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प्रदीप देवीशरण भट्ट's Blog (34)

दिल का कोना

दिल के बदले दिया तुमने खिलौना

नहीं खाली था शायद दिल में कोना

ये माना हमने तुम सबसे हंसी हो

मगर सोना तो फ़िर भी होता सोना

ना तुम वादा करो मिलने का कोई

बड़ा मुश्किल है अब तो बाट जोहना…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 19, 2019 at 1:30pm — No Comments

बेटी बचाओ बेटी पढाओ

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ 

सिर्फ़ एक नारा भर नहीँ है

कुछ करके दिखाना भी है

एक क़दम मैंने बढाया है

एक क़दम तुम भी ढ़ा

झिझको मत ठहरो मत

आगे बढो और पढाओ…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 17, 2019 at 5:30pm — 1 Comment

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा पर विशेष

 

गुरु कृपा हो जाए तो सफ़ल सिद्ध हों काम ।

कृपा हनू पर रखते हैं जैसे सियापति  राम॥

 

राम कहें शंकर गुरु ,भोले कहें श्रीराम।

दोनों ही सर्वज्ञ हैं, मैं जाऊं काकै…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 16, 2019 at 4:00pm — 1 Comment

अपने आप में

"यदि तुम्हें

उससे प्रेम है अनंत!

तो तुम स्वीकार

क्यूँ नहीं करते।

 

क्यूँ नहीं देख पाते

उसकी आंखों का सूनापन

जहाँ बरसों से नही बरसी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 9, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

नादान बशर

दर्दों गम से हर कोई बेजार है,

हादसों की हर तरफ़ दीवार है।

 

बिक रहे हैं वो भी जो अनमोल हैं,

 कैसे नादानों का ये बाज़ार हैं।

 

सब्र अब सबका चुका लगता मुझे,

हर बशर लड़ने को बस तैय्यार है।

 

पल में तोला पल में माशा मत बनो,

ये भी जीने का कोई आधार है।

 

मुफलिसी के मारे लगते हैं सभी,

फ़िर भी ये लगते नहीं लाचार हैं।

 

जिसके हाथों में हैं ज्यादा पुतलियाँ,

उनकी ही उतनी बड़ी सरकार…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 4, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

ज़ीस्त

ज़ीस्त को मुझसे है गिला देखो

जी रहा हूँ मैं हौसला देखो

साथ रहते हैं एक छत के तले

दरम्याँ फिर भी फासला देखो

तुम जिधर जा रहे हो बेखुद से

वहीं आयेगा जलजला देखो

सँभाल ही लूँगा मरासिम…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on July 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

मेंरी लाडली

जब तू पैदा हुई थी

तो मैं झूम के नाचा था

मेरी गोद में आकर

जब तूने पलकें झपकाई

मैंने अप्रतिम प्रसन्नता क़ो

अनुभव किया था

फ़िर तू शनै शनै

बेल की तरह बड़ी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on June 24, 2019 at 11:30am — 1 Comment

-ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार-

ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार

बंद करो ये अत्याचार

नज़रो में वहशत है पसरी

जीना बच्चों का दुश्वार

शहर नया हर रोज़ हादसा

क्यूँ चुप बैठी है सरकार

नज़र गड़ाए बैठे हैं फूल पर …

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on June 18, 2019 at 3:00pm — 3 Comments

माँ भी बोझ लगती है

बोझ उठाती हैअकेली माँ कई बच्चोँ का

कई बच्चोँ को मगर माँ भी बोझ लगती है

 

लहू से सींचकर जिसको बडा किया उसको

बहु के साथ ही रहने में मौज लगती है…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on May 30, 2019 at 3:00pm — No Comments

श्वान  का दर्द

जब से शहर में चुनाव का बिगूल बज गया

श्वान का भी श्वान से खौफ निकल गया

शोर और सिर्फ शोर मच रहा सुबह शाम

पांच साल बाद नेता को पडा जनता से काम

  

श्वान हैरान परेशान घूमता रहता इधर उधर…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 4, 2019 at 11:00am — 4 Comments

पथ के पथगामी-

नारी तो केवल है नारी है    

नर भी तो केवल है नर      

दोनोँ के विचार अलग हैं

दोनोँ के किरदार अलग

ना इसका कुछ हिस्सा ज्यादा

ना ही उसका है कुछ कम

 

कभी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on April 2, 2019 at 6:30pm — 4 Comments

"रिश्तोँ की घुटन"

 

भीड भरे रस्ते पे एक दिन,

बरसोँ पुराना दोस्त मिला । 

चेहरे से मुस्कान थी गायब,

स्वर भी कुछ रुखा सा मिला । । 

 

मैंने पूछा कैसे हो तुम,

वो बोला कुछ ठीक नहीं । 

मैंने पूछा और हाल-ए-इश्क,

सोच के बोला ली भीख नही । । 

 

उसके इस उत्तर से अचम्भित,

ठिठक  गया  मैं  चलते-चलते । 

फिर काँधे पे हाथ रख पूछा,

किसी से नहीं क्या मिलते-जुलते…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on March 30, 2019 at 7:00pm — 6 Comments

शहीदों का युवाओँ से संवाद- 23 मार्च शहीदी दिवस पर विशेष

हम तो कहीँ और नहीँ गये हैं बच्चोँ,

अभी भी मौज़ूद हैं ह्म तुम्हारे अंदर   

ज़ुल्म को देखकर भी चुपचाप कैसे बैठे हो,

क्या धधकता नहीं है ज्वाला तुम्हरे अंदर । ।

 

 हर इक शय में सियासत भरी हुई है…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on March 29, 2019 at 3:00pm — 1 Comment

गांव का युवा और शहर के गिद्ध

माँ की लोरी सुनकर सोने वाला शिशु,

बाप की उंगली पकड चलने वाला शिशु,

दादी नानी से नये किस्से सुनने वाला शिशु,

खिलौने के लिए बाज़ार में मचलने वाला शिशु।

बडा हो…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on March 27, 2019 at 1:30pm — 2 Comments

मैं एक स्त्री भी हूँ

"अंतर्रष्ट्रिय  महिला दिवस पर विशेष"

सिर्फ माँ बहन पत्नी बेटी की,

परिभषा में मत उल्झओ

सबसे पहले मैं एक स्त्री हूँ,

मुझे मेरा सम्मन दिलवाओ।।

 

सिर्फ वंश…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on March 8, 2019 at 11:30am — 2 Comments

अपबे वतन में बेघर

अपने वतन में बेघर का दर्द क्या जानो

जिन्होने लूटा है खसूटा उनको पहचानो

मेहनत मज़दूरी की तो जी गये बच्चे

संस्कार मिले थे बुजुर्गो से हमें भी अच्छे

लुट गये लेकिन हथियार उठाया ना कभी

वतन पे जान देने का है इरादा अब भी…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on February 18, 2019 at 6:00pm — 2 Comments

"मरघट के कपोत"

मनुज पशु पक्षी और जंतु,

एक ही सबका जीवन दाता,

धनी हो या फिर निर्धन कोई,

मरघट अंतिम ही सुख् दाता ।

भोर से लेकर सांझ तलक शव,

मरघट में आते रह्ते हैं,

चंद्न लकडी घी पावक मिल,

भस्म उसे करते रहते हैं ।

मूषक पिपिलिका कपोत उपाकर,

व्रीही खाकर जीवीत रहते हैं,

दूषित समझ मनुज जो छोडे,

वो जल पी जीवीत रहते हैं ।

उचित अनुचित तो ये भी जाने,

मनुज के मन को भी पहचाने,

पाप पुण्य का ज्ञान…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on February 4, 2019 at 12:30pm — 4 Comments

"अज़ीम शख़्स की दास्तां"

जब वो कहता है तो वो कहता है 

रोक पाता नहीं उसे कोई , 

उसके आगे ना रंक, राजा है , 

कंठ में कोयल सा उसके वासा है ॥ 

जब भी कहता है सच ही कहता है 

जैसे बच्चा हृदय में रहता है , 

उसके…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on January 4, 2019 at 1:00pm — 8 Comments

"आजकल"

आजकल कोई बुलाता भी नहीं।

आजकल मैं भी कहीं जाता नहीं

आजकल हर ओर है बदली फिज़ा

आजकल गायब है चेहरे से गीज़ा॥

 

आजकल कुछ भी सुहाता ही नहीं।

आजकल मैं गुनगुनाता भी नहीं

आजकल बदले हुए हालात हैं

आजकल मैं मुस्कुराता भी नहीं॥

 

आजकल बेकार है सब कोशिशें।

आजकल हैं लग रही बस बंदिशें

आजकल अपने ही छलते हैं यहाँ

आजकल हैं सब बहुत बस परेशां॥

 

आजकल वादों की ही भरमार है।

आजकल गैरों के सर पे हाथ…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 30, 2018 at 4:00pm — 2 Comments

"अहसास"

ज़िंदगी दी है खुदा ने,मुस्कुराने के लिए

भूलना लाज़िम है तुमको,याद आने के लिए

 

बेखयाली मे कदम फ़िर, खींच लाये है मुझे

मैं नहीं आया किसी का, दिल चुराने के लिए

 

यूँ ही मिल जाए कोई फ़िर, क़द्र करता ही…

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Added by प्रदीप देवीशरण भट्ट on November 21, 2018 at 1:00pm — 3 Comments

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