Started this discussion. Last reply by आशीष यादव Jul 28, 2012. 15 Replies 4 Likes
आज जहाँ सुनिये वहीँ भाषा का बिगड़ा स्वरूप सुनाई देता है। किस पुरुष का कर्ता है और कौन सी क्रिया लग गई पता ही नही। यह भी नही की यह युवा पीढ़ी ढंग से आंग्ल भाषा ही जानती हो। तो क्या हमारी और सरकार की यह…Continue
mrs manjari pandey commented on आशीष यादव's blog post मजबूरी क्यों खून के आंसू पीने की
गीतिका 'वेदिका' commented on आशीष यादव's blog post मजबूरी क्यों खून के आंसू पीने की
आशीष यादव commented on आशीष यादव's blog post मजबूरी क्यों खून के आंसू पीने की
ram shiromani pathak commented on आशीष यादव's blog post मजबूरी क्यों खून के आंसू पीने की
बृजेश नीरज commented on आशीष यादव's blog post मजबूरी क्यों खून के आंसू पीने की
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आशीष यादव commented on कवि - राज बुन्दॆली's blog post महाशिवरात्रि पर विशेष : शिव पार्वती विवाह
आशीष यादव commented on SANDEEP KUMAR PATEL's blog post दोहा-रोला गीत
आशीष यादव replied to Admin's discussion एक घोषणा :- प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पत्र "हमारा मेट्रो" आपकी रचनाओं को नियमित प्रकाशित करेगी...
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कुमार गौरव अजीतेन्दु left a comment for आशीष यादव
आशीष यादव commented on Albela Khatri's blog post मित्रता दिवस को समर्पित छह दोहेPosted on March 10, 2013 at 10:30am 6 Comments 0 Likes
जिनके लिये हिन्द प्राण से प्यारा था।
सत्य अहिंसा ही बस जिनका नारा था।
तैंतीस कोटि जनो का जो विश्वास था।
जिसमे होता देवों का आभाष था।
जिसने देखे स्वप्न राम के राज की।
उसी हिन्द की दशा हुई क्या आज की।
सत्य बैठ कोने मे सिसकी लेता है।…
Posted on August 20, 2012 at 10:00am 0 Comments 0 Likes
मानव की प्रवृत्तियाँ क्या हैं? वह क्या चाहता है? क्या पसन्द है उसे? क्या नही पसन्द करता वो? ये सभी बातें उसी पर निर्भर हैं। किन्तु ये नही कहने वाला हूँ मै। कुछ और ही कहना चाहता हूँ।
कुछ लोगों को अच्छे लोग नही भाते बल्कि बुरे लोगो में दिलचस्पी हो जाती है। पता नही कैसा ये मन का रिश्ता है। क्या पता कब, कैसे, किससे जुड़ जाये। इसकी खबर भी नही लगती।
बात ये भी नही कहना चाहता मै लेकिन ये सभी घटनायें कभी न कभी अवश्य ही घटती हैं जीवन मे। इनके पीछे क्या होता है उस समय कोई नही जान सकता।…
ContinuePosted on July 26, 2012 at 5:59pm 19 Comments 1 Like
मेरा भारत अपना भारत ना जाने कहाँ खो गया
उसके सारे चिन्ह खो गये, कैसा ये बदलाव हो गया
नही रही अब गुरु की गुरुता, नही रहे वो शिष्य महान
काट अँगूठा तक दे देते थे करते गुरु का सम्मान
आज के युग में शिक्षा क्या, बस पैसों का व्यापार हो गया
मेरा भारत अपना भारत ना जाने कहाँ खो गया
नही रही धुन बाँसुरिया की, जो छेड़ा करती थी तान
कहाँ थाप तबले ढोलक की, कहाँ नगाड़े का है मान
आज कान के परदे फट जाते ऐसा संगीत हो गया
मेरा भारत अपना भारत ना जाने कहाँ खो…
Posted on June 5, 2012 at 8:00am 19 Comments 2 Likes
आज बनूँगा मै विद्रोही, अब विद्रोह कराऊँगा|
जो सबके ही समझ में आये, ऐसे गीत सुनाऊँगा||
बहुत हो गया अब न रुकूँगा, मै रोके इन चट्टानों के,
बहुत बुझ चुका अब न बुझूँगा मै पड़कर इन तूफानों मे।
कर के हलाहल-पान आज मै होके अमर दिखा दूँगा,
और बुलबुलों को बाजों से लड़ना आज सिखा…
कुमार गौरव अजीतेन्दु said… प्रिय आशीष जी.....मेरी कविता को पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार.....
Sachchidanand Pandey said…
कुमार गौरव अजीतेन्दु said… आशीष जी, प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार.......
कुमार गौरव अजीतेन्दु said…
अरुण कान्त शुक्ला said… आशीष जी मित्र बनने का अवसर प्रदान करने के लिए धन्यवाद |
डॉ. सूर्या बाली "सूरज" said… आशीष जी आपकी शुभकमानयों और बधाइयों के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !
डॉ. सूर्या बाली "सूरज" said… आशीष जी आपकी दाद के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ! अच्छा लिखते हो ! ऐसे ही लिखते रहो और सबका मनोरंजन करते रहो !!
swagat hai

Dhanyavaad Ashish Bhai.
Sarita Sinha said… thanx ashish ji for liking my post...
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