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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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सुचिसंदीप अग्रवालl and बृजेश कुमार 'ब्रज' are now friends
Jan 7
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं
"बह्र-ए-मीर पर "ग़ज़ल की कक्षा" में जनाब अजय तिवारी साहिब का आलेख मौजूद है,उसका अध्यन करें ।"
Jan 6
राज़ नवादवी commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं
"आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' साहब, आदाब. सुंदर ग़ज़ल की प्रस्तुति पे  मुबारकबाद क़ुबूल  करें. साथ ही. जो बातें जनाब  समर कबीर साहब ने इंगित की हैं उनका संज्ञान लेकर लाभान्वित हों. सादर. "
Jan 6
बृजेश कुमार 'ब्रज' posted a blog post

ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं

बह्र ए मीर अब तक रहे भटकते उजड़े दयार में अब कौन बसा आन दिले बेक़रार मेंजिस रास्ते पे  उनकी मन्ज़िलें  नहीं उस  राह में  खड़े  हैं  इन्तज़ार  मेंबेकार  हर सदा है कितना पुकारता ये कौन सो रहा है गुमसुम मज़ार मेंउस फूल को ख़िज़ायें ले के कहाँ गईं जिस फूल को चुना था लाखों हजार मेंऐ मीत इस कदर भी मत आज़मा मुझे आ जाये न कमी 'ब्रज' के ऐतबार में (मौलिक एवं अप्रकाशित) बृजेश कुमार 'ब्रज'See More
Jan 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं
"देर से आने के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ आदरणीय समर कबीर जी..दरअसल ये ग़ज़ल पोस्ट करने का एक कारण ही यही कि थोडा शंका समाधान हो..ये मापनी सबसे सरल कही जाती है लेकिन मुझ जैसे नए लोगों के लिए इसे समझना वाकई मुश्किल है।हालाँकि ग़ज़ल के नजरिये से इसकी तकती'…"
Jan 4
Samar kabeer commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं
"जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब,इस ग़ज़ल की एक बार तक़ती'करके देखिये, क्या आपको ठीक लगती है?"
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post गीत-युगों से जुदा हैं नदी के किनारे-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"आदरणीय गिरधारी सिंह जी सादर अभिवादन स्वीकार करें..."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on क़मर जौनपुरी's blog post गज़ल - प्यार को वो आज़माना चाहता है
"वाह खूब ज़नाब जौनपुरी जी..आदरणीय समर जी की इस्लाह काबिले तारीफ है.."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ८९
"वाह आदरणीय राज साहब बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है..."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल (रब से कीजिए दुआएं नए साल में)
"वाह बहुत ही खूब आदरणीय तस्दीक़ जी.."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on amita tiwari's blog post चुनौती नए साल
"वाह अच्छी रचना महोदया..."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Naveen Mani Tripathi's blog post आप गुजरेंगे गली से तो ये चर्चा होगा
"वाह जी वाह आदरणीय बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है..."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post नव वर्ष के दोहे
"वाह वाह आदरणीय बहुत ही उत्तम दोहे.."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सूबे सिंह सुजान's blog post नज़्म - नया साल
"वाह बहुत ही सुन्दर रचना..बधाई"
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on PHOOL SINGH's blog post मैं गलती का पुतला हूँ
"अच्छी रचना के लिए बधाई आदरणीय.."
Jan 3
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post नववर्ष पर हाइकु - [हाइकु]/शेख़ शहज़ाद उस्मानी :
"बढ़िया आदरणीय उस्मानी जी.."
Jan 3

Profile Information

Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं

बह्र ए मीर
अब तक रहे भटकते उजड़े दयार में
अब कौन बसा आन दिले बेक़रार में

जिस रास्ते पे  उनकी मन्ज़िलें  नहीं
उस  राह में  खड़े  हैं  इन्तज़ार  में

बेकार  हर सदा है कितना पुकारता
ये कौन सो रहा है गुमसुम मज़ार में

उस फूल को ख़िज़ायें ले के कहाँ गईं
जिस फूल को चुना था लाखों हजार में

ऐ मीत इस कदर भी मत आज़मा मुझे
आ जाये न कमी 'ब्रज' के ऐतबार में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on January 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

गीत-युगों से जुदा हैं नदी के किनारे-बृजेश कुमार 'ब्रज'

उन्हें कौन पूछे उन्हें कौन तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

उदासी उदासी उदासी घनेरी

विरह वेदना प्रीत की है चितेरी

अँधेरे खड़े द्वार पे सिर झुकाये

तभी रात ने स्वप्न इतने सजाये

उसी रात को छल गये चाँद तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

लगी रात की आँख भी छलछलाने

अँधेरा मगर बात कोई न माने

क्षितिज पे कहीं मुस्कुराया सवेरा

तभी रूठ कर चल दिया है अँधेरा

नजर रोज सुनसान राहें बुहारे

युगों से जुदा हैं नदी के…

Continue

Posted on December 21, 2018 at 4:30pm — 10 Comments

गीत...दीप कहाँ से लाऊँ

इस गीत के साथ ओबीओ परिवार के सभी मनीषियों को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

सारा जग उजियारा कर दे

दीप कहाँ से लाऊँ

अंधकार ने फन फैलाया

मैला हर इक मन है

सूरज भी गुमसुम सा बैठा

विस्मित नील गगन है

मन को मनका मोती कर दे

सीप कहाँ से लाऊँ

सारा जग उजियारा कर दे

दीप कहाँ से लाऊँ

गली गली में घूमे रावण

हर घर में इक लंका

प्यार मुहब्बत भाईचारा

मिटने की आशंका

कण कण राम बिराजें ऐसा

द्वीप…

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Posted on November 6, 2018 at 11:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल...ले ली मेरी जान सलीके से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वो बैठा दिल में आन सलीके से

फिर ले ली मेरी जान सलीके से

यूँ ही पहले थोड़ी सी बात हुई

बन बैठे फिर अरमान सलीके से

पल भर को पहलू में आओ चन्दा

इतना तो कर अहसान सलीके से

काफी है पलकों का उठना गिरना

तू नैन कटारी तान सलीके से

दिल की दुनिया लूट गईं दो आँखें

फिर होती हैं हैरान सलीके से

कोने की उस जर्जर अलमारी में

रख छोड़े कुछ अरमान सलीके से

जिनको थी लाज बचानी कलियों की

बन…

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Posted on October 25, 2018 at 5:00pm — 18 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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