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Hemant kumar
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उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)

2122, 212, 2122, 212 उससे मुझको सच मे कोई शिकायत भी नही, हाँ मगर दिल से मिलूँ अब ये चाहत भी नही। इस बुरुत पर ताव देने का मतलब क्या हुआ, गर बचाई जा सके खुद की इज्जत भी नही। अब अँधेरा है तो इसका गिला भी क्या करें, ठीक तो अब रौशनी की तबीअत भी नही। आती हैं आकर चली जाती हैं यूँ ही मगर, इन घटाओं मे कोई अब इक़ामत भी नही। जुल्म सहने का हुआ ये भी इक अन्जाम है, अब नजर आँखों में आती बगावत भी नही। मौलिक व अप्रकाशितSee More
13 hours ago
Ravi Shukla commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"आदरणीय समर साहब हमारी शंका के समाधान के लिए आपका शुक्रिया। सादर"
Monday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"वाह आदरणीय शानदार ग़ज़ल.."
Sunday
Hemant kumar commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"आदरणीय त्रिपाठी जी बहुत बहुत आभार आपका इस तरह हौसला बढ़ाने के लिए.. सादर..."
Friday
Hemant kumar commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"आदरणीय सेवगाँवकर जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका...ग़ज़ल को पसंद करने के लिए सादर.."
Friday
Hemant kumar commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"आदरणीय सेवगाँवकर जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका...ग़ज़ल को पसंद करने के लिए सादर.."
Friday
Hemant kumar commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"आदरणीय कबीर सर प्रणाम! ग़ज़ल को पसंद करने के लिए आपका शुक्रिया बस इसी तरह स्नेह बनाएँ रखें। सादर...."
Friday

सदस्य कार्यकारिणी
शिज्जु "शकूर" commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"अच्छी ग़ज़ल हुई है आ. हेमंत जी बहुत बहुत बधाई, शेष आ. रवि शुक्ल जी बता ही चुके हैं"
Friday
Naveen Mani Tripathi commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"वाह बहुत खूब ।"
Friday
Nilesh Shevgaonkar commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"बहुत खूब आ. हेमंत जी...अच्छी ग़ज़ल के लिये बधाई..."
Apr 20
Samar kabeer commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"जनाब हेमन्त कुमार जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ । बाक़ी जनाब रवि जी बता ही चुके हैं ।"
Apr 20
Samar kabeer commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"जी,रवि जी 'शिकस्ते नारवां'नहीं,"शिकस्त-ए-हर्फ़-ए-नारवा',जी हाँ गुंजाइश है ।"
Apr 20
Hemant kumar posted blog posts
Apr 20
Hemant kumar commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"आदरणीय सर प्रणाम! ग़ज़ल की सराहना के लिए एवं सुधारात्मक सुझाव देने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। "अब नजर आखों में आती बगावत भी नही" से सुधार कर रहा हूँ। चौथे शेर के सानी मिसरे मे "बरसती"को सही वज्न में लाने की कोशिश करूंगा...बस…"
Apr 20
Ravi Shukla commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"एक सवाल और है जो भी गुण्‍ाी जन इस गजल पर आएं कृपया बताएं कि इस बहर में शिकस्‍ते नारवां की गुजांइश  है या नहीं । हमें पढने में लग रहा है ।"
Apr 20
Ravi Shukla commented on Hemant kumar's blog post उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)
"आदरणीय हेमंत जी  अच्‍छी  गजल कही है आपने मुबारकबाद कुबूल करें । आखिरी शेर पर नज्र और नजर में हमें कुछ संशय है आप शायद देखने की बात कर रहे है आपने नज्र लफ्ज लिया है जिसका अर्थ अता करना है देना है । शेर के हिसाब से नजर उपयुुक्‍त हो…"
Apr 20

Profile Information

Gender
Male
City State
Bhatapara. Cg
Native Place
Raipur
Profession
Teacher at education

Hemant kumar's Blog

उस से मुझको सच में कोई शिकायत भी नही (ग़ज़ल)

2122, 212, 2122, 212



उससे मुझको सच मे कोई शिकायत भी नही,

हाँ मगर दिल से मिलूँ अब ये चाहत भी नही।



इस बुरुत पर ताव देने का मतलब क्या हुआ,

गर बचाई जा सके खुद की इज्जत भी नही।



अब अँधेरा है तो इसका गिला भी क्या करें,

ठीक तो अब रौशनी की तबीअत भी नही।



आती हैं आकर चली जाती हैं यूँ ही मगर,

इन घटाओं मे कोई अब इक़ामत भी नही।



जुल्म सहने का हुआ ये भी इक अन्जाम है,

अब नजर आँखों में आती बगावत भी नही।



मौलिक व…

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Posted on April 20, 2017 at 11:00am — 13 Comments

ग़ज़ल

२१२२/१२१२/२२

हमने अपने ही पाँव काटे हैं,
इस सड़क पर के छाँव काटे हैं।

जो परींदा मजे से रहता था,
उनके तो सारे ठाँव काटे हैं।

दौड़ना चाहती है हर बेवा,
पर ये दुनिया ने पाँव काटे हैं।

वार जिसने भी करना चाहा तो,
उसके तो सारे दाँव काटे हैं।

जानकर जा रहे शहर(१२) तुम भी,
इस शहर(१२)ने ही गाँव काटे हैं।

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on April 6, 2017 at 9:00pm — 12 Comments

ग़ज़ल

२२१२/२२१२/२२१२

बाजा़र मे दिल आज़माया कर कभी,
दिल बेचने भी यार आया कर कभी।

दिल टूटने का दर्द अब होगा नही,
इन पत्थरों से दिल लगाया कर कभी।

माना सितारों से बहुत हैं प्यार पर,
जुगनूओं को घर भी बुलाया कर कभी।

दुनिया अमीरों के मुआफ़िक हैं मगर,
कुछ घर ग़रीबी के सज़ाया कर कभी।

बे-शक ये रास्ते हैं तरक़्की़ के मगर,
पैमाना पर इनका बनाया कर कभी।

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on March 28, 2017 at 9:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल

बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आखिर
२१२/२१२/२१२/२

रहनुमाई की बरसात है क्या।
फिर चुनाओं के हालात हैं क्या।

झुठ भी बोलो अगर तो सही है,
ये सियासत के शहरात है क्या।

शह्र मे आग है फिर पुरानी ,
दंगो से फिर ये हालात है क्या।

चीखें फिर से सुनाई दे कोई,
बहनों के लूटे अस्मात है क्या।

लोग कितने मजे से यहाँ हैं,
शह्र के ये हवालात हैं क्या।

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on February 26, 2017 at 8:00pm — 6 Comments

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At 4:38pm on February 8, 2017,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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