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C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"
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C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"'s Page

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C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" commented on Samar kabeer's blog post तरही ग़ज़ल, जनाब निलेश 'नूर' साहिब की नज़्र
""तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि ये शब-ए-हिज्राँकिसी ग़रीब का करके शिकार गुज़री है"वाह ! वाह ! बहुत खूब !! उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद कुबूल करें आदरणीय  Samar kabeer जी | "
May 21
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" commented on गिरिराज भंडारी's blog post ग़ज़ल - जाने किस किस से तेरी अनबन हो ( गिरिराज भंडारी )
"उम्दा ग़ज़ल कही है भाई | हार्दिक बधाई आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी। "
May 21
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" commented on rajesh kumari's blog post इश्क में खुद जाँ लुटाने आ गए (ग़ज़ल 'राज')
""मुट्ठियों में वो नमक रखते तो क्या  जख्म हमको भी छुपाने आ गए"वाह वाह ! बहुत खूब ! शानदार ग़ज़ल | हार्दिक बधाई आदरणीया  rajesh kumari जी  ......."
May 21
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 73 in the group चित्र से काव्य तक
"श्री  Tasdiq Ahmed Khan जी ,आपको मेरे छंद पसंद आए इसके लिए आपका हार्दिक आभार | मेरा लेखन कर्म सफल हुआ |"
May 19
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 73 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीया  Rajesh Kumari जी  आप जैसी गुणी कवयित्री और समीक्षक से छंदों की प्रशंसा पाकर मन गदगद है | आपका हार्दिक आभार महोदया | मेरा लेखन कार्य सफल हुआ | "
May 19
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 73 in the group चित्र से काव्य तक
"श्री  Mohammed Arif जी ,आपको मेरे छंद पसंद आए इसके लिए आपका हार्दिक आभार | मेरा लेखन कर्म सार्थक हुआ |"
May 19
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 73 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय  Saurabh Pandey जी,  मुझे दुःख है कि मैं एक अरसे के बाद इस सुरभित पटल पर आ पाया हूँ | इसका कारण आजकल ट्रेड यूनियन में बहुत अधिक व्यस्तता है | संभवतः आपको जानकारी हो कि मैं राष्ट्रीय स्तर पर रेलवे की मान्यता प्राप्त फेडरेशन…"
May 19
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 73 in the group चित्र से काव्य तक
""ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव " अंक-73   (1) सार छंद  छन्न पकैया छन्न पकैया, आजा घूँघट वारी  सैर कराऊँ मंसूरी की,  मैं दिल वाला प्यारी    छन्न पकैया छन्न पकैया, बुझा प्यास तू मोरी  मैं…"
May 19
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" joined Admin's group
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चित्र से काव्य तक

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोंत्सव" में भाग लेने हेतु सदस्य इस समूह को ज्वाइन कर ले |See More
May 19
Samar kabeer commented on C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"'s blog post ग़ज़ल
"जनाब शून्य आकांक्षी जी आदाब,पहली बार आपकी ग़ज़ल से रूबरू हुआ हूँ । ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,इसके लिये बधाई स्वीकार करें,मिसरे लय में हैं मगर बयान साफ़ नहीं,इस तरफ़ ध्यान दीजियेगा । इस मंच पर ग़ज़ल के साथ बह्र लिखने का नियम है,आगे से ध्यान रखियेगा ।"
Sep 25, 2016
PRAMOD SRIVASTAVA commented on C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"'s blog post ग़ज़ल
"सुन्दर रचना ।परन्तु सत्कर्म ओढ़े और बजबजाते का सम्बन्ध  खटक  रहा है। "
Sep 24, 2016
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" posted a blog post

ग़ज़ल

उजाड़े हैं हमारे घर, चले शकुनी के पासे हैं . तुम्हारे हाथ में हंटर, हुकुम हम तो बजाते  हैं .  हमारी बेटियाँ, बहिनें तुम्हें जायदाद लगती हैं,हमारा लुट रहा सब कुछ, मगर हम ही लजाते हैं .  इधर जयघोष शंकर का, उधर अल्लाह-ओ-अकबर,सुना दोनों तरफ दागी, तुम्हारी ही कृपा से  हैं .  अँधेरा हँस रहा रौशन अनाचारी, दुराचारी,निशा उपभोग करते हैं, दिवस जी भर सताते  हैं .  बढ़ाते तेज कदमों को, उड़ाते धूल राहों की,सुखों की रोशनी खातिर, कोई छप्पर जलाते  हैं .  धवल शब्दों में लिपटी सोच बदबू से भरी मैली,तुम्हें क्या फर्क…See More
Sep 24, 2016
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" commented on C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"'s blog post दोहे
" डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी,आपको दोहे अच्छे लगे, यह जानकर प्रसन्नता हुई । आपका हार्दिक धन्यवाद । "
Sep 24, 2016
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" commented on Saurabh Pandey's blog post यार, ठीक हूँ, सब अच्छा है ! (नवगीत) // --सौरभ
"सुन्दर व प्रवाहमान सार्थक नवगीत के लिए बधाई स्वीकार कीजिएगा श्री Saurabh Pandey जी । आप सच में हर विधा के सच्चे और अच्छे कवि हैं । यह नवगीत सचमुच बहुत सुन्दर बन पड़ा है । फिर भी एक जगह मैं विद्यार्थी के रूप में आपसे जानना चाहता हूँ :"…"
Sep 24, 2016
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" replied to Saurabh Pandey's discussion छन्दों के प्रति उत्कट आग्रह के साथ सतत क्रियाशील रहना कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है in the group पुस्तक समीक्षा
"काव्य-संग्रह : ’कुण्डलिया कानन’ तथा ’कुण्डलिया संचयन’  की सारगर्भित समीक्षा के लिए आपका आभार ।  - शून्य आकांक्षी "
Sep 3, 2016
C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" joined Admin's group
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पुस्तक समीक्षा

इस ग्रुप में पुस्तकों की समीक्षा लिखी जा सकती है |
Sep 3, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
Kota, Rajasthan
Native Place
Mathura
Profession
Retired from Indian Railways
About me
Reading & Writing Literature.

C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi"'s Blog

ग़ज़ल

उजाड़े हैं हमारे घर, चले शकुनी के पासे हैं . 
तुम्हारे हाथ में हंटर, हुकुम हम तो बजाते  हैं . 
 
हमारी बेटियाँ, बहिनें तुम्हें जायदाद लगती हैं,
हमारा लुट रहा सब कुछ, मगर हम ही लजाते हैं . 
 
इधर जयघोष शंकर का, उधर अल्लाह-ओ-अकबर,
सुना दोनों तरफ दागी, तुम्हारी ही कृपा से  हैं . 
 
अँधेरा हँस रहा रौशन अनाचारी, दुराचारी,
निशा उपभोग करते हैं, दिवस जी भर सताते  हैं…
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Posted on September 23, 2016 at 11:30pm — 2 Comments

दोहे

लिखो किसी भी शिल्प में, मोटा लिखो महीन । 
कलम चले पर इस  तरह, पीड़ित  करे यकीन ॥01॥  
  
रिश्तों   के   पर्वत  किए,  हरियाली   से  हीन । 
चाह   रहा   शीतल  हवा,  कैसा   मूरख  दीन ॥02॥  
 
बंधन   तो  था  जनम  का, हुआ बीच में भंग । 
कैसे   चलता   दूर   तक, धुंध - धूप का  संग ॥03॥   
 
पश्चिम  की आँधी  चली,  भूले  पनघट  गीत । 
गमलों…
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Posted on September 24, 2014 at 9:00pm — 11 Comments

दोहे (शून्य आकांक्षी)

दोहे 
घुला कुदरती रंग  में, मौसम  का  उल्लास । 

धूप  गुलाबी  टहलती,  हरी - हरी  है  घास ॥1॥ 



हवा  बिखेरे  हर  तरफ, देखो  प्रेम - गुलाल । 

प्रकृति गा रही फाग है, करतीं दिशा धमाल ॥2॥ 



होली   समरसता   तथा,  सद्भावों   का  पर्व । 

सामूहिकता  को  निरख, परम्परा  पर  गर्व ॥3॥ 



नहीं  बुरा  पीछे  भ्रमण, गर कोई नहिं रुष्ट । 

जाएँ  उसी  अतीत  में,  वर्तमान   हो  पुष्ट ॥4॥ 



वैर  और  ईर्ष्या  जले,  पले  हृदय…
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Posted on March 13, 2014 at 11:30pm — 14 Comments

कुण्डलिया छन्द

(1)
झेला   हमने   इसलिए,  हर  काँटे   का  दंश । 
ताकि चमन में खिल सकें, फूलों के सब वंश ॥ 
फूलों  के   सब   वंश,  महक   वे   सारे  पाएँ । 
गुलशन का हर द्वार, प्यार से जो  खटकाएँ ॥ 
कहें  'शून्य' कविराय, लगे खुशियों का मेला । 
पाएँ  सब  आनंद,  कष्ट  इस  कारण  झेला ॥ 
 
(2)
सपनों  में  यह  गगन भी, तभी बजाए शंख । 
दीप  जला  हो  आस का, हों  साहस के पंख ॥
हों…
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Posted on February 2, 2014 at 11:00pm — 13 Comments

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At 3:49pm on March 14, 2014, Omprakash Kshatriya said…

शून्य आकांक्षी जी जोरदार दोहों के लिए मेरी बधाई स्वीकार करे 

 
 
 

कृपया ध्यान दे...

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