For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

atul kushwah
Share

Atul kushwah's Friends

  • somesh kumar
  • harivallabh sharma
  • Dr. Vijai Shanker
  • Yamit Punetha 'Zaif'
  • kalpna mishra bajpai
  • sakhi singh
  • MUKESH SRIVASTAVA
  • Poonam Priya
  • savitamishra
  • शकील समर
  • DR. HIRDESH CHAUDHARY
  • sunita dohare
  • गिरिराज भंडारी
  • Vasundhara pandey
  • Sulabh Agnihotri
 

atul kushwah's Page

Profile Information

Gender
Male
City State
gwalior
Native Place
kannauj up
Profession
journalist
About me
journalist n poet

atul kushwah's Photos

  • Add Photos
  • View All

Atul kushwah's Blog

मुल्क भी हैरान है ऐसा मदारी देखकर...

एक करतब दूसरे करतब से भारी देखकर

मुल्क भी हैरान है ऐसा मदारी देखकर,

 

जिनके चेहरे साफ दिखते हैं मगर दामन नहीं

शक उन्हें भी है तेरी ईमानदारी देखकर,

 

उम्रभर जो भी कमाया मिल गया सब खाक में

चढ गया फांसी के फंदे पर उधारी देखकर,

 

मुल्क में हालात कैसे हैं पता चल जाएगा

देखकर कश्मीर या कन्याकुमारी देखकर,

 

सर्द मौसम है यहां तो धूप भी बिकने लगी

हो रही हैरत तेरी दूकानदारी देखकर,

 

इस…

Continue

Posted on November 16, 2016 at 5:00pm — 16 Comments

गजल: दिल में ठहरा कोई ख्वाब सा रह गया..

दिल में ठहरा कोई ख्वाब सा रह गया

मैं उसे उम्रभर चाहता रह गया,

उसके जैसा कोई भी दिखा ही नहीं

जिसकी तसवीर मैं देखता रह गया,

शाम होते ही वो याद आने लगा

फिर उसे रातभर सोचता रह गया,

मुझसे मिलने वो आया बहुत दूर से

मैं शहर में उसे ढूंढता रह गया,

उसके बारे में अब याद कुछ भी नहीं

हां मगर याद उसका पता रह गया,

थी वो तकदीर शायद किसी और की

मैं दुआ में जिसे मांगता रह गया।।

.

# अतुल…

Continue

Posted on September 2, 2016 at 6:00pm — 3 Comments

वो सर पर हाथ रखकर सौ बलाएं टाल देती है..

- गजल के चार मिसरे - 
घर से जब भी निकलूं मां हमेशा मेरे थैले में
मैं जो कुछ भूल जाता हूं वो चीजें डाल देती है,
न जाने कौन सी जादूगरी है मां के हाथों में
वो सर पर हाथ रखकर सौ बलाएं टाल देती है।।

-----------

 - मुक्तक - 

सुहानी शाम हो जब खूबसूरत, याद रहती है

हर—इक इंसान को अपनी जरूरत याद रहती है
मोहब्बत में कसम—वादे—वफा हम भूल सकते हैं,
मगर ताउम्र हमको एक सूरत याद रहती है।।

.
 मौलिक व अप्रकाशित (अतुल कुशवाह)

Posted on January 4, 2016 at 5:30pm — 2 Comments

वो मुझे देखकर मुस्कराती रही..

मैं उसे देखकर मुस्कराता रहा,

वो मुझे देखकर मुस्कराती रही।

उस कहानी का किरदार मैं ही तो था,

जो कहानी वो सबको सुनाती रही।।

मैं चला घर से मुझ पर गिरीं बिजलियां

बदलियां नफरतों की बरसने लगीं,

बुझ न जाए दिया इसलिए डर गया

देखकर आंधियां मुझको हंसने लगीं,

दुश्मनी जब अंधेरे निभाने लगे

रोशनी साथ मेरा निभाती रही,

मैं उसे देखकर मुस्कराता...

प्यास तुमको है तुम तो हो प्यासी नदी

एक सागर को क्या प्यास होगी भला,

हां अगर तुम…

Continue

Posted on February 12, 2015 at 10:00pm — 14 Comments

Comment Wall (5 comments)

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

At 2:11am on July 31, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें.

At 9:40pm on January 29, 2015, sunita dohare said…

अतुल जी, नमस्कार आपका स्वागत है 

At 11:03pm on October 28, 2014, somesh kumar said…

sukriya,

At 8:09am on June 22, 2014, जितेन्द्र पस्टारिया said…

आपकी मित्रता का स्वागत है आदरणीय अतुल जी

सादर!

At 7:02pm on February 19, 2014, annapurna bajpai said…

हमारे ओबीओ परिवार मे एम मित्र मंडली मे स्वागत है आपका । 

 
 
 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"रामनगर एक्सप्रेस  ****************एक का नाम तो अब्दुल्ला ही था पर दूसरे का दीवाना नहीं था। पर…"
2 minutes ago
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post आख़िर नुक़सान हमारा है
"हार्दिक आभार आपका"
24 minutes ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"आदाब। हार्दिक स्वागत आदरणीय। मानवेतर लघुकथा चंद प्रतीकों में कहते हुए बहुत से मुद्दे उभारे गये हैं…"
51 minutes ago
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"                सवाल तब हवा भी कैद थी। बलिष्ठ बाहों में…"
1 hour ago
रवि भसीन 'शाहिद' commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post माइल नहीं हुआ (ग़ज़ल)
"आदरणीय समर कबीर साहब, बहुत बहुत शुक्रिया आपके मेहर-ओ-करम का।"
1 hour ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"आदाब। वास्तव में आप एक बढ़िया लघुकथा कहने जा रहे थे, लेकिन विवरण अधिक हो गया। बहुत बढ़िया कथानक व…"
1 hour ago
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"आदाब। रचना पढ़कर लगभग हर पाठक को अपने अनुभव याद हो आयेंगे। ऐसे ही आत्मविश्वासी दृढसंकल्पित दिव्यांग…"
1 hour ago
VIRENDER VEER MEHTA replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"विषय पर प्रस्तुति तो अच्छी हुयी है भाई तेज वीर सिंह जी, लेकिन जैसा कि आदरणीय योगराज सर ने कहा, मैं…"
1 hour ago
VIRENDER VEER MEHTA replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"बेहतरीन लघुकथा आदरणीय बागी सर।  सफर विषय को छू कर निकलती यह रचना विकलांग विषय और विकलांगों की…"
1 hour ago
VIRENDER VEER MEHTA replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-59 (विषय: सफ़र)
"प्रदत्त विषय पर अच्छी प्रस्तुति हुयी उस्मानी भाई। अंत में कहा गया वाक्य //"केवल नंगों का वार…"
2 hours ago
Samar kabeer commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दिल्ली जलती है जलने दे - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"//कब कहता हूँ आम आदमी मुझको अपने पैसे देहो सकता है तुझ से कुछ तो कुर्वानी में बच्चे दे।।दिल्ली जलती…"
2 hours ago
Samar kabeer commented on रवि भसीन 'शाहिद''s blog post माइल नहीं हुआ (ग़ज़ल)
"// ये दिल इबादतों पे क्यूँ माइल नहीं हुआ     मुनकिर न था तो क्यूँ भला क़ाइल नहीं…"
2 hours ago

© 2020   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service