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विनय कुमार
  • Male
  • Varanasi , U P
  • India
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बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on विनय कुमार's blog post जुनून--लघुकथा
"बहुत ही खूबसूरती से दर्द का चित्रण किया है..सादर"
Saturday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post जुनून--लघुकथा
"बहुत बहुत शुक्रिया आ महेंद्र कुमारजी, वह महिला राजन की पत्नी भी हो सकती है और उसकी अंतरंग महिला मित्र भी| धन्यवाद इस टिपण्णी के लिए"
Thursday
Mahendra Kumar commented on विनय कुमार's blog post जुनून--लघुकथा
"रफ़्तार के जुनून पर केन्द्रित अच्छी लघुकथा है आ. विनय जी. दुआ करने वाली महिला पात्र राजन की कौन थी, यदि आप इसका भी ज़िक्र कर देते तो बेहतर रहता. मेरी तरफ़ से हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
Wednesday
विनय कुमार posted a blog post

जुनून--लघुकथा

बस आज की रात निकल जाए किसी तरह से, फिर सोचेंगे, यही चल रहा था उसके दिमाग में| दिन तो किसी तरह कट गया लेकिन रात तो जैसे हर अनदेखा और अनसोचा डर सामने लेकर आ खड़ी होती है और आज की रात तो जैसे अपनी पूरी भयावहता के साथ बीत रही थी| डॉक्टर की दी हुई हिदायत कि आज की रात बहुत भारी है, उसे रह रह कर डरा देती थी|कितनी बार उसने दबे स्वर में मना भी किया था कि जिंदगी के प्रति इतने लापरवाह भी मत रहो| लेकिन राजन ने कभी सुनी थी उसकी, बस एक बड़े ठहाके में उसकी हर बात उड़ा देता| "जिंदगी उनका वरण करती है जो उसे जी…See More
Wednesday
विनय कुमार commented on Manan Kumar singh's blog post विमोचन(लघु कथा)
"साहित्य की वर्तमान हालात को बयां करती बढ़िया रचना, बहुत बहुत बधाई आपको"
Wednesday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आ मुहतरम समर कबीर साहब"
Jan 15
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आ महेंद्र कुमार जी"
Jan 15
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आ सुरेंद्र नाथ सिंह जी"
Jan 15
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आ कल्पना भट्ट जी"
Jan 15
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार आ अजय तिवारी साहब"
Jan 15
Mahendra Kumar commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"बढ़िया लघुकथा है आ. विनय जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
Jan 15
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"आद0 विनय कुमार जी सादर अभिवादन।बढिया लघुकथा है,मार्मिक।बहुत बहुत बधाई इसपर।"
Jan 15
Samar kabeer commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"जनाब विनय कुमार जी आदाब,बहुत उम्दा लघुकथा है, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Jan 14
KALPANA BHATT ('रौनक़') commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"हृदय स्पर्शी लघुकथा कही है आपने आदरणीय विनय सर| बधाई स्वीकारें आदरणीय|"
Jan 13
Ajay Tiwari commented on विनय कुमार's blog post मुआफ़ी- लघुकथा
"आदरणीय विनय जी, असाधारण सादगी के साथ आपके गद्य में असाधारण अभिव्यंजना की क्षमता भी है. कथा बहुत स्पर्शी है.हार्दिक बधाई. "
Jan 13
विनय कुमार posted a blog post

मुआफ़ी- लघुकथा

धीरे धीरे सभी जुटने लगे थे, नजदीक के रिश्तेदार भी लगभग आ गए थे| उनके मोबाइल पर लगातार बेटे का फोन आ रहा था कि बस पहुँच रहे हैं माँ के अंतिम दर्शन करने के लिए| आंगन में विभा का शरीर सफ़ेद कपड़े में लपेट कर रखा हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे वह हमेशा से ऐसी ही शांति में जी रही थी| उन्होंने एक बार फिर समय देखा और पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ चुपचाप बैठ गए| बाहर गाड़ियों की आवाज़ आयी और फिर थोड़ी देर में रोने धोने की आवाज़ भी आने लगी| बेटा परिवार सहित अंदर आया और फिर उनका विलाप शुरू हो गया| उनको यह सब…See More
Jan 13

Profile Information

Gender
Male
City State
Johannesburg
Native Place
Varanasi
Profession
Banker
About me
पिछले कई सालों से लगातार पढ़ते रहने के बाद कुछ लिखने की प्रेरणा मिली तो लिखना प्रारम्भ किया |

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जुनून--लघुकथा

बस आज की रात निकल जाए किसी तरह से, फिर सोचेंगे, यही चल रहा था उसके दिमाग में| दिन तो किसी तरह कट गया लेकिन रात तो जैसे हर अनदेखा और अनसोचा डर सामने लेकर आ खड़ी होती है और आज की रात तो जैसे अपनी पूरी भयावहता के साथ बीत रही थी| डॉक्टर की दी हुई हिदायत कि आज की रात बहुत भारी है, उसे रह रह कर डरा देती थी|

कितनी बार उसने दबे स्वर में मना भी किया था कि जिंदगी के प्रति इतने लापरवाह भी मत रहो| लेकिन राजन ने कभी सुनी थी उसकी, बस एक बड़े ठहाके में उसकी हर बात उड़ा देता| "जिंदगी उनका वरण करती है जो…

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Posted on January 17, 2018 at 3:00pm — 3 Comments

मुआफ़ी- लघुकथा

धीरे धीरे सभी जुटने लगे थे, नजदीक के रिश्तेदार भी लगभग आ गए थे| उनके मोबाइल पर लगातार बेटे का फोन आ रहा था कि बस पहुँच रहे हैं माँ के अंतिम दर्शन करने के लिए| आंगन में विभा का शरीर सफ़ेद कपड़े में लपेट कर रखा हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे वह हमेशा से ऐसी ही शांति में जी रही थी| उन्होंने एक बार फिर समय देखा और पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ चुपचाप बैठ गए|

बाहर गाड़ियों की आवाज़ आयी और फिर थोड़ी देर में रोने धोने की आवाज़ भी आने लगी| बेटा परिवार सहित अंदर आया और फिर उनका विलाप शुरू हो गया| उनको…

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Posted on January 12, 2018 at 8:39pm — 10 Comments

कशमकश--लघुकथा

अजीब सी कशमकश में गुजर रहे थे हरी बाबू पिछले एक हफ्ते से, एक तरफ उनके खुद के विचार तो दूसरी तरफ एक छोटी सी चीज पर उनकी असहमति| बेटी अर्पिता पिछले दो साल से नौकरी में थी और उन्होंने कह रखा था कि या तो खुद ही शादी कर लो या जहाँ मन हो बता देना, शादी कर देंगे| लेकिन अपने उदार सोच और प्रगतिशील विचारों के बावजूद एक छोटी सी बात वह चाह कर भी किसी से नहीं कह पाए थे|

वैसे तो उनके सभी मज़हब और जातियों के दोस्त थे और उन्होंने कभी उनमें फ़र्क़ भी नहीं किया| लेकिन पिछले कई वर्षों से धर्म के आधार पर हो…

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Posted on December 20, 2017 at 6:30pm — 4 Comments

पिंजरा--लघुकथा

जैसे ही आशिया घर में घुसी उसे चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आयी. चारो तरफ देखते हुए उसकी नज़र किनारे मेज पर रखे एक पिंजरे पर पड़ी जिसमें कई सारे रंगीन पक्षी कूद फांद कर रहे थे. उसने उछलते हुए पिंजरे की तरफ रुख किया और जब तक वह पिंजरे के पास पहुंचती, सामने से अब्बू आते दिखे.

"कितने प्यारे पक्षी हैं न आशिया, तुम्हारे लिए ही लाये हैं मैंने", अब्बू ने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा.

आशिया ने हँसते हुए अब्बू को शुक्रिया कहा और पिंजरे के पास खड़ी हो गयी. एक से एक खूबसूरत और प्यारे पक्षी, उसे लगा…

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Posted on December 14, 2017 at 6:12pm — 12 Comments

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At 1:14am on July 16, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विनय जी 

At 4:37am on April 30, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

 
 
 

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सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल ( निकल कर तो आओ कभी रोशनी में )
"आद0 तस्दीक अहमद साहिब, बहुत बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने,बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल पर।"
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