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बसंत कुमार शर्मा
  • Male
  • जबलपुर, मध्यप्रदेश
  • India
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vijay nikore commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post हो गए - ग़ज़ल
"बहुत ही सुन्दर गज़ल के लिए बधाई, मित्र बसंत कुमार जी।"
Sunday
Rakshita Singh commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post हो गए - ग़ज़ल
"आदरणीय बसंत जी नमस्कार,  बहुत ही सुंदर रचना बहुत बहुत बधाई ।"
Saturday
Samar kabeer commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post हो गए - ग़ज़ल
"जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत उम्द: ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।"
Saturday
बसंत कुमार शर्मा posted a blog post

हो गए - ग़ज़ल

मापनी २१२*4 चाहते हम नहीं थे मगर हो गएप्यार में जून की दोपहर हो गए हर कहानी खुशी की भुला दी गईदर्द के सारे किस्से अमर हो गए खो गए आपके प्यार में इस कदरसारी दुनिया से हम बेखबर हो गए प्रेम के यज्ञ में हो गया सब हवनमंत्र जो थे सभी बेअसर हो गए जो कभी थे बड़े खूबसूरत महलदेखते देखते खंडहर हो गए कह दिया आपने जो हुआ सो हुआआँसुओं से नयन तरबतर हो गएसुर्ख़ियों में रहे रोज अख़बार की  वक़्त के साथ बासी खबर हो गए"मौलिक एवं अप्रकाशित" See More
Jun 17
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"आदरणीय   vijay nikore जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार "
May 30
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"आदरणीय  Hardam Singh Maan जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार "
May 30
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"आदरणीय   dandpani nahak जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार "
May 30
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"आदरणीय   Anamika singh Ana जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार "
May 30
बसंत कुमार शर्मा commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी सादर नमस्कार, आपकी हौसला अफजाई के लिए हृदय से आभार "
May 30
vijay nikore commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"गज़ल अच्छी लगी। बधाई, मित्र बसंत कुमार जी।"
May 30
Hardam Singh Maan commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"बहुत खूब"
May 26
dandpani nahak commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"जब मिला आदमी में मिला आदमी वाह क्या कहने भुत उम्दा! आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी"
May 26
Anamika singh Ana commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"वाह ! उम्दा ग़ज़ल हेतु  सादर बधाई  ।"
May 25
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"आ. भाई बसंत जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।"
May 25
बसंत कुमार शर्मा posted a blog post

आदमी - ग़ज़ल

है कहाँ फूल जैसा खिला आदमीहो गया है ग़मों का किला आदमी मंदिरों, मस्जिदों में रहे ढूँढते  जब मिला आदमी में मिला आदमी गाँठ दिल में लगी तो खुली ही नहींभूल पाया न शिकवा-गिला आदमी भीड़ में जब गया भीड़ का हो गयाबन गया आजकल काफ़िला आदमी दौड़ कर मिल रहा था गले कल तलकतख्त पाकर कहाँ फिर हिला आदमी सुर्ख़ियों में रहा गुम गया एक दिनएक चलता हुआ सिलसिला आदमी"मौलिक एवं अप्रकाशित"See More
May 24
बसंत कुमार शर्मा commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सजती चुनाव में यहाँ जब तस्तरी बहुत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्षण धामी साहब -सादर नमस्कार , काफियों में नवीनता और उनका सटीक निर्वाह, आनंद आ गया , बधाई हो आपको  "
Apr 30

Profile Information

Gender
Male
City State
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
Native Place
धौलपुर
Profession
भारतीय रेल यातायात सेवा
About me
बोन्साई एवं कविता लेखन में रूचि

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हो गए - ग़ज़ल

मापनी २१२*4 

चाहते हम नहीं थे मगर हो गए

प्यार में जून की दोपहर हो गए

 

हर कहानी खुशी की भुला दी गई

दर्द के सारे किस्से अमर हो गए

 

खो गए आपके प्यार में इस कदर

सारी दुनिया से हम बेखबर हो…

Continue

Posted on June 17, 2019 at 11:56am — 3 Comments

आदमी - ग़ज़ल

है कहाँ फूल जैसा खिला आदमी

हो गया है ग़मों का किला आदमी

 

मंदिरों, मस्जिदों में रहे ढूँढते  

जब मिला आदमी में मिला आदमी

 

गाँठ दिल में लगी तो खुली ही नहीं

भूल पाया न शिकवा-गिला आदमी

 …

Continue

Posted on May 24, 2019 at 10:07am — 10 Comments

सभी कुछ बता दिया - ग़ज़ल

मापनी २२१२ १२१ १२२ १२१२ 

हमने रखा न राज़ सभी कुछ बता दिया

खिड़की से आज उसने भी परदा हटा दिया

 

बंजर जमीन दिल की’ हुई अब हरी-भरी

सींचा है उसने प्रेम से’ गुलशन बना दिया

 

जज्बात मेरे’ दिल के’ मचलते चले…

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Posted on April 19, 2019 at 9:00pm — 3 Comments

पलकों पे ठहर जाता है - ग़ज़ल

मापनी - 2122, 1122,1122, 22(112)

 

दूर साहिल हो भले, पार उतर जाता है

इश्क में जब भी कोई हद से गुज़र जाता है

 

है तो मुश्किल यहाँ तकदीर बदलना लेकिन    

माँ दुआ दे तो मुकद्दर भी सँवर जाता है  

 

हमसफ़र साथ रहे कोई…

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Posted on April 15, 2019 at 9:30am — 6 Comments

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At 2:23pm on September 28, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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