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विनय कुमार
  • Male
  • Varanasi , U P
  • India
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विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post अपना चेहरा- लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ लक्मण रामानुज लड़ीवालाजी और सलीम रज़ा रेवा जी   "
Oct 23
SALIM RAZA REWA commented on विनय कुमार's blog post अपना चेहरा- लघुकथा
"आ. ख़ूबसूरत लघुकथा के लिए मुबारक़बाद."
Oct 19
लक्ष्मण रामानुज लडीवाला commented on विनय कुमार's blog post अपना चेहरा- लघुकथा
"अच्छी लगी लघु कथा  ! बधाई स्वीकारे "
Oct 18
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post अपना चेहरा- लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ मोहतरम समर कबीर साहब "
Oct 18
Samar kabeer commented on विनय कुमार's blog post अपना चेहरा- लघुकथा
"जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लगी आपकी लघुकथा,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Oct 18
विनय कुमार commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post मधु-मीतों का व्यक्तिवाद (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"वर्तमान परिस्थितियों पर बढ़िया तंज कस्ती रचना के लिए बहुत बहुत बधाई आ शेख शहज़ाद साहब"
Oct 18
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post अपना चेहरा- लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ शेख शहज़ाद साहब "
Oct 18
विनय कुमार commented on Mohammed Arif's blog post लघुकथा--मलिका
"वाह और आह दोनों इस लघुकथा के लिए, बहुत बहुत बधाई इस गहरी चोट करती रचना के लिए आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब"
Oct 18
Sheikh Shahzad Usmani commented on विनय कुमार's blog post अपना चेहरा- लघुकथा
"आइना दिखाती हुई, सबक़ देती हुई बेहतरीन भावपूर्ण रचना के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद मुहतरम जनाब विनय कुमार साहब।"
Oct 18
विनय कुमार posted a blog post

अपना चेहरा- लघुकथा

"सरकार, आज अगर एक बार देख लिया जाए तो हमका तसल्ली होइ जात", लच्छू की आवाज़ बहुत घबराई लग रही थी| उसने एक बार सर ऊपर उठाया और लच्छू को गौर से देखा, दोनों हाथ जोड़े हुए उसका चेहरा बेहद कातर लग रहा था|"किसको देखना था लच्छू?, लच्छू कई बार किसी के लिए कह रहा था, इतना तो याद आया लेकिन किसके लिए कहा था, याद नहीं आया| कितनी बार तो टाल चुके हैं इसको, फिर भी!"सरकार, पतोहू कई दिन से बीमार है और लड़का बाहर काम करत है, एक बार आप देख लेते तो ठीक हो जात", लच्छू की आवाज़ में अब थोड़ी उम्मीद जग गयी|एकदम से उनके अंदर…See More
Oct 17
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post परंपरा और गुलामी--
"बहुत बहुत आभार आ कल्पना भट्ट जी, आपकी इस विस्तृर और उत्साह बढ़ाने वाली टिपण्णी ने उत्साह भर दिया, शुक्रिया "
Oct 12
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post परंपरा और गुलामी--
"बहुत बहुत आभार आ मोहतरम समर कबीर साहब "
Oct 12
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post अपने अपने जज़्बात- लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ ब्रजेश कुमार बज्र जी "
Oct 12
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on विनय कुमार's blog post अपने अपने जज़्बात- लघुकथा
"उम्दा पेशकस के लिए बधाई आदरणीय.."
Oct 11
Samar kabeer commented on विनय कुमार's blog post परंपरा और गुलामी--
"जनाब विनय कुमार जी आदाब,बहुत बढ़िया लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Oct 11
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post परंपरा और गुलामी--
"बहुत बहुत आभार आ मोहतरम शेख शहज़ाद साहब "
Oct 11

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Male
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Johannesburg
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Varanasi
Profession
Banker
About me
पिछले कई सालों से लगातार पढ़ते रहने के बाद कुछ लिखने की प्रेरणा मिली तो लिखना प्रारम्भ किया |

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अपना चेहरा- लघुकथा

"सरकार, आज अगर एक बार देख लिया जाए तो हमका तसल्ली होइ जात", लच्छू की आवाज़ बहुत घबराई लग रही थी| उसने एक बार सर ऊपर उठाया और लच्छू को गौर से देखा, दोनों हाथ जोड़े हुए उसका चेहरा बेहद कातर लग रहा था|

"किसको देखना था लच्छू?, लच्छू कई बार किसी के लिए कह रहा था, इतना तो याद आया लेकिन किसके लिए कहा था, याद नहीं आया| कितनी बार तो टाल चुके हैं इसको, फिर भी!

"सरकार, पतोहू कई दिन से बीमार है और लड़का बाहर काम करत है, एक बार आप देख लेते तो ठीक हो जात", लच्छू की आवाज़ में अब थोड़ी उम्मीद जग…

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Posted on October 17, 2017 at 3:48pm — 7 Comments

परंपरा और गुलामी--

"कल की फोटो देखी मैंने, बहुत सुंदर दिख रही थीं आप", उसने ऑफिस में अपनी कलीग से कहा|

"अरे कल वो व्रत था ना, उसमें तो सजना बनता था", मुस्कुराते हुए वह बोली|

"अच्छा, तो आप भी यह सब मानती हैं, मुझे लगा कि आप आजाद ख्याल की हैं", उसके लहजे में व्यंग्य था या सहानुभूति, वह समझ नहीं पायी|

"ऐसी बात नहीं है, मैं तो बस परंपरा निभाने के लिए ऐसा कर लेती हूँ| वैसे इसी बहाने थोड़ी शॉपिंग भी हो जाती है, पति से गिफ्ट भी मिल जाता है", थोड़ी सफाई सी देती हुए वह बोली|

"मतलब परंपरा की आड़ में सब कुछ…

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Posted on October 10, 2017 at 11:46am — 6 Comments

अपने अपने जज़्बात- लघुकथा

"हाय मम्मी, कैसी है, तबियत ठीक है ना तुम्हारी और दवा रोज ले रही हो ना", रोज के यही सवाल होते थे सिम्मी के और उसका रोज का जवाब।

"अब वीडियो काल किया है तो देख ही रही है मुझे, मैं एकदम ठीक हूँ। अच्छा अभी कितना बज रहा है वहाँ पर", उसने अपनी दीवाल घड़ी को देखते हुए पूछा।

"रोज तो बताती हूँ, बस साढ़े तीन घंटे आगे चलती है घड़ी यहाँ, अभी शाम के सिर्फ सात ही बजे हैं"।

"मुझे याद नहीं रहता, हमेशा उलझ जाती हूँ कि हमारी घड़ी आगे है या तुम्हारी। और मेहमान आए कि नहीं अभी, छोटू कैसा है", उसने भी…

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Posted on October 9, 2017 at 5:54pm — 12 Comments

दर्द का एहसास--

"मैडम, इस तरह कैसे चलेगा, बिना छुट्टी लिए आप गायब हो जाती हैं| यह ऑफिस है, ध्यान रखिये, पहले भी आप ऐसा कर चुकी हैं", जैसे ही वह ऑफिस में घुसी, बॉस ने बुलाकर उसे झाड़ दिया| उसने एक बार नजर उठाकर बॉस को देखा, उसकी निगाहों में गुस्सा कम, व्यंग्य ज्यादा नजर आ रहा था| बगल में बैठी बॉस की सेक्रेटरी को देखकर उसको उबकाई सी आ गयी|

लगभग तीन महीने हो रहे थे उसको इस ऑफिस में, पूरी मेहनत से और बिना किसी से लल्लो चप्पो किये वह अपना काम करती थी| ऑफिस में कुछ महिलाएं भी थीं जिनके साथ वह रोज लंच करती थी…

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Posted on September 27, 2017 at 1:00am — 12 Comments

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At 1:14am on July 16, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विनय जी 

At 4:37am on April 30, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

 
 
 

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