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Usha Awasthi
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Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"सादर प्रणाम ,  भाई लक्ष्मण धामी जी, रचना पर आपके विचार जानकर खुशी हुई।हार्दिक धन्यवाद"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन । अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Monday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"आदाब , आ0, हार्दिक आभार आपका"
Sunday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Usha Awasthi's blog post क्यों ना जड़ पर चोट ?
"आदरणीया ऊषा अवस्थी जी आदाब, सुन्दर रचना हुई है बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Sunday
Usha Awasthi posted a blog post

क्यों ना जड़ पर चोट ?

पैसों से क्या जान कोहम पाएगें तोल ?सदा - सदा को बुझ गएजब चिराग़ अनमोलकिन-किन के थे वरद हस्तजो पनपी यह खोटखोज-खोज उनकी करेंक्यों ना जड़ पर चोट ?इस बढ़ती विष बेल परयदि ना डली नकेलचक्रब्याज की वृद्धि समबढ़ जाएगा खेलघर के ही दुश्मन करेंजन्म भूमि से घातपर दुख से मतलब नहींअपना सुख दिन - रातपा कर शह उन्मुक्त होनित बढ़ते दुर्दान्तरक्षक बल  को ख़ौफ़ बिनमार रहे पथ भ्रान्तमौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Saturday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे
"आदाब , आ0 ,आपको  प्रस्तुति सुन्दर लगी , जान कर प्रसन्नता हुई । हार्दिक धन्यवाद आपको"
Saturday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Usha Awasthi's blog post रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे
"आदरणीया ऊषा अवस्थी जी आदाब, इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Friday
Usha Awasthi posted a blog post

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसेअजहूँ न आए पिया रे..ये बदरा कारे - कजरारे बार- बार आ जाएँ दुआरेघर आँगन सब सूना पड़ा रेसूनी सेजरिया रेरिमझिम....तन-मन ऐसी अगन लगाएजो बदरा से बुझे न बुझाए )अब तो अगन बुझे तबही जबआएँ साँवरिया रेरिमझिम...छिन अँगना छिन भीतर आऊँदीप बुझे सौ बार जलाऊँपिया हमारे घर आएगेंछाई अँधियारी रेरिमझिम .....मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Jul 3
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"आ. हार्दिक धन्यवाद आपको"
Jul 2
Dr. Vijai Shanker commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"“ कलियुग इसको ही कहें ” समयानुकूल प्रस्तुति , आदरणीय सुश्री उषा अवस्थी जी , बधाई , सादर।"
Jul 2
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"   आ. हार्दिक आभार  आपका"
Jul 1
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
Jul 1
Usha Awasthi posted a blog post

क्यों करते अह्वान ?

कितने सालों से सुनेंशान्ति - शान्ति का घोषअपने ही भू- भाग कोखो बैठे , बेहोशजब दुश्मन आकर खड़ाद्वार , रास्ता रोकक्या गुलाम बन कर रहें ?करें न हम प्रतिरोध ज्ञान - नेत्र को मूँद लेंखड़ा करें अवरोध गीता से निज कर्म - पथका , कैसै हो बोध ?ठुकराते ना सन्धि कोकौरव कर उपहासकुरूक्षेत्र का युद्ध क्यों ?फिर बनता इतिहाससोलह कला प्रवीण जोस्वयं कृष्ण भगवानपाञ्चजन्य से , समर का क्यों करते अह्वान ?मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Jun 25
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"आदाब ,  हार्दिक धन्यवाद आपको"
Jun 24
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post खो बैठे जब होश
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।"
Jun 24
Usha Awasthi posted a blog post

खो बैठे जब होश

बड़े-बड़े देखे यहाँकुटिल , सोच में खोटमर्यादा की आड़ लेदें दूजों को चोटऐसे भी देखे यहाँ सुन्दर, सरल , स्वभावयदि सन्मुख हों तो बहेसरस प्रेम रस भावकलियुग इसको ही कहेंचाटुकारिता भायतज कर अमृत का कलशविष-घट रहा सुहायगिनें , गिनाएँ , फिर गिनेंनित्य पराए दोषएक न अपने में दिखेखो बैठे जब होशमौलिक एवं अप्रकाशित See More
Jun 23

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

क्यों ना जड़ पर चोट ?

पैसों से क्या जान को

हम पाएगें तोल ?

सदा - सदा को बुझ गए

जब चिराग़ अनमोल

किन-किन के थे वरद हस्त

जो पनपी यह खोट

खोज-खोज उनकी करें

क्यों ना जड़ पर चोट ?

इस बढ़ती विष बेल पर

यदि ना डली…

Continue

Posted on July 4, 2020 at 5:50pm — 4 Comments

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

रिमझिम - रिमझिम बदरा बरसे

अजहूँ न आए पिया रे..

ये बदरा कारे - कजरारे 

बार- बार आ जाएँ दुआरे

घर आँगन सब सूना पड़ा रे

सूनी सेजरिया रे

रिमझिम....

तन-मन ऐसी अगन लगाए

जो बदरा से बुझे न बुझाए )

अब तो अगन बुझे तबही जब

आएँ साँवरिया रे

रिमझिम...

छिन अँगना छिन भीतर आऊँ

दीप बुझे सौ बार जलाऊँ

पिया हमारे घर आएगें

छाई अँधियारी रे

रिमझिम .....

मौलिक…

Continue

Posted on June 30, 2020 at 9:00pm — 2 Comments

क्यों करते अह्वान ?

कितने सालों से सुनें

शान्ति - शान्ति का घोष

अपने ही भू- भाग को

खो बैठे , बेहोश

जब दुश्मन आकर खड़ा

द्वार , रास्ता रोक

क्या गुलाम बन कर रहें ?

करें न हम प्रतिरोध 

ज्ञान - नेत्र को मूँद लें

खड़ा करें अवरोध 

गीता से निज कर्म - पथ

का , कैसै हो बोध ?

ठुकराते ना सन्धि को

कौरव कर उपहास

कुरूक्षेत्र का युद्ध क्यों ?

फिर बनता इतिहास

सोलह कला प्रवीण…

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Posted on June 25, 2020 at 10:30am

खो बैठे जब होश

बड़े-बड़े देखे यहाँ

कुटिल , सोच में खोट

मर्यादा की आड़ ले

दें दूजों को चोट

ऐसे भी देखे यहाँ 

सुन्दर, सरल , स्वभाव

यदि सन्मुख हों तो बहे

सरस प्रेम रस भाव

कलियुग इसको ही कहें

चाटुकारिता भाय

तज कर अमृत का कलश

विष-घट रहा सुहाय

गिनें , गिनाएँ , फिर गिनें

नित्य पराए दोष

एक न अपने में दिखे

खो बैठे जब होश

मौलिक एवं अप्रकाशित

 

Posted on June 23, 2020 at 1:00am — 6 Comments

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At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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