आदरणीय साथियो,
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शब्द बाण
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संगीत संध्या में दो हजार कुर्सियाँ श्रोताओं से भरी हुई थीं। संगीत में विशेष रुचि न होते हुए भी आयोजकों के आग्रह पर एक हजार सहयोग राशि देकर गंगाराम प्रथम पंक्ति में विराजमान थे।
तीस मिनट देर से मंच पर आते ही एकमात्र प्रौढ़ गायिका ने अलाप लेना प्रारंभ किया। उसकी कुरूपता से गंगाराम कुछ निराश हुए उस पर दस मिनट के अलाप के बाद हिन्दी अरबी फारसी शब्दों के प्रयोग से जब उसने कर्कश स्वर में गाना प्रारंभ किया तो लगा कि कहाँ फँस गए।
तीस मिनट सुनने के बाद बेचैन गंगाराम बाजू में बैठे सज्जन से पूछ बैठे - “बड़े दांत भोंडी नाक और समोसे जैसे मुखड़े वाली ये मोटी काली महिला कौन है ?”
सज्जन सहज भाव से बोले- “ जिसकी इतनी तारीफ की, वो मेरी धर्मपत्नी है।"
गंगाराम की दशा दयनीय हो गई। शब्द बाण वापस ले नहीं सकते। दो मिनट गायिका को ताकते रहे, फिर उस अभागे सज्जन से बोले- “ गरम समोसे के साथ गीत संगीत का आनंद लेंगे, मैं लेकर आता हूँ।”
सज्जन मुस्कुराते रहे, वे समझ गये कि न समोसा आएगा न ही वो बेचारा बेचैन मानव।
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( मौलिक अप्रकाशित )
अनुरोध - कर्कश स्वर को पंचम स्वर पढ़ें ...... धन्यवाद
लघुकथा पर अच्छा प्रयास हुआ है अखिलेश भाई। पढ़ने में रोचक तो है।
विशेष टिप्पणी तो इस विधा के जानकार ही कर पाएंगें। सो उनका इंतज़ार करते है।
बहरहाल, पनाह बधाई।
सादर
सादर नमस्कार मंच। लतीफ़ेनुमा किंतु बहुत ही तंजदार रचना के साथ विषय मुक्त लघुकथा गोष्ठी के नव प्रयोग में सहभागिता हेतु हार्दिक बधाई और आभार आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी। तंज है संगीत में रुचि न होने वाले लोगों को सभा में दर्शक-श्रोता दीर्घा में स्थान देने पर , वो भी अच्छी खासी सहयोग राशि के एवज में। ऐसे लोगों में ऐसे भी होते हैं, जो कलाकार की काया पर ग़ौर करते हैं, प्रतिभा और सभा के अनुशासन पर नहीं। तंज है ऐसे अभद्र शब्द बाणों से अपना ही परिचय देने वाले दर्शक और श्रोता पर। तंज है व्यवस्थापक पर। समापन वाक्य में लेखकीय प्रवेश लगता है। अर्थात समापन वाक्य सही नहीं है लघुकथा विधा के समापन विधान अनुसार। समापन वाक्य जवाबी तंजदार विचारोत्तेजक संवाद से हो, तो बेहतर। नकारात्मक शब्द बाण का जवाब सकारात्मक तीखे शब्द बाण से दिया जा सकता है लघुकथा के तेवर हेतु। तब बढ़िया शीर्षक की सार्थकता भी अधिक हो जायेगी।अन्य सहभागियों की रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी। मैं भी प्रयासरत हूं।
आदरणीय शेख शहजादजी
शास्त्रीय गीत संगीत में रुचि न रखने वाले से अधिकतम सहयोग राशि (चंदा ) जबरदस्ती लोगे और उसकी पसंद का कुछ भी न हो तो अपनी भड़ास कहाँ निकालेगा। और सबसे बड़ी बात गंगारामजी ने जो भी कहा उसमें सच्चाई है। इसीलिए गायिका के पति भी मुस्कुराते रहे। शास्त्रीय राग आधारित कुछ फिल्मी गीत होता तो शायद सहन भी कर लेते। पूरी कथा गंगाराम के नजरिये से लिखी गई है वही नायक है। उसके शब्दों के कारण ही शीर्षक सार्थक हुआ है।
जी, शुक्रिया।
आदरणीय अखिलेश जी
स्वयं के प्रचार प्रसार के लिए इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रमों का चलन साहित्य और कला के क्षेत्रों में आम हो रहा है। इस पर आपने खूब कलम चलाई है। व्यंग्यात्मक शैली लिए आपकी रचना रोचक है। हार्दिक बधाई।
हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी । इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों में आम बात है।
सहयोग राशि किसी अधिकारी के दबाव में दे भी देते हैं तो वे समय का महत्व जानते हैं और आयोजन से दूर ही रहते हैं ।
आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा लिखी है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर
आदरणीय शेख शहजादजी
पूरी कथा और इस कथा का भाव मेरी समझ से बाहर है। गुणीजन ही इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। विद्यालय में रोज ही यही सब होता है तो उस दिन नया क्या हुआ। लो बेटा अब लेना मजे मासाब की सजा में ..... प्राथमिक शाला के बच्चे एक दूसरे को बेटा कहकर संबोधित करते हैं ... आश्चर्य !!
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