2122 1212 22
आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में
क्या से क्या हो गए महब्बत में
मैं ख़यालों में आ गया उस की
हो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में
मुझ से मुझ ही को दूर करने को
आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में
तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं
चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में
चाट कर के अफीम मज़हब की
मरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में
ए ग़रीबी है शुक्रिया तेरा
जो भी सीखा है सीखा ग़ुर्बत में
मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
आदरणीय Jaihind Raipuri जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें।
/आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में/
आदरणीय ये मिस्रा बहर में नहीं है। "शब-ए" का वज़न 12 होता है। इसे "शाम-ए-फ़ुर्क़त कहने से मिस्रा सहीह हो जाएगा।
2122 / 1212 / 22
/तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं/
जी "जाते" में "जा" का मात्रा पतन नहीं किया जा सकता। "कोई", "मेरा", "तेरा" वगैरह को छोड़ कर, केवल शब्द के आखिरी दीर्घ अक्षर को ही गिराकर 1 मात्रिक किया जा सकता है। "तुम ख़्यालों में यूँ हो आ जाते"
/चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में/
"चीन ज्यूँ आ गया था तिब्बत में"
/चाट कर के अफीम मज़हब की/
अफ़ीम
सादर
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