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नयना(आरती)कानिटकर
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नयना(आरती)कानिटकर posted a blog post

मैं और मेरा मन

पहन रखा हैं  मैने गले में, एकगुलाबी चमक युक्त बडा सा मोती जिसकी आभा से दमकता हैं       मेरा मुखमंडल  मैं भी घूमती हूँ  इतराती हुई उसके नभमंडल में किंतु नहीं जानती थी समय के साथ होगा बदलाव उसमें भी धूप, बादल, बारिश आंधी के थपेड़ो को झेलते बदलेगा उसका तेज बुरी, काली,झपटने को आतुर  लोंगो की नज़रों से बदलेगा उसका वैभव अब तक उसे हथेली की अंजुरी में रख निहारने वाली मैं निस्तब्ध हूँ कोशिश में लगी हूँ कि अब ढक लू उसे हथेलियों से कि ना पड़े ऐसी कोई दृष्टि जो खत्म कर दे  उसकी भव्यता  और तब गले में लटका…See More
Jun 25
नयना(आरती)कानिटकर commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"आ. विजय जी, सुशिल जी, डा. छोटेलाल जी आप सभी का आभार.समर जी अवश्य सुधार करती हूँ."
Jun 25
vijay nikore commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"भाव अच्छे पिरोय हैं। रचना अच्छी लगी। बधाई आदरणीया नयना जी।"
Jun 23
Samar kabeer commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"मुहतरमा नयना(आरती)कानिटकर जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'मैं भी घूमती हूँ  ईतराती हुई' इस पंक्ति में 'ईतराती' को "इतराती" कर लें ।"
Jun 23
Sushil Sarna commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"आदरणीया जी अंतर्मन के भावों को चित्रित करती इस भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई।"
Jun 22
डॉ छोटेलाल सिंह commented on नयना(आरती)कानिटकर's blog post मैं और मेरा मन
"आदरणीया नयना जी बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना के लिए बहुत बहुत बधाई"
Jun 21
नयना(आरती)कानिटकर posted a blog post

मैं और मेरा मन

पहन रखा हैं  मैने गले में, एकगुलाबी चमक युक्त बडा सा मोती जिसकी आभा से दमकता हैं       मेरा मुखमंडल  मैं भी घूमती हूँ  इतराती हुई उसके नभमंडल में किंतु नहीं जानती थी समय के साथ होगा बदलाव उसमें भी धूप, बादल, बारिश आंधी के थपेड़ो को झेलते बदलेगा उसका तेज बुरी, काली,झपटने को आतुर  लोंगो की नज़रों से बदलेगा उसका वैभव अब तक उसे हथेली की अंजुरी में रख निहारने वाली मैं निस्तब्ध हूँ कोशिश में लगी हूँ कि अब ढक लू उसे हथेलियों से कि ना पड़े ऐसी कोई दृष्टि जो खत्म कर दे  उसकी भव्यता  और तब गले में लटका…See More
Jun 20
नयना(आरती)कानिटकर replied to योगराज प्रभाकर's discussion “ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी”  अंक-41 में शामिल सभी लघुकथाएँ
" आ. भाई जी लघुकथा गोष्ठी अंक ४१ के आयोजन हेतु बधाई. मैं जानती हूँ मैं बडी देर से आपको बधाई दे रही पर....मेरा नम्र निवेदन है कि मुझे मेरी लघुकथा “सहवास” जो कि शीर्षक क्रमाँक- २२ पर स्थापित है, उसे  संशोधन के साथ निम्न रूप में…"
Sep 27, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
" नमस्कार सर. पता नहीं क्यो जब मैं अतिव्यस्त होती हूँ तभी मुझे कथा सुझती हैं आप तो जानते आज का अंतिम दिन हैं रिटर्न फाइलिंग का और अचानक ये कथानक सुझा. ये सोचकर पोस्ट कर दी कि वर्तनी सुधार मैं संकलन में कर लूँगी. अगली बार के लिए ध्यान रखूँगी.…"
Aug 31, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-41
"सहवास दो हफ़्ते से ज्यादा हो गये हैं  उन्हें आय.सी.यू. में भर्ति हुए. बुढापा, डयबिटिज, ब्लडप्रेशर सबने एक साथ जोर मार दिया हैं.वेंटिलेटर सारे शरीर में नलियाँ ही नलियाँ .दस मिनट बैठने देती है सिस्टर.  मैं  भी तो बुढा गई हूँ . थक जाती…"
Aug 31, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to KALPANA BHATT ('रौनक़')'s discussion ककनमठ( उपन्यास) समीक्षा in the group पुस्तक समीक्षा
"पुस्तक को बहुत बारिकी से पढते हुए समीक्षा लिखी हैं. पुस्तक पढने का मन हो आया. बहुत बहुत बधाई"
Aug 9, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-38 (विषय: "डर")
"हार्दिक बधाई आपको आ. तस्दीक अहमद खान जी । डर विषय को उम्दा तरीके  परिभाषित कर रही हैं आपकी कथा।"
May 31, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-38 (विषय: "डर")
"  कनक जी वाह!  बहूत बढिया रचना, बधाई आपको .खासकर इन पंक्तियों के लिए//"जंगल में आजकल आदमखोर घूम रहा है जल्दी आ जाना।" सास ने सुबह घर से निकलते समय खबर दी थी।"उफ्फ ये कमर दर्द..." अब चला नहीं जा रहा था। घर भी जल्दी जाना…"
May 31, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-38 (विषय: "डर")
"लिव-इन रिलेशन के डर को दिखाती अच्छी रचना अर्चना जी . बधाई स्वीकर करे."
May 31, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-38 (विषय: "डर")
"आ.उस्मानी जी उम्दा कटाक्ष करती रचना किंतु "डर" उतना उभरकर नहीं आपा. कुछ विचार किजिएगा इसपर. फिर भी बधाई तो बनती ही हैं"
May 31, 2018
नयना(आरती)कानिटकर replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-38 (विषय: "डर")
"आ.आरिफ़ जी आदाब, आप ओर अच्छा लिख लेते हैं इस बार व्यक्तिगत तौर पर  रचना थोडा कमजोर लगी मुझे किंतु ऐसा हो जाता हैं कभी-कभी. बहरअहाल सहभागिता हेतु बधाई स्वीकार करे"
May 31, 2018

Profile Information

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Female
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Bhopal
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BHopal
Profession
S.A
About me
i try to learn every thing which possible for me.taking interest in reading & writing

नयना(आरती)कानिटकर's Blog

मैं और मेरा मन

पहन रखा हैं 

मैने गले में, एक

गुलाबी चमक युक्त

बडा सा मोती

जिसकी आभा से दमकता हैं      

मेरा मुखमंडल 

मैं भी घूमती हूँ  इतराती हुई

उसके नभमंडल में…

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Posted on June 20, 2019 at 10:00am — 5 Comments

सुबह की धूप

 खुद को भूली वो जब दिन भर के काम निपटा कर अपने आप को बिस्तर पर धकेलती तो आँखें बंद करते ही उसके अंदर का स्व जाग जाता और पूछता " फिर तुम्हारा क्या". उसका एक ही जवाब "मुझे कुछ नहीं चाहिए. कभी ना कभी तो मेरा भी वक्त आएगा. उसे याद है अपने छोटे से घर की…

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Posted on January 6, 2018 at 6:45pm — 3 Comments

हस्तरेखा (लघुकथा)

"इतना मान-सम्मान पाने वाली, फिर भी इनकी हथेली खुरदरी और मैली सी क्यों है?"-- हृदय रेखा ने धीरे-धीरे बुदबुदाते हुए दूसरी से पूछा तो हथेली के कान खड़े हो गए।

"बडे साहसी, इनका जीवन उत्साह से भरपूर है,फिर भी देखो ना..." मस्तिष्क रेखा ने फुसफुसा कर ज़बाब दिया।

" देखो ना! मैं भी कितनी ऊर्जा लिए यहाँ हूँ, किंतु हथेली की इस कठोरता और गदंगी से.....!" जीवन रेखा भी कसामसाई।

"अरे! क्यों नाहक क्लेष करती हो तुम तीनों? भाग्य रेखा…

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Posted on October 7, 2017 at 4:00pm — 11 Comments

वो दिन---

"तुम रातभर बैचेन थी। हो सके तो आज आराम करो। मैंने चाय बनाकर थर्मस में डाल दी हैं। मैं नाश्ता, खाना आफ़िस में ही ली लूँगा, तुम बस अपना बनवा लेना। आफ़िस से छुट्टी ले लो।"

पास तकिए पर रखे कागज को पढा और चूमकर सीने पर रख लिया। आफ़िस में इस एक दिन के अवकाश की लड़ाई लड़ी और जीती भी थी।

चाय का कप लेकर बालकनी में आई तो सहज ही प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनती उन लड़कियों पर नजर गयी। उफ्फ, ये लोग क्या करती होंगी इन दिनों? कप हाथ में लिए-लिए ही झट नीचे आयी। उन्हें आवाज लगाकर अपने…

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Posted on September 25, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

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At 7:45pm on November 30, 2017, डॉ छोटेलाल सिंह said…
आदरणीया नयना जी आपने लघुकथा के माध्यम से जो चित्र खींचा वह मर्मस्पर्शी है बहुत ही रोचक और प्रभावकारी है बहुत बहुत मुबारकबाद इस महान उपलब्धि के लिए
At 2:01pm on September 3, 2013, annapurna bajpai said…

welcome ,Nayana ji in our O B O family . 

 
 
 

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"आदरणीया जी बहुत बहुत बधाई बहुत अच्छी कोशिश की सादर ।"
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