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देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२
****
तीर्थ  जाना  हो  गया  है सैर जब
भक्ति का हर भाव जाता तैर जब।१।
*
देवता फिर दोस्त होंगे क्यों भला
आदमी  का  आदमी से बैर जब।२।
*
दुश्मनो की क्या जरूरत है कहो
रक्त  के  रिश्ते   हुए  हैं  गैर जब।३।
*
तन विवश है मन विवश है आज भी
क्या करें  हम  मनचले  हों  पैर जब।४।
*
सोच लो कैसा  समय  तब सामने
मौत मागे  जिन्दगी  की  खैर जब।५।
*
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on Saturday

आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 13, 2026 at 11:15pm

आपने कहे को सस्वर किया इस हेतु धन्यवाद, आदरणीय 

//*फिर को क्यों करने से "क्यों " का दोहराव होरहा है। इसकी जगह यह कैसा रहेगा सुझाइए -//

मेरा आशय फिर और क्यों के बीच अदला-बदली से था - देवता फिर दोस्त होंगे क्यों भला 

शुभ-शुभ

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 10, 2026 at 12:02pm

आ. भाई सौरभ जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और विस्तृत टिप्पणी से मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार।
मिसरों में सुधार का प्रयास किया है मार्गदर्शन कीजिए।


//तीर्थ जाना  हो  गया है सैर जब
भक्ति का यूँ भाव जाता तैर जब।१।  ..........   सानी पर तनिक और समय दिया जाना था//
इसे इस प्रकार किया है-
*भाव जाता भक्ति का बस तैर जब*

//देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला  .............    फिर को ’क्यों’ किया जाना और उचित होता ...///
*फिर को क्यों करने से "क्यों " का दोहराव होरहा है। इसकी जगह यह कैसा रहेगा सुझाइए -
-देवता भी दोस्त होंगे क्यों भला


//तन विवश है मन विवश है आज यूँ .......   ..   उला का ’यूँ’ से समाप्त होना सानी में किसी बानगी की अपेक्षा करता है.//
इसे इस प्रकार किया है-
*तन विवश है मन विवश है आज भी*


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 7, 2026 at 4:46pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, 

तीर्थ जाना  हो  गया है सैर जब
भक्ति का यूँ भाव जाता तैर जब।१।  ..........   सानी पर तनिक और समय दिया जाना था 
*
देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला  .............    फिर को ’क्यों’ किया जाना और उचित होता ... 
आदमी  का  आदमी से बैर जब।२।
*
दुश्मनो की क्या जरूरत है भला  ...... ........  भला को ’कहो’ किया जाय तो सम्प्रेषणीयता अवश्य ही और अधिक बढ़ जाएगी 
रक्त  के  रिश्ते  हुए  हैं  गैर जब।३।
*
तन विवश है मन विवश है आज यूँ .......   ..   उला का ’यूँ’ से समाप्त होना सानी में किसी बानगी की अपेक्षा करता है. 
क्या करें हम  मनचले  हों पैर जब।४।
*
सोच लो कैसा  समय  तब सामने 
मौत मागे  जिन्दगी  की  खैर जब।५।  .......    एक अच्छे शे’र के लिए बधाई .. 

शुभ-शुभ

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