मंजिल हर सोपान की, केवल है अवसान ।
मुश्किल है पहचानना, जीवन के सोपान ।।
छोटी-छोटी बात पर, होने लगे तलाक ।
पल में टूटें आजकल, रिश्ते सारे पाक ।।
छोटे से परिवार में, सीमित है औलाद ।
उस पर भी होते नहीं, आपस में संवाद ।।
पति-पत्नी के प्रेम का, अजब हुआ है हाल ।
प्रेम जाल में गैर के, दोनों हुए हलाल ।।
कत्ल प्रेम में आजकल, हर दिन होते आम ।
नाता जोड़ें गैर से, फिर होते बदनाम ।।
धोखा…
ContinueAdded by Sushil Sarna on August 19, 2025 at 3:00pm — 6 Comments
धोते -धोते पाप को, थकी गंग की धार ।
कैसे होगा जीव का, इस जग में उद्धार ।
इस जग में उद्धार , धर्म से रिश्ते झूठे ।
मन में भोग-विलास, आचरण दिखें अनूठे ।
कर्मों के परिणाम , देख फिर हरदम रोते ।
करें न मन को शुद्ध , गंग में बस तन धोते ।
सुशील सरना / 10-8-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on August 10, 2025 at 7:00pm — 4 Comments
दोहा पंचक. . . . . अपनत्व
अपनों से मिलता नहीं, अब अपनों सा प्यार ।
बदल गया है आजकल, आपस का व्यवहार ।।
अपने छूटे द्वेष में, कल्पित है व्यवहार ।
तनहा जीवन ढूँढता, अपनों का संसार ।।
क्षरण हुआ विश्वास का, बिखर गए संबंध ।
कहीं शून्य में खो गई, अपनेपन की गंध ।।
तोड़ सको तो तोड़ दो, नफरत की दीवार ।
इसके पीछे है छुपा, अपनों का संसार ।।
आपस में अपनत्व का, उचित नहीं पाखंड ।
रिश्तों को अलगाव का, फिर मिलता है दंड ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on May 7, 2025 at 4:41pm — 15 Comments
दोहा पंचक. . . . . नया जमाना
अपने- अपने ढंग से, अब जीते हैं लोग ।
नया जमाना मानता, जीवन को अब भोग ।।
मुक्त आचरण ने दिया, जीवन को वो रूप ।
जाने कैसे ढल गई, संस्कारों की धूप ।।
मर्यादा ओझल हुई, सिमट गए परिधान ।
नया जमाना मानता, बेशर्मी को शान ।।
सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।
नयी सभ्यता ने दिया, खूब इसे विस्तार ।।
निजी पलों का आजकल, नहीं रहा अब मोल ।
रहा मौन को देखिए, नया जमाना खोल ।।
सुशील सरना / 6-5-25
मौलिक…
ContinueAdded by Sushil Sarna on May 6, 2025 at 8:40pm — No Comments
दोहा दशम -. . . शाश्वत सत्य
बंजारे सी जिंदगी, ढूँढे अपना गाँव ।
मरघट में जाकर रुकें , उसके चलते पाँव ।।
किसने जाना आज तक, विधना रचित विधान ।
उसका जीवन पृष्ठ है , आदि संग अवसान ।।
जाने कितने छोड़ कर, मोड़ मिला वो अंत ।
जहाँ मोक्ष का ध्यान कर , देह त्यागते संत ।।
मरघट का संसार में, कोई नहीं विकल्प ।
कितनी भी कोशिश करो, ,बढ़ें न साँसें अल्प ।।
जीवन भर मिलता नहीं, साँसों को विश्राम ।
थम जाती है जिंदगी, जब हो अन्तिम शाम…
Added by Sushil Sarna on May 3, 2025 at 6:00pm — 6 Comments
दोहा सप्तक. . . . विविध
कह दूँ मन की बात या, सुनूँ तुम्हारी बात ।
क्या जाने कल वक्त के, कैसे हों हालात ।।
गले लगाकर मौन को, क्यों बैठे चुपचाप ।
आखिर किसकी याद में, अश्क बहाऐं आप ।।
बहुत मचा है आपकी. खामोशी का शोर ।
भीगे किसकी याद से, दो आँखों के कोर ।।
मन मचला जिसके लिए, कब समझा वह पीर ।
बह निकला चुपचाप फिर, विरह व्यथा का नीर ।।
दो दिल अक्सर प्यार में, होते हैं मजबूर ।
कुछ पल चलते साथ फिर, हो जाते वह दूर ।।
कहते हैं मजबूरियाँ,…
ContinueAdded by Sushil Sarna on May 1, 2025 at 12:52pm — 2 Comments
दोहा सप्तक. . . . . लक्ष्य
कैसे क्यों को छोड़ कर, करते रहो प्रयास ।
लक्ष्य भेद का मंत्र है, मन में दृढ़ विश्वास ।।
करते हैं जो जीत से, लक्ष्यों का शृंगार ।
उनको जीवन में कभी, हार नहीं स्वीकार ।।
आज किया कल फिर करें, लक्ष्य हेतु संघर्ष ।
प्रतिफल है प्रयासों का , लक्ष्य प्राप्ति पर हर्ष ।।
देता है संघर्ष ही, जीवन को उत्कर्ष ।
आज नहीं तो जीत का, कल छलकेगा हर्ष ।।
सच्ची कोशिश हो अगर, मंज़िल आती पास ।
मिल जाता संघर्ष को,…
Added by Sushil Sarna on April 30, 2025 at 7:30pm — 6 Comments
नहीं दरिन्दे जानते , क्या होता सिन्दूर ।
जिसे मिटाया था किसी , आँखों का वह नूर ।।
पहलगाम से आ गई, पुलवामा की याद ।
जख्मों से फिर दर्द का, रिसने लगा मवाद ।।
कितना खूनी हो गया, आतंकी उन्माद ।
हर दिल में अब गूँजता,बदले का संवाद ।।
जीवन भर का दे गए, आतंकी वो घाव ।
अंतस में प्रतिशोध के, बुझते नहीं अलाव ।।
भारत ने सीखी नहीं, डर के आगे हार ।
दे डाली आतंक को ,खुलेआम ललकार ।।
कर देंगे…
ContinueAdded by Sushil Sarna on April 26, 2025 at 1:00pm — 4 Comments
दोहा सप्तक. . . . उल्फत
याद अमानत बन गयी, लफ्ज हुए लाचार ।
पलकों की चिलमन हुई, अश्कों से गुलजार ।।
आँखों से होते नहीं, अक्स नूर के दूर ।
दर्द जुदाई का सहे, दिल कितना मजबूर ।।
उल्फत में रुसवाइयाँ, हासिल हुई जनाब ।
मिला दर्द का चश्म को, अश्कों भरा खिताब ।।
उलझ गए जो आँख ने, पूछे चन्द सवाल ।
खामोशी से ख्वाब का, देखा किए जमाल ।।
हर करवट महबूब की, यादों से लबरेज ।
रही सताती रात भर, गजरे वाली सेज ।।
हासिल दिल को इश्क में, ऐसी हुई किताब…
ContinueAdded by Sushil Sarna on April 18, 2025 at 5:29pm — 2 Comments
दोहा सप्तक. . . . . तकदीर
होती है हर हाथ में, किस्मत भरी लकीर ।
उसकी रहमत के बिना, कब बदले तकदीर ।।
भाग्य भरोसे कब भला, करवट ले तकदीर ।
बिना करम के जिंदगी, जैसे लगे फकीर ।।
बिना कर्म इंसान की, बदली कब तकदीर ।
श्रम बदले संसार में, जीने की तस्वीर ।।
चाहो जो संसार में, मन वांछित परिणाम ।
नजर निशाने पर करे, संभव हर संधान ।।
भाग्य भरोसे कब हुआ, जीवन का उद्धार ।
चाबी श्रम की खोलती, किस्मत का हर द्वार ।।
बिछा हुआ हर हाथ में,…
ContinueAdded by Sushil Sarna on April 11, 2025 at 2:30pm — 2 Comments
दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार
दृगजल से लोचन भरे, व्यथित हृदय उद्गार ।
बाट जोहते दिन कटा, रैन लगे अंगार ।।
तन में धड़कन प्रेम की, नैनन बरसे नीर ।
बैरी मन को दे गया, अनबोली वह पीर ।।
जग क्या जाने प्रेम के, कितने गहरे घाव ।
अंतस की हर पीर को, जीवित करते स्राव ।।
विरही मन में मीत की, हरदम आती याद ।
हर करवट पर मीत से, मन करता संवाद ।।
बैठ अनमनी द्वार पर, विरहन देखे राह ।
मन में उठती हूक सी , पिया मिलन की चाह ।
नैन पिया की याद…
ContinueAdded by Sushil Sarna on March 20, 2025 at 8:48pm — 4 Comments
दोहा पंचक. . . . . होली
अलहड़ यौवन रंग में, ऐसा डूबा आज ।
मनचलों की टोलियाँ, खूब करें आवाज ।।
हमजोली के संग में, खेले सजनी रंग ।
चुपके-चुपके चल रहा, यौवन का हुड़दंग ।।
पिचकारी की धार से, ऐसे बरसे रंग ।
जीजा की गुस्ताखियाँ, देख हुए सब दंग ।।
कंचन काया का किया, पति ने ऐसा हाल ।
अंग- अंग रंग में ढला, यौवन लगे कमाल ।।
पारदर्शिता देख कर, दिलवाले हैरान ।
पिचकारी के रंग से , डोल उठा ईमान ।।
सुशील सरना / 13-3-25
मौलिक एवं…
ContinueAdded by Sushil Sarna on March 13, 2025 at 8:44pm — No Comments
दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते
तार- तार रिश्ते हुए, मैला हुआ अबीर ।
प्रेम शब्द को ढूँढता, दर -दर एक फकीर ।1।
सपने टूटें आस के , खंडित हो विश्वास ।
मुरझाते रिश्ते वहाँ, जहाँ स्वार्थ का वास ।2।
देख रहा संसार में, अकस्मात अवसान ।
फिर भी बन्दा जोड़ता, विपुल व्यर्थ सामान ।3।
ऐसे टूटें आजकल, रिश्ते जैसे काँच ।
पहले जैसे प्रेम की, नहीं रही अब आँच ।4।
रिश्तों के माधुर्य में, झूठी हुई मिठास ।
मन से तो सब दूर हैं , तन से चाहे पास…
Added by Sushil Sarna on March 3, 2025 at 4:32pm — No Comments
दोहा पंचक. . . . . उमर
बहुत छुपाया हो गई, व्यक्त उमर की पीर ।
झुर्री में रुक- रुक चला, व्यथित नयन का नीर ।।
साथ उमर के काल का, साया चलता साथ ।
अकस्मात ही छोड़ती, साँस देह का हाथ ।।
बैठे-बैठे सोचती, उमर पुरातन काल ।
शैशव यौवन सब गया, बदली जीवन चाल ।।
दौड़ी जाती जिंदगी, ओझल है ठहराव ।
यादें बीती उम्र की, आँखों में दें स्राव ।।
साथ उमर के हो गए, क्षीण सभी संबंध ।
विचलित करती है बहुत, बीते युग की गंध ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 28, 2025 at 6:02pm — 4 Comments
कुंडलिया. . . .
जीना है तो सीख ले ,विष पीने का ढंग ।
बड़े कसैले प्रीति के,अब लगते हैं रंग ।।
अब लगते हैं रंग , जगत् में छलिया सारे ।
पल - पल बदलें रूप, स्वयं का साँझ सकारे ।।
बड़ा कठिन है सोम, भरोसे का यों पीना ।
विष को जीवन मान , पड़ेगा यों ही जीना ।।
सुशील सरना / 27-2-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on February 27, 2025 at 8:52pm — 6 Comments
दोहा पंचक. . . . नवयुग
प्रीति दुर्ग में वासना, फैलाती दुर्गन्ध ।
चूनर उतरी लाज की, बंध हुए निर्बंध ।।
पानी सूखा आँख का, न्यून हुए परिधान ।
बेशर्मी हावी हुई, भूले देना मान ।।
सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।
पश्चिम की यह सभ्यता, लील रही संस्कार ।।
पश्चिम के परिधान का, फैला ऐसा रोग ।
नवयुग ने बस प्यार को, समझा केवल भोग ।।
अवनत जीवन के हुए, पावन सब प्रतिमान ।
भोग पिपासा आज के, नवयुग की पहचान ।।
सुशील सरना /…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 21, 2025 at 8:29pm — No Comments
दोहा सप्तक. . . . . . अभिसार
पलक झपकते हो गया, निष्ठुर मौन प्रभात ।
करनी थी उनसे अभी, पागल दिल की बात ।।
विभावरी ढलने लगी, बढ़े मिलन के ज्वार ।
मौन चाँद तकने लगा, लाज भरे अभिसार ।।
लगा लीलने मौन को, दो साँसों का शोर ।
रही तिमिर में रेंगती, हौले-हौले भोर ।।
अद्भुत होता प्यार का, अनबोला संवाद ।
अभिसारों में करवटें, लेता फिर उन्माद ।।
प्रतिबंधों की तोड़ता, साँकल मौन प्रभात ।
रुखसारों पर लाज की, रह जाती सौगात ।।
कुसुमित मन…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 17, 2025 at 3:58pm — No Comments
दोहा दशम - ..... उल्फत
अश्कों से जब धो लिए, हमने दिल के दाग ।
तारीकी में जल उठे, बुझते हुए चिराग ।।
ख्वाब अधूरे कह गए, उल्फत के सब राज ।
अनसुनी वो कर गए, इस दिल की आवाज ।।
आँसू, आहें, हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।
नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।
माना उनकी बात का, दिल को नहीं यकीन ।
आयें अगर न ख्वाब है, उल्फत की तौहीन ।।
यादों से हों यारियाँ , तनहाई से प्यार ।
उल्फत का अंजाम बस , इतना सा है यार ।।
मिला इश्क को हुस्न से,…
ContinueAdded by Sushil Sarna on February 10, 2025 at 1:04pm — 3 Comments
रैन स्वप्न की उर्वशी, मौन प्रणय की प्यास ।
नैन ढूँढते नैन में, तृषित हृदय मधुमास ।।
वातायन की ओट से, हुए नैन संवाद ।
अरुणिम नजरों में हुए, लक्षित फिर उन्माद ।
मृग शावक सी चाल है, अरुणोदय से गाल ।
सर्वोत्तम यह सृष्टि की, रचना बड़ी कमाल ।।
गौर वर्ण झीने वसन, मादकता भरपूर ।
जैसे हो यह सृष्टि का, अलबेला दस्तूर ।।
जब-जब दमके दामिनी, उठे मिलन की प्यास।
अन्तस में व्याकुल रहा, बांहों का मधुमास…
Added by Sushil Sarna on February 4, 2025 at 9:30pm — No Comments
कुंडलिया. . .
मन से मन का हो गया, मन ही मन अभिसार ।
मन में मन के प्रेम का, सृजित हुआ संसार ।
सृजित हुआ संसार , हाथ की चूड़ी खनकी ।
मुखर हुआ शृंगार , बात फिर निकली मन की ।
बंध हुए निर्बंध ,भाव सब निकले तन से ।
मन ने दी सौगात , प्रीति को सच्चे मन से ।
सुशील सरना / 2-2-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on February 2, 2025 at 5:05pm — No Comments
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