आदरणीय साथियो,
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हार्दिक धन्यवाद मेरे इस प्रयास पर आपकी प्रतिक्रिया और सुझाव हेतु। आजकल के परिवेश में 'बेटा' या 'यार' शब्द सामान्य या तंजदार बोलचाल में हर उम्र के हर लिंग के लोगों में संभव है।
आदरणीय अखिलेश जी
लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर स्पष्ट कहे जाना लघुकथा का चरित्र नहीं है। इस लघुकथा में हमारे विद्यालयों की दशा एक विसंगति है और चपरासी के संवादों के पीछे इसका अनकहा छिपा है। चपरासी और स्कूल व्यवस्था इस बात के लिए स्वयं को उत्तरदायी नहीं मान रहे कि पढाई नहीं हुई या खाना नहीं बना उल्टे बच्चों को ही झाड़ू नहीं लगाने और ताला नहीं खोलने के लिए डाँट रहे हैं। उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे.यही भाव है इस लघुकथा का।
आदाब। रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी रचना का मर्म और अनकहे के एक पहलू को स्पष्ट करती समीक्षा हेतु और प्रोत्साहन हेतु तहेदिल बहुत-बहुत शुक्रिया। कृपया शीर्षक पर भी अपनी राय दीजियेगा यदि समय मिल सके, तो।
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