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विनय कुमार
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विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post नींव की ईंट--लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ मुहतरम जनाब समर कबीर साहब"
23 hours ago
Samar kabeer commented on विनय कुमार's blog post नींव की ईंट--लघुकथा
"जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
yesterday
विनय कुमार posted a blog post

नींव की ईंट--लघुकथा

"अरे लल्ला, साहब लोगन के लिए दुइ कप चाय तो बनवा दो", दशरथ ने आवाज लगाया. "रहने दीजिये, अभी तो यहाँ खाना खाया, चाय की जरुरत नहीं है", उसने दशरथ को मना किया. तब तक बगल में बैठे मलखान ने लल्ला को आवाज़ लगायी "अरे चाय नहीं, काफ़ी बनवाओ, और हाँ कम शक्कर वाली", और उन्होंने मुस्कुराते हुए ऐसे देखा जैसे मन की बात पकड़ ली हो. उसने फिर से मना किया लेकिन तब तक लल्ला घर के अंदर घुस गया. गाँव में अभी भी काफी चहल पहल थी. "साहब आपको १२ बजे आना था, असली मेला तो ओही समय था. कल से अखंड रामायण करवाए थे जो दिन में…See More
Sunday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post सहारा- लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ समर कबीर साहब"
Saturday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post सहारा- लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ शेख शहज़ाद उस्मानी साहब"
Saturday
Samar kabeer commented on विनय कुमार's blog post सहारा- लघुकथा
"जनाब विनय कुमार जी आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani commented on विनय कुमार's blog post सहारा- लघुकथा
"बेहतरीन यथार्थपूर्ण, कटाक्षपूर्ण व प्रेरक विचारोत्तेजक सृजन।.हार्दिक बधाइयाँ आदरणीय विनय कुमार साहिब।"
Friday
विनय कुमार posted a blog post

सहारा- लघुकथा

कितनी ही बार वह प्रयास कर चुका था लेकिन झोला संभालने में वह अपने आप को असमर्थ पा रहा था. अपने आप पर उसे अब क्रोध आने लगा, क्या जरुरत थी पैदल आकर सब्जी खरीदने की. स्कूटर रहता तो कम से कम उसपर इसे रख तो लेता लेकिन अब करे? सब्जियों से ठसाठस भरा झोला उठाने में उसे वैसे ही बहुत कठिनाई हो रही थी और उस पर इसकी पट्टी को आज ही टूटना था. अब घर कैसे जाए, झख मारकर उसने घर पर बेटे को फोन लगाया. बेटा भी मैच देखने में मगन था तो उसने भी टालते हुए कहा "अरे एक रिक्शा ले लीजिये और आ जाईये", और फोन रख दिया. बड़ी…See More
Friday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post देश प्रेम—लघुकथा
"बहुत बहुत आभार आ बबीता गुप्ता जी"
Wednesday
विनय कुमार commented on विनय कुमार's blog post रुके हुए शब्द- कहानी
"बहुत बहुत आभार आ बबीता गुप्ता जी"
Wednesday
babitagupta commented on विनय कुमार's blog post रुके हुए शब्द- कहानी
"ऊँच-नीच का भेदभाव दिमाग में परिचय मिलते ही नजरिया बदल देती हैं,कोइ महानुभाव होगा  जो इन सबसे सर्वोपरि होता हैं.बेहतरीन रचना ,मानसिक सोच को दर्शाती ,हार्दिक बधाई स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।"
Wednesday
babitagupta commented on विनय कुमार's blog post देश प्रेम—लघुकथा
"आज लड़ाई सरहद से ज्यादा आंतरिक लड़ाई को सुलझाने की हैं.बेहतरीन रचना स्वीकार कीजियेगा आदरणीय सरजी।"
Wednesday
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-94
"बहुत बहुत आभार आ तस्दीक अहमद खान साहब"
Aug 10
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-94
"बहुत बहुत आभार आ अजय गुप्ता जी"
Aug 10
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-94
"बहुत बहुत आभार आ समर कबीर साहब"
Aug 10
विनय कुमार replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-94
"वाह, सावन पर बहुत सुंदर दोहे लिखे है आपने आ डॉ छोटेलाल सिंह जी, बहुत बहुत बधाई आपको"
Aug 10

Profile Information

Gender
Male
City State
Johannesburg
Native Place
Varanasi
Profession
Banker
About me
पिछले कई सालों से लगातार पढ़ते रहने के बाद कुछ लिखने की प्रेरणा मिली तो लिखना प्रारम्भ किया |

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नींव की ईंट--लघुकथा

"अरे लल्ला, साहब लोगन के लिए दुइ कप चाय तो बनवा दो", दशरथ ने आवाज लगाया.

"रहने दीजिये, अभी तो यहाँ खाना खाया, चाय की जरुरत नहीं है", उसने दशरथ को मना किया. तब तक बगल में बैठे मलखान ने लल्ला को आवाज़ लगायी "अरे चाय नहीं, काफ़ी बनवाओ, और हाँ कम शक्कर वाली", और उन्होंने मुस्कुराते हुए ऐसे देखा जैसे मन की बात पकड़ ली हो. उसने फिर से मना किया लेकिन तब तक लल्ला घर के अंदर घुस गया. गाँव में अभी भी काफी चहल पहल थी.

"साहब आपको १२ बजे आना था, असली मेला तो ओही समय था. कल से अखंड रामायण करवाए थे…

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Posted on August 18, 2018 at 10:43pm — 2 Comments

सहारा- लघुकथा

कितनी ही बार वह प्रयास कर चुका था लेकिन झोला संभालने में वह अपने आप को असमर्थ पा रहा था. अपने आप पर उसे अब क्रोध आने लगा, क्या जरुरत थी पैदल आकर सब्जी खरीदने की. स्कूटर रहता तो कम से कम उसपर इसे रख तो लेता लेकिन अब करे? सब्जियों से ठसाठस भरा झोला उठाने में उसे वैसे ही बहुत कठिनाई हो रही थी और उस पर इसकी पट्टी को आज ही टूटना था.

अब घर कैसे जाए, झख मारकर उसने घर पर बेटे को फोन लगाया. बेटा भी मैच देखने में मगन था तो उसने भी टालते हुए कहा "अरे एक रिक्शा ले लीजिये और आ जाईये", और फोन रख…

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Posted on August 17, 2018 at 12:30pm — 4 Comments

देश प्रेम—लघुकथा

आज फिर अब्बू सुबह सुबह शुरू हो गए थे, “तुझे फौजी ही बनना चाहिए, और कुछ नहीं”. 

दरअसल आज फिर अखबार के पहले पन्ने पर छपा था कि दहशतगर्दों से लड़ाई में कई फौजी शहीद हो गए और उनकी अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ की जाएगी.

पिछले कई दिन से वह अपने प्ले के रिहर्सल में लगा हुआ था. वर्तमान राजनीति और धर्म के घालमेल के दुष्परिणाम पर आधारित उसका प्ले, जिसे खुद उसी ने लिखा था. और अपने कुछ रंगकर्मी दोस्तों के साथ आने वाले स्वतन्त्रता दिवस पर लोगों के सामने प्रदर्शित करने की पुरजोर कोशिश…

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Posted on August 9, 2018 at 1:00pm — 8 Comments

रुके हुए शब्द- कहानी

ट्रेन स्टेशन छोड़ चुकी थी, रिज़र्वेशन वाले डब्बे में भी साधारण डब्बे जैसी भीड़ थी. अपना बैग कंधे पर टाँगे और छोटा ब्रीफकेस खींचते हुए शंभू डब्बे में अंदर बढ़े. लगभग हर सीट पर कई लोग बैठे हुए थे और शंभू को कहीं जगह नजर नहीं आ रही थी. जहां भी वह बैठने का प्रयत्न करते, लोग उन्हे झिड़क देते. अचानक साइड वाली एक सीट पर उनकी नजर पड़ी जहां सिर्फ एक ही व्यक्ति बैठा हुआ था. शंभू लपक कर सीट पर एक तरफ बैठ गये और अपना ब्रीफकेस उन्होने सीट के नीचे घुसा दिया. अक्सर सफर करनेवाले शंभू को इन परिस्थितियों से भी…

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Posted on August 8, 2018 at 2:00pm — 6 Comments

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At 1:14am on July 16, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय विनय जी 

At 4:37am on April 30, 2015,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार की ओर से आपको जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनायें 

 
 
 

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5 hours ago
नवीन श्रोत्रिय उत्कर्ष added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
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