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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल..गैरो से जा महबूब मिले
"आदरणीय तेजवीर जी बहुत बहुत आभार.."
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल..गैरो से जा महबूब मिले
"हार्दिक आभार आदरणीय धामी जी.."
Mar 4
TEJ VEER SINGH commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल..गैरो से जा महबूब मिले
"हार्दिक बधाई आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी।बेहतरीन गज़ल।"
Mar 4
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल..गैरो से जा महबूब मिले
"आ. भाई बृजेश जी, सुंदर गजल हुयी है। हार्दिक बधाई ।"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on मिथिलेश वामनकर's blog post गीत- मिथिलेश वामनकर
"गीत तो बहुत ही शानदार हुआ है आदरणीय मिथिलेश जी..शब्दों का चयन और भावो का सम्प्रेषण कमाल है...हालाँकि कथ्य से सहमत और असहमत हुआ जा सकता है।यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post साँझ होते  माँ  चौबारे  पर  जलाती  थी दीया -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल )
"वाह खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय..मतले के सानी में "लोगो" की जगह कोई और शब्द नहीं किया जा सकता क्या?जैसे प्यारी तितलियाँ.."
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post फ्रोज़न माइंड ( लघुकथा)
"बढ़िया भावो से ओतप्रोत लघुकथा है आदरणीया"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ''s blog post मुख़्तलिफ़ हमने यहाँ सोच के पहलू देखे (३३ )
"बहुत ही खूब ग़ज़ल कही है आदरणीय..वाकई में बेमिसाल"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on TEJ VEER SINGH's blog post समाधान - लघुकथा -
"बहुत बढ़िया ढंग से आपने अपने विचार रखें हैं लघुकथा में आदरणीय..बधाई"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Ravi Shukla's blog post तरही ग़ज़ल फ़िराक़ साहब के मिसरे पर
"खूबसूरत ग़ज़ल कही है आदरणीय शुक्ला जी बधाई"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on डॉ छोटेलाल सिंह's blog post अभिनन्दन
"बढ़िया रचना आदरणीय डा. साहब.."
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post यादें - गजल ( लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' )
"बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आदरणीय..वाह"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on indravidyavachaspatitiwari's blog post जाम का झाम
"एक अच्छा विषय समेटने की कोशिस की है आपने लघुकथा में..थोड़ी कसावट की दरकार है.."
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on KALPANA BHATT ('रौनक़')'s blog post ज़हरीली हवा (कविता)
"उम्दा भावप्रण कविता के लिए बधाई आदरणीया"
Mar 4
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Tanweer's blog post तरही ग़ज़ल (मुझको ये भी न था मालूम किधर जाना था)
"बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही है ज़नाब तनवीर जी.."
Mar 4

Profile Information

Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल... जिस रास्ते पे उनकी मन्ज़िलें नहीं

बह्र ए मीर
अब तक रहे भटकते उजड़े दयार में
अब कौन बसा आन दिले बेक़रार में

जिस रास्ते पे  उनकी मन्ज़िलें  नहीं
उस  राह में  खड़े  हैं  इन्तज़ार  में

बेकार  हर सदा है कितना पुकारता
ये कौन सो रहा है गुमसुम मज़ार में

उस फूल को ख़िज़ायें ले के कहाँ गईं
जिस फूल को चुना था लाखों हजार में

ऐ मीत इस कदर भी मत आज़मा मुझे
आ जाये न कमी 'ब्रज' के ऐतबार में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on January 3, 2019 at 2:30pm — 4 Comments

गीत-युगों से जुदा हैं नदी के किनारे-बृजेश कुमार 'ब्रज'

उन्हें कौन पूछे उन्हें कौन तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

उदासी उदासी उदासी घनेरी

विरह वेदना प्रीत की है चितेरी

अँधेरे खड़े द्वार पे सिर झुकाये

तभी रात ने स्वप्न इतने सजाये

उसी रात को छल गये चाँद तारे

युगों से जुदा हैं नदी के किनारे

लगी रात की आँख भी छलछलाने

अँधेरा मगर बात कोई न माने

क्षितिज पे कहीं मुस्कुराया सवेरा

तभी रूठ कर चल दिया है अँधेरा

नजर रोज सुनसान राहें बुहारे

युगों से जुदा हैं नदी के…

Continue

Posted on December 21, 2018 at 4:30pm — 10 Comments

गीत...दीप कहाँ से लाऊँ

इस गीत के साथ ओबीओ परिवार के सभी मनीषियों को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

सारा जग उजियारा कर दे

दीप कहाँ से लाऊँ

अंधकार ने फन फैलाया

मैला हर इक मन है

सूरज भी गुमसुम सा बैठा

विस्मित नील गगन है

मन को मनका मोती कर दे

सीप कहाँ से लाऊँ

सारा जग उजियारा कर दे

दीप कहाँ से लाऊँ

गली गली में घूमे रावण

हर घर में इक लंका

प्यार मुहब्बत भाईचारा

मिटने की आशंका

कण कण राम बिराजें ऐसा

द्वीप…

Continue

Posted on November 6, 2018 at 11:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल...ले ली मेरी जान सलीके से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

वो बैठा दिल में आन सलीके से

फिर ले ली मेरी जान सलीके से

यूँ ही पहले थोड़ी सी बात हुई

बन बैठे फिर अरमान सलीके से

पल भर को पहलू में आओ चन्दा

इतना तो कर अहसान सलीके से

काफी है पलकों का उठना गिरना

तू नैन कटारी तान सलीके से

दिल की दुनिया लूट गईं दो आँखें

फिर होती हैं हैरान सलीके से

कोने की उस जर्जर अलमारी में

रख छोड़े कुछ अरमान सलीके से

जिनको थी लाज बचानी कलियों की

बन…

Continue

Posted on October 25, 2018 at 5:00pm — 18 Comments

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At 6:59pm on October 24, 2017, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

स्वागत है आदरणीय ,  आपको मित्र के रूप में पाना मेरा सौभाग्य है .

At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

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