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Usha Awasthi
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कहें किससे व्यथा ?

तुम हुए जो व्यस्त अभिभावक कहें किससे व्यथा? हो गए कितने अकेले  क्या तुम्हे यह भी पता? जिन्दगी की राह में तुम तो निकल आगे गए वे गहन अवसाद, द्वन्दों में उलझ कर रह गए सहन कर पाए न वे  संतान की ये बेरुखी बेसहारा , ढलती वय थक कर, हताशा में फंसी तुम उन्हे कुछ वक्त दो प्यार दो , संतृप्ति दो जिन्दगी जीने को कुछ आधार कण रससिक्त दो पुष्प फिर आशीष के तुम पर बरस ही जाएंगे कवच बन संसार के संताप से टकराएंगे मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Thursday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post श्रमेव जयते
"प्रोत्साहन हेतु आप सबका आभार।"
Aug 10
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post श्रमेव जयते
"मुहतरमा ऊषा जी आदाब,दोहों का अच्छा प्रयास है,बधाई स्वीकार करें । अंतिम दोहे की पहली पंक्ति की मात्रा एक बार गिन लें ।"
Aug 8
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post श्रमेव जयते
"आदरणीय ऊषा जी, सुंदर प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई।"
Aug 7
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Aug 7
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श्रमेव जयते

उद्मम करते जो सदा कर्मनिष्ठ , मतिधीर वे सम्पन्न समाज की  रखते नींव , प्रवीर श्रमेव जयते में सदा जिनका है विश्वास उनके ही श्रम विन्दु से  ले वसुन्धरा श्वास मेहनत भी एक साधना नहीं कोई यह भोग लक्ष्य केन्द्रित वृत्ति ही बन जाए फिर योग मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Aug 7
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर
"  आभार आपका।"
Aug 6
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर
"आ. उषा जी, सुंदर दोहे हुए हैं हार्दिक बधाई।"
Aug 4
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर
"आदाब। बहुत आभार आपका।"
Jul 27
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,अच्छे दोहे लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।"
Jul 25
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धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर

धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर कामचोर को क्यों मिलें लड्डू मोतीचूर ? बैठे - बैठे खा रहे सरकारी दामाद कर्म करें जो रात - दिन , मिले उन्हे अवसाद कोई भी ऐसे नियम , कभी न आए रास कर्मयोगियों को मिले , जिनसे केवल त्रास विविध करों की भीड़ में , मेहनतकश मजबूर टैक्स नहीं ' जनसेवकों ' पर , सम्पति भी भूर मौलिक एवं अप्रकशितSee More
Jul 24
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Usha Awasthi's blog post स्वयं को एक बार देखो
"आद0 ऊषा अवस्थी जी सादर अभिवादन। अच्छी कविता का सृजन हुआ है, बधाई स्वीकार कीजिये"
Feb 2
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post स्वयं को एक बार देखो
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 29

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

कहें किससे व्यथा ?

तुम हुए जो व्यस्त

अभिभावक कहें किससे व्यथा?

हो गए कितने अकेले 

क्या तुम्हे यह भी पता?



जिन्दगी की राह में

तुम तो निकल आगे गए

वे गहन अवसाद, द्वन्दों

में उलझ कर रह गए



सहन कर पाए न वे 

संतान की ये बेरुखी

बेसहारा , ढलती वय

थक कर, हताशा में फंसी



तुम उन्हे कुछ वक्त दो

प्यार दो , संतृप्ति दो

जिन्दगी जीने को कुछ

आधार कण रससिक्त दो



पुष्प फिर आशीष के

तुम पर बरस ही जाएंगे

कवच बन संसार…

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Posted on August 22, 2019 at 9:50pm

श्रमेव जयते

उद्मम करते जो सदा
कर्मनिष्ठ , मतिधीर
वे सम्पन्न समाज की 
रखते नींव , प्रवीर

श्रमेव जयते में सदा
जिनका है विश्वास
उनके ही श्रम विन्दु से 
ले वसुन्धरा श्वास

मेहनत भी एक साधना
नहीं कोई यह भोग
लक्ष्य केन्द्रित वृत्ति ही
बन जाए फिर योग

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on August 6, 2019 at 7:00pm — 3 Comments

धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर

धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर

कामचोर को क्यों मिलें लड्डू मोतीचूर ?



बैठे - बैठे खा रहे सरकारी दामाद

कर्म करें जो रात - दिन , मिले उन्हे अवसाद



कोई भी ऐसे नियम , कभी न आए रास

कर्मयोगियों को मिले , जिनसे केवल त्रास



विविध करों की भीड़ में , मेहनतकश मजबूर

टैक्स नहीं ' जनसेवकों ' पर , सम्पति भी भूर…





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Posted on July 23, 2019 at 8:30pm — 4 Comments

स्वयं को एक बार देखो

अवनि के विस्तृत पटल पर

प्रकृति के नित नव सृजन,

संगीत की अद्भुत समन्वित

राग-रागनियों के रस , लय ,

छन्द का विस्तार देखो

स्वयं को एक बार देखो



चहुँ दिशाओं में थिरकतीं

इन्द्रधनुषी नृत्य करतीं

रंगों की मनहर ऋचाएँ 

सृष्टिकर्ता प्रकृति का प्रतिपल

नया अभिसार देखो

स्वयं को एक बार देखो



विपुल रवि , ग्रह , चन्द्र मंडित

गहन अनुशासित अखंडित

ज्योति किरणों से प्रभासित

व्योम में , गतिमान

सामंजस्य का श्रृंगार देखो…

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Posted on January 27, 2019 at 8:30pm — 3 Comments

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At 9:12am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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