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बृजेश कुमार 'ब्रज'
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post जो चाहेगा वो हंस लेगा - डॉo विजय शंकर
"अच्छा कटाक्ष है आदरणीय..सादर"
Wednesday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- किसे गुरेज़ जो दो-चार झूठ बोले है,
"आदरणीय नीलेश जी एक और शानदार ग़ज़ल..सादर नमन करते हुए उत्सुकतावश पुंछ रहा हूँ..मतले की पहली पंक्ति में दो चार झूट बोले है या बोले हैं होना चाहिए..या शायद उस इंसान की बात हो रही जो झूट बोले है.."
Wednesday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप''s blog post तरही गजल (मुहब्बत में अगर कोई कभी बीमार हो जाये)
"वाह आदरणीय सुरेन्द्र जी वाह.. एक से बढ़कर एक शे'र लाजबाब ग़ज़ल हुई..सादर"
Wednesday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Anuraag Vashishth's blog post घनेरे पेड़ पर है चाँद और हम छत पर बैठे हैं - अनुराग
"वाह आदरणीय अनुराग जी बहुत बेहतरीन ग़ज़ल कही है..सादर"
Wednesday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Samar kabeer's blog post तरही ग़ज़ल, जनाब निलेश 'नूर' साहिब की नज़्र
"वाह वाह बताऊँ,कैसे शब-ए-इन्तिज़ार गुज़री है मेरे हवास पे होकर सवार गुज़री है..बेमिसाल यही तो होता है हर शब हमारे सीने पर ग़मों की फ़ौज बनाकर क़तार गुज़री है..क्या कहने आदरणीय अनुकरणीय..हर एक शे'र बेहतर से बेहतर..सादर"
Sunday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post माँ
"आहा..कितने खूबसूरत भावों की समावेश किया है रचना में..बेहतरीन सादर"
Sunday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल--शम अ रोशन करो मुहब्बत की
"बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आदरणीय..सादर"
Sunday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"आदरणीय अनुराग जी सादर अभिवादन स्वीकार करें..आपने एक नया नजरिया प्रदान किया है ग़ज़ल को..इस दिशा में मैं सोच ही नहीं पाया..सादर आभार"
May 20
Anuraag Vashishth commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"आ. बृजेश जी, बहुत खूब! पिछली ग़ज़ल और इसमें ज़मीन-आसमान का फर्क है.  'बड़े खूंरेज कातिल हो जलाया खूब इन्सां को' इस मिसरे में 'खूब' के प्रयोग से एक व्यंग का भाव पैदा होता है.यह हिंसा का खूबी के तौर पर स्वीकार नहीं है. इसलिए…"
May 20
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल....रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ
"बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी..सादर"
May 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"आदरणीय नीलेश जी सादर अभिवादन स्वीकार करें..आपकी सलाह सर्वथा उचित है..बुंदेलखंड में अधिक या बहुत जयादा के लिए खूब का प्रयोग करते हैं..मैंने वही अर्थ ले लिया लेकिन ये मेरी गलती है..खूब का मतलब गुणवत्ता से है..चौथे शे'र में भी कुछ सुधार करता…"
May 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"आदरणीय गिरिराज जी सादर अभिवादन..आदरणीय आपका इशारा तीसरे शे'र की तरफ है..चौथा शे'र 'निवाले हैं..जीने में'..सादर"
May 19
Nilesh Shevgaonkar commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"आ. बृजेश जी,अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई ... जलाया खूब इन्सां को.. में ख़ूब का प्रयोग ठीक नहीं है ... क्यूँ की हिंसा ख़ूबी के तौर पर कवि ह्रदय स्वीकार नहीं कर पाता ..न सर पे आशियाँ जिनके न खाने को निवाले हैंउन्हें क्या फर्क पड़ता है यूँ मरने और जीने…"
May 19

सदस्य कार्यकारिणी
गिरिराज भंडारी commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"आदरणीय बृजेश भाई ... अच्छी ग़ज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ , चौथे शेर में जैसे  और  में   ,      में दोष नही आ रहा है ...  में , अनुस्वार के साथ है  और से  बिना अनुस्वार के । मेरे ख्याल से बदलने की…"
May 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"चौथे शे'र में रादिफेन दोष है कुछ अच्छा कर सकूँ कोशिश कर रहा हूँ.."
May 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में
"आदरणीय विजय जी बहुत बहुत आभार..सादर"
May 19

Profile Information

Gender
Male
City State
noida
Native Place
jhansi

बृजेश कुमार 'ब्रज''s Blog

ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में

1222 1222 1222 1222

उठा लो हाथ में खंज़र लगा दो आग सीने में

धरा है क्या नजाकत में नफासत में करीने में



बड़े खूंरेज कातिल हो जलाया खूब इन्सां को

जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में



उठी लहरें हजारों नागिनें फुफकारती जैसे

न कोई बच सका जिन्दा समंदर में सफीने में



न सर पे आशियाँ जिनके न खाने को निवाले हैं

उन्हें क्या फर्क पड़ता है यूँ मरने और जीने में



हुये मशहूर किस्से जब अदाए कातिलाना के

सहेजूँ किस तरह तुमको अँगूठी के नगीने… Continue

Posted on May 18, 2017 at 8:05pm — 13 Comments

ग़ज़ल....रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

2122 2122 2122 212

रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

हौसलों का क्या करूँ चीने जबीं का क्या करूँ



रंग लाती ही नहीं अश्कों दफ़न की कोशिशें

आँख में आती नज़र रंजो ग़मी का क्या करूँ



​​रो रही है रात गुमसुम चाँद तारे मौन है

आग अंतस में लगाये चाँदनी का क्या करूँ



ओढ़ चादर कोहरे की कपकपाते होंसले

हर कदम पे थरथराते आदमी का क्या करूँ



हों इरादे आसमां तो जुगनुओं से रोशनी

आप घर खुद ही जलाये रोशनी का क्या करूँ



गुनगुनायें… Continue

Posted on May 14, 2017 at 11:52am — 20 Comments

हिन्दी ग़ज़ल...जब सूर्य चले अस्ताचल को

22 22 22 22
जब सूर्य चले अस्ताचल को
गहराय तिमिर घेरे तल को

इक दीप जलाओ अंतस में
जगमग कर दो भूमण्डल को

आवाज बनो तुम गूंगों की
तूफान बना दो हलचल को

जब चलना है, तो साथ चलें
पग से नापें नभ जल थल को

दुःख दुनिया का पी लेंगें 'ब्रज'
रक्खो तैयार हलाहल को
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on May 9, 2017 at 7:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल...कई शम्स उसने सँभाले हुये हैं

122 122 122 122
कई शम्स उसने सँभाले हुये हैं
वो जिसके करम से उजाले हुये हैं

चला जो सदा सत्य की लौ जलाये
उसी शख्स के पांव छाले हुये हैं

ये जिनकी तपिश से जले आशियाने
वो मुददे नहीं बस उछाले हुये हैं

कहीं दूध मेवा कहीं आदमी को
बमुश्किल मयस्सर निवाले हुये हैं

विसाले सनम के हसीं ख्वाब दिल से
कई साल पहले निकाले हुये हैं
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Posted on May 4, 2017 at 6:38pm — 15 Comments

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At 11:43pm on November 17, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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