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आशीष यादव's Blog (67)

गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,

एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।

दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे हैं,

और हम... जो खेतों से कटकर आ रहे हैं।

वे हमारे 'अधिकार' नहीं निचोड़ते,

वे हमारे भीतर कहीं आत्मा तक निचोड़ते हैं।

पहले वे मीठी बातें करते हैं, जैसे शक्कर की चाशनी,

फिर हमें परतों में दबाकर,

हमारा 'रक्त' मत पेटियों (ईवीएम) के गिलास में भर लेते हैं।

जब चुनावी कोल्हू रुकता है,

तब हम इंसान नहीं बचते...

हम…

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Added by आशीष यादव on May 11, 2026 at 9:33am — 1 Comment

मशीनी मनुष्य

आज के समय में मनुष्य मशीन बनता जा रहा है या उसको मशीन बनने पर मजबूर किया जाता है. कारपोरेट जगत मनुष्य को संवेदनहीन कर रहा है. यह मोबाइल का युग जिसने सबको अपनी गिरफ्त में ले रखा है जिससे नवजात बच्चे तक अछूते नहीं हैं . इसी को ध्यान में रखकर मैंने मुख्य शीर्षक मशीनी मनुष्य के अंतर्गत कई कविताओं को लिखने की कोशिश की है.

01

शीर्षक: कारपोरेट कीबोर्ड 

उंगलियाँ नाचती हैं…

मकाम पर नहीं, काली कुंजियों के मैदान…

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Added by आशीष यादव on April 20, 2026 at 12:31am — No Comments

जाने तुमको क्या क्या कहता

तेरी बात अगर छिड़ जाती

जाने तुमको क्या क्या कहता

सूरज चंदा तारे उपवन

झील समंदर दरिया कहता

कहता तेरे होंठ गुलाबी

जैसे सूरज निकल रहा है 

कहता बदन तुम्हारा ऐसा

जैसे सोना पिघल रहा है 

मै तुमको सम्मोहक कहता

मै मनभावन रत्ना कहता

कहता तेरा रूप बहारों

की तरुणाई के जैसा है

और बदन, कहता संगमरमर

सी चिकनाई के जैसा है

तुमको पूनम की रातों का

जगमग जगमग चंदा कहता

तेरे…

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Added by आशीष यादव on January 7, 2025 at 8:30pm — 1 Comment

गज़ल : पत्थरों पर चल रहा हूं

2122 2122

पत्थरों पर चल रहा हूँ

रास्तों को छल रहा हूँ 1

लग रहा हूँ आज मीठा

सब्र का मैं फल रहा हूँ 2

कर दिया उनको पवित्तर 

यार गंगा जल रहा हूँ 3 

अब नहीं ख्वाहिश किसी की

हाँ कभी बेकल रहा हूँ 4

आज इतनी गाड़ियाँ है

मैं कभी पैदल रहा हूँ 5

याद आऊँ, मुस्कुरा दो 

वह तुम्हारा कल रहा हूँ 6

मैं डुबोया हूँ खुद ही को

स्वयं का दलदल रहा हूँ…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2023 at 11:56pm — 1 Comment

ऋतु शीत रवानी में अपने

ऋतु शीत रवानी में अपने

ऊर्ध्वगी जवानी में अपने  

चहुँओर सर्द को बढ़ा रही

जीवन वह्निः तक बुला रही

थी जगह जगह जल रही आग

प्रमुदित होकर जन रहे ताप 

कौड़े में जैसे उठी ज्वाल

मन मोह लिया इक अधर लाल 

रति जैसी जिसकी छाया थी

वह थी समक्ष या माया थी

पहने थे वसन तरीके से 

सब सज्जित स्वच्छ सलीके से 

कुंतल को उसने झटक दिया 

मनसिज प्रसून पर पटक दिया

कितने उद्गार उठे मन में 

ताड़ित से कौंध रहे तन…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2023 at 11:10am — No Comments

तस्वीर: एक मोहक चित्र

2122 2122 2122 2122

क्या पता उस लोक में दिखती हैं कैसी अप्सराएँ

किस तरह चलतीं मचल कर किस तरह से भाव खाएँ

कौन सा जादू लिए फिरतीं सभी पर मार देतीं

किस तरह पुचकारती हैं किस तरह से प्यार देतीं 

क्या महावर और मेहँदी आँख में काजल अनोखा

केशिनी मृगचक्षुणी हैं सत्य, या उपमान धोखा 

किस तरह श्रृंगार रचती किस तरह गेशू सजाएँ

क्या पता कितनी सही है आमजन की कल्पनाएँ

आज देखी थी परी जो हाल कुछ उसका सुनाऊँ

देखता ही रह गया…

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Added by आशीष यादव on January 19, 2023 at 6:32am — 1 Comment

एक दिन स्वर्ग में (आशीष यादव)

एक दिन स्वर्ग में घूमते-घूमते

एक जगह रुक्मिणी राधिका से मिली

एक दिन स्वर्ग में……………

सैकड़ों प्रश्न मन में समेटे हुए

श्याम की प्रीत तन पर लपेटे हुए

जोड़कर हाथ राधा के सम्मुख वहाँ

एक रानी सहज भावना से मिली

एक दिन स्वर्ग में …………….

देखकर राधिका झट गले लग गई

साँवरे की महक से सुगंधित हुई

प्रीत की प्रीत में घोलकर मन, बदन

साधना प्रीत की साधना से मिली

एक दिन स्वर्ग में……………

भेँटना हो गया बात होने…

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Added by आशीष यादव on March 25, 2022 at 1:30pm — No Comments

गणतंत्र दिवस गीत

जय भारत के लोगों की 

जय भारत देश महान की 

जय जय जय गणतंत्र दिवस की

जय जय संविधान की

जय जय जय जय हिंद

अपनी धुनें बनाई हमने अपना राग बनाया था 

जिसमें समता, न्याय, आजादी का संकल्प समाया था 

एक अखंडित राष्ट्र के लिए गरिमा भाईचारा से 

हमने अपने गीत लिखे थे हमने खुद को गाया था 

जय लिक्खी संप्रभुता की जय लोकतंत्र कल्याण की 

जय जय जय गणतंत्र दिवस की

जय जय संविधान की

जय जय जय जय हिंद 

सूत कातते…

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Added by आशीष यादव on January 25, 2022 at 11:15pm — 3 Comments

मैं पुलिस हूँ (पुलिस गीत) : आशीष यादव

मैं पुलिस हूँ 

मैं पुलिस हूँ, मित्र हूँ 

मैं आपका ही प्यार हूँ 

आपकी खातिर खड़ा हूँ

आपका अधिकार हूँ 

मैं पुलिस हूँ 

शपथ सेवा की उठाया हूँ करूँगा आमरण 

धीर साहस के लिए मैंने किया वर्दी-वरण 

जुल्म-अत्याचार से चाहे प्रकृति की मार से

रात-दिन रक्षा करूँगा आपका बन आवरण 

मैं अहर्निश कमर कसकर 

वेदना में भी विहँसकर 

कर्म को तैयार हूँ

मैं पुलिस हूँ 

मैं पुलिस…

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Added by आशीष यादव on January 5, 2022 at 9:23am — 4 Comments

नव वर्ष पर 5 दोहे

सबसे पहले आपको नाथ नवाता शीश
यही याचना, आपका मिलता रहे आशीष

जीवन मे उत्थान दे मंगलमय नव-वर्ष
नए साल में छूइए नए-नए उत्कर्ष

शुभकामना स्वीकारिये मेरी भी श्रीमान
शुक्ल पक्ष के चाँद सी बढ़े आपकी शान

जैसे इस ब्रम्हांड का नही आदि ना अंत
वैसे ही श्रीमान को खुशियाँ मिलें अनंत

धन-सम्पत से युक्त हों लोभ-मोह से हीन
उनको भी उद्धारिये जो हैं दीन-मलीन 

मौलिक एवं अप्रकाशित


आशीष यादव

Added by आशीष यादव on January 1, 2022 at 9:05am — 7 Comments

दीप जलाना

जहाँ दिखे अँधियार वहीं पर दीप जलाना 

छाये खुशी अपार वहीं पर दीप जलाना 

अपने मन के भीतर का जो पापी तम है 

'अयं निजः' का भाव जहाँ पलता हरदम है 

'वसुधा ही परिवार' जहाँ अंधेरे में है 

सबसे पहले यार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे अँधियार………………..

मुरझाए से होठों पर मुस्कान बिछाने 

छोटी-छोटी खुशियों को सम्मान दिलाने 

जिन दर दीप नहीं पहुँचे हैं उन तक जाकर 

रोशन करना द्वार वहीं पर दीप जलाना 

जहाँ दिखे…

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Added by आशीष यादव on November 4, 2021 at 2:30pm — 6 Comments

जो इजाजत हो

122  2122  2122  2122  2

तेरी तस्वीर होठों से लगा लूँ, जो इजाजत हो। 

उसे आगोश में लूँ, चूम डालूँ, जो इजाजत हो।

बहुत नायाब दौलत है तुम्हारे हुस्न की दौलत 

तुम्हारा हुस्न तुमसे ही चुरा लूँ जो इजाजत हो ।

नशीले नैन लाली होंठ की यूँ मुझ पे छाई…

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Added by आशीष यादव on September 24, 2021 at 3:30pm — 8 Comments

कहो सूरमा! जीत लिए जग?

कहो सूरमा! जीत लिए जग? 

तुम्हें पता है जीत हार का? 

केवल बारूदों के दम पर 

फूँक रहे हो धरती सारी 

नफरत की लपटों में तुमने 

धधकाई करुणा की क्यारी 

कितना आतंकित है…

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Added by आशीष यादव on September 2, 2021 at 1:00am — 5 Comments

स्वयं को आजमाने को तू खुलकर आ जमाने में

स्वयं को आजमाने को

तू खुलकर आ जमाने में

बहुत अनमोल है जीवन

गवाँता क्यों बहाने में

नदी के पास बैठा है

दबा के प्यास बैठा है

तुझे मालूम है, तुझमें

कोई एहसास बैठा है

किनारे कुछ न पाओगे

मिलेगा डूब जाने में

तुम्हारे सामने दुनिया

सुनो रणभूमि जैसी है

स्वयं का तू ही दुश्मन है

स्वयं का तू हितैषी है

कहीं पीछे न रह जाना

स्वयं से ही निभाने में

कहाँ दसरथ की दौलत …

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Added by आशीष यादव on July 1, 2021 at 2:30am — 4 Comments

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

रणभेरी बजने से पहले अच्छा है तुम घर जाओ

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम मर जाओ

कितनी ही आशाएं तुमसे लगी हुई है, टूटेंगीं

कितनी ही तकदीरें तुमसे जुड़ी हुई हैं, रूठेगीं



तेरे पीछे मुड़ जाने से कितने सिर झुक जाएंगे

कितने प्राण कलंकित होंगे कितने कल रुक जाएंगे



उतर गए हो बीच समर तो कौशल भी दिखला जाओ

हिम्मत के बादल बन कर तुम विपदाओं पर छा जाओ

तप कर और प्रबल बनकर तुम शोलों बीच सँवर जाओ

वरना पीठ दिखाने से तो अच्छा है तुम…

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Added by आशीष यादव on May 28, 2021 at 12:11am — 7 Comments

याद तुम्हारी

याद तुम्हारी क्या बतलाऊँ

कैसे कैसे आ रही है

चलने का अंदाज़ ठुमक कर

मचल-मचल कर और चहक कर

हाथों को लहरा-लहरा कर

अदा-अदा से और विहँस कर

तेरी सुंदर-सुंदर बातें

मन हर्षित है गाते-गाते

मैं कब से आवाज दे रहा

आ जाते हँसते-मुस्काते

तेरे गालों वाले डिम्पल

याद आते हैं मुझको पल-पल

मिसरी में पागे होठों के

नाज़ुक चुम्बन कोमल-कोमल

एक छवि मुस्कान बटोरे

मुझको अपने परितः घेरे

सुंदर सुखद समीर…

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Added by आशीष यादव on April 24, 2021 at 4:36am — 1 Comment

बोलो मैं कैसे बिकता

एक गजल तेरे होठों पर लिख सकता था

इसकी टपक रही लाली पर बिक सकता था

किंतु सामने जब शहीद की पीर पुकारे

जान वतन पर देने वाला वीर पुकारे

जिसने भाई, लाल, कंत कुर्बान किये हों

सूख चुकी उनकी आँखों का नीर पुकारे

कैसे उन क़ातिल मुस्कानों पर बिकता

कैसे कोमल नाजुक होठों पर लिखता



एक गजल तेरी आँखों पर लिख सकता था

चंचल चितवन सी कमान पर बिक सकता था

पर कौरव-पांडव दल आँखें मींच रहा हो

चीर दुःशासन द्रुपद-सुता की…

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Added by आशीष यादव on September 6, 2020 at 8:30pm — 8 Comments

ये जिंदगी का हसीन लमहा

(12122)×4

ये ज़िंदगी का हसीन लमहा

गुजर गया फिर तो क्या करोगी

जो जिंदगी के इधर खड़ा है

उधर गया फिर तो क्या करोगी

तुम्हें सँवरने का हक दिया है

वो कोई पत्थर का तो नहीं है

लगाये फिरती हो जिसको ठोकर

बिखर गया फिर तो क्या करोगी

कि जिनकी शाखों पे तो गुमां है

मगर उन्हीं की जड़ों से नफरत

"वो आँधियों में  उखड़ जड़ों से"

शज़र गया फिर तो क्या करोगी

जिसे अनायास कोसती हो

छिपाए बैठा है पीर…

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Added by आशीष यादव on August 25, 2020 at 2:30am — 6 Comments

मगर हड़का रहा है (गजल)

उसकी ना है इतनी सी औकात मगर हड़का रहा है

झूठे में ही खा जाएगा लात मगर हड़का रहा है

औरों की बातों में आकर गाल बजाने वाला बच्चा

जिसके टूटे ना हैं दुधिया दाँत मगर हड़का रहा है

जिसके आधे खर्चे अपनी जेब कटाकर दे रहे हैं

अबकी ढँग से खा जायेगा मात मगर हड़का रहा है

आदर्शों मानवमूल्यों को छोड़ दिया तो राम जाने

कितने बदतर होंगे फिर हालात मगर हड़का रहा है

उल्फत की शमआ पर पर्दा डाल रहा है बदगुमानी

कटना मुश्किल है नफरत की रात…

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Added by आशीष यादव on August 10, 2020 at 6:36pm — No Comments

उसने पी रखी है

2122 2122 2122 2122

वो न बोलेगा हसद की बात उसने पी रखी है

सिर्फ़ होगी प्यार की बरसात उसने पी रखी है

होश में दुनिया सिवा अपने कहाँ कुछ सोचती है

कर रहा है वो सभी की बात उसने पी रखी है

मुँह पे कह देता है कुछ भी दिल में वो रखता नहीं है

वो समझ पाता नहीं हालात उसने पी रखी है

झूठ मक्कारी फ़रेबी ज़ुल्म का तूफ़ाँ खड़ा है

क्या वो सह पायेगा झंझावात? उसने पी रखी है

जबकि सब दौर-ए-जहाँ में लूटकर घर भर रहे हों…

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Added by आशीष यादव on August 3, 2020 at 12:30pm — 4 Comments

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