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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Page

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Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post है दूर मंज़िल घना तिमिर है------ग़ज़ल, इस्लाह की गुजारिश के साथ
"मेरे कहे को मान देने के लिए धन्यवाद ।"
Sep 13
Ajay Kumar Sharma commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post है दूर मंज़िल घना तिमिर है------ग़ज़ल, इस्लाह की गुजारिश के साथ
"परम् आदरणीय कबीर सर क्षमा प्रार्थी हूँ. आइन्दा से इस बात काखयाल रखूँगा. "
Sep 13
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post है दूर मंज़िल घना तिमिर है------ग़ज़ल, इस्लाह की गुजारिश के साथ
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । मतले के दोनों मिसरों में "गर" के क़वाफ़ी दोषपूर्ण हैं, किसी एक मिसरे का क़ाफ़िया बदलने का प्रयास करें ।"
Sep 13
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post है दूर मंज़िल घना तिमिर है------ग़ज़ल, इस्लाह की गुजारिश के साथ
"// बहुत सुन्दर रचना... हार्दिक बधाई...// भाई अजय कुमार शर्मा जी,इतनी छोटी टिप्पणी देना ओबीओ की परिपाटी नहीं है,ऐसा सोशल मीडिया पर चलता है, यहाँ नहीं,यहाँ पहले रचनाकार को आदर से सम्बोधित करते हैं,फिर उसकी रचना के गुण दोष बताये जाते हैं,कृपया मंच की…"
Sep 13
Ajay Kumar Sharma commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post है दूर मंज़िल घना तिमिर है------ग़ज़ल, इस्लाह की गुजारिश के साथ
"बहुत सुन्दर रचना... हार्दिक बधाई..."
Sep 12
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

है दूर मंज़िल घना तिमिर है------ग़ज़ल, इस्लाह की गुजारिश के साथ

12122 12122 12122 12122है दूर मन्ज़िल घना तिमिर है कलम का पथ जो अगर कठिन हैनहीं थकेंगे कदम हमारे हमारा व्रत भी मगर कठिन हैचलो उठाओ तमाम बातें जवाब सारा कलम ही देगीचले भले ही कदम अभी कम पता है हमको सफर कठिन हैमना ले जश्नां उड़ा मज़ाकाँ ज़माने दूँगा सलाम लाखोंसलाम वापस इधर ही होंगे हालाँकि तुमसे समर कठिन हैन पूछ काहें मैं अक्षरों की ये धार सब पर बिखेरुँ पल पलहै इक हिमालय यहाँ भी ग़म का सो आँसुओं की लहर कठिन हैदुआएं उनको जो साथ में हैं दुआ उन्हें भी जो घात पर हैंमगर नहीं हूँ हताश किंचित प्रयास का हर…See More
Sep 11
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post काँधे पर सभी शरीर गए (इस्लाह के लिए)
"आदरणीय लक्ष्मण धामी सर बहुत आभार"
Sep 11
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post काँधे पर सभी शरीर गए (इस्लाह के लिए)
"आ. भाई पंकज जी, सुंदर गजल हुयी है। हार्दिक बधाई ।"
Sep 1
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया--
"आदरणीय रवि भैया, बहुत बहुत आभार"
Aug 31
Ajay Tiwari commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post काँधे पर सभी शरीर गए (इस्लाह के लिए)
"आदरणीय पंकज जी, शेर अच्छे हैं और अब बह्र के हिसाब से भी ठीक हैं. मेरे लिए इतना ही काफी है. सादर  "
Aug 31
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)
"//और क्षमा निवेदन कि आपका कमेंट गल्ती से डिलीट हो गया// कोई बात नहीं । आपका प्रयोग सराहनीय है,लेकिन मैंने भी आपके प्रति अपना फ़र्ज़ ही निभाया है,ख़ुश रहो, सलामत रहो ।"
Aug 31
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)
"और क्षमा निवेदन कि आपका कमेंट गल्ती से डिलीट हो गया"
Aug 30
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)
"आदरणीय बाऊजी, दरअसल इस प्रयोग के लिए मेरी कोई ज़िद नहीं है, बस एक प्रयास मात्र है जो निश्चित सिद्धांतों से हर हाल अलग हैं...... इस अलग प्रयोग का एक ही कारण रहा, वो है......जब मैं इश्क़-है पढ़ता हूँ तो उसका उच्चारण इश्क्है उच्चारित होता…"
Aug 30
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)
"//ये शेरो/शायरी/मुझे इश्/क्है भई   122/ 212/   122 /1212 /सभी से/आप से/किसी ख़ा/स्से नई  122   / 212  / 122      /1212 ये जो अंत के टुकड़े को "क है भई1212,और "स से नई1212 को आपने सहीह लिया है क्या? या…"
Aug 30
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)
"122 212 122 212 ये शेरो/शायरी/मुझे इश्/क्है भईसभी से/आप से/किसी ख़ा/स्से नई क़लम चिल्/ला उठी/जहाँ के/दर्द सेकुई तड़/पा निगा/ह नम जो/ हो गई किसी नें/राष्ट्र को/तरेरी/आँख तोज़िगर औ/साँस में/चढ़ाई/ है मई सुनो ए/नाज़नीं/घमण्डी/होने काइसे इल्/ज़ाम दे/ने को…"
Aug 30
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)
"122 212 122 212 ये शेरो/शायरी/मुझे इश्/क्है भई सभी से/आप से/किसी ख़ा/स्से नई क़लम चिल्/ला उठी/जहाँ के/दर्द से कुई तड़/पा निगा/ह नम जो हो गई किसी नें/राष्ट्र को/तरेरी/आँख तो ज़िगर औ/साँस में/चढ़ाई/ है मई सुनो ए/नाज़नीं/घमण्डी/होने का इसे इल्/ज़ाम दे/ने…"
Aug 30

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog

है दूर मंज़िल घना तिमिर है------ग़ज़ल, इस्लाह की गुजारिश के साथ

12122 12122 12122 12122

है दूर मन्ज़िल घना तिमिर है कलम का पथ जो अगर कठिन है

नहीं थकेंगे कदम हमारे हमारा व्रत भी मगर कठिन है

चलो उठाओ तमाम बातें जवाब सारा कलम ही देगी

चले भले ही कदम अभी कम पता है हमको सफर कठिन है

मना ले जश्नां उड़ा मज़ाकाँ ज़माने दूँगा सलाम लाखों

सलाम वापस इधर ही होंगे हालाँकि तुमसे समर कठिन है

न पूछ काहें मैं अक्षरों की ये धार सब पर बिखेरुँ पल पल

है इक हिमालय यहाँ भी ग़म का सो आँसुओं की लहर कठिन…

Continue

Posted on September 11, 2018 at 7:52pm — 5 Comments

जिगर औ साँस में उतर आई मई (ग़ज़ल, इस्लाह के लिए)

122 212 122 212

ये शेर-ओ-शायरी? मुझे, इश्क़ है भई
सभी से, आप से; किसी ख़ास से नई

क़लम चिल्ला उठी, जहाँ के दर्द से
कुई तड़पा, निगाह नम हो गई

किसी नें राष्ट्र को तरेरी आँख तो
जिगर औ साँस में उतर आई मई

सुनो ए, नाज़नीं घमण्डी होने का
इसे इल्ज़ाम देने को बस तुम नई

महज़ खटती रहीं वो बच्चों के लिए
सभी माताओं की उम्र यूँ ही गई

मौलिक-अप्रकाशित

Posted on August 29, 2018 at 12:00am — 7 Comments

काँधे पर सभी शरीर गए (इस्लाह के लिए)

16 रुकनी ग़ज़ल

किस किस के नाम गिनाऊँ मैं, जो इस दिल मे भर पीर गए

जिस जिस को हिफाज़त सौंपी थी, वो सारे ही दिल चीर गए

वो तन्हा छोड़ गए लेकिन मैं उनको दोष नहीं दूँगा

जो तोहफे में इन दो प्यासे नयनों को दे कर नीर गए

हर गीत ग़ज़ल अशआर सभी हैं जिन लोगों की सौगातें

आबाद रहें वो, जो मुझ को, दे कर ग़म की जागीर गए

हर ख़ाब कुचल डाले मेरे, तुम रौंद गए अरमानों को

पर मुआफ़ किया मैंने तुमको, तुम चाहे कर तफ़्सीर गए

रातों की…

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Posted on August 28, 2018 at 1:30am — 18 Comments

जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया--

1212 1122 1212 112

मैं किसका नाम गिनाऊँ जो पीर भर केे गया
जिसे भी दिल मे बसाया वो चीर कर के गया
किसी दीवार पे टाँगा हुआ आईना हूँ
निगाह जिसने मिलाई वही सँवर के गया
मेरी कथा भी किसी फल भरे शजर सी है
उसी ने चोट दी जो छाँव मेंं ठहर के गया
भला क्यूँ जाग रहा हूँ मैं रोज़ रातों से
न पूछियेगा कभी कौन नींद हर के गया
ग़ुरूर क्यूँ न करे खुद पे जबकि पंकज से
मिला है जो भी…
Continue

Posted on August 26, 2018 at 1:00am — 15 Comments

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At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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