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Usha Awasthi
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post धरणी भी आखिर रोती है
"आ. ऊषा जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
14 hours ago
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post धरणी भी आखिर रोती है
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।"
yesterday
Usha Awasthi posted a blog post

धरणी भी आखिर रोती है

कितने ही द्रव्य और निधियाँ,वह अपने गर्भ संजोती हैपर पल में मानव नष्ट करेधरणी भी आख़िर रोती हैकाटे नित हरे वृक्ष , पर्वतमाँ की काया श्री हीन करेअपनी ही विपुल संपदा कोवह काँप-काँप कर खोती हैधरणी भी आख़िर रोती हैउसके ही सीने पर चढ़करजो भव्य इमारत खड़ी हुईंउन बोझों से दबकर,थककरअपनी कराह को ढोती हैधरणी भी आख़िर रोती हैउद्योग और कारखाने हैं कचरा नदियों में डालेंइनमें घुल गए रसायन मेंमारक क्षमता तो होती हैधरणी भी आख़िर रोती हैहैं धुआँ उगलते सड़कों परभारी वाहन , मोटरगाड़ीवायु भी तो ज़हरीली,भरसीने में ,…See More
Friday
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post क्यों कर्तव्य निभाएँ हम ?
"आदाब, मुझे प्रसन्नता  है कि आपकी प्रतिक्रिया मुझे सदैव प्राप्त होती है। हार्दिक आभार आपका"
Jan 31
Samar kabeer commented on Usha Awasthi's blog post क्यों कर्तव्य निभाएँ हम ?
"मुहतरमा ऊषा अवस्थी जी आदाब,सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई ।"
Jan 30
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Jan 28
Usha Awasthi posted a blog post

क्यों कर्तव्य निभाएँ हम ?

शब्दों का है खेल निरालाआओ हम खिलवाड़ करेंगढ़ आदर्श वाक्य रचनाएँक्यों उन पर हम अमल करें ?दूजों को सीखें देकर, हैउन्हे मार्ग दिखलाएँ हमनिज कर्मों पर ध्यान कौन दे ?अपना मान बढ़ाएँ हमअपने घर का कूड़ा करकट अन्यों के घर में डालेंबन नायक अभियान स्वच्छताअपना अभिमत ही पालेंसरिया ,गारा , मिट्टी , गिट्टीढेर लगाएँ राहों  परचलें फावड़े , टूट-फूट का दोषधर रहे निगमों परअपने घर की थाती समझेंसार्वजनिक सारे स्थलपथ पर चलना अति दूभरवाहन हो या फिर हों पैदलसचमुच में अब लोकतन्त्र हैउसके मजे उठाएँ हममतलब हमको अधिकारों…See More
Jan 28
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-111
"मेरा मनोबल बढ़ाने हेतुआप सभी को हार्दिक धन्यवाद"
Jan 12
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-111
"सारा जगत प्रपंच है माया का भ्रमजाल चौरासी का पाश यह जन्म-जन्म का काल क्यों फंसता इस चक्र में अन्तर लोचन खोल पाएगा अनिवर्चनीय नित आनन्द अमोल मौलिक एवं अप्रकाशित"
Jan 12
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-111
"सारा जगत प्रपंच है माया का भ्रम जाल चौरासी का पाश यह जनम-जनम का काल क्यों फंसता इस चक्र में अन्तर लोचन खोल पाएगा अनिवर्चनीय नित आनन्द अमोल"
Jan 12
Usha Awasthi replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-111
"सारा जगत प्रपंच ही माया का भ्रम जाल चौरासी का पाश यह जनम-जनम का काल क्यों फंसता इस चक्र में अन्तर लोचन खोल पाएगा अनिवर्चनीय नित आनन्द अमोल"
Jan 12
Usha Awasthi commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"आप सभी को हार्दिक धन्यवाद"
Jan 9
vijay nikore commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"रचना अच्छी बनी है। बधाई आ० ऊषा जी।"
Jan 7
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"आद0 उषा जी सादर अभिवादन। नववर्ष पर सकारात्मक सोच को परिलक्षित करती उम्दा रचना पर बधाई स्वीकार कीजिए।"
Jan 4
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"आ. ऊषा जी, सादर अभिवादन। नववर्ष पर सकारात्मक सोच फैलाती सुंदर रचना हुई है । हार्दिक बधाई।"
Jan 3
आशीष यादव commented on Usha Awasthi's blog post कविता : चलो, विश्वास भरें
"नये वर्ष मे नई प्रेरणा प्रदान करती हुई सुन्दर रचना। बधाई।"
Jan 2

Profile Information

Gender
Female
City State
Lucknow
Native Place
Uttar Pradesh
Profession
Author

ब्राहम्ण

उषा अवस्थी

मान दिया होता यदि तुमने
ब्राम्हण को , सुविचारों को
सदगुण की तलवार काटती
निर्लज्जी व्यभिचारों को

उसको काया मत समझो ,
ज्ञान विज्ञान समन्वय है
द्वैत भाव से मुक्त, जितेन्द्रिय
सत्यप्रतिज्ञ , समुच्चय है

कर्म , वचन , मन से पावन
वह ब्रम्हपथी , समदर्शी है
नहीं जन्म से , सतत कर्म से
तेजस्वी , ब्रम्हर्षि है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Usha Awasthi's Blog

धरणी भी आखिर रोती है

कितने ही द्रव्य और निधियाँ,

वह अपने गर्भ संजोती है

पर पल में मानव नष्ट करे

धरणी भी आख़िर रोती है



काटे नित हरे वृक्ष , पर्वत

माँ की काया श्री हीन करे

अपनी ही विपुल संपदा को

वह काँप-काँप कर खोती है

धरणी भी आख़िर रोती है



उसके ही सीने पर चढ़कर

जो भव्य इमारत खड़ी हुईं

उन बोझों से दबकर,थककर

अपनी कराह को ढोती है

धरणी भी आख़िर रोती है



उद्योग और कारखाने 

हैं कचरा नदियों में डालें

इनमें घुल गए रसायन में

मारक क्षमता तो…

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Posted on February 14, 2020 at 4:59pm — 2 Comments

क्यों कर्तव्य निभाएँ हम ?

शब्दों का है खेल निराला

आओ हम खिलवाड़ करें

गढ़ आदर्श वाक्य रचनाएँ

क्यों उन पर हम अमल करें ?

दूजों को सीखें देकर, है

उन्हे मार्ग दिखलाएँ हम

निज कर्मों पर ध्यान कौन दे ?

अपना मान बढ़ाएँ हम

अपने घर का कूड़ा करकट 

अन्यों के घर में डालें

बन नायक अभियान स्वच्छता

अपना अभिमत ही पालें

सरिया ,गारा , मिट्टी , गिट्टी

ढेर लगाएँ राहों  पर

चलें फावड़े , टूट-फूट का दोष

धर रहे निगमों…

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Posted on January 28, 2020 at 6:14pm — 2 Comments

कविता : चलो, विश्वास भरें

चलो, विश्वास भरें

गया पुरातन वर्ष

नवीन विचार करें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर 

चलो, विश्वास भरें

बैर भाव से हुए प्रदूषित

जो मन, बुद्धि , धारणाएँ

ज्ञानाग्नि से , सर्व कलुष कर दग्ध

सभी संत्रास हरें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर 

चलो, विश्वास भरें

है अनेकता में सुन्दर एकत्व

उसे अनुभूति करें

कर संशय, भ्रम दूर

नेह, सतभाव वरें

आपस के सब मनमुटाव कर दूर

चलो,…

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Posted on January 1, 2020 at 9:12pm — 5 Comments

धुआँ-धुआँ क्यों है?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?
सुबू शाम बुझा-बुझा क्यों है?
इन्सां बाहर निकलने से डर रहा है
बीमारियों की फ़िज़ा क्यों है?

यह सारा किया उसी ने है
ज़हर फैलाया उसी ने है
बेजान इमारतों के ख़ातिर
वृक्षों को गिराया उसी ने है

कितने अपशिष्ट जलाए उसने?
कितने कारखाने चलाए उसने?
क्या उसे नहीं पता ?
इतनी बद्दुआएँ क्यों हैं?

ये आसमां धुआँ-धुआँ क्यों है?

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on November 21, 2019 at 11:30am — 3 Comments

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At 9:12am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

At 6:29am on August 5, 2018, Kishorekant said…

सुन्दर रचना केलिये हार्दिक अभिनंदन सुश्री उषा अवस्थिजी ।

At 9:01pm on September 9, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए....

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है.

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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post डूब गया कल सूरज
"आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन । अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई । "
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"Bhaee Musafir ji, Post Pasandgee aur comment ke liye bahut bahut aabhar"
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14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Usha Awasthi's blog post धरणी भी आखिर रोती है
"आ. ऊषा जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।"
14 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post
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"आदरणीय अमिता जी, इस भावपूर्ण सुन्दर रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।"
15 hours ago
vijay nikore commented on vijay nikore's blog post डूब गया कल सूरज
"रचना की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार, प्रिय भाई समर कबीर जी।"
16 hours ago

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