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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"
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Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने------पंकज मिश्र

1212 1222 1212 22.अदा में शोखियाँ मस्ती गुलाबी रंग धरेये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहनेये हुस्न है या कोई दरिया ही चला आया है दिल डुबोने को गालों पे इक भँवर ले केठुमकने लगते हैं सपने सलोने सरगम पर वो खिलखिला के हँसे तो लगे सितार बजेनज़र उसी पे ही सबकी टिकी है महफ़िल में ये बात और है उसकी निगाहें बस मुझ पेज़रा सा छू ने पे छुई मुई समेटे ज्यूँ खुद को नज़र पड़े तो वो खुद को समेटती वैसे.मौलिक-अप्रकाशितSee More
yesterday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 95 in the group चित्र से काव्य तक
"आओ ए सखि आज मैं, मल दूँ तुम्हें गुलाल हरा लगाऊँ एक पर, लाल दूसरे गाल थोड़ी सी चूनर सखी, पीछे लो सरकाय ताकि तुम्हारे गाल पर, रंग ज़रा चढ़ जाय होली के ये रंग सब, ज्यूँ मिल होते एक वैसे ही इस जगत के, सब जन होवें एक होली का यह पर्व है, मनस मिलन…"
Sunday
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे रुखसार हैं या दहके गुलाब-------ग़ज़ल
"आदरणीय बाऊजी प्रणाम इसमें आपके सुझाव भी सहयोगी हैं"
Mar 12
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post तेरे रुखसार हैं या दहके गुलाब-------ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।"
Mar 12
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted blog posts
Mar 8
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गए---ग़ज़ल
"आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम सुझाव पर काम होगा"
Mar 7
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गए---ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । ऐसी बह्र पर प्रयास करने से,बह्र निभाने के चक्कर में गेयता से हाथ धोना पड़ता है,इसलिए बहतर होगा कि मारूफ़ बहूर पर अभ्यास किया जाए । 'सुकून मुल्क़ का जो खुद निगल गए' इस…"
Mar 7
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" posted a blog post

क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गए---ग़ज़ल

1212 1222 1212हमारे वार से जब अरि दहल गए क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गएख़बर ख़बीस के मरने की क्या मिली वतन में कईयों के आँसू निकल गएवो बिलबिला उठे हैं जाने क्यूँ भला जो लोग देश को वर्षों हैं छल गएनसीब-ए-मुल्क़ पे उँगली उठाए हैं सुकून देश का जो खुद निगल गएमिलेगा दण्ड ए दुश्मन ज़रु'र वो और ही थे, जो तुझ पर पिघल गएमौलिक अप्रकाशितSee More
Mar 5
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
""यक" उचित होगा ।"
Mar 5
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
"आदरणीय बाऊजी सादर प्रणाम, अभी संशोधन करता हूँ.....उला मिसरे में "यक" रखने से शायद दोष दूर हो जाये"
Mar 5
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
"आदरणीय हरिओम जी सादर आभार"
Mar 5
Samar kabeer commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
"अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । मतले के ऊला में क़ाफ़िया दोष है देखियेगा ।"
Mar 5
Hariom Shrivastava commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
"वाहह,वाहहह,बहुत सुंदर ग़ज़ल"
Mar 4
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
"आदरणीय लक्ष्मण धामी सर बहुत बहुत आभार"
Mar 4
Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
"आदरणीय सतविंदर भाई बहुत बहुत आभार, रचना को समर्थन देकर आपने इसका कद और बढ़ाया है। सादर"
Mar 4
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s blog post मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल
"आ. भाई पंकज जी, सुंदर प्रस्तुति हुयी है । हार्दिक बधाई ।"
Mar 4

Profile Information

Gender
Male
City State
Azamgarh
Native Place
Azamgarh
Profession
Teaching

Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan"'s Blog

ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने------पंकज मिश्र

1212 1222 1212 22

.

अदा में शोखियाँ मस्ती गुलाबी रंग धरे

ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने

ये हुस्न है या कोई दरिया ही चला आया

है दिल डुबोने को गालों पे इक भँवर ले के

ठुमकने लगते हैं सपने सलोने सरगम पर

वो खिलखिला के हँसे तो लगे सितार बजे

नज़र उसी पे ही सबकी टिकी है महफ़िल में

ये बात और है उसकी निगाहें बस मुझ पे

ज़रा सा छू ने पे छुई मुई समेटे ज्यूँ खुद को

नज़र पड़े तो वो खुद को समेटती…

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Posted on March 17, 2019 at 7:30pm

तेरे रुखसार हैं या दहके गुलाब-------ग़ज़ल

1222 1222 2121

तेरे रुख़्सार हैं या दहके ग़ुलाब

ये तेरी ज़ुल्फ़ है या तेरा हिज़ाब

हटा के ज़ुल्फ़ का पर्दा, उँगलियों से

बिखेरो चाँदनी मुझ पर माहताब

करीब आ तो, निगाहों के पन्ने पलटूँ

मैं पढ़ना चाहूँ तेरे मन की किताब

महज़ चर्चा तुम्हारा, बातें तुम्हारी

इसे ही सब कहें, चाहत बे-हिसाब

ज़माना तुहमतें चाहे जितनी भी दे

ग़ज़ल पंकज की, है तुझको इंतिसाब

===============================

कठिन शब्दों के…

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Posted on March 8, 2019 at 8:24am — 2 Comments

क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गए---ग़ज़ल

1212 1222 1212

हमारे वार से जब अरि दहल गए
क्यूँ जाने लोग कुछ अपने ही जल गए

ख़बर ख़बीस के मरने की क्या मिली
वतन में कईयों के आँसू निकल गए

वो बिलबिला उठे हैं जाने क्यूँ भला
जो लोग देश को वर्षों हैं छल गए

नसीब-ए-मुल्क़ पे उँगली उठाए हैं
सुकून देश का जो खुद निगल गए

मिलेगा दण्ड ए दुश्मन ज़रु'र
वो और ही थे, जो तुझ पर पिघल गए

मौलिक अप्रकाशित

Posted on March 5, 2019 at 4:30pm — 2 Comments

मीडिया भारत का या तो वायरस इक बन गया---ग़ज़ल

2122 2122 2122 212

मीडिया भारत का या तो वायरस यक बन गया

दीमकों के साथ मिलकर या के दीमक बन गया

मीडिया का काम था जनता की ख़ातिर वो लड़े

किन्तु वो सत्ता के उद्देश्यों का पोषक बन गया

दोस्तों टी वी समाचारों का चैनल त्यागिए

क्योंकि उनके वास्ते हर दर्द नाटक बन गया

क्या दिखाना है, नहीं क्या क्या दिखाना चाहिए

कुछ न, जाने मीडिया, सो अब ये घातक बन गया

ज़ह्र भर कर शब्द में, वो वार जिह्वा से…

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Posted on March 3, 2019 at 10:00pm — 9 Comments

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At 4:23pm on February 28, 2016, kanta roy said…

स्वागत आपका तहेदिल आदरणीय पंकज जी।  

At 6:34pm on October 26, 2015, kanta roy said…

महीने के सक्रीय सदस्य चुने जाने के इस गौरव पल के  लिए ढेरों बधाई आपको आदरणीय पंकज जी।  

At 11:27pm on October 15, 2015,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय

पंकज कुमार मिश्रा 'वात्स्यायन' जी,
सादर अभिवादन,
यह बताते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है कि ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार में विगत माह आपकी सक्रियता को देखते हुए OBO प्रबंधन ने आपको "महीने का सक्रिय सदस्य" (Active Member of the Month) घोषित किया है, बधाई स्वीकार करें | प्रशस्ति पत्र उपलब्ध कराने हेतु कृपया अपना पता एडमिन ओ बी ओ को उनके इ मेल admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध करा दें | ध्यान रहे मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई है |
हम सभी उम्मीद करते है कि आपका सहयोग इसी तरह से पूरे OBO परिवार को सदैव मिलता रहेगा |
सादर ।
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 5:35pm on August 7, 2015, Ravi Shukla said…

स्‍वागत है पंकज जी आपका

At 11:39am on July 26, 2015, Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" said…
सभी लोगों का सादर अभिवादन
 
 
 

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