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Mahendra Kumar
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Latest Activity

Mohammed Arif commented on Mahendra Kumar's blog post ग़ज़ल - वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने
"आदरणीय महेंद्र कुमार जी आदाब, बहुत ही मारक क्षमता वाली ग़ज़ल का तोहफ़ा दिया आपने । हर शे'र माक़ूल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजनों के आने का इंतज़ार करेंं ।"
11 minutes ago
Mahendra Kumar posted a blog post

ग़ज़ल - वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने

फिर मुहब्बत से लिया नाम तुम्हारा उसने वार मुझ पर किया है कितना करारा उसनेमेरी कश्ती को समन्दर में उतारा उसने और फिर कर दिया तूफ़ाँ को इशारा उसनेडूबते वक़्त बहुत मैंने दी आवाज़ मगर बैठ कर दूर से ही देखा नज़ारा उसनेबात इक बार की होती तो न होता कुछ भी मुझपे ख़ंजर ये उतारा है दुबारा उसनेग़ैर भी कोई गुज़ारे न किसी ग़ैर के साथ वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसनेमेरी तस्वीर पे तस्वीर बना कर ख़ुद की अक्स अपना मेरे अन्दर से उभारा उसनेदाँव पर ख़ुद को लगाया जो मुहब्बत में तो अब तलक जो भी था जीता हुआ हारा…See More
49 minutes ago
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post दायरा
"रचना को मान देने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया आ. मोहित जी. दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. सादर."
13 hours ago
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post दायरा
"बहुत-बहुत शुक्रिया आ. अफरोज़ ही. हार्दिक आभार. सादर."
13 hours ago
Mahendra Kumar commented on Mahendra Kumar's blog post दायरा
"सादर आदाब आ. समर सर. रचना पर उपस्थित हो कर मेरा हौसला बढ़ाने के लिए आपका हृदय से आभारी हूँ. बहुत-बहुत धन्यवाद. सादर."
13 hours ago
Mahendra Kumar commented on Samar kabeer's blog post ग़ज़ल बतौर-ए-ख़ास ओबीओ की नज़्र
"यही आरज़ू लेके आया हूँ यारोमैं इस मंच को लूटना चाहता हूँ ...लूट लिया सर आपने. ये समझो,मुझे कुछ भी आता नहीं हैमैं सब कुछ यहाँ सीखना चाहता हूँ ...आपकी सादगी को सलाम. मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बतमैं तुमसे भला और क्या चाहता हूँ ...बेहतरीन शेर. आ.…"
13 hours ago
Mahendra Kumar commented on Samar kabeer's blog post वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ
"वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ ...वाह! क्या ख़ूब मतला है. मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँमैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ  ...ज़बरदस्त शेर. आ. समर सर, इस ख़ूबसूरत ज़मीन पर बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको दिल से ढेर सारी…"
13 hours ago
Mahendra Kumar commented on Samar kabeer's blog post ग़ज़ल :- जन्नत में हर इक चीज़ है,दुनिया तो नहीं है
"इक बात है यारों कोई शिकवा तो नहीं हैजन्नत में हर इक चीज़ है दुनिया तो नहीं है ...वाह! मैं चाँद के बारे में बस इतना ही कहूँगादिलकश है मगर आपके जैसा तो नहीं है ...ग़ज़ब! क्या ही शानदार ग़ज़ल कही है आपने आ. समर सर. शेर दर शेर दिल से दाद के साथ मुबारक़बाद…"
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on Samar kabeer's blog post ग़ज़ल :- कहाँ ये दिल बहले
"वाह! क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है सर. हर शेर लाजवाब है. दिल से ढेर सारी बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on बासुदेव अग्रवाल 'नमन''s blog post छोटी बहर की ग़ज़ल
"छोटी बह्र पर अच्छी ग़ज़ल कही है आपने आ. बासुदेव जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on Sushil Sarna's blog post तेरे इंतज़ार में ...
"बेहद भावपूर्ण कविता लिखी है आपने आ. सुशील सरना जी. अच्छी लगी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर."
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on rajesh kumari's blog post आईने में सिंगार कौन करे (फिलबदीह ग़ज़ल 'राज')
"आ. राजेश मैम, बहुत अच्छी लगी आपकी ग़ज़ल. ये अशआर विशेष रूप से पसन्द आये : दिल को फिर बेकरार कौन करे आपका ऐतबार कौन करे जब नजर से ही काम चल जाए तीर को  दागदार कौन करे आ. राज साहिब से मैं भी सहमत हूँ. यहाँ "कत्ल का दिन अगर मुकर्रर है"…"
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on रामबली गुप्ता's blog post ग़ज़ल-गलतियाँ किससे नही होतीं-रामबली गुप्ता
"आ. रामबली जी, उम्दा ग़ज़ल कही है आपने. यह शेर विशेष रूप से पसन्द आया : प्रेम पूजा, प्रेम ईश्वर, प्रेम के ही पंथ सब, प्रेम ही कुरआन गीता बाइबिल के सार में। क्षमा चाहूँगा पर यह शेर मुझे पसन्द नहीं आया. हालाँकि अपनी-अपनी सोच है. आधुनिकता के दुशासन ने…"
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on Manan Kumar singh's blog post गजल(कह रहे,...)
"आ. मनन जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. क्या ये मिसरे ऐसे हो सकते हैं : सच ये है, सच को दबाया जा रहा।1 अब सवेरे को बुलाया जा रहा।7 देख लीजिएगा. सादर."
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post बाज़ार में जूतमपैजार (लघुकथा)/ शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"वाह! बहुत ही उम्दा लघुकथा है आ. शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.  "दुकान के नौकर और मालिक व जूते-चप्पलों की कम्पनियाँ" सादर."
14 hours ago
Mahendra Kumar commented on Tasdiq Ahmed Khan's blog post ग़ज़ल -तरही -2(उनके सोए हुए जज़्बात जगा भी न सकूँ )
"अच्छी ग़ज़ल है आ. तस्दीक़ जी. ये शेर विशेष रूप से पसन्द आये : इतना मजबूर भी मुझको न खुदा कर देना अपने घर बार को इज़्ज़त से चला भी न सकूँ | वो सितमगर सही तस्दीक़ मगर है दिलबरउस की फ़ितरत मैं ज़माने को बता भी न सकूँ | हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.…"
14 hours ago

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Gender
Male
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Allahabad
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Fatehpur

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ग़ज़ल - वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने

फिर मुहब्बत से लिया नाम तुम्हारा उसने

वार मुझ पर किया है कितना करारा उसने

मेरी कश्ती को समन्दर में उतारा उसने

और फिर कर दिया तूफ़ाँ को इशारा उसने

डूबते वक़्त बहुत मैंने दी आवाज़ मगर

बैठ कर दूर से ही देखा नज़ारा उसने

बात इक बार की होती तो न होता कुछ भी

मुझपे ख़ंजर ये उतारा है दुबारा उसने

ग़ैर भी कोई गुज़ारे न किसी ग़ैर के साथ

वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने

मेरी तस्वीर पे तस्वीर बना कर ख़ुद…

Continue

Posted on September 26, 2017 at 10:03am — 1 Comment

ग़ज़ल - वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ

बह्र : 122 122 122 122



वफ़ाओं के बदले वफ़ा चाहता हूँ

सभी की तरह मैं ये क्या चाहता हूँ



दिवानों का मुझ पर असर हो गया है

ख़ता तो नहीं की सज़ा चाहता हूँ



ख़ुदा ही सही पर हटो सामने से

मैं थोड़ी सी ताज़ा हवा चाहता हूँ



वही बस वही बस वही चाहिए बस

नहीं कुछ भी उसके सिवा चाहता हूँ



यहाँ है, वहाँ है, कहाँ है मुहब्बत

बताओ मैं उसका पता चाहता हूँ



वो कैसा था ये जानने के लिए ही

वो कैसा है ये जानना चाहता हूँ



ज़माने… Continue

Posted on September 12, 2017 at 6:34pm — 30 Comments

ग़ज़ल - ढोते फिरेंगे आप मुहब्बत कहाँ कहाँ

बह्र : 221/2121/1221/212



इस दोस्ती के बीच तिजारत कहाँ कहाँ

तुमने लगायी है मेरी कीमत कहाँ कहाँ



तुम मुझ से कह रहे हो कि मैं होश में रहूँ

नासेह दे रहे हो नसीहत कहाँ कहाँ



सब कुछ हमें ख़बर है नुमाइश के दौर में

करता है कौन कितनी सियासत कहाँ कहाँ



हैं आप जो ख़ुदा तो मुझे पूछना है ये

पहुँची है मुफ़लिसों की इबादत कहाँ कहाँ



गंगा में ले के जाइए और फेंक आइए

ढोते फिरेंगे आप मुहब्बत कहाँ कहाँ



तुम पूछ तो रहे हो मगर क्या… Continue

Posted on September 3, 2017 at 12:39pm — 6 Comments

दायरा

"तेरे पिता उस संगठन से जुड़े हैं जो इन्हें देखना तक नहीं चाहता और तू कहता है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता?" कार्तिक आज भी उसी रेस्टोरेंट में बैठा था जहाँ सुमित ने कभी उससे ये बातें कही थीं। उसके हाथ में परवीन शाकिर की किताब थी तो ज़ेहन में ये ग़ज़ल, तुझसे कोई गिला नहीं है, क़िस्मत में मेरी सिला नहीं है।

"क्या ख़ूब ग़ज़ल सुनाई तुमने। किसकी है?" न्यू ईयर की पार्टी में लोगों ने ज़ोया से पूछा जिसने अभी हाल ही में ऑफिस ज्वाइन किया था।

"परवीन शाकिर की।" यह पहली बार था…

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Posted on June 8, 2017 at 10:30am — 8 Comments

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"प्रिय रोहित जी आदाब, अच्छी रचना । यह रचना आपने किस छांदसिक विधान में लिखी है, बताने का कष्ट करें?…"
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"जनाब अफरोज़ साहब ,ग़ज़ल  पर शिरकत और सुखन नवाजी का तहे दिल से शुक्रिया "
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