राज़ नवादवी commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-४१ (बाकी रह गया इक शख्स जो राज़ नवादवी है)
राज़ नवादवी commented on Er.vir parkash panchal's blog post पत्थरों के शहर में
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Laxman Prasad Ladiwala commented on राज़ नवादवी's blog post राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-४१ (बाकी रह गया इक शख्स जो राज़ नवादवी है)
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राज़ नवादवी commented on SANDEEP KUMAR PATEL's blog post दीदार के खातिर यूँ आवाम दिवानी है
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राज़ नवादवी commented on वीनस केसरी's blog post कहानी - नशा - वीनस केसरीPosted on October 31, 2012 at 9:03am 6 Comments 0 Likes
दिन ऐसे गुज़र जाते है जैसे हाथ से ताश के पत्ते. देखते देखते महोसालोदहाई सर्फ़ हो गए, कहाँ गए सब? ज़िंदगी में जो बीत गया, किधर चला चला गया? जो लोग अब नहीं हैं तकारुब में और जिनके मख्फी साये ही ज़हन में आते जाते हैं, वो कहाँ हैं अभी? ख्वाहिशों से भी मुलायम सपने जो कभी पूरे नहीं हुए, उदासियों सी भी तन्हा कोई राहगुज़र जो कभी मंजिल तक न पहुँच पाई, दिल की सोजिशों से भी रंजीदा इक नज़र जो झुक गई मायूसियों के बोझ तले- क्या हुआ उनका?
तुम्हारे गाँव का वो खाली खाली घर जहाँ बसी है आईने के…
ContinuePosted on October 26, 2012 at 12:30pm 11 Comments 1 Like
घरों में सीलिंग फैन्स की घड़घड़ाहट बंद सी होने लगी है और दिन सुबुकपा और रातें संगीन. मौसम ने करवट की इक गर्दिश पूरी की हो जैसे- धूप की शिद्दत खत्म होने लगी है और सुकून और मुलायमियत के झीने से सरपोश के उस तरफ साकित ओ मुतमईन, आयंदा और तबस्सुमफिशाँ कुद्रत के नए रूप का एहसास होने लगा है. घर की हर शै जैसे तपिश भरी दोपहरियों से सज़ायाफ्ता ज़िंदगी की नींद से बेदार होने लगी है और जल रहे लोबान के धुंए की तरह दूदेसुकूत फजाओं में फ़ैल रहा है. ये आमदेसरमा (जाड़े के मौसम के आगमन) के बेहद इब्तेदाई रोज़…
ContinuePosted on October 19, 2012 at 11:51pm 8 Comments 0 Likes
बहरे रमल मुसम्मन महजूफ़
(वज़न- फायलातुन फायलातुन फायलातुन फाएलुन)
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मुलाहिजा फरमाएं:
बात क्यूँ करते हो मुझसे इश्रतोआराम की
हुस्नवालों की दलीलें हैं मिरे किस काम की
कब हुई तस्लीम मेरी इक ज़रा सी इल्तेजा
दास्तानें कब हुईं मंसूख तेरे नाम की
जाग जाओ सोने वालो अपने मीठे ख्वाब से
घंटियाँ बजने लगी हैं शह्र में आलाम की
पीछे पीछे नामाबर…
ContinuePosted on October 13, 2012 at 11:19am 10 Comments 1 Like
ऐतिहासिक इमारतों में कितना आकर्षण समाया है. इक पूरी ज़िंदगी और ज़माने का कोई थ्री डी अल्बम हों ये जैसे. ख्यालों की लम्बी दौड़ लगानेवालों के लिए गोया ये फंतासी, रूमानियत, त्रासदी, और न जाने किन किन रंगों के तसव्वुरात की कब्रगाह या कोई मज़ार हैं ये इमारतें.
ज़िंदगी जीते हुए जितनी हसीन नहीं लगती उससे कहीं अधिक माजी के धुंधले आईने में नज़र आती है. जैसे गर्द से आलूदा किसी शीशे में कोई हसीन सा चेहरा पीछे से झांकता नज़र आ जाए और हम खयालों में मह्व (खोए), हौले से अपनी उंगुलियाँ आगे…
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DEEPAK SHARMA 'KULUVI' said… welcome sir
DEEPAK SHARMA 'KULUVI' said… aapki rachnaen behatreen hain
नादिर ख़ान said… मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं
मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई
मैं भी न मिल सका उसे पिछले बरसके बाद
तनहा कली कहीं कोई मुरझा के रह गई
बहुत ही उम्दा गज़ल है राज़ भाई बहुत ख़ूब
प्रमेन्द्र डाबरे said… राज़ साहब आपने मुझ नाचीज़ की भी रचना पढ़ी मैं धन्य हो गया, आपकी दाद मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा है और कुछ और अच्छा लिखने की प्रेरणा अब मुझे मिलती रहेगी.... आपका तलबगार प्रमेन्द्र डाबरे
लोकेश सिंह said… राज भाई तहे दिल से मेरा शुकराना स्वीकार करे ,आपके स्नेहिल वचन मुझे और अच्छे काव्य की रचना की प्रेरणा देंगे ,सराहना के लिए बहुत -बहुत साधुवाद ......लोकेश सिंह
Albela Khatri said… राज़ साहेब, आप नये हैं ये मुझे मालूम नहीं था क्योंकि मैं ख़ुद यहाँ नया हूँ......हा हा हा हा ....लेकिन आपसे पहली मुलाक़ात अच्छी रही........मुझे इस महफ़िल में बहुत प्यार और मुहब्बत से नवाज़ा गया है और आप भी यहाँ के दोस्ताना माहौल में रस से सराबोर हो जायेंगे . ऐसा मेरा यक़ीन है
___ओ बी ओ है ही ऐसी जगह.................आपका तहेदिल से इस्तेकबाल है भाई साहेब !
Albela Khatri said… वाह वाह वाह वाह
निहाल कर दिया साहेब
___जनाब राज़ नवादवी जी.........गज़ब है !
___मुबारक हो ये उम्दा शाइरी........
Albela Khatri said… aapka dili isteqbaal hai janaab !
Admin said…
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Kewal Prasad commented on Kewal Prasad's blog post !!! नव गीत !!!
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