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इक तेरी है इक मेरी है

ढल के आग में ये बनी हैं

जैसे तुम से तुम बने हो

वैसे मैं से मैं भी बनीं हूँ

 

आ चल बैठ यहीं हम देखें

एक दूजे से कुछ हम सीखें

अलग है माना फिर भी संग संग

मिलजुल कर के रहना सीखें

 

शहरों क़ी फिर चकाचौंध हो

जंगल में या कहीं ठौर हो

साथ ना छोडे एक दूजे का

ताप हो कितना या के शीत हो

कहीं हैं सीधी कहीं ये टेढी

दिन हो या हो रात अंधेरी

कर्म पथ से कभी ना डिगती

ना करती कभी तेरी मेरी

 

हम एक दूजे का हाथ पकड लें

जो टूटे ना वो विश्वास पकड लें

हम हर मुश्किल में साथ रहेगें

गर बाहों का हम पाश पकड लें! !

- प्रदीप देवीशरण भट्ट - 27-01-2020

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on January 30, 2020 at 5:36pm

जनाब प्रदीप जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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"आदरणीया रचना भाटिया जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई हैं हार्दिक बधाई स्वीकार करें !"
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