुगाड़ से सब कुछ कह या कहलवा देतीं हैं और 'दूध का दूध, पानी  का पानी' या 'एक-तरफ़ा प्रेमाकर्षण- कहानी' सुस्पष्ट हो जाती है, वरना…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post फर्स्ट-साईट-लव (लघुकथा )
"आदाब। वाक़ई होता तो ऐसा भी है  अधिकतर बुद्धिजीवी पुरूषों के साथ। आजकल की लड़िकयां तो यूं जुगाड़ से सब कुछ कह या कहलवा देतीं हैं और 'दूध का दूध, पानी  का पानी' या 'एक-तरफ़ा प्रेमाकर्षण- कहानी' सुस्पष्ट हो जाती है, वरना…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani commented on डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव's blog post फर्स्ट-साईट-लव (लघुकथा )
"आदाब। वाक़ई होता तो ऐसा भी है  बेचारे पुरूषों के साथ। लड़िकयां तो यूं जुगाड़ से सब कुछ कह या कहलवा देतीं हैं और दूध का दूध,पान का पानी या एक-तरफ़ा कहानी सुस्पष्ट हो जाती है, वरना पुरुष ही स्वयं से उलझता रहकर स्वयं पर भड़ास निकाल कर दूसरों के…"
Sunday
Sheikh Shahzad Usmani added a discussion to the group बाल साहित्य
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'मैं और मेरे अपने' (आत्माकथा)

मैं आज ज़िंदा हूं, तो बस जनाब कक्का साहिब की बदौलत। किसी की नज़र में मैं अब बदसूरत हूं, तो क्या हुआ! उनकी दृष्टि में तो हमेशा सुंदर हूं, ...शुरू से ही महत्वपूर्ण हूं! यही वज़ह है कि मेरा न तो कहीं तबादला हो सका और न ही मेरा कोई और रूपांतरण; वरना मैं भी किसी रद्दीवाले के ठेले से होती हुई, किसी गोदाम और फ़िर किसी 'रिसाइकल बिन या टैंक' में होते हुए अब तक न जाने किस-किस के साथ घुल-मिल कर किसी नये प्रोडक्ट (उत्पाद) में तब्दील हो चुकी होती! तुम लोग भी चौंक रहे होगे कि "ये आख़िर इस तरह क्यों अपनी…See More
Sunday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"बहुत-बहुत शुक्रिया अनुमोदन और प्रोत्साहन हेतु आदरणीया राजेश कुमारी साहिबा।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आपको यह रचना और यह चतुष्पदी पसंद आई। मिहनत काफी सफल हो सकी। हार्दिक आभार आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय साहिबा।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। रचना पर समय देकर इस्लाह और हौसला अफ़ज़ाई हेतु बहुत-बहुत शुक्रिया। अपनी सोच के अनुसार विषयांतर्गत ही समझ रहा था। पुनर्विचार करूंगा।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। विचार मंथन उत्प्रेरित करती, आशावादिता के साथ उचित आह्वान करती बहुत बढ़िया उम्दा समसामयिक रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय साहिबा।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। वाह। (16-14) मात्रायें लेकर ह़िदायत, ताक़ीद, इस्लाह व सच्चाई बयां करती बेहतरीन उम्दा गीतिका सृजन हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय सतविंदर कुमार राणा साहिब।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। देश के वर्तमान परिदृश्य, उपलब्धियों, अपेक्षाओं, विरोध-गतिरोध, आशावादिता के भाव समेटे बहुत बढ़िया रचना हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले साहिब।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। अब तक की तमाम प्रविष्ठियों से सर्वदा भिन्न बेहतरीन शिल्प में उम्दा बेहतरीन सृजन हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय टी आर शुक्ल साहिब।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। सच्चाई बयां करते प्रेरक भावपूर्ण मुक्तक प्रयास हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय दयाराम मेथानी साहिब। मुहतरम जनाब समर कबीर साहिब की इस्लाह पर ग़ौर फ़रमाइयेगा।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। आप सभी की सकारात्मक टिप्पणियों से मेरी कोशिश सफल महसूस हुई। इस हौसला अफ़ज़ाई हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय महेंद्र कुमार साहिब।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। मेरी इस रचना पर भी समय देकर प्रोत्साहित करने हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया  सुचिसंदीप अग्रवाल‌  साहिबा।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। मेरी इस दूसरी प्रविष्टि पर भी सहृदय समय देकर अनुमोदन और हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर साहिब।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-99
"आदाब। अनुमोदन और प्रोत्साहन हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' साहिब।"
Saturday

Profile Information

Gender
Male
City State
Shivpuri M.P.
Native Place
Shivpuri
Profession
Radio Announcer
About me
A Private School- teacher, Freelancer and a Casual Radio Announcer. Simlple living, high thinking, fond of reading and writing.

Sheikh Shahzad Usmani's Blog

'बढ़ते क़दम' (संस्मरण/संवादात्मक शैली में)

"क्या कर रहे हो, गुड्डू अब तुम यहां? तुमने नई डिक्शनरी की पैकिंग आज भी नहीं खोली! कब से पढ़ना शुरू करोगे, बेटे?"

"नहीं पापा, मैं नहीं पढ़ूंगा! मैंने दिल्ली में ही पिछले विश्व पुस्तक मेले में कह दिया था कि ख़रीदो, तो मेरे पक्के दोस्त के लिए भी ख़रीदो!"

"बेटे, मैंने वैसे भी पांच हज़ार रुपए की पुस्तकें ख़रीद लीं थीं, इसलिए केवल तुम भाई-बहन के लिए ही दो डिक्शनरियां ख़रीदीं थीं। वहां तुम्हारे लिए भी तो कुछ ख़रीदना था दिल्ली के बाज़ार से!"

"कुछ भी हो, मेरे दोस्त को बहुत बुरा लगा है।…

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Posted on January 6, 2019 at 8:52am — 3 Comments

नववर्ष पर हाइकु - [हाइकु]/शेख़ शहज़ाद उस्मानी :

1-

स्वागत देख

भौंचक्का नववर्ष

बीते को देख

2-

अद्भुत हर्षा

वर्ष विदाई-रात

दुआ की बात

3-

हे नववर्ष

दुआयें बरसाता!

स्वप्न दिखाता!

4-

ख़र्चीले दिन

आते-जाते वर्ष के

दो जश्नों के!

5-

सत्य, असत्य

आते-जाते वर्ष के

मिथ्या धूम के



(छद्म धूम के)

(धूम/जश्नों)

6-

है नेतागिरी…

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Posted on December 29, 2018 at 6:30pm — 5 Comments

फ़न-फ़ेअर (संस्मरण)

पिछले महीने की ही बात है। गुड्डू को लेकर हम सभी सपरिवार अपने बच्चों के स्कूल में आयोजित 'फ़न-फ़ेअर' दिखाने ले गये। उसके दोनों बड़े भाई-बहन ने मेले में समोसे-पकोड़े की स्टॉल में सहभागिता की थी। बच्चों के प्रोत्साहन और टिकट-ड्रॉ की लालसा में हमने बीस टिकट पहले ही ख़रीद लिये थे, जो गुड्डू के ही पर्स में सुरक्षित रखे हुए थे।

"वाओ! कितना सुंदर गेट सज़ा है! हमारे स्कूल का फ़न-फ़ेअर देखते ही रह जाओगे आप लोग!" वह ऐसे बोला जैसे कि वह यह मेला पहले ही घूम चुका हो या बहुत जानकारी हासिल कर चुका हो।…

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Posted on December 23, 2018 at 5:30pm — 3 Comments

'नव जागृति' (लघुकथा)

ट्रेन की बोगी में वह बालक न तो ख़ुश बैठा हुआ था और न ही दुखी। सजे-धजे किन्नरों से भरी बोगी में, पैसे गिनते हुए एक बुज़ुर्ग किन्नर को वह देख ही रहा था कि एक फेरी वाला मूंगफली बेचता हुआ वहां आया और दो-चार सवारियों को मूंगफलियां बेच कर,पैसे गिन कर उन्हें बाक़ी पैसे लौटाने लगा।

"अरे देखो, यह लंगड़ा और दोनों आंखों से अंधा है, फ़िर भी पैसों का सही हिसाब कर रहा है !" वह बालक बगल में बैठे उस किन्नर से बोल पड़ा, जो उसे समझा-बुझाकर उसके घर से अपने दल में शामिल करने के लिए लाया था उसके…

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Posted on December 3, 2018 at 4:00pm — 5 Comments

Comment Wall (13 comments)

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At 12:50am on October 5, 2018, mirza javed baig said…

आली जनाब शहज़ाद उस्मानी साहिब आदाब, 

मुझे अपनी दोस्तों की फ़ेहरिस्त में जोड़ने का शुक्रिया 

At 6:43am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

"आदरणीय Sheikh Usmani साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर "

At 11:59am on April 12, 2018, MD SHAFIQUE ASHRAF said…

जी बहूत  बहुत शुक्रिया जनाब ... नया हूँ .... थोड़ा सीखने का मौका दीजिये  

At 10:23am on January 8, 2017, Dr Ashutosh Mishra said…
आदरणीय शेख भाई जी आपके मित्रों की सूची में खुद को शामिल पाकर मैं सुखद अनुभूति कर रहा हूँ आपकी लघु कथाएं इस मंच पर मेरे बिशेष आकर्षण का केंद्र है आपकी हर लघु कथा मैं पढता हूँ आपकी कलम सृजन के नए आयाम स्थापित करती रहे ऐसी अपनी शुभकामनाओं के साथ सादर
At 8:23pm on August 5, 2016, pratibha pande said…

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ  आदरणीय उस्मानी जी  ,आपका रचनाकर्म हर दिन नई बुलंदियां छुएँ ,ये कामना करती हूँ 

At 7:30am on June 20, 2016, सुरेश कुमार 'कल्याण' said…
श्रद्धेय शेख शहजाद उस्मानी साहब ये सब तो आप जैसे मित्रों के सहयोग से ही हुआ है और आशा करता हूं कि भविष्य में भी मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे। हृदय की गहराईयों से धन्यवाद ।
At 8:42am on May 24, 2016, महिमा वर्मा said…

आभार आपका आ.शेख उस्मानी सर जी,अभी जानकारी  पूरी नहीं है ,तो आपको जवाब देने में देर हो गई.पुनः आभार आपका .

At 2:11pm on May 1, 2016, pratibha pande said…

मित्रता के लिए आभार 

At 8:41am on November 18, 2015, pratibha pande said…

हार्दिक आभार आपका आदरणीय 

At 9:27am on November 4, 2015, kanta roy said…

देखी वफ़ा-ए-फ़ुरसत-ए-रंज-ओ-निशात-ए-दहर

ख़मियाज़ा यक दराज़ी-ए-उमर-ए-ख़ुमार था---- 

मिर्ज़ा ग़ालिब साहब का ये शेर आज आपके लिए
असीम शुभकामनाएँ आपको आदरणीय शहजाद जी।

 

 
 
 

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"आद0 तस्दीक अहमद खान जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।"
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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post दुर्मिल सवैया
"आद0 फूल सिंह जी सादर अभिवादन। रचना पसंद करने के लिए कोटिश आभार"
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो
"आ. भाई महेंद्र जी, सुंदर गजल हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post जागो उठो हे लाल तुम (मधुमालती छंद)
"आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन। प्रतिक्रिया से नवाजने के लिए आभारी हूँ।"
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Tasdiq Ahmed Khan commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (दिल ने जिसे बना लिया गुलफाम दोस्तो)
"जनाब महेंद्र कुमार साहिब , ग़ज़ल पर आपकी सुंदर प्रतिक्रिया और हौसला अफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया…"
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Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : कैसे बनता है कोई शख़्स तमाशा देखो
"हृदय से आभारी हूँ आदरणीय तेज वीर सिंह जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर."
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Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"लिखना सार्थक रहा आदरणीय अजय जी. बहुत-बहुत शुक्रिया. हार्दिक आभार. सादर."
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Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल : अशआर मेरे जिनको सुनाने के लिए हैं
"बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय तेज वीर सिंह जी. हृदय से आभारी हूँ. सादर."
12 hours ago

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