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Dr. Vijai Shanker
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Dr. Vijai Shanker commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post ढूँढा सिर्फ निवाला उसने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"खुद औरों के कन्धे पर चढ़कहता बोझ सँभाला उसने।३। बहुत सुन्दर प्रस्तुति , बधाई , आदरणीय लक्षमण धामी मुसाफिर जी , सादर।"
Jan 23
Dr. Vijai Shanker commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सब कुछ है अब यार सियासी- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)
"देश का पहिया जाम पड़ा हैदौड़ रही बस कार सियासी।६।बहुत सटीक विवेचन। बधाई, आदरणीय लक्षण धामी मुसाफिर जी, सादर।"
Jan 7
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर
"आदरणीय सुरेंद्र नाथ सिंह कुशक्षात्रप जी, बहुत बहुत हार्दिक आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
Dec 30, 2020
नाथ सोनांचली commented on Dr. Vijai Shanker's blog post दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर
"आद0 डॉ विजय शंकर जी सादर अभिवादन। बेहतरीन लघु कविताएँ हुई हैं । बधाई स्वीकार कीजिये"
Dec 30, 2020
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर
"आदरणीय समर कबीर साहब, नमस्कार , आपकी उपस्थिति और सार्थक टिप्पणी के लिए आभार , शुभकामनाओं के लिए हार्दिक धन्यवाद , सादर।"
Dec 24, 2020
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर
"आदरणीय लक्षमण धामी मुसाफिर जी , आपकी प्रेरक सद्भावनाओं के लिए आभार एवं बधाई के लिए धन्यवाद , सादर।"
Dec 24, 2020
Samar kabeer commented on Dr. Vijai Shanker's blog post दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर
"जनाब डॉ. विजय शंकर जी आदाब, दोनों कविताएँ बहुत उम्द: हुई हैं, इस शानदार प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Dec 21, 2020
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर
"आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन । उत्तम लघुकथाएँ हुई हैं ।हार्दिक बधाई ।"
Dec 17, 2020
Dr. Vijai Shanker posted a blog post

दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर

( एक ) लोग राजनीति में बड़े - बड़े बदलाव लाने के लिए आते हैं। सत्ता में आते ही कद-काठी , डील-डौल , रंग-रूप , वाणी , पहनावा सब बदल जाते हैं , सबसे बड़ी बात , चेहरे - मोहरे और इरादे तक बदल जाते हैं। ( दो ) वह गतिमान है , चलते रहना उसकी प्रकृति। वह समय है , गुजर जाता है। पर अतीत को छोड़ जाता है , और छोड़ जाता है , अतीत के अवशेष, धरोहरें, स्मृतियाँ , स्मारक , कहानियां। समय प्रति क्षण चलायमान रहता है , एक सा नहीं रहता है , बदलता रहता है। पर अतीत के सामने वह भी विवश रहता है , उसे…See More
Dec 17, 2020
Dr. Vijai Shanker commented on amita tiwari's blog post मोल भाव मत करना
"आदरणीय सुश्री अमिता तिवारी जी , मार्मिक रचना के लिए बधाई , सादर"
Dec 17, 2020
Dr. Vijai Shanker commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post अन्नदाता के लिए -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी , बधाई ग़ज़ल के लिए , सादर।"
Dec 17, 2020
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय ब्रजेश कुमार ब्रज जी , ह्रदय से आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
Dec 13, 2020
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर
"अच्छी सटीक कविता है डॉ साहब..."
Dec 12, 2020
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी , नमस्कार , रचना को स्वीकार करने और मान देने के लिए आपका ह्रदय से आभार। मुबारकबाद के लिए धन्यवाद , सादर।"
Dec 6, 2020
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Dr. Vijai Shanker's blog post कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर
"जनाब डॉ.विजय शंकर जी आदाब, शानदार नसीहत पेश की है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।"
Dec 5, 2020
Dr. Vijai Shanker commented on Dr. Vijai Shanker's blog post कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर
"आदरणीय लक्षमण धामी मुसाफिर जी , रचना पर आपकी उपस्थिति एवं सार्थक टिप्पणी के लिए आभार एवं धन्यवाद , सादर।"
Dec 5, 2020

Profile Information

Gender
Male
City State
UP
Native Place
Allahabad
Profession
Retired
About me
Educationist

.जिंदगी तुझे ही पढ़ लेते हैं ---डा० विजय शंकर

चलो किताबों को बंद कर देते हैंजिंदगी तुझे ही सीधे-सीधे पढ़ लेते हैं .किताबों में सबकुझ तेरे बारे में ही तो हैलो , तुझसे ही सीधे-सीधे बात कर लेते हैं.किताबें तो बहुत सी हैं , मिल भी जायेंगींउन को पढ़ लूँ तो क्या तू मिल जायेगी .मौत को कितने और कौन-कौन पढ़ते हैंपर उसका वादा है , सबको मिलती है .भरोसा नहीं , तू किसको मिले , कितनी मिलेतेरे लिये , तेरे चाहने वाले दिन रात लगे रहते हैं .अरे सब कुछ तो तेरे लिए ही है जिंदगी मेंतू है तो सब है , तू नहीं तो क्या है जिंदगी में .इसलिए चलो किताबों को बंद कर देते हैं .तू है , तुझसे सीधे-सीधे बात कर लेते हैं ...डा० विजय शंकर---------------( मौलिक और अप्रकाशित )

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At 7:54pm on August 31, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय डॉ. विजय शंकर जी प्रणाम! बहुत बहुत शुक्रिया आपको मेरी प्रथम लघुकथा अच्छी लगी आपने अपना अमूल्य समय निकाला और जो हौसला बढ़ाया उसका ह्रदय से आभार आपका स्नेहभाव सदा यूँ ही बना रहे!
At 5:38pm on January 1, 2017, Mohammed Arif said…
आदरणीय डॉ.विजय शंकर मेहताजी सकारात्मक सोच को उद्घरित करती रचना के लिए बधाई । नव वर्ष मंगलमय हो !
At 4:58pm on November 5, 2015, Abid ali mansoori said…

देर से ही सही.. हर्दिक आभार आपका आदरणीय विजय शंकर जी!

At 10:23pm on November 4, 2015, Abid ali mansoori said…

Haardik abhaar aapka!

At 3:46pm on July 1, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर,

आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

At 7:50pm on June 3, 2015, Tanuja Upreti said…
आभार आदरणीय
At 7:28pm on May 4, 2015, Seema Singh said…
आभार सर मार्गदर्शन के लिए
At 8:35am on April 17, 2015, Mohan Sethi 'इंतज़ार' said…

आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी आप का हार्दिक आभार ....मंगलकामनाएँ...सादर  

At 6:57am on January 18, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, निवेदन स्वीकार करने के लिए आभार...

विद्यार्थी की मुक्त कंठ प्रशंसा आपका बड़प्पन और आपके हृदय की विशालता का प्रमाण है.

आपका  स्नेह और आशीर्वाद  सदैव मिलता रहे, इसके लिए सदैव प्रयास करता रहूँगा. नमन 

At 10:51pm on January 15, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आदरणीय डॉ विजय शंकर सर, आभार, धन्यवाद.... आप लोगो के स्नेह और आशीर्वाद से ही मंच पर सक्रिय हो पाता हूँ. आपका आभार हार्दिक धन्यवाद 

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दो लघु कवितायें —डॉo विजय शंकर

( एक )

लोग राजनीति में बड़े - बड़े

बदलाव लाने के लिए आते हैं।

सत्ता में आते ही कद-काठी ,

डील-डौल , रंग-रूप , वाणी ,

पहनावा सब बदल जाते हैं ,

सबसे बड़ी बात , चेहरे - मोहरे

और इरादे तक बदल जाते हैं।



( दो )

वह गतिमान है ,

चलते रहना उसकी प्रकृति।

वह समय है , गुजर जाता है।

पर अतीत को छोड़ जाता है ,

और छोड़ जाता है ,

अतीत के अवशेष, धरोहरें,

स्मृतियाँ , स्मारक , कहानियां।

समय प्रति क्षण चलायमान…

Continue

Posted on December 17, 2020 at 9:30am — 6 Comments

कौन हो तुम — डॉo विजय शंकर

ओजस्वी तेजस्वी

से दिखाई देते हो ,

अपनी जयकार से

आत्म मुग्ध लगते हो।

आईने में खुद को

रोज ही देखते हो ,

क्या खुद को

कुछ पहचानते भी हो।

बड़े आदमी हो , बहुत बड़े ,

लोग तुम्हें जानते हैं ,

बच्चे सामान्य ज्ञान के लिए

तुम्हारा नाम रटते और जानते हैं ,

रोज कितने ही लोग तुम्हारी ड्योढ़ी

पर खड़े रहते हैं , टकटकी लगाए ,

कितने आदमी तुमसे रोज ही

मिलने के लिए आते रहते हैं ,

तुम भी कभी किसी से

आदमी की तरह मिलते हो…

Continue

Posted on December 4, 2020 at 11:28am — 8 Comments

क्षणिकाएं — डॉ0 विजय शंकर

वाह जनतंत्र ,

कुर्सी स्वतंत्र ,

आदमी परतंत्र।

कल कुर्सी पर था

तो स्वतंत्र था ,

आज हट गया ,

परतंत्र हो गया।........... 1.

किसी को भी कहीं भी

यूं ही बुरा बोल देते हो।

सच , किसी बुरे को भी

कभी बुरा बोल लेते हो।...........2.

कुछ कर न कर

दूसरे के काम में

दखल जरूर कर।

अच्छा बोल , बुरा

बोल , कैसा भी बोल,

शहद में लपेट कर बोल l.......... 3.

मौलिक एवं…

Continue

Posted on October 28, 2020 at 6:57am — 8 Comments

नसीब — डॉo विजय शंकर

एक उम्र भर हम
लोगों को समझते रहे।
हालातों को समझते रहे ,
दोनों से समझौता करते रहे ,
दुनिया में समझदार माने गए।
बस अफ़सोस यह ही रहा ,
हमें कोई ऐसा मिला ही नहीं ,
या नसीब में था ही नहीं ,
जिसे हम भी समझदार मानते
और हम भी समझदार कहते।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on July 20, 2020 at 10:31pm — 2 Comments

 
 
 

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