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आंचलिक साहित्य

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ઓળખાણ

ફેસબુક પર ઘણાં વખત થી વાત ચિત થતી . આ વાતચિત પ્રેમ માં ક્યારે પરિવર્તિત થયી ખબરજ ના પડી . ચોવીસ વરસ ની સુધા અને ત્રીસ વરસ નો અમ્રિત . હા આજ નામ થી એક બીજા ને ઓળખાણ આપી હતી . ઘર માં જુવાન દીકરી હોય…Continue

Started by KALPANA BHATT Nov 16, 2016.

આગંતુક (કથા )

ઘરે મહેમાન ઘણાં હતા , એ વચ્ચે એક આગંતુક આવ્યો એને જોઈને બા એક્દુમ આશ્ચર્યચકિત થયા . બંને ની આંખો મળી , પણ બને ખામોશ રહ્યા . સોનાલી ના પપ્પા એ પણ એ આગંતુક ને જોઈ લીધેલા પણ એ પણ કશું ના બોલ્યા , તેઓએ…Continue

Started by KALPANA BHATT Oct 5, 2016.

ચર્ચા ( કથા ) 2 Replies

" શાળા માં એક ચર્ચા સાંભળી ! " લલિતા એ પૂછયું બધી બેનપણીઓ ના કાન ઉભા થઇ ગયા . એક એ પૂછ્યું શું થયું ? શાની ચર્ચા !લલિતાએ બધાની ઉત્સુકતા જોઈ કહ્યું , " આપણા પ્રાધ્યાપક શાળા છોડી ને જવાના છે . તેઓ એ…Continue

Started by KALPANA BHATT. Last reply by KALPANA BHATT Oct 5, 2016.

રમકડું 1 Reply

માં મારું રમકડું ક્યાં ગયુંમારી જોડેજ તો રહેતું હતુંકૌણ જાણે હવે ક્યાં ગયુંમાં, પપ્પા લઈને આવ્યા હતાગયા વર્ષે જયારે હું પાસ થયો હતોખોળા માં બેસાડી ને પપ્પા રમાડતામાં, મારું રમકડું ક્યાં ગયું ?આ ટી..…Continue

Started by KALPANA BHATT. Last reply by Madanlal Shrimali Sep 26, 2016.

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Comment by Omprakash Kshatriya on July 20, 2015 at 7:01am

लघुबाता – फिकर (मालवी) “ अरे ओ किसनवा ! लठ ले के कठे जा रियो हे ? मच्छी मारवा की ईच्छा हे कई ?” “ नी रे , माधवा ! गरमी मा पाच कौस पाणी लेवा नी जानो पड़े उको बंदोबस्त करी रियो हु.” “ ई लाठी थी ?” किसनवा से मोटी व वजनी लाठी देख कर माधवा की हंसी छुट गइ . “ हंस की रियो रे माधवा . बापू की लाठी से डरी ने मूँ सकुल जानो रुक सकू तो ये नदि का नी रुक सके.” ------------------------------ लघुकथा – चिंता “ अरे किसन ! लाठी ले कर किधर जा रहा है ? मछली खाने की इच्छा है ?” “ नहीं रे माधव ! गर्मी में पांच मील पानी लेने जाना पड़ता है. उसी का इंतजाम करना चाहता हूँ.” “ इस लाठी से ?” किसन से लम्बी और भारी लाठी देख कर माधव की हंसी छुट गई . “ हंस क्यों रहा है माधव. पिताजी की लाठी से डर कर मैं स्कूल जाना छोड़ सकता हूँ तो नदी बहना क्यों नहीं छोड़ सकती है ?” ----------- मौलिक और अप्रकाशित


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Comment by अरुण कुमार निगम on October 7, 2013 at 8:58am

मोर जानत मा ये मंच मा छत्तीसगढ़ी के पहिली टिप्पणी आपमन करे हौ. मन हा परसन होगे भाई. गीत रुचिस, मोर भाग खुलगे.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 6, 2013 at 6:48pm

बने छतीसढ़ी गीत लिखे हवौ भैय्या अरुण निगम जी , आपमन ला मोर डहन ले झारा झारा बधई हवे !! हमर भांखा के मान घलो बढ़ाय हवौ , ओखरो बर बधई लेवौ !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on October 6, 2013 at 11:38am

मया चिरई : अरुण कुमार निगम
(छत्तीसगढ़ी गीत)


जुग-जुग के नाता पल-छिन मा
मिट जाय कभू छुट जाय कभू
पल-छिन के नाता जुग-जुग के
बन जाय कभू, बँध जाय कभू |


कभू चीन्हत-चीन्हत चीन्है नहिं
कभू अनचीन्हे चिन्हारी लगय
कभू अइसन चीन्हा मिल जावय
नइ जिनगी भर मिट पाय कभू |


कभू हाँसत-हाँसत रोवय मन
कभू रोवत-रोवत हाँसे लगय
चंचल मन के का बात कहवँ
उड़ जाय कभू रम जाय कभू |


कभू अइसन अचरिज हो जाथे
भागे नहिं पावै कहूँ कती
ये मया चिरई बड़ अजगुत हे
बिन फाँदा के फँस जाय कभू ||


(मौलिक व अप्रकाशित)


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

[शब्दार्थ -

मया चिरई = प्रेम चिरैय्या, कभू = कभी, चिन्हारी = पहचान, अइसन = ऐसा, चिन्हा = निशानी, अजगुत = आश्चर्यजनक, कहूँ कती = किसी ओर]

 
 
 

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