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Usha Awasthi's Blog (24)

दूजा नहीं विकल्प

है मुश्किल आई बड़ी , सारी दुनिया त्रस्त

मिल कर साथ खड़े रहें , कहता है यह वक्त

परमपिता का न्याय तो  सबके लिए समान

अरबों के मालिक भले हों कोई श्रीमान

ईश्वर पर विश्वास का व्यर्थ मुलम्मा ओढ़

कर ना भ्रष्टाचार तू , जीवन यह अनमोल

प्रकृति हमें समझा रही , पर हित लें संकल्प

अन्य बचें तब हम बचें , दूजा नहीं विकल्प

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on March 28, 2020 at 5:30pm — 4 Comments

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ ?

जो दिल से भाव निकलते हैं

वह कोमल सा अहसास कहाँ ?

है नर्तन मधुर तरंगों सा

अपना ' प्रणाम ' अन्यान्य कहाँ ?

जिससे झंकृत हृद - तार मृदुल

वह सुन्दरता , उल्लास कहाँ

जब बच्चा ' अम्मा , कहकर के

जा , माँ के गले लिपटता है

इस नैसर्गिक उद्बोधन में

अद्भुत आनन्द , हुलास कहाँ ?

कोई भी भाषा हो , लेकिन

हिन्दी सी भला मिठास कहाँ…

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Added by Usha Awasthi on March 27, 2020 at 9:33am — 9 Comments

सब निरोग सब हों सुखी

कोरोना का संक्रमण सारे देश , जहान

है दुस्साध्य परिस्थिति , मुश्किल में है जान

इस संकट की घड़ी में हमको रहना एक

दृढ़ संकल्पित हों खड़े , भुला सभी मतभेद

सर्व हिताय खड़े हुए डा0 नर्स तमाम

पुलिस महकमे के लिए है आराम हराम

नित सफाई कर्मी करें बिना शिकन के काम

इनके सेवा भाव को शत , शत मेरा प्रणाम

आई है , टल जाएगी , यह जो बड़ी विपत्ति

अनुशासित घर में रहें बिना किसी आपत्ति

सब निरोग , सब हों सुखी , करना यही…

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Added by Usha Awasthi on March 25, 2020 at 5:32pm — 2 Comments

वृज की होली

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

वृज बीथिन्ह मँह , अजिर , अटारी

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

अबिर , गुलाल मलैं गोपियन कै

लुकैं छिपैं वृज की सब नारी

ढूँढि - ढूँढि रंग - कुंकुम मारैं

घूमि - घूमि गोपी दैं गारी

श्याम सामने रोष दिखावहिं

पाछे मुसकावहिं सब ठाढ़ी

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

चिहुँक - चिहुँक राधा पग धारहिं

श्याम पकरि चुनरी रंग डारहिं

विद्युत चाल चपल मनुहारी

लपक - झपक कीन्ही…

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Added by Usha Awasthi on March 13, 2020 at 1:30pm — 4 Comments

आख़िर नुक़सान हमारा है

है करता कौन समाज ध्वस्त?

किसने माहौल बिगाड़ा है?

किसकी काली करतूतों से

यह देश धधकता सारा है?



चिल्लाते जो जनतन्त्र-तन्त्र

"जन" को ही बढ़कर मारा है

बरगला "अशिक्षित" लोगों को

शिक्षा से किया किनारा है



है अकरणीय कर्मों के वश

अब शहर सुलगता सारा है

विद्यालय की पवित्र धरण

बनती जा रही अखाड़ा है



विद्वेष भरें अपनों में ही

जनता की दौलत नष्ट करें

लेते बापू का नाम मगर, 

हिंसा का बजे नगाड़ा है



वह नहीं…

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Added by Usha Awasthi on February 26, 2020 at 8:30am — 2 Comments

धरणी भी आखिर रोती है

कितने ही द्रव्य और निधियाँ,

वह अपने गर्भ संजोती है

पर पल में मानव नष्ट करे

धरणी भी आख़िर रोती है



काटे नित हरे वृक्ष , पर्वत

माँ की काया श्री हीन करे

अपनी ही विपुल संपदा को

वह काँप-काँप कर खोती है

धरणी भी आख़िर रोती है



उसके ही सीने पर चढ़कर

जो भव्य इमारत खड़ी हुईं

उन बोझों से दबकर,थककर

अपनी कराह को ढोती है

धरणी भी आख़िर रोती है



उद्योग और कारखाने 

हैं कचरा नदियों में डालें

इनमें घुल गए रसायन में

मारक क्षमता तो…

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Added by Usha Awasthi on February 14, 2020 at 4:59pm — 6 Comments

क्यों कर्तव्य निभाएँ हम ?

शब्दों का है खेल निराला

आओ हम खिलवाड़ करें

गढ़ आदर्श वाक्य रचनाएँ

क्यों उन पर हम अमल करें ?

दूजों को सीखें देकर, है

उन्हे मार्ग दिखलाएँ हम

निज कर्मों पर ध्यान कौन दे ?

अपना मान बढ़ाएँ हम

अपने घर का कूड़ा करकट 

अन्यों के घर में डालें

बन नायक अभियान स्वच्छता

अपना अभिमत ही पालें

सरिया ,गारा , मिट्टी , गिट्टी

ढेर लगाएँ राहों  पर

चलें फावड़े , टूट-फूट का दोष

धर रहे निगमों…

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Added by Usha Awasthi on January 28, 2020 at 6:14pm — 2 Comments

कविता : चलो, विश्वास भरें

चलो, विश्वास भरें

गया पुरातन वर्ष

नवीन विचार करें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर 

चलो, विश्वास भरें

बैर भाव से हुए प्रदूषित

जो मन, बुद्धि , धारणाएँ

ज्ञानाग्नि से , सर्व कलुष कर दग्ध

सभी संत्रास हरें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर 

चलो, विश्वास भरें

है अनेकता में सुन्दर एकत्व

उसे अनुभूति करें

कर संशय, भ्रम दूर

नेह, सतभाव वरें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर

चलो,…

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Added by Usha Awasthi on January 1, 2020 at 9:12pm — 5 Comments

धुआँ-धुआँ क्यों है?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?
सुबू शाम बुझा-बुझा क्यों है?
इन्सां बाहर निकलने से डर रहा है
बीमारियों की फ़िज़ा क्यों है?

यह सारा किया उसी ने है
ज़हर फैलाया उसी ने है
बेजान इमारतों के ख़ातिर
वृक्षों को गिराया उसी ने है

कितने अपशिष्ट जलाए उसने?
कितने कारखाने चलाए उसने?
क्या उसे नहीं पता ?
इतनी बद्दुआएँ क्यों हैं?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on November 21, 2019 at 11:30am — 3 Comments

किस्से हैं, कहानी है

किस्से हैं , कहानी है

दुनिया अनजानी है

कोई कब आएगा ?

कोई कब जाएगा ?

कौन जानता भला ?

केवल रवानी है

किस्से हैं - -

अभी तो यहीं था

कैसे चला गया ?

बार-बार दोहराती

बात पुरानी है

किस्से हैं - -

ख़ाली ही आया धा

ख़ाली विदा हुआ

बार -बार पाने की

ज़िद , दीवानी है

किस्से हैं - -

निर्मोही देह में

मोह पोसा गया

पाया न मनभाया

नित- नित कोसा गया

फिर…

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Added by Usha Awasthi on October 12, 2019 at 9:00pm — 2 Comments

वे ही सन्त होते हैं

करो कितना विवेचन

शैलियों , पांडित्य का, लेकिन

भावों के धरातल पर ही

गौतम बुद्ध बनते हैं

हुए तर्कों , वितर्कों से परे

वे शुद्ध हो गए

प्रकृति के सब प्रपंचों से 

निरुद्ध , प्रबुद्ध हो गए

जो खेलें दूसरों की गरिमा से

उन्मत्त होते हैं

सदा जो प्रेम से भरपूर

वे ही सन्त होते हैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on September 18, 2019 at 10:30pm — 1 Comment

तुझसे ही धोखे खाए हैं

सबसे ज्यादा ज़िन्दगी 
तुझसे ही धोखे खाए हैं
जब किया विश्वास तब
तूने कहर बरपाए हैं
सबसे - -

दीप आशा का लिए
जब - जब उमंगित मैं खड़ी
द्वार जो नैराश्य के 
आकर सतत खटकाए हैं
सबसे - -

मत समझना तू हरा देगी
मुझे ऐ ज़िन्दगी
हमने ही तो कूट प्रश्नों के
गिरह सुलझाए हैं
सबसे - -

परत दर परतों के पीछे
कितना ही छुपती फिरे
पर तेरे झूठे मुखौटे
हमने ही विलगाए हैं
सबसे - -

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on August 28, 2019 at 9:51pm — 1 Comment

कहें किससे व्यथा ?

तुम हुए जो व्यस्त

अभिभावक कहें किससे व्यथा?

हो गए कितने अकेले 

क्या तुम्हे यह भी पता?



जिन्दगी की राह में

तुम तो निकल आगे गए

वे गहन अवसाद, द्वन्दों

में उलझ कर रह गए



सहन कर पाए न वे 

संतान की ये बेरुखी

बेसहारा , ढलती वय

थक कर, हताशा में फंसी



तुम उन्हे कुछ वक्त दो

प्यार दो , संतृप्ति दो

जिन्दगी जीने को कुछ

आधार कण रससिक्त दो



पुष्प फिर आशीष के

तुम पर बरस ही जाएंगे

कवच बन संसार…

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Added by Usha Awasthi on August 22, 2019 at 9:50pm — 6 Comments

श्रमेव जयते

उद्मम करते जो सदा
कर्मनिष्ठ , मतिधीर
वे सम्पन्न समाज की 
रखते नींव , प्रवीर

श्रमेव जयते में सदा
जिनका है विश्वास
उनके ही श्रम विन्दु से 
ले वसुन्धरा श्वास

मेहनत भी एक साधना
नहीं कोई यह भोग
लक्ष्य केन्द्रित वृत्ति ही
बन जाए फिर योग

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on August 6, 2019 at 7:00pm — 3 Comments

धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर

धन के वे हकदार हैं , श्रम करते भरपूर

कामचोर को क्यों मिलें लड्डू मोतीचूर ?



बैठे - बैठे खा रहे सरकारी दामाद

कर्म करें जो रात - दिन , मिले उन्हे अवसाद



कोई भी ऐसे नियम , कभी न आए रास

कर्मयोगियों को मिले , जिनसे केवल त्रास



विविध करों की भीड़ में , मेहनतकश मजबूर

टैक्स नहीं ' जनसेवकों ' पर , सम्पति भी भूर…





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Added by Usha Awasthi on July 23, 2019 at 8:30pm — 4 Comments

स्वयं को एक बार देखो

अवनि के विस्तृत पटल पर

प्रकृति के नित नव सृजन,

संगीत की अद्भुत समन्वित

राग-रागनियों के रस , लय ,

छन्द का विस्तार देखो

स्वयं को एक बार देखो



चहुँ दिशाओं में थिरकतीं

इन्द्रधनुषी नृत्य करतीं

रंगों की मनहर ऋचाएँ 

सृष्टिकर्ता प्रकृति का प्रतिपल

नया अभिसार देखो

स्वयं को एक बार देखो



विपुल रवि , ग्रह , चन्द्र मंडित

गहन अनुशासित अखंडित

ज्योति किरणों से प्रभासित

व्योम में , गतिमान

सामंजस्य का श्रृंगार देखो…

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Added by Usha Awasthi on January 27, 2019 at 8:30pm — 3 Comments

जाने कितने बढ़े हुए हैं

जाने कितने बढ़े हुए हैं
दुष्ट, अधर्मी, व्यभिचारी
पग-पग पर धोखा देते जो
लोभी, कृपण,अनाचारी

इनकी घातों का कब तक,अब
बोझ सहन करना होगा?
कलियुग के इन दुष्ट,पापियों 
का, कुछ तो करना होगा

अन्यायी, पापाचारी जो
कामी, भ्रष्ट, दुराचारी जो
इनकी कुटिल कुचालों का
प्रतिरोध हमे करना होगा


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on January 11, 2019 at 6:30pm — 3 Comments

आधुनिक शिक्षा संस्थान

शिक्षा संस्थाओं के
हाल आज और हैं
छात्र यूनियनों में
लड़ाई  के दौर हैं

शिक्षालय आज 
राजनीति के अड्डे हैं
कमाई,चुनाव के
थ॓धों पर थंधे हैं

फैली अराजकता
अलग -अलग झंडे हैं
परिसर में घूमते
दलालों के पंडे हैं


मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on August 4, 2018 at 10:30am — No Comments

प्राचीन गुरुकुल

पूर्णतया शिक्षा को गुरू समर्पित थे

कंद,मूल,फल,बिना जोता अन्न खाते थे

पठन -पाठन को समय बचाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



गुरुकुल के प्राँगण में व्यर्थ वाद वर्जित था

गुरू ज्ञान-धारा से हर छात्र सिंचित था

चरणों में उनके नतमस्तक हो जाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



राजा उनसे मिलने गुरुगृह जब जाते थे

आयुध अपने बाहर रख अन्दर आते थे

उलझनें शासन की,उन स॔ग सुलझाते थे

तभी तो गुरुजन श्रृषि कहलाते थे



मौलिक एव॔…

Continue

Added by Usha Awasthi on August 4, 2018 at 10:30am — 8 Comments

जरा धीरे चलो

जिन्दगी थोड़ा ठहर जाओ
जरा धीरे चलो
तेज इस रफ्तार से 
घात से प्रतिघात से 
वक्त रहते , सम्भल जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
कामना के ज्वार में
मान के अधिभार में
डूबने से बच , उबर जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -
शब्दाडम्बरों के
उत्तरों प्रत्युत्तरों के
जाल से बच कर , निकल जाओ 
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

(मौलिक एवम अप्रकाशित)

Added by Usha Awasthi on June 12, 2018 at 10:27pm — 11 Comments

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