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Afroz 'sahr'
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"आदरणीय कालीपद प्रसाद जी लफ़्ज़ "सैराब" का अर्थ होता है,,, "तृप्त", जिसकी प्यास बाक़ी न रही हो,"
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Afroz 'sahr' commented on Mohammed Arif's blog post जाड़े के दोहे
"जनाब आरिफ़ साहिब आपके दोहों ने सर्दी में गर्मी का एहसास करा दिया बहुत बधाई आपको,,,,"
15 hours ago
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"आदरणीय संतोष जी अच्छी ग़ज़ल हुई है मेंरी और से बहुत बधाई आपको,,"
yesterday
Afroz 'sahr' commented on rajesh kumari's blog post इश्क़ करने की चलो आज सजा हो जाए (ग़ज़ल 'राज')
"आदरणीय राजेश कुमारी साहिबा ख़ूबसूरत ग़ज़ल है शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद पेश कता हूँ।,,,"
Tuesday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आली जनाब समर कबीर साहिब गज़ल को अपना बेश क़ीमती वक़्त देने,  ख़ाकसार की हौसला अफ़ज़ाई ,और आपके मुफ़ीद मश्विरे का दिल की अमीक़ गहराईयों से शुक्रिया अदा करता हूँ।,,,,,सादर,,,,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय शेख़ शहजा़द उस्मानी जी ग़ज़ल में आपकी शिरकत और सुख़न नवाज़ी पर आपका दिल की गहराईयों से मश्कूर ओ मम्नून हूँ ,,,,,,,,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय सतविन्द्र जी ग़ज़ल को वक़्त  और मान देने पर आपका मश्कूर हूँ।,,,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणिया प्रतिभा पांडे जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नवाज़ी का मश्कूर ओ मम्नून हूँ,,,,,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय डा. गोपाल नारायण जी ग़ज़ल को मान देने के लिए आपका मश्कूर हूँ।,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय छोटेलाल सिंह जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नवाज़ी का शुक्रिया,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय सुरेश कुमार कल्याण जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नवाज़ी का शुक्रिया"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय सतविन्द्र जी प्रदत्त विषय पर बहुत ही सुंदर कुण्डलिया छंद बधाई आपको,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय सुशील सरना जी अति सुंदर अति सुंदर,,,बधाई"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणिया प्रतिभा पांडे जी प्रदत्त विषय पर बहुत ही सटीक एवं सफल  इस सुंदर प्रस्तुति पर मेंरी और से बहुत बधाई,,,"
Saturday
Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
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Afroz 'sahr' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-86
"आदरणीय ब्रजेन्द्र नाथ जी ग़ज़ल में शिरकत और सुख़न नवाजी़ पर आपका मश्कूर हूँ।,,,,"
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Afroz 'sahr''s Blog

ग़ज़ल,,,,इशारों का साथ दो,,,,,,,

221/2121/1221/212



है इख़्तियार तुमको बहारों का साथ दो।

लेकिन कभी तो दर्द के मारों का साथ दो।।



गर हैं निजात के लिए दरकार नेकियाँ।

डोली उठाने वाले कहारों का साथ दो।।



बाहम वो मिल सके न जो सारी हयात में।

मजबूर बेक़रार कनारों का साथ दो।।



तुम इन उदासियों की रिदाओं को चीर कर।

दिलकश हसीन शौख़ नजारों का साथ दो।।



ये वक़्त का तकाजा़ है दानाइ भी यही।

रक्खो ज़ुबान बंद इशारों का साथ दो।।



मिट्टी के ढेर हैं ये फ़कत और… Continue

Posted on December 4, 2017 at 1:36pm — 20 Comments

ग़ज़ल,,,,भीगी पलकों पे कई ख़्वाब,,

2122/1122/1122/22/112



अश्क़ आँखों में यूँ बेताब हुआ करते हैं

भीगी पलकों पे कई ख़्वाब हुआ करते हैं।



जिनकी क़ीमत ही नहीं लोगों की नज़रों में कोई

रब की नज़रों में वो सुरख़ाब हुआ करते हैं।



जो भी रखते हैं बुज़ुर्गों की रिवायत का भरम

लोग दुनिया में वो नायाब हुआ करतें हैं।



ख़ुश्क फूलों की तरह मुझको समझने वालों

गुल में ख़ुश्बू के कई बाब हुआ करते हैं।



तुहमतें गैरों पे साज़िश की लगाने वाले

तेरे दुश्मन तेरे एहबाब हुआ करते… Continue

Posted on November 7, 2017 at 1:00pm — 20 Comments

ग़ज़ल,,,,में अपनी हसरतें,,,,,

1222/1222/1222/1222



जो सच हो ही नहीं सकता वो सपना छोड़ आया हूँ

में अपनी हसरतें सहरा में तंहा छोड़ आया हूँ।



ख़िरद ने जबसे जोड़ा है हक़ीकत से मेंरा रिश्ता

तख़य्युल को ख़लाओं में भटकता छोड़ आया हूँ।



ज़रूरत मुझको ले कर आ गई परदेस में लेकिन

में अपने घर में इक पुतला अना का छोड़ आया हूँ।



सबब जिसके हुए जाते थे अपने ही मेंरे दुश्मन

वो चाँदी छोड़ दी मैंने वो सोना छोड़ आया हूँ।



वो इक लम्हा जो गफ़लत में तेरी चाहत के बिन… Continue

Posted on October 17, 2017 at 7:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल: फूंकने को इसे बिजलियाँ आगईं

212/212/212/212



याद तुमने किया हिचकियाँ आगईं

दिल की तस्कीन को सिसकियाँ आगईं।



ज़ेर ए तामीर था ये नशेमन मेंरा

फू़ंकने को इसे बिजलियाँ आगईं।



तू नहीं आसका हाल तेरा मगर

लेके अख़बार की सुर्ख़ियाँ आगईं।



जब तड़प कर गुलों ने पुकारा उन्हें

लब हसीं चूमने तितलियाँ आ गईं।



गर्म साँसों की औढ़ा दो मुझको रिदा

लौट कर फिर वो ही सर्दियाँ आ गईं।



चाह दिल में तेरे वस्ल की जब जगी

लम्स तेरा लिये चिट्ठियाँ आ गईं।…

Continue

Posted on October 11, 2017 at 5:30pm — 6 Comments

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At 2:29pm on September 12, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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