For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

प्रदीप देवीशरण भट्ट
  • Male
  • हैदराबाद (तेलांगाना)
  • India
Share

प्रदीप देवीशरण भट्ट's Friends

  • Pratibha Pandey
  • Sheikh Shahzad Usmani
  • Samar kabeer
  • Dr. Vijai Shanker
 

प्रदीप देवीशरण भट्ट's Page

Latest Activity

Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post बिन तेरे
"जनाब प्रदीप जी,आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई ।"
Jan 30
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post पटरियों से सीख
"जनाब प्रदीप जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 30
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted blog posts
Jan 30
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post सहर हो जाएगा
"जनाब प्रदीप देवीशरण भट्ट जी आदाब,अगर ये ग़ज़ल है तो इसके मतले में क़वाफ़ी नहीं हैं,दूसरी बात शीर्षक भी ग़लत है 'सहर हो जाएगा' 'सहर' शब्द स्त्रीलिंग है,देखियेगा ।"
Jan 28
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

सहर हो जाएगा

जिस्म तो नश्वर है, ये मिट जाएगाप्रेम पर अपना अमर हो जाएगा सोच मत खोया क्या तूने है यहाँएक लम्हा भी दहर हो जाएगा माना ये छोटा है पर धीरज तो धरबीज एक दिन ये शजर हो जाएगा भाग्य में जितना लिखा था मिल गयाअपना इसमें भी गुजर हो जाएगा जीस्त बेफिक्री में काटी है मगरमौत का उस पर असर हो जाएगा तिरगी से डर के क्यूँ रहना भलाआज या फ़िर कल सहर हो जाएगा सीख कुछ मेरे तजरबे से ‘प्रदीप’वरना तू भी दर बदर हो जाएगा                     मौलिक व अप्रकाशित…See More
Jan 17
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post हम पंछी भारत के
"आद0 प्रदीप देवी शरण भट्ट जी सादर अभिवादन। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये"
Jan 16
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post हम पंछी भारत के
"शुक्रिया समर जी"
Jan 16
Samar kabeer commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post हम पंछी भारत के
"जनाब प्रदीप देवीशरण भट्ट जी आदाब,ग़ज़ल शिल्प,व्याकरण,बह्र,क़वाफ़ी पर अभी समय चाहती है,बहरहाल इसप्रस्तुति पर बधाई लें ।"
Jan 13
प्रदीप देवीशरण भट्ट posted a blog post

हम पंछी भारत के

जो हैं भूखे यहाँ ठहर जाएँशेष सब संग संग उड़ जाएँकमी नहीं यहाँ पे दानों क़ीहो जो बरसात मेरे घर आएँपेट भरता है चंद दानों सेफ़िर क्यूँ सहरा में घूमने जाएँलोग भारत के बहुत अच्छे हैंख़ुद से पहिले हमें हैं खिलवाएँमार कंकर भगाते हैं बच्चेफिर वही प्यार से हैं बुलावाएँप्रचंड गर्मी में जब तडपते हैंपानी हमको यहीं हैं पिलवाएँखेत खलिहान सौंधी सी ख़ुशबूछोड़ मिट्टी क़ो 'दीप' क्यूँ जाएँ. मौलिक व अप्रकाशित-प्रदीप देवीशरण भट्ट - 08:01:2020See More
Jan 13
Bhupender singh ranawat commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post मनुष्य और पयोनिधि
"Shandaar rachna"
Jan 13
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अमर प्रेम
"समर जी शुक्रिया, मैं अवश्य सज्ञांन (देखिए फिर गडबड हो गई) लूगाँ।"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अमर प्रेम
"शुक्रिया सुरेंद्र जी"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अमर प्रेम
"शुक्रिया लक्ष्मण जी, फोंट की ज़बरदस्त समस्या है टाइप करते करते अपने बदल जाता है, सुझाव के शुक्रिया"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अहसास
"समर जी आभार आपका"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अहसास
"शुक्रिया लक्ष्मण जी"
Jan 9
प्रदीप देवीशरण भट्ट commented on प्रदीप देवीशरण भट्ट's blog post अहसास
"शुक्रिया सुरेंद्र जी"
Jan 9

Profile Information

Gender
Male
City State
हैदराबाद
Native Place
रुडकी (उत्तराखंड)
Profession
Government
About me
Superintendent in KVIC, हैदराबाद

प्रदीप देवीशरण भट्ट's Blog

बिन तेरे

तेरे बिन है घर ये सूना
मेरे मन का कोना सूना
समझो ना ये चार दिनो का
प्यार हमारा काफ़ी जूना*!

घर क़ी देहरी कैसे ये लांघूँ
मैं छलना ना ख़ुद को जानूं
लोगों का तो काम है कहना
मैं तुमको बस अपना मानूं! !

मुझे आस तुम्हारे मिलने क़ी है
और साथ में चलने क़ी है
तब ये सूनापन ना अखरे
बात नज़रिया बदलने क़ी है! !


* पुराना (मराठी शब्द)
- प्रदीप देवीशरण भट्ट - 28:01:2020

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on January 28, 2020 at 3:30pm — 1 Comment

पटरियों से सीख

इक तेरी है इक मेरी है

ढल के आग में ये बनी हैं

जैसे तुम से तुम बने हो

वैसे मैं से मैं भी बनीं हूँ

 

आ चल बैठ यहीं हम देखें

एक दूजे से कुछ हम सीखें

अलग है माना फिर भी संग संग

मिलजुल कर के रहना सीखें

 

शहरों क़ी फिर चकाचौंध हो

जंगल में या कहीं ठौर हो

साथ ना छोडे एक दूजे का

ताप हो कितना या के शीत हो

कहीं हैं सीधी कहीं ये टेढी

दिन हो या हो रात अंधेरी

कर्म पथ से कभी ना डिगती

ना…

Continue

Posted on January 27, 2020 at 1:00pm — 1 Comment

सहर हो जाएगा

जिस्म तो नश्वर है, ये मिट जाएगा

प्रेम पर अपना अमर हो जाएगा

 

सोच मत खोया क्या तूने है यहाँ

एक लम्हा भी दहर हो जाएगा

 

माना ये छोटा है पर धीरज तो धर

बीज एक दिन ये शजर हो जाएगा

 

भाग्य में जितना लिखा था मिल गया

अपना इसमें भी गुजर हो जाएगा

 

जीस्त बेफिक्री में काटी है मगर

मौत का उस पर असर हो जाएगा

 

तिरगी से डर के क्यूँ रहना भला

आज या फ़िर कल सहर हो जाएगा

 

सीख कुछ मेरे…

Continue

Posted on January 16, 2020 at 2:30pm — 1 Comment

हम पंछी भारत के

जो हैं भूखे यहाँ ठहर जाएँ

शेष सब संग संग उड़ जाएँ

कमी नहीं यहाँ पे दानों क़ी

हो जो बरसात मेरे घर आएँ

पेट भरता है चंद दानों से

फ़िर क्यूँ सहरा में घूमने जाएँ

लोग भारत के बहुत अच्छे हैं

ख़ुद से पहिले हमें हैं खिलवाएँ

मार कंकर भगाते हैं बच्चे

फिर वही प्यार से हैं बुलावाएँ

प्रचंड गर्मी में जब तडपते हैं

पानी हमको यहीं हैं पिलवाएँ

खेत खलिहान सौंधी सी ख़ुशबू

छोड़ मिट्टी क़ो 'दीप' क्यूँ…

Continue

Posted on January 9, 2020 at 5:30pm — 3 Comments

Comment Wall

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

  • No comments yet!
 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on Sushil Sarna's blog post मीठे दोहे :
"बहुत सुन्दर मौलिक दोहे एक सार्थक संदेश देते हुए । हार्दिक बधाई आदरणीय "
4 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"ओबीओ परिवार के सभी सदस्यों को ओबीओ की 10 वीं सालगिरह की ढेरों बधाई और शुभकामनाएँ ...."
4 hours ago

सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"अपने ओबीओ परिवार के सभी सदस्यों को ओबीओ की 10 वीं सालगिरह की ढेरों बधाई और शुभकामनाएँ ...."
4 hours ago
Manan Kumar singh commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(शोर हवाओं....)
"आभार आदरणीय।"
14 hours ago
vijay nikore posted blog posts
17 hours ago
Sushil Sarna posted blog posts
17 hours ago
Sushil Sarna replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"ओबीओ परिवार के सभी सदस्यों को ओबीओ की 10 वीं सालगिरह की ढेरों बधाई और शुभकामनाएँ ...."
18 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post कोरोना पर कुछ दोहे :
"आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन पर आपकी स्नेहाशीष का दिल से शुक्रिया।"
18 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post कोरोना पर कुछ दोहे :
"आदo   Dayaram Methani जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।"
18 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post समय :
"आदo  कंवर करतार  जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।"
18 hours ago
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएँ :
"आदo Rachna Bhatia जी सृजन पर आपकी मनोहारी प्रशंसा का दिल से आभार।"
18 hours ago
Rachna Bhatia commented on Sushil Sarna's blog post क्षणिकाएँ :
"वाह वाह वाह शानदार क्षणिकाएँ। आदरणीय सुशील सरना जी हार्दिक बधाई।"
yesterday

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service