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शिज्जु "शकूर"
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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"बहुत शुक्रिया मोहतरम अनीस अरमान साहिब"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"बहुत शुक्रिया मोहतरम तस्दीक अहमद खान साहिब"
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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"बहुत शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण धामी जी"
Aug 28

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"प्रस्तुति के लिए बधाई, आदरणीय रूपम कुमार मीत जी, मोहतरम समर कबीर साहब की बात का संज्ञान लीजिएगा"
Aug 28

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"प्रस्तुति के लिए आभार आदरणीय सालिक गणवीर जी, शेष मोहतरम समर कबि साहिब ने कह ही दिया है।"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"आदरणीया रचना भाटिया जी, प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार। शेष मोहतरम समर कबीर साहिब की बात का संज्ञान लीजिएगा"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"बहुत शुक्रिया आदरणीय अजय गुप्ता जी,"
Aug 28

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"अच्छी ग़ज़ल हुई है मोहतरम मो. अनीस अरमान साहिब, बहुत बहुत मुबारक"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"बहुत खूब मोहतरम तस्दीक अहमद खान साहिब, मुबारकबाद कुबूल फरमाएँ"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"मोहरतम जनाब अमीरूद्दीन अमीर साहिब आपकी टिप्पणी मुख्य थ्रेड में आ गई। "
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"मोहतरम जनाब अमीरुद्दीन अमीर साहिब, आपका तहे दिल से शुक्रिया"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"मोहतरम अमीरूद्दीन अमीर साहिब, मोहतरम समर कबीर साहब ने तरकीब बता दी है, देख लीजियेगा। हिंदी के छंदों में, जानकारों के अनुसार शब में दो स्वतंत्र लघु होता है, जबकि ग़ज़ल के जानकार कहते है कि यह शाश्वत दीर्घ है। सादर,"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"हौसलाअफजाई के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया, कोशिश रहेगी कि मैं मंच पर सक्रिय रह सकूँ"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"जनाब इस मिसरे का वज्न मेरे हिसाब से रौ2शन2 भी1 हो2गा1 कुछ2 शब2 ता 2री2क1 घर2 मे1रा2 (221 2122 221 212) आ रहा है, इस हिसाब से यह बहर से बाहर जा रहा है।"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"//पानी अभी है कम तो न छींटाकशी करेंदरिया कभी तो अपनी रवानी में आएगा// वाह, क्या खूब शे'र है। गज़ल के लिए बधाई, इस शे'र के लिए विशेष दाद पेश करता हूँ"
Aug 28

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शिज्जु "शकूर" replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-122
"बहुत शुक्रिया आदरणीय अनिल कुमार सिंह सर,"
Aug 28

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Male
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Raipur
Profession
Freelance Creative writer
About me
I emotional and introvert person usually like to spend time alone, it is selfish nature because sometimes our beloved one wishing to spend time with us

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ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं(ग़ज़ल)

2122 2122 2122 212

ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं

अपनी सांसों से मेरी फिर गुफ़्तगू होती नहीं

गर तड़प होती न मेरे दिल में तुझको पाने की

मेरी आँखों में, मेरे ख्वाबों में तू होती नहीं

उम्र गुज़री है यहाँ तक के सफ़र में, दोस्तो!

पर ये वो मंज़िल है, जिसकी जुस्तजू होती नहीं

ये जहाँ गिनता है बस कुर्बानियों की दास्ताँ

जाँ लुटाये बिन मुहब्बत सुर्ख-रू होती नहीं

दोस्तों के दिल मुनव्वर जो नहीं होते 'शकूर'

रौशनी भी…

Continue

Posted on July 13, 2020 at 1:09pm — 10 Comments

एक ग़ज़ल - शिज्जु शकूर

221 2121 1221 212

बे-ख़्वाब आँखों में दबे लम्हात से अलग
गुज़री है ज़िन्दगानी अलामात से अलग

दस्तार रह गई है रवाजों के दरमियाँ
पर इश्क़ खो गया है रिवायात से अलग

जीने की चाह में हुआ बंजारा आदमी
बस घूमता दिखे है मक़ामात से अलग

किस रिश्ते की दुहाई दूँ अहल ए जहाँ को मैं
है क्या यहाँ पे कहिये फ़सादात से अलग

वो वक़्त और ही था कि मौसम बदलते थे
मौसम रहा न अब कोई बरसात से अलग

-मौलिक व अप्रकाशित

Posted on November 12, 2018 at 1:26pm — 13 Comments

जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है - शिज्जु शकूर

221 1222 22 221 1222 22

जितना बड़ा जो झूठा है वो, उतना ही अधिक चिल्लाता है

आवाज़ के पीछे चुपके से, रस्ते से यूँ भी भटकाता है

 

तुम बाँच रहे हो जो इतना, अज्दाद के किस्से मंचों से

उन किस्सों को सुनने वाला अब, पत्थर पे जबीं टकराता है

 

इंसान फ़कत है इक ज़र्रा, मिट जाएगा खुद इक झटके में

आकाश को छूती मीनारें, बेकार ही तू बनवाता है

 

है रंग बदलने में माहिर, हर शख़्स सियासत के अंदर

कुछ भी कहे वो लेकिन मतलब, कुछ और…

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Posted on March 25, 2018 at 8:13am — 19 Comments

इसी दुनिया में अपनी मुख़्तसर दुनिया बनाता हूँ

1222 1222 1222 1222

ज़मीन-ओ-आसमाँ के दरमियाँ रस्ता बनाता हूँ

इसी दुनिया में अपनी मुख़्तसर दुनिया बनाता हूँ



चढ़ाकर चाक पर मिट्टी कहा कुम्हार ने मुझसे

जहाँ जैसी ज़रूरत है इसे वैसा बनाता हूँ



बना लेता है अपने आप ही ये मुख़्तलिफ़ शक्लें

मेरा फ़न सिर्फ़ इतना है कि आईना बनाता हूँ



गुज़श्ता ज़िंदगी के तज़्रबों से वाकिए चुनकर

अकेला होता हूँ जब भी, कोई किस्सा…

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Posted on February 22, 2018 at 11:24am — 5 Comments

Comment Wall (31 comments)

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At 6:39am on July 2, 2018, राज़ नवादवी said…

आदरणीय शिज्जू शुकुर साहब, तरही मुशायरे में मेरी ग़ज़ल में शिरकत का दिल से शुक्रिया. समयाभाव था, कमेंट बॉक्स बंद हो चुका है. इसलिए यहाँ से आभार प्रकट कर रहूँ हूँ.सादर 

At 10:50pm on April 18, 2016, RATNA PRIYA PANDEY said…
धन्यवाद सर
At 7:06pm on January 3, 2016, Sushil Sarna said…

नूतन वर्ष 2016 आपको सपरिवार मंगलमय हो। मैं प्रभु से आपकी हर मनोकामना पूर्ण करने की कामना करता हूँ।

सुशील सरना

At 9:27pm on April 19, 2015, Mala Jha said…
सप्रेम धन्यवाद महोदय मुझे OBO जैसे प्रतिष्ठित मंच पर स्थान देने के लिए।बहुत बहुत आभार आपका।
At 9:48am on December 31, 2014, Rahul Dangi Panchal said…
आदरणीय शिज्जू "शकूर" जी आपका स्वागत है ! और धन्यवाद भी कि आपने मुझ कम बुद्धि को भी अपनी दोस्ती के काबिल समझा! सादर!
At 9:42pm on June 18, 2014, Sushil Sarna said…

aadrneey Shijju Shakoor saahib aapke margdarshan ka main aabhaaree hoon....koshish kroonga ki bataaee bahar pr aage badh skoon....tahe dil se shukriya

At 7:39pm on June 17, 2014, Sushil Sarna said…

हा हा हा …… बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय शिज्जु शकूर जी आपने हमारी रचना को कविता का दर्जा तो दिया। .... काश हमें भी ग़ज़ल लिखने का अंदाज़ आ जाए ? सर मेरी कोशिश तो ग़ज़ल लिखने की थी मगर बह्र में उलझता चला गया कभी ११२ कभी ११२१ करता फिर जब उलझन से छुटकारा न मिला तो रचना बना कर डाल दिया। आप की ज़र्रा नवाज़ी होगी अगर मेहरबानी करके इसी की नीचे लिखी चंद पंक्तियों की बह्र बना कर मुझ नौसिखिये को ग़ज़ल का हुनर सिखाएंगे। तकलीफ के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ। शुक्रिया

अपनी हर सांस में...तुझे करीब पाता हूँ
तुझे हर ख्याल में अपना हबीब पाता हूँ
बिन तेरे ज़िंदगी की हर मसर्रत है झूठी
राहे वफ़ा में तुझे अपना नसीब पाता हूँ

At 3:39pm on June 3, 2014, Sushil Sarna said…

aadrbeey Shajju jee, namaskaar-kya apko aik takleef de sakta hoon ? aapkee kripa hogee yadi mujhe thoda sa trhee gazal kya hotee hai, btaayenge. gazal to samajh rhaa hoon pr trhee gazal smajh naheen aa rhee.aapke amuly smay men se kuch smay maang rhaa hoon, please dont mind. 

sushil sarna

At 10:59am on June 3, 2014, RACHNA JAIN said…

आपकी सभी रचनाएँ बहुत खूब हैं सर .... फिर भी, आपकी सलाह पर अमल करेंगे ... शुक्रिया !!

At 10:25am on June 3, 2014, RACHNA JAIN said…

बहुत खूब लिखा सर आपने... बधाई ...!!

 
 
 

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